Category Archives: epilepsy and homeopathy

मेरी डायरी – ईथूजा साइनाएपियम (Aethusa Cyanapium )

क्या  एक रोगी की केस हिस्ट्री  एक कन्सलटेशन मे पूरी हो जाती है ?  बहुधा यह संभव नही हो पाता । पहली बार आया हुआ नया रोगी बहुधा उन लक्षणॊं को तरजीह  नही देता जिसको उसको लगता है कि उनकी महत्ता कम है । लेकिन २-३ कन्सलटेशन और रोगी के परिवार जनों के साथ वार्तालाप के बाद कै नये लक्षण प्रकाश मे आते हैं जिनसे आगे के केस को संभालना आसान हो जाता  है । हाँ , अलबत्ता उन रोगियों या उनके परिवार के लोगों मे जहाँ होम्योपैथिक की समझ होती है वहाँ परेशानी नही आती । यह चर्चा मै इस लिये कर रहा हूँ क्योंकि कई बार मुझे नये रोगियों के साथ इस तकलीफ़ से गुजरना पडा है । कुछ इसी तरह ६ वर्षीय सानिया के साथ हुआ । epileptic convulsions  या आक्षेपॊं  से पीडित सानिया का इलाज फ़रवरी २०१० से सितंबर २०१० के मध्य चला और इस के दौरान कई बार केस हिस्ट्री के आधार पर सही सिमिलमम को बदलना पडा और आखिरकार कुछ अप्रत्याशित से आक्षेपों मे कम इस्तेमाल होने वाली औषधि ईथूजा साइनाएपियम से वह पूरी तरह से स्वस्थ हुयी ।

aethusa

सम्पूर्ण केस को रखने  के पहले ईथूजा साइनाएपियम को स्मरण करना एक बार उचित होगा ।  यूरोप मे पायी जानी वाली एक साधारण सी घास  फ़ूल्स पार्सली ( fools parsley ) से यह औषधि तैयार की जाती है । नन्हें-२  बच्चॊ की यह सच्ची मित्र है क्योंकि यह उनकी बहुत सी समस्याओं से छुट्कारा दिलाती है विशेषकर दूध की उल्टी करने वाले शिशुऒं मे । शिशु जैसे ही दूध पीता है वह या तो वमन से भारी मात्रा मे निकल जाता है और अगर कुछ देर के लिये वह पॆट मे ठहर गया तो वमन जैसे जमे हुये दही के रुप मे होती है । प्यास न के बराबर और निद्रा का आवेश बहुत अधिक इसके प्रधान लक्षण हैं ।

aethusa intolerance of milk

इसके अलावा ईथूजा  ऐसे आक्षेपों मे भी उपयोगी रहती है निनमे अगूंठॆ भिंच जाते हैं और आँखे नीचे झुक जाती हैं । रोगी का हाव भाव एक खास पहचान लिये होता है । उसकी आखॆं धँसी होती हैं तथा नथूनॊ से मुख के कोणॊं तक खिंची दो स्पष्ट रेखाओं और ऊपरी ओंठ से घरे भाग मे मोती जैसी सफ़ेदी रहती है । इसे नासिका रेखायें  कहते हैं ।

 aethusa dullness during examination ईथूजा का प्रयोग ध्यान केंद्रित करने की शक्ति के अभाव मे भी रहता है और यही कारण है कि यह औषधि अकसर उन शिक्षार्थियों मे भी प्रयोग की जाती है जहाँ अवससन्नता , ध्यान केद्रितं करने का अभाव और एक खास तरह की गमगीनता रहती है ।

 love for animals लेकिन एक और लक्षण  भी है जिसकी नजर मेरी इस केस को लेते और repertorise करते हुये पडी । और वह है जानवरॊं से अथाह प्रेम । और यही इस रोगी कॊ ठीक करने प्रधान लक्षण साबित हुआ |

सानिया को जब उसके पिता दिखाने के लिये  पहली बार लाये तो वह अन्य बच्चॊ से अलग सी दिखी । अगस्त २००९ मे पहला आक्षेप पडा और उसके बाद यह सिलसिला लगातार ३-४ दिनों के अन्तराल पर चलता रहा । इस दौरान ऐलोपैथिक इलाज का सहारा लिया लेकिन आक्षेपों मे कमी न आयी । अन्तर अवशय बढ गया लेकिन इसके बावजूद आक्षेप  पडते रहे । ५ भाई बहनॊ मे ४ नम्बर मे यह लडकी का चेहरा और  स्वभाव कुछ अजीब सा दिखा । चेहरा तमतमाया हुआ जैसे लडने मे मूड मे हो , सन्तुष्ट किसी से भी नही , अकेले रहना पसन्द और अन्य भाई बहनों से पटरी बिल्कुल भी नही । ऐसा भी नही था कि परिवार मे उसके साथ कोई भेद भाव रखा जाता रहा हो । उसके पिता के अनुसार रोज नई –२ तरह की डिमांड , कभी नये मोजों की फ़रमाईश और कभी मुर्गी के बच्चॊ की । एक डिमाडं पूरी की जाती तो नयॊ डिमाडं खडी हो जाती । लडाई झगडा पडॊसियों के बच्चॊ से तो था ही लेकिन अपने भाई बहनों से भी पटरी नही खाती थी । घर मे किसी का समझाना तो मानो आफ़त सी खडी कर देता । और कम से कम मेरे किसी भी सवाल का जबाब उसने कभी भी ठीक से नही दिया ।

sania

रिपर्टर्जेशन के आधार पर Chamomilla ,  Staphysagria , Sepia , Carcinocin और Cina मे से कैमोमिला सबसे उपयुक्त औषधि के रुप मे ऊभरी । अत: पहला प्रिसक्र्पशन कैमोमिला २०० और pl  से किया गया । लेकिन १० दिन की समाप्ति पर न तो मानसिक लक्षणॊं मे और न ही आक्षेपों मे अपेक्षित परिणाम दिखाई दिये । आक्षेप पूर्वत: की तरह ४ दिन पर पडॆ । दूसरे सप्ताह की समाप्ति पर कैमोमिला के साथ Oenanthus crocata  Q और Artemesia vulgaris Q को जोडा गया । इस बार आक्षेप पहले की तुलना मे कम रहे लेकिन मानसिक लक्षण वैसे ही रहे |  इस १५ दिन के दौरान आक्षेप घट कर २ बार पर आ गये । यह क्रम अप्रैल मध्य तक चला , कभी आक्षेप कम और कभी अधिक ।

अप्रेल के महीने के अंत मे मुझे अचानक उसके घर पर उसकी माँ को देखने जाना पडा . जब मै उसकी माँ को देख कर कमरे से बाहर निकल रहा था तो मेरी नजर उस लडकी पर पडी . दरवाजे  के पास बैठी वह  दो बिल्ली के बच्चों को अपनी गोदी मे लेकर  सुलाने की कोशिश कर रही थी । मै एक क्षण  के लिये रुका और  एक  पल उसको  देखता रहा . कम से कम इतनी अवधि मे उसके चेहरे पर इतना भोलापन और सौम्यता कभी न देखी । वह बिल्कुल अबोध बच्चॊ की तरह शांत नजर आ रही थी । मुझे देखकर वह मुस्कराई और धीरे से मुझे सलाम किया । मै अपलक उसको देखता रहा और  वापस पल्टा और उसकी माँ से उसके इस व्यवहार के बारे मे पूछ्ने लगा । ’यही इसका स्वभाव है ,  कबूतरॊं , बिल्ली और अन्य जानवरों  के बच्चॊ को छॊडकर इसकी निभती किसी से नही  है ’, उसकी माँ बोली

मैं क्लीनिक वापस आया और सिन्थीसस रिपर्ट्री मे love for animals रुब्रिक को तलाशने लगा ।

MIND – ANIMALS – love for animals
aeth. ambr. bar-c. bufo calc. calc-p. carc. caust. lac-del. lac-f. lac-leo. limest-b. med. nat-m. nuph. phos. psor. puls. sulph. tarent.
MIND – ANIMALS – love for animals – talking to animals
aeth.

ईथूजा हर लक्षण को तो नही लेकिन  प्रमुखता से दिखने वाले rare, striking  और  characteristic लक्षणॊं को कवर कर रही थी  , वह आक्षेपों और विशेष मानसिक लक्षण love for animals को कवर कर रही थी लेकिन क्या ईथूजा वाकई मे उसकी दवा थी , थोडी सी और तलाश मे ईथूजा के मानसिक लक्षणॊं पर वृहद लेख Alexander Gothe and Julia Drinnenberg की Homeopathic Remedy Pictures में मिला । एक नजर :

    • patients requiring Aehusa are often loners who live a withdrawnlife , together with one or several animals.
    • This reclusion into solitude develops slowly, fuelled by personal dissapontments and a feeling of not being able to understand the society with its manifold ideas , opinions and trends . They feel different.
    • they find it hard to build up contacts and relationship with other people , to communicate with or show an intrest in others.
    • These patients have their own intense thoughts and feelings, but they timidily keep them to themselves because they think that no one understands them or wants to know.
    • Thus their  emotions are bottled up; they are unable to express them, and this unconscious conflict results in these people withdrawing further and further.
    • Eventually they avoid people . they become outsiders, compensate by acquiring many animals and dedicate their whole life to them.
    • In this way they construct a substitute world in which the company and affection of the animals render any need for contact with human beings superfluous.
    • Through their sensitive communication with the animals , these patients release their pent up emotions and achieve the kind of pleasure which they were not able to find with humans.
    • If they do not suceed in building this kind of community in order to relax emotionally , their emotional affections begin to emerge in the form of soliloquies or illnesses.

अप्रेल २०१० के मध्य मे चल रहे औषधियों को हटा कर ईथूजा १००० और pl दी गई और परिणाम अविस्मर्णीय रहे । मई तक आते –२ आक्षेप लगभग  बन्द हो गये और मुख्य बात कि रोगी के व्यवहार मे असाधारण परिवर्तन दिखाई दिया , अब तो न वह आक्रामक थी , न ही उसकी कोई अनावशयक  डिमाडं थी । अक्टूबर २०१० तक ईथूजा १००० को २ बार रिपीट करना पडा । सानिया आज पूर्ण्तया स्वस्थ है । अक्टुबर मे उसका इलाज बन्द कर दिया और उसके पिता को खासकर ताकीद दी कि अगर कोई व्यवहार मे कोई  परिवर्तन दिखे तो फ़िर तुरन्त मिले ।

मानसिक लक्षणॊं का आधार होम्योपैथिक प्रेसक्राइबिग  का प्रमुख घटक है ।

आर्गेर्नान आफ़ मेडिसेन मे हैनिमैन ने लिखते  हैं :

§ 5

HAHNEMANN Useful to the physician in assisting him to cure are the particulars of the most probable exciting cause of the acute disease, as also the most significant points in the whole history of the chronic disease, to enable him to discover its fundamental cause, which is generally due to a chronic miasm. In these investigations, the ascertainable physical constitution of the patient (especially when the disease is chronic), his moral and intellectual character, his occupation, mode of living and habits, his social and domestic relations, his age, sexual function, etc., are to be taken into consideration.

सूत्र ५-रोग के मूल कारण की खोज

रोग नया हो या पुराना चिकित्सक को बीमारी के मूल कारणॊं की खोज करना नितान्त आवशयक  है । नये रोगों मे रोग उत्पन्न करने और रोग को उत्तेजना देने वाले कारणॊं पर तथा पुरानी बीमारियों मे रोग के इतिहास पर चिकित्सकों को बहुत अधीरता और सावधानी से विचार करना चाहिये क्योंकि ऐसा करने पर ही रोग के मूल कारण का पता लग सकता है । वस्तुत: चिकित्सक को रोगी की शरीर रचना और प्रकृति – गठन , शक्ति , स्वभाव , आचरण , च्यवसाय , रहन सहन , आदतें , समाजिक तथा परिवारिक संबन्ध , आयु, ज्ञान्निद्र्यों के व्यवाहार पर पूरी तरह से विचार कर लेना चाहिये ।

    § 213

    We shall, therefore, never be able to cure conformably to nature – that is to say, homoeopathically – if we do not, in every case of disease, even in such as are acute, observe, along with the other symptoms, those relating to the changes in the state of the mind and disposition, and if we do not select, for the patient’s relief, from among the medicines a disease-force which, in addition to the similarity of its other symptoms to those of the disease, is also capable of producing a similar state of the disposition and mind.1

    1 Thus aconite will seldom or never effect a rapid or permanent cure in a patient of a quiet, calm, equable disposition; and just as little will nux vomica be serviceable where the disposition is mild and phlegmatic, pulsatilla where it is happy, gay and obstinate, or ignatia where it is imperturbable and disposed neither to be frightened nor vexed.

सूत्र २१३ – रोग के इलाज के लिये मानसिक दशा का ज्ञान अविवार्य

इस तरह , यह बात स्पष्ट है कि हम किसी भी रोग का प्राकृतिक ढंग से सफ़ल इलाज उस समय तक नही कर सकते जब तक कि हम प्रत्येक रोग , यहां तक नये रोगों मे भी  , अन्य लक्षणॊं कॆ अलावा रोगी के स्वभाव और मानसिक दशा मे होने वाले परिवर्तन पर पूरी नजर नही रखते । यादि हम रोगी को आराम पहुंचाने के लिये ऐसी दवा नही चुनते जो रोग के सभी लक्षण  के साथ उसकी मानसिक अवस्था या स्वभाव पैदा करनेच मे समर्थ है तो रोग को नष्ट करने मे सफ़ल नही हो सकते ।

सूत्र २१३ का नोट कहता है :

ऐसा रोगी जो धीर और शांत स्वभाव का है उसमे ऐकोनाईट और नक्स कामयाब नही हो सकती , इसी तरह एक खुशमिजाज नारी मे पल्साटिला या धैर्यवान नारी मे इग्नेशिया  का रोल नगणय ही  रहता है क्योंकि यह रोग और औषधि की स्वभाव से मेल नही खाते ।

pkt 2

Blog Author ( ब्लाग रचयिता ) : डा. प्रभात टन्डन
जन्म भूंमि और कर्म भूमि लखनऊ !! वर्ष १९८६ में नेशनल होम्योपैथिक कालेज , लखनऊ से G.H.M.S. किया , और सन १९८६ से ही इन्टर्नशिप के दौरान से ही प्रैक्टिस मे संलग्न .. वर्ष १९९४ मे P.H.M.S. join करते-२ मन बदला और तब से प्राइवेट प्रैक्टिस मे ………. आगे देखें

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