सफ़ेद दाग और होम्योपैथी- आशा की एक किरण -भाग-१ (Leucoderma & homeopathy- an ultimate hope -Part-1)

  leucoderma लियकोडर्मा पर पिछली दो पोस्टों से अब की बार कुछ हट कर बात करते हैं। लेकिन यह बिल्कुल आवशयक नही कि मेरे तरीके दूसरे होम्योपैथिक चिकित्सक पसन्द करें और एक राय बनायें । सच तो यह है कि आज होम्योपैथी क्लासिकल और नान -क्लासिकल होम्योपैथी मे बुरी तरह से फ़ँस कर रह गयी है। हर चिकित्सक का औषधि देने का तरीका अलग-2 होता है , भले ही हम अपने को कितने सिद्दांत्वादी कह ले , लेकिन कही न कही हम करते वही हैं जो हम किलीनिकल प्रैकिटिस मे सीखते हैं। क्या क्लासिकल होम्योपैथी गलत है- बिल्कुल नहीं , मेरे यह लिखने का तात्पर्य यह कदापि नहीं है । हैनिमैन ने भी आर्गेनान मे अपने जीवित रहने तक छह बार सुधार किया , लेकिन उसके बाद क्या हुआ ? कुछ दिन पूर्व कलकत्ता के डां शयामल बैनर्जी ने बातों – 2 मे बहुत ही महत्वपूर्ण इशारा किया और मै डा बैनर्जी की बात से काफ़ी हद तक सहमत भी हूँ । बतौर डा बैनर्जी

“अकसर रिपर्टार्जेशन करते समय या तो पोलीक्रेस्ट औषधिया सामने आती हैं या ऐसी औषधियाँ जो कुछ मिलती हुयी या काफ़ी हद तक मिलती प्रतीत होती हु्यी या ऐसी मे वह औषधियाँ जो मियाज्म की पृष्ठभूमि से हैं लेकिन ऐसी औषधियाँ जो नयी और हाल ही मे आयी हैं वह लगभग छूट ही जाती हैं …. ”

यह बात काफ़ी हद तक सच भी है ।

 कुछ इसी तरह के विचार डां देश बन्धु वाजपेजी जी ने मेरी एक पोस्ट सेंकड प्रिसक्र्पशन और सही पोटेन्सी के चुनाव पर रखी थी । आपके अनुसार,

Since commence of Homeopathic doctrine in existence from Medicine of Experiences unto the appearance of the Organon of Medicine 6th edition, Hahnemann have changed many times his doctrine and philosophy, which he laid down in earliest period in their subsequent editions. These changes are itself proved that there is need to make much more changes in the practical way. Why we forget that Boenninghausen convinced Hahnemann for alternation of medicine rule inclusion in Organon. If you go Hahnemannian Life History and also in some writings, Hahnemann himself used and advocated alternation of two remedies at a time. Why you forget the famous trio of Boenninghausen, which is still effective in Spasmodic croup.But due to opposition of the then followers Hahnemann geared back to include this law.

हाल के दिनो मे देखें काफ़ी नयी होम्योपैथिक औषधियाँ प्रयोग के लिये तैयार हैं , लेकिन बात वही आ कर फ़ँस जाती है कि इनका उपयोग करने की जहमत कौन उठाये ।  ओ. बी. जूलियन की मैटिया मेडिका , डा घोष की ड्र्ग्स आफ़ हिन्दुस्तान, ऎन्शुट्ज की रेअर होम्योपैथिक मेडिसिन्स मे बहुत सी नयी औषधियों का समावेश है , उनको व्यवहार मे लाना तो होगा , मगर कैसे ? जब आप उनका उपयोग ही नही करोगे तो कहाँ से वह कसौटी पर उतरेगीं, जबकि इन औषधियों का कार्य कई रोगों मे अधिक त्वरित है। यही हाल बैच फ़्लावर औषधि और मदर टिन्चर के साथ भी है । डां रौजर वान वैन्डर्वुर्ड की कम्पलीट रिपर्ट्री को खोल कर देखें तो बहुत सी औषधियों के क्लीनिकल प्रमाण लियकोडर्मा मे दिखते हैं , यह बात अलग कि इनमे से अधिकांश औषधि भारत मे नही मिलती , और शायद इनका न मिलने का कारण होम्योपैथिक चिकित्सकों द्वारा नयी औषधियों के प्रति अरुचि दिखाना   है ।
लेकिन मैने पाया कि पुराने और जटिल रोगों मे अगर हम क्लासिकल और नान-क्लासिकल होम्योपैथी का संगम ले कर चलते हैं तो उनके परिणाम अधिक सुखद दिखते हैं। मै समझता हूँ कि बहुत से होम्योपैथिक चिकित्सक इनका प्रयोग सफ़लता पूर्वक कर रहे हैं लेकिन बोलने की हिमाकत नही करते क्योंकि फ़िर उनकी टाँग- खिचाई यह क्लासिकल वाले कुछ अधिक ही कर डाल देते हैं ) , तो जाहिर है कि कि मै हैनिमैन और केन्ट के तरीको से थोडा हट कर बात कर रहा हूँ, हाँ , यही सत्य है, कम से कम लियकोडरमा के रोगियों मे मै अपने ही तरीके से चलना पसन्द करता हूँ। हर साल कुछ नये रोगी लियकोडर्मा के मिलते रहते हैं , कुछ इनमे से ठीक होते हैं तो कुछ नही भी और कुछ बिना समय दिये ही जल्दी भाँगने मे भलाई समझते हैं , इतने सालों मे मै अपने कोई रिकार्ड व्यवस्थित न रख पाया लेकिन गत वर्ष होम्पैथ के case analysis साफ़्टवेऐर से लियकोडर्मा के रोगियों की सही ढँग से समीक्षा करने का मौका पडा । इस एक साल के दौरान २२ रोगी लिये गये जिनमें से ७ रोगियों ने १-२ महीने के अन्तराल पर इलाज छोडा , बाकी बचे १५ , इनमे से ७ पूर्णतया ठीक हुये और ४ को कुछ महीने के बाद मना करना पडा क्योंकि इनमे रोग  के पैच काफ़ी बडॆ थे और बाकी बचे ४ जिनका इलाज अभी चल रहा है और रोग मे कमी दिखा रहे हैं।
वैसे जब मै अपने तरीको की ही बात करूँ तो सबसे पहले रोग के प्रमुख कारण ,लियकोडर्मा रोगियों के लिये आहार और पथ्य,  विभिन्न होम्योपैथिक और दूसरी पद्दतियों के चिकित्सकों के मत और  उनके सफ़ल तरीको   पर भी एक चर्चा कर लेना आवशयक समझता हूँ। साथ ही में कुछ टिप्स B.H.M.S. छात्रॊं के लिये भी, विशेष कर रिपर्टाराजेशन करते समय आने वाली दुशवारियों और उनके हल पर भी रहेगीं । एक नजर हम डा सहगल की  “Revolutionized Homoeopathy  यानि इन्कलाबी होम्योपैथी ” पर भी डालेगें और साथ ही मे बैच फ़्लावर पर भी एक नजर रहेगी । लेकिन यह सब देखेगें किसी दूसरी पोस्ट में ।  बास आज इतना ही !

क्रमश: आगे जारी ………

 देखें  लियकोडर्मा पर संबधित पोस्ट :

16 responses to “सफ़ेद दाग और होम्योपैथी- आशा की एक किरण -भाग-१ (Leucoderma & homeopathy- an ultimate hope -Part-1)

  1. चलो, एक आशा की किरण तो है.

  2. बहुत उपयोगी जानकारी दे रहे हैं आप। इसी तरह के प्रयत्न ही चिकित्सा सम्बन्धी विषयों पर हिन्दी में सामग्री बढ़ायेंगे जिससे जनसामान्य का भी भला होगा, हिन्दी का भी और भारत का भी।

  3. sir, i would like to know about any online free homeosoftware . plz help me.

  4. @Amit Jain
    A new online repertory based on James Tyler Kent repertory is now available:
    http://www.pietro-lusso.com/onlinerep/index.php
    However, I found it’s bit slow even on broadband .
    There is another link for the online Kent repertory:
    http://www.homeoint.org/hidb/kent/index.htm
    I personally feel it’s the best so far . But the concept & layout of pietro-lusso is fairly good .

  5. Thanks Dr. Tondon, I have gone through your this post. I have seen the data number of your treated patient, in which 7 is OK, 7 left the treatment within 2 months, 4 you have advised to leave the treatment and 4 is still under in your treatment. Yet, I will not like to say any comment of the failures but I will highly appreciate you that you have presented the reality of the Homoeopathic practice situation before the practitioners, which is scare today. Every big Homoeopath will tell you about his success, but no one will tell you about his failures honestly. I appreciate you again.

    Now the question is here, why we fail to provide normal health condition to our patient, which we recieve for the treatment ? There is many reasons, in which most of them are not studied in the curriculam , during our study in medical college. The prime and first requirement is, how we live, pass our day and night, what we eat and what act , we have to do daily to maintain our normal health condition. This is a major draw back with every patient. If a patient is taking Chaumin, chienes food, pickles, snacks from market, spiecy food, vinegars etc etc exciting foods, he will never recover his health, due to the food intake, which will have adverse action to recovery of disease. If a patient is not maintaining his normal health condition, he will never get recovery.

    Hahnemann instructed in Organon to remove the “obstacles of cure”. These are the obstacles and a physician have to find it. It is the duty of physician, how and what he instruct about the food intake, what he should do or not. If patient is not following the instructions of the physician, he should tactfully tackle the patient and with the strict warning warn patient. This is the first requirement to instruct the patient , what he should do.

    Next come to medicine. The prime requirement is to probe the beginning of complaints. I have seen a common complaints in almost all leucoderma patient that they are suffering with the Irritable Bowel Syndromes IBS, Inflammatory condition of Bowels ICB, Gastritis,
    Poor function of Liver, Poor function of Gall bladder, Spleenomegaly, Hepatospleenomegaly
    Hyperacidity, in females menstrual anomalies , hormonal anomalies. The disease is a form of Physical problems, which a physician should find out and that is the “cause of disease” according to Hahnemann.

    Regarding medicine, in my opinion, it is very risky to experiment on the patient. No single medicine is capable to recover the patient’s complaints, this is my experience since over 40 years in White patches patients. I use mixture of mother tinctures, few single medicine in alternation, few Ayurvedic drugs and restrictions in diets, with the follow health maintenance rules.

  6. @ Dr D.B.Bajpei,

    Hahnemann instructed in Organon to remove the “obstacles of cure”. These are the obstacles and a physician have to find it. It is the duty of physician, how and what he instruct about the food intake, what he should do or not. If patient is not following the instructions of the physician, he should tactfully tackle the patient and with the strict warning warn patient. This is the first requirement to instruct the patient , what he should do.

    आपकी बात से मै पूर्णतया सहमत हूँ , एक सफ़ल इलाज के पैमाने मे परहेज भी है और बहुत सी रुकावटें जिन्हें रोगी को बताने पर भी वह पालन नही करता जैसे आपने फ़ास्ट फ़ूड आदि के बारे मे इंगित किया है । मै जल्द ही इसी श्रृंखला की दूसरी कडी मे यह सब भी ले कर आऊँगा और बकायदा विभिन्न चिकित्सकों के तथ्य और प्रमाणों के साथ ।

  7. sir ji i m waiting for ur next part. jaldi likhiye. u r doing a good work sir.

  8. पिंगबैक: Leucoderma and Homeopathy ( सफ़ेद दाग और होम्योपैथी) « होम्योपैथी-नई सोच/नई दिशायें

  9. Dr. Tondon, I want to say some again. The Photo, which you have pasted in this article to show the Leucoderma patches, are actually suffering from the pathophysiology of the orbital and palpebral part of Orbicularis oculi muscles including Orbicularis oris muscle, nasalis muscles, Levator labii superoris muscle and Zygometicum Minor muscles. The impact of the Melanin pigmentation is somehow disturbed and inhibited due to improper supply and distribution. Cytoplasm of the cell becomes abnormal due to derangement of tyrosine metabolism, which contains large quantity of Melanin pigment.

    Melaninosis is also due to anomalic functions of Pituitary and adrenal glands. If Sulphur based Amino acid will not synthesized metabolically, melanoisis will appear and depegmentation will crop up.

    Over all, there are so many reasons of this disease condition. The above mentioned phenomenon is of only physiological importance and is not related to anyway with the cause of disease. The problem is related to patient’s personal metabolic behavior of physiological functions individually, which is differing from person to person. If you observe the Basic Metabolic Rate [BMR] of an individual, it will differ from person to person. No two persons shall ever have similar BMR. Again age factor is also considerable.

    Regarding Repertorisation, in my opinion, this is a mechanical system. After all
    Repertories are only index of symptoms, arranged systematically for finding them easily in junks of symptoms. Repertorisation is not easy as it is understood. This is a complicated mechanical matter. So many lacunae are in reportorial analysis. If you like to save you patient, it is better to consult Materia Medica at last and there is no shortcut. When you repertories a case, over proved medicine will comes up. This creates confusion. The better way is to find the “Potential Differential Field” among the medicine. But this is not an easy task.

  10. @DR DESH BANDHU BAJPAI R/SIR You invented Electro-Homoeo-graphy machine ,which qunatify the status of the Homoeopathic miasms- Psora, Sycosis, Syphilis and diagnosis of diseases, persisiting in Human body
    It provides the facility for the repertorisation of the cases, based on the obtained tracing by ETG machine, without asking and examination of the patient.
    sir ,plz write some on your invention

  11. @ Amit Jain

    Yes, without asking any question or examination of patient, Homoeopathic physician can repertorise the case from obtained tracings. This is an advantage of the technology. Interpretation , analysis and synthesis of the tracings are an important factors . It is very useful technology, when patient is hospitalised , unconscious stage or in a condition where he is not able to tell his condition etc.

    Infact , Electrohomoeography [EHG] technolgy is a part of Electrotridoshagraphy [ETG] , which is for the status quantification of the Ayurvedic principles, which are over 150 in numbers. Such a big quantity is quantifed by this technique. Comparatively Homoeopathy have very little number of fundamentals. I have tried to quantify the status of Unani fundamentals, they are very few. I am trying to measure the Vitalality of Patient, whether he have strong vitalforce or weak. In Ayurveda it is somehow similar to “Oaj”. Oaj is quantified. But when you go deeply Hahnemannian view about Vital force, it looks disimilar to Oaj. However research is going on about this phenomenon.

    EHG technology is in running stage of research and development. While Electrotridoshagraphy [ETG] has completed its research work except on some areas, which is yet to be understand.

  12. पिंगबैक: लियोकोडर्मा पर हुये होम्योपैथिक रिसर्च और दृष्टिकोण(clinical homeopathic researches and views in vitiligo) « होम्योपैथी-नई सोच/

  13. pl suggest me medicine for luckodarma

  14. procedure to close this deasies

  15. give me some help

    ph no : 9820868793

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