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लियोकोडर्मा पर हुये होम्योपैथिक रिसर्च और दृष्टिकोण(clinical homeopathic researches and views in vitiligo)

लियोकोडर्मा यानि सफ़ेद दाग पर चल रही सीरीज का यह अन्तिम भाग  है , इसके पहले के भागों के लिये यहाँ और यहाँ देखें । हाँलाकि यह पोस्ट यहाँ समाप्त अवशय होती है लेकिन इसके बाद समय-२ पर रोग मुक्त हुये क्लीनिकल केसों से  अपडेट करने का प्रयास अवशय  रहेगा । एक बात और अगर आप होम्योपैथिक चिकित्सक हैं और इस ब्लाग से गुजर रहे हैं तो अपने क्लीनिकल अनुभवों को होम्योपैथिक से जुडने वाली नयी पीढी में बाँटने मे न हिचकें , कोई भी चिकित्सक पूर्ण नही है , हम अपने और दूसरों के अनुभवों को बाँट कर अपनी चिकित्सा प्रणाली को समृद्द और बचा सकते हैं और अगर हम ऐसा नही करेगें तो शायद हमारा हाल भी आर्युवेद्द और यूनानी पद्दति जैसा ही होगा जहाँ अच्छे-२ वैद्द विशारद अपने अनुभवों को लिये कालचक्र मे समा गये । कोई आवशयक नही कि आप मेरी बात से सहमत ही हों , विचारधाराओं मे अन्तर और उस पर एक स्वस्थ बहस ही किसी भी निष्कर्ष तक पहुँचने मे हमेशा सहायक होती है । और चलते-२ एक सलाह आंम जनों से – कृपया होम्योपैथिक औषधियों पर हाथ आजमाने की चेष्टा न करें , आपका होम्योपैथिक चिकित्सक आपको उचित और योग्य सलाह दे सकता है ।
लियोकडर्मा की इस अन्तिम पोस्ट मे हम लियोकडर्मा पर हुये होम्योपैथिक शोध कार्यों को तो देखेगें ही और साथ ही मे कुछ टिप्स नये B.H.M.S. छात्रों और चिकित्सकों के लिये भी रहेगी । सबसे पहले लेते हैं हमारे औषधि-कोष यानि रिपर्ट्री पर एक नजर और उसके बाद शोध कार्य और विभिन्न चिकित्सकों के क्लीनिकल अनुभव ।
होम्योपैथिक औषधि कोष यानि रिपर्ट्री पर एक नजर:

सबसे पहले होम्योपैथिक औषधि कोष यानि रिपर्ट्री पर एक नजर देखते हैं । आम तौर से प्रयोग होने वाली केन्ट रिपर्ट्री ,कम्पलीट रिपर्ट्री, सिन्थीसिस, मिलिनीनम या चाहे विथिलीकोस सिस्टम की बात करे तो vitiligo या leucoderma शब्द को सर्च करने का तरीका लगभग एक सा ही है।

केन्ट और कम्पलीट (KENT REPERTORY & COMPLETE REPERTORY):
1- जिस खंड मे जैसे skin मे vitiligo या leucoderma शब्द को सर्च कर   रहे हो वहाँ पहले discoloration white शब्द के अंतर्गत ढूंढे .  यही बात दूसरे खंडॊं   पर भी लागू होती है।

radar search vitigo  रडार

 

2-होमपैथ 8( HOMPATH CLASSIC 8 ) के प्रयोगकर्ता को साफ़्टवेएर मे दोनो विकल्प दिखेगें । Discoloration skin–white–vitiligo और quick repertorisation मे सीधे vitiligo शब्द को डालकर सर्च कर सकते हैं।

hompath leucoderma search होम्पैथ क्लासिक प्रीमियम

Hompath classic 8-quick repertorisation

 
3-सिन्थीसिस के लिये रडर के प्रयोगकर्ता ऊपर लिखे तरीके से ही सर्च कर सकते हैं, लेकिब्न रडार मे D/D के लिये भी एक विकल्प है जो होम्पैथ मे नही है। देखे नीचे आकृति ( रडार 9 से ली गयी)
DD of vitigo रडार

 

जिन खंड (chapters) पर विशेष ध्यान देना है उनकी आकृति नीचे दी है:

रडार  रडार

एक सही सिमिलीमम की तलाश के लिये सिर्फ़ common symptoms पर अपना जोर न रखें , रोगी के मानसिक लक्षणों को लेने की कोशिश करें ।

क्या एक सही सिमीलिमम की तलाश पूरी हो गई , नहीं कदापि नही , रोगी के मन:स्थिति को टटोलने की कोशिश करें। रोगॊ को जिस इलाज की आश्वशयकता है उसे आपको खोजना है । वह इलाज जो उसके लिये है -उसके शरीर और मन के लिये -विशेषकर मन के लिये । अत: जो लक्षण यांत्रिक कारणॊं पर आधारित होते हैं वे रोगी का बयान नही करते अत: होम्योपैथी चिकित्सा के लिये महत्वहीन रह जाते हैं । अत: जब आप अपनी रिपर्ट्री खोलें तो रोग से सम्बनिधत लक्षणॊ को नजरान्दाज करें । ध्यान रखें जो लक्षण आपने लिये हैं वह रोगी  की ही चारित्रिक विशेषता वाले लक्षण हों न कि रोग के साधारण लक्षण । आप देखते होगें कि आपका रोगी बेहद नफ़रत करने वाली प्रवृति का है या सन्देह करता है या रोता है और सहानभूति मिलने पर खिन्न हो जाता है । रोग होने पर ऐसे लक्षण उभरते हैं या उसका व्यक्तित्व भी कुछ ऐसा ही है ।  यदि मानसिक लक्षण प्रमुख हैं और यह रोगी के सामान्य स्थिति मे बदलाव दिखाता है तो यह बेहद महत्वपूर्ण हैं । किसी कम महत्वपूर्ण मानसिक लक्षण  या छोटे लक्षण के लिये अच्छी दवा को खोने का खतरा न मोल लें । और अगर यदि वह अधिक महत्वपूर्ण है तो आपको जानना चाहिये कि जिस दवा के चुनाव मे आप लगे हैं उसके लक्षणॊं मे यह लक्षण शामिल हो । और अगर वह बेहद महत्वपूर्ण दिखने वाला मानसिक लक्षण उन लियोकोडर्मा के सामान्य दिखने वाले लक्षणों को न भी कवर कर रहा हो , तब भी यह आप की औषधि के चुनाव की महत्वपूर्ण ईकाई होगा । सच तो यह है कि यह प्रणाली सिर्फ़   सफ़ेद दाग के रोगियों के केस लेते समय ही लागू नही होती बलिक सभी जटिल रोगों के लिये आवशयक है ।

अत: इतना महत्वपूर्ण है यह मानसिक लक्षण कि अगर आपने सही ढंग से लिया है तो उसे आप आसानी से हटा भी नही सकते । अत: आपकी औषधि  यही है । मानसिक लक्षणों की होम्योपैथिक औषधि के चयन मे क्या भूमिका है , इस पर हम विस्तार से अगली किसी पोस्ट मे देखेगें , लेकिन नीचे दिया एक स्लाइड शो इस पर थोडा प्रकाश अवशय डाल सकता है ।

इस स्लाइड शो के अधिकाशं चित्र दिल्ली होम्यो.काम द्वारा प्रस्तुत एक फ़्लैश प्रेस्नट्शेन से लिए गये हैं , जिनके कुछ चित्रों को स्लाइड शो मे डाला गया है । आभार – delhihomeo.com )

आप लक्षणों को इस तरह सजायें :

मानसिक लक्षण ( mental symptoms) —–>व्यापक लक्षण ——->विशेष लक्षण ——->रोग के उतार चढाव के साथ

लेकिन अगर रोगी मे चारित्रिक लक्षण ( constitutunal symptoms ) नही मिल रहे हों तब क्या करें । मियाज्म दोष पर भी अपनी तीखी और पैनी निगाहें रखें और अगर फ़िर भी नही तो  रोगी मे उस दुर्लभ लक्षण ( rare , striking & characteristic symptoms) को ढूँढने की कोशिश करें ।

एक बात जो अकसर मै कहता रहा हूँ और इस कडी की पहली पोस्ट मे भी कही थी कि होम्योपैथिक मैटिरिया मेडिका मे हाल के दिनों मे आयी नई औषधियों का प्रयोग कैसे हो क्योंकि इनका परीक्षण पूर्ण रुप से नही हुआ है , इनमें काफ़ी बडी संख्या भारतीय मूल की औषधियों से उतप्न्न मदर टिन्चर की है । इन औषधियों को अगर हम चारित्रिक लक्षण द्वारा चयनित औषधि के साथ प्रयोग करते हैं तो रोग की  recovery काफ़ी तेज दिखाई देती है । मै तो इसी तरीके से ही प्रयोग करता रहा हूँ और डां देश बन्धु वाजपेई जी शायद आप भी इससे सहमत होगें कि इनके परिणाम अधिक सफ़ल रहते हैं । हाँ , यह बात अलग कि हम होमयोपैथी के सिद्दातों से थोडा हटकर चलते है ।

एक नजर देखते हैं उन दुर्लभ होम्योपैथिक औषधियों की तरफ़ : 

दुर्लभ होम्योपैथिक औषधियाँ ( Rare homeopathic medicines)
1. Amni Vesenega
2. Psoralia Cor
3. Mica
4. Magneferia Indica
5. Commocladia D
6. Ozone
7. Veroninia A
8. Cuprum oxy Nigrum
9. Cobalt Nitricum
10. Radium Brom
11. Hydrocotyle
12. Piper methysticum

 

 सफ़ेद दाग पर हुये होम्योपैथिक शोध कार्य और विभिन्न होम्योपैथिक चिकित्सकों के मत :

  • डां वाडिया के लियोकडर्मा के रोगियों पर लिये सफ़ल परिणाम सबसे अधिक authentic रहे । एक ऐलोपैथिक चिकित्सक होने के बावजूद उनका योगदान होम्योपैथी के लिये अतुलनीय रहा । आपके अनुसार :

Drugs helpful in my Practice
At the outset, I may mention that the constitutional remedy works the best, if we can find matching symptoms. Later, an intercurrent remedy or a miasmatic remedy can be given.
1. Thuja-occ- I use this remedy very frequently. My reasons.
a) A number of vaccinations and modern drugs have been given especially in children. Here Thuja works as an antidote and clears the sycotic background.
b) Symptoms of Thuja are present not only children but adults too have dreams of falling, startling in sleep, have warts on the face or body, loss of appetite and dullness since those innoculations. After three doses of Thuja 200, the patients general condition improves. Now is the time to give the indicated remedy which starts working well.
c) My third reason for giving this remedy, is in cases of history of tuberculosis or respiratory diseases in the patient. According to Dr Barnett in his book on tumours on pg 315, Bacillinum will not act very well unless Thuja is given first. Vacinosis evidently comes in the way, very much the same as Hahnemann mentions for Psora and the use of Sulphur as an intercurrent remedy.
2. Sulphur- This is an important remedy and also the greatest antipsoric. It will also cure (along with psora) the suppressed sycotic and syphilitic miasmatic symptoms. If there is a history of suppressed shin diseases, diarrhoea, dysentery, jaundice, typhoid and other fevers then this remedy is of help. But the most important thing is that symptoms of Sulphur should be present like.
a) Heat of palms, soles, eyes, anus, vulva, vagina and top of head.
b) Generally patient is hot yet sometimes could be chilly.
c) Irritability and obstinacy can also be noticed.
d) Books describe Sulphur as a ragged philosopher but that is not found in all the cases. Due to poverty or lack of toilet facilities he may not take a bath and look dirty. The remedy can be given in clean patients also if other symptoms agree.
3. Bacillinum- The third most important remedy is Bacillinum or Tuberculinum. Many times we get cases, where the patient suffers from a chronic cold, with an occasional history of haemoptysis. Loss of weight, loss of appetite, flat chests of boys and girls, prominent ribs and clavicles etc may be other symptoms. We could get a family history of TB or pleurisy. We ask a patient of Sulphur repeatedly for a history of skin diseases, similarly we must ask a Bacillinum patient for a history of chest diseases. Many patients who are not clear or intelligent give a history of pleurisy more often than a history of TB. So we must try and get the symptoms in a tactful manner. Tuberculinum-bovinum and Drosera act better if there is a history of glandular or bony tuberculosis. The first case baby V G had bone TB for which she was given the drugs mentioned above. Now 19 years old, she goes to college in perfect health.
4. Nux-vomica- is required initially when the patient comes after taking a lot of the Modern drugs. It acts as an antidote to clear the background. This remedy also helps the patient to get over the problem of ineffectual urge for stool and also improves his digestion. It however has no specific action on the white spots.
5. Sepia- useful particularly in females. Besides the usual white discolouration, these patients have irregular menses-late, scanty, painful, menses in young girls, leucorrhoea, pruritis, dyspareunia and frigidity.
Most patients give H-O morning sickness, vomiting, nausea, travellers headache. Swings, merry-ground etc also affect her. The remedy removes the above symptoms and the white spots become pink in colour, but do not disappear completely. Sepia requires to be complemented with Nat-mur, to complete the cure.
6. Merc-Sol- is indicated in cases with a history of dysentery with mucus and blood, jaundice and liver enlargement. These patients are worse at night with salivation and have a syphilitic miasm. They perspire in bed and do not tolerate extremes of climate.
7. Acid-nit- I have used this remedy in cases of white spots around mucocutaneous junctions. There may also be fissures at the same site. Other indications are-craving for chalk, pencils etc mainly in children. This remedy, like Sepia removes the other symptoms but spots do not disappear completely.
8. Graphites and Calc-carb-also do come in the picture occasionally. Both are obese but their other symptoms are different. There is a history of suppressed itch in Graphites and irregular menses in a Calc-carb.
9. Ars-sulph-flav-Many doctors say that they are disappointed with the use of this remedy. The real cause is that they merely prescribe it as a specific for the disease. This is the most abused prescription. Very few books have given characteristic symptom of this drug. On the lookout for a good literature of the drug I was pleasantly surprised to find it in Kents Lesser Writings a detailed description on page 18. It states that if one find either mental, general or sexual symptoms along with the white spots the patient will definitely get well.
In addition to these I have used various other remedies like.
10. Cup-aceticum- in lower potencies. This is because copper is the chief source to produce melanin.
11. Cantharis- In our materia medica nothing is mentioned about skin discolouration. Dr R S Pareek who has given a great important to this remedy states that in burns the skin loses its pigmentation and Cantharis restores it.
12. Restinon- has also been recommended by a doctor friend of mine from Calcutta.
13. Psoralin- I have used this in potencies, as antidote in those cases where a lot of it was given by the allopathic doctors in crude form.
14. Carcinocin- must be used when there is a definite history of cancer in the patients family. Mrs E whose case has been mentioned was perfectly well after giving Carcinocin.
15. Bowel Nosodes- Morgan-bach, Morgan=gaertner, and Dyscentrico have been used by me with good success

Conclusions of Dr Wadia :

Family History percentage of cases
1. Tuberculosis
2. Leucoderma
3. Diabetes
4. Suppressed skin diseases
30%
29%
15%
15%
Past History percentage of cases
1. Past History- intestinal diseases including dysentery( Amoebic), jaundice, typhoid,and different types of worms
2.Vaccination & inoculation
3.suppressed skin diseases
4.Tuberculosis
5.Asthma
79%

25%
21%
12%
5%

Remedies that are helpful percentage of cases
1. Tuberculinum
or  Bacillinum
3. Thuja
3. Sulphur
4. Sepia
5. Merc sol
6. Acid Nitric
27%
26%
22%
14%
11%
10%

.

199 cases were studied (130 new cases(74 males & 56 females) and 69 old cases(37 male & 32 female) during the period 1st April 2004 to 31st December 2004 of these 190 cases had reported regularly. There was marked improvement in 10 patients, moderate improvement in 22 patients and mild improvement in 86 patients. The medicines found useful were Nat mur, Nux vom., Sulph., Puls., Lyco, Phos, Calc carb., Calc phos. Intercurrents on the basis of specific history and indications used were Tuberculinum, Syphilinum and Carcinosin. The Specific medicines used were Magnifera indica(prescribed to 4 patients all the 4 patients responded well) Mica (prescribed to 17 patients of which only 10 responded), Arsenic sulph flavum (prescribed to 7 patients of which 3 patients responded) and Psoralia Q (prescribed to 4 patients and all the four patients responded well). The potencies used were in 30, 200 and 1M. The 30 potency was repeated weekly, 200 potencies were repeated fortnightly and 1M potency was repeated after a month. Intercurrents were given in 200 and 1M potency.

  • प्रो सुबोध मेहता के प्रयोग अपने मे अनोखे ही थे। आपने लियोकोडर्मा के रोगियों को औषधि देने के पहले रक्त की आम जाँचे जैसे TLC, DLC,ESR के अलावा ब्लड ग्रुप, सीरम सोडियम, सीरम पोटेशियम और inorganic phosphorous के  टेस्ट करवाये और इन्ही सीरम सोडियम और सीरम पोटेशियम के अनुपात के आधार पर आपने सफ़ेद दाग के रोगियों को चार भाग मे वर्गीकृत किया:
    क- हार्मोनल
    ख-आनुवंशिक
    ग-Acquired
    घ-Idiopathic
    क- हार्मोनल- ऐसे रोगियों मे सोडियम -पोटेशियम और सोडियम – फ़ास्फ़ोरस का अनुपात कम देखा गया और इस वर्ग के लिये प्रो सुबोध ने sepia, thuja और silicea को श्रेणीबद्द किया।
    ख-आनुवंशिक-करीब 50% रोगियों मे आनुवंशिक प्रमण मिले , इस वर्ग के लिये syphilinum, thuja , silicea को तरजीह दी गयी। ऐसे रोगियों मे सोडियम पोटेशियम का अनुपात कम और सोडियम -फ़ासफ़ोरस का अनुपात अधिक पाया गया।
    ग-Acquired-ऐसे रोगियों की संख्या काफ़ी अधिक निकली और इन रोगियों मे पेट के रोग जैसे amoebic or bacillary dysentery (पेचिश), antibiotics के दुष्प्रभाव के चलते संभवत: आँत की श्लेषमा ( intestinal mucosa) प्रभावित हुयी और शायद इसी वजह से tyrosine की कमी के चलते melanin मे भी कमी आ गयी । ऐसे रोगियों मे bacillinum, phosphorous,chelidonium,nux vom, का प्रभाव देखा गया।
    घ-Idiopathic-ऐसे रोगी जो ऊपर दी गयी किसी श्रेणी मे नही आते। प्रो सुबोध के अनुसंधान का एक रोचक पहलू यह भी था कि अधिकांश रोगी ब्लड ग्रुप O से संबधित निकले जबकि ब्लड ग्रुप A इसमे लगभग छूटा ही रहा।
    लेकिन दु:ख की बात यह रही कि प्रो सुबोध हमारे बीच अब न रहे और इनके प्रयोगों को Dr Subodh Mehta Research Centre और C.C.R.H. ( सेन्ट्रल कौन्सिल आफ़ रिसर्च इन होम्योपैथी) ने कोई महत्व न दिया। ( स्त्रोत:
    Transections of International Homeopathic Congress 1967/Leucoderma by Professor Subodh Mehta )
  • डां कमल कन्सल ने लीडम पाल ( Ledum pal ) से लिये आशचर्य चकित परिणामों की जानकारी NATIONAL JOURNAL OF HOMOEOPATHY  के Volume: 1993 Mar / Apr VOL II No 2  में रखी । आपके अनुसार :

Melanocytic Action of Ledum Palustre [Melanocytic Action Of Ledum Palustre]
NATIONAL JOURNAL HOMOEOPATHY by Vishpala Parthasarathy 
Volume: 1993 Mar / Apr VOL II No 2 
Author: Kamal Kansal
Subject: Materia Medica
Remedy: Led
Leucoderma of Vitiligo is a disease of unknown aetiology and variable course. Ledum-pal may be surprise prescription for all of us, but has proved a highly efficacious remedy tried on 76 patients during a period of 6 years.
Why Ledum-pal? Conventionally used medicines for Leucoderma or Vitiligo did not give me satisfactory results even with the support of constitutionally indicated catalytic remedy. Prolonged treatment has also made it more frustrating. It so happened that a patient came to me for two small marks, white in colour at the site of a burn injury on the forehead and on the chest. Patient was noninformative. A look in Boerickes Materia Medica under skin of this remedy- “long discolouration of skin after injuries” made me think about it and I prescribed Ledum-pal 200, three times and to my surprise the skin started repigmentation. I have given this medicine in patients even without history of injury and have found most encouraging results.

      Case report-B S, aged 20 years has spots on the face, neck, abdomen and legs for 7 years. (See photo a). He had been taking all kinds of therapies including Homoeopathy. He was given Ledum- pal 200 three times daily on 22nd Nov 92. Photograph on 1st Dec 92 and 22nd Jan 1993 show evident repigmentation. (See photo b). Conclusion-Materia Medica requires reproving of many drugs. It is not necessary that all symptoms of a drug have come out in earlier provings. The trial of Ledum-pal is an example to make reproving and reconfirmation of drugs a continuous process. The role of Ledum-pal on Melanin pathway cannot be ruled out.

  • चेन्नई के डा कोपिकर ( Dr S.P.Koppikar) ने Acid Nit और Sepia के अलावा Nylon 30 और Rastinon 30 से अच्छे परिणाम निकाले ।
  • कोटायम होम्योपैथिक मेडिकल कालेज के भूतपूर्व प्रधानाचार्य डा आर. पी. पटेल  ने उपचार की एक आसान सी राह सुझायी:
    क- Syphilinum 200-1000 – अगर रोग का कारण सिफ़िलिक्टिक मियाज्म हो और रोग के उत्त्भेद्द ओंठ,जनेन्द्रिय ( genital ) और bony areas पर दिखें।
    ख- Medorrhin 200-1000- अगर रोग का कारण साइकोटिक मियाज्म हो और रोग के उत्भेद्द माँसल हिस्सों (muscular parts)मे दिखें।
    ग- Sepia 3- अधिकतर शिशुऒं और युवतियों मे । रोग के उत्भेद्द ओंठ, सर की त्वचा और चेहरे पाये जायें।
    घ- Lyco 3, 30-उन रोगियों पर जो पुराने अतिसार ( chronic amoebic dysentry) , या यकृत ( liver) संबधी रोग जैसे पीलिया (jaundice) से पीडित रहे हों।
    ड- Ars iod 3- ऐसे रोगियों मे जहाँ टी बी (T.B.) का इतिहास रहा हो या टी बी (T.B.) परिबारिक पृष्ठभूमि ( hereditary) से आयी हो।
    च- Hydrocotyle 3, 10M- ऐसे रोगियों मे जहाँ त्वचा के रोग जैसे अकोता(Eczema), ल्यूप्स (Lupus) आदि को सिर्फ़ दबाया (suppress) गया हो।
    छ -Bacillinum 1M- जहाँ पूर्व या वर्तमान मे रोगी दमा(Asthma), यक्ष्मा (T.B.), त्वचा संबधी रोग विशेष कर दाद (Ringworm) से पीडित रहे हों।
    ज- Nat Mur- सफ़ेद दाग खारिश(itching) के साथ
    झ- Rasitonin- यकृत संबधी रोगों के साथ ।
  • आगरा के डा आर एस पारिख ने अपने अनुभवों के आधार पर Cuprum Acetium , Cobalt Nitricum और Cantharis पर जोर दिया।
  • हैदराबाद के डा पी एस कृष्णामूर्ति ने ब्रिटिश होम्योपैथिक जर्नल मे Amoebiasis पर एक लेख लिखा । आपने हैनिमैन की मियाज्म थ्योरी का पक्ष लेते हुये उष्ण प्रदेशों मे अतिसार मियाज्म (Dysentery miasm) को सफ़ेद दाग के लिये जिम्मेदार ठहराया। इस वर्ग के लिये उन्होने मर्क साल को वरीयता क्रम मे सबसे ऊपर रखा ।

निष्कर्ष ( Conclusions ):

  • सबसे बडी समस्या सफ़ेद दाग के रोगियों मे धैयरता की है , साथ ही मे चिकित्सक की तरफ़ से भी हडबडी मे लिखे नुस्खे या बार-२ औषधि को बदलने की प्रक्रिया रोगी के रोग को incurable बना देती है । जितनी उम्मीद आप एक रोगी से रखॆं कि वह टिक कर इलाज करे उतना ही अपने नुस्खों पर भी रखें ।
  • इलाज की समय अवधि कोई निशिचित नही है , फ़िर भी सामान्य केस से लेकर बिगडे केस भी लगभग एक साल से चार साल या उससे अधिक समय ले जाते हैं ।
  • बडे चकत्तों की अपेक्षा छोटॆ सफ़ेद दाग के चकत्ते जल्द ठीक होते हैं और कई -२ रोगियों मे जहाँ चकत्ते काफ़ी अधिक बडी ऐरिया  को कवर करते हैं ऐसे रोगियों का ठीक हो पाना लगभग नामुनिकन हो जाता है ।

 

देखें सम्बन्धित पोस्ट:

1. VITILIGO & HOMEOPATHY

2. Leucoderma and Homeopathy ( सफ़ेद दाग और होम्योपैथी)

3. सेंकेंड प्रिसक्पशन और सही पोटेन्सी का चुनाव (Second Prescription & selection of potency)

4. सफ़ेद दाग और होम्योपैथी- आशा की एक किरण -भाग-१ (Leucoderma & homeopathy- an ultimate hope -Part-1)

5. सफ़ेद दाग और होम्योपैथी- आशा की एक किरण भाग- २ (Leucoderma & homeopathy- an ultimate hope-part-2 )

चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: homeopathy, होम्योपैथी,

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सफ़ेद दाग और होम्योपैथी- आशा की एक किरण भाग- २ (Leucoderma & homeopathy- an ultimate hope-part-2 )

पिछ्ली पोस्ट से आगे……..

leucoderma

लियकोडर्मा या सफ़ेद दाग के प्रधान लक्षण – शरीर के चमडे के स्थान -२ पर सादा व उस स्थान पर लोम तक सफ़ेद हो जाते हैं , कभी-२ एक अंग का पूरा अंश सफ़ेद हो जाता है । इस रोग में चमडे के ऊपरी भाग का सूक्ष्म पर्दा ( dermis) केवल आक्रान्त होता है , इसलिये रोगी को शारिरक कष्ट तो अनुभव नही होता लेकिन मानसिक रुप से वह बुरी तरह से टूट जाता है । लियकोडर्मा स्पर्शाक्रमक यानि छूत का रोग नहीं है लेकिन इसके बावजूद भी विशेष कर ग्रामीण इलाकों में लियकोडर्मा के रोगियों को समाजिक बहिषकार तक झेलना पडता है ।

सफ़ेद दाग के कारण और विभिन्न चिकित्सकों के मत

causes of leucoderma

इस रोग की वास्तविक उत्पति का कारण आज तक निर्णीत नहीं हुआ है , बहुत से कारण हैं जिन्हें समय-२ पर विभिन्न चिकित्सकों ने देखा और परखा है , ऐसे ही कारणों पर नजर डालते हैं –

1- होम्योपैथी मे सफ़ेद दाग पर वयापक शोध मुम्बई के डा वडिया के हिस्से रहा । आपके अनुसार इस रोग का प्रधान कारण पेट के रोगों से संबधित है और इन रोगों मे पुराना अतिसार (chronic Amoebic dysentery )और आँतों मे कृमि (intestinal parasites) का होना प्रमुख है। आपके क्लीनिकल रेकार्ड को देखने पर 50% रोगी के मल की जाँचों मे Ent amoeba histolytica, giardia के अंडे या कृमि पाये गये। देखें यहाँ

२-परिवारिक अनुवांशिकता के सफ़ेद दाग के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं । हमारे देश मे सफ़ेद दाग की बहुतायत सोमवंश सहसर्जुन क्षत्रिय समुदाय मे अधिक पायी जाती है। देखें यहाँ (Vitiligo : a study of 998 cases attending KEM Hospital in Pune ;Tawade YV, Parakh AP, Bharatia PR, Gokhale BB, Ran )

३-मानसिक चिन्तायें, विषाद (depression), किसी तरह का सदमा(shock) ,गृह क्लेश , बेरोजगरी की समस्या के चलते मनसिक अवसद आदि भी भी इस रोग को पैदा करने मे सहायक रहे।

४- ऐसी antibiotcs जिनसे intestinal flora नष्ट हो गया , वह भी इस रोग को पैदा करने मे सहायक रही।

५- त्वचा के कई रोग जिनको एंटीबायटाकिस (antibiotcs) , स्टीरौडिस (steroids) और मलहम से दबाया गया ।

६- कुछ रोगियों मे जिनका परिवारिक यक्षमा (T.B.) का इतिहास रहा हो।

७ त्वचा का जलना, मस्से या तिल को सर्जरी से हटाना भी कभी-2 एक कारण मे देखा गया।

८- माथे पर बिन्दी का लगाना , कसे हुये कपडों का पहनना विशेष कर औरतो और युवतियो मे जहाँ कसे हुये ब्लाऊज, ब्रा, या पेटिकोट के नाडे के दबाब के चलते सफ़ेद दाग दिखे।

९- मियाज्म (Miasm) दोष- सोरा, सिफ़िलिस और साइकोसिस- ( मियाज्म (Miasm)कया है , इसके लिये यहाँ देखें

१०- जे जे हास्पिटल ,मुम्बई के डा जे श्रौफ़ ने Indian journal of medical science 1973 मे एक लेख के जरिये कुछ नये तर्क रखे। आपने पाया कि सफ़ेद दाग और कई औटो इमयून समस्यायें (auto immune disorders ) जैसे मधुमेह (diabetes), थाइरोड के कई रोग, और रक्ताभाव (pernicious anaemia) का आपस मे गहरा संबध है।

११- विटामिन बी काम्पलेक्स- कई विटामिन और खनिज तत्वों का भी मिलैनिन के उत्पादन पर असर देखा गया।

१२- ब्रेटनैक (Breathnach 1971 )ने पाया कि मिलैनिन के बनने की प्रक्रिया शरीर मे मौजूद इन्जाइम टायरोनेज (enzyme- tyrosinase ) पर निर्भर करती है और इन्जाइम टायरोनेज के बनने के लिये विटामिन की आवशयकता पडती है। इसके पहले सीव (Sieve 1965) ने विटामिन की कमी और सफ़ेद दाग के व्यापक प्रमाण दिये।

१३- खनिज तत्वों मे कापर ( copper) की catalytic activity सबसे अधिक इन्जाइम टायरोनेज (enzyme- tyrosinase ) पर देखी गयी । बाद के विशलेषणों मे पाया गया कि इन्जाइम टायरोनेज के अणु मे कापर की मात्रा 0.2% होती है और सफ़ेद दाग के रोगियों मे कापर का प्रतिशत आम लोगों की अपेक्षा कम देखा गया। ( V.C.Shah,N.J.Chinoy etc, deptt of zoology, gujrat university, Ahmedabad)
शायद यही कारण रहा कि आगरा के डा आर एस पारिख ने cuprum Acetium 6 के प्रयोग पर जोर दि्या।

१४- कुपोषण और बढती हुयी अंट-बंट (junk food) खाने की प्रवृति ने भी बच्चों मे सफ़ेद दाग की संख्या मे वृद्दि दिखाई दी , देखें यहाँ । (Behl PN, Agarwal A, Srivastava G- Etiopathogenesis of vitiligo : Are we dealing with an environmental disorder ?)

आहार और पथ्य (Diet & Regimen)

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  • जहाँ तक संभव हो माँसाहारी खाने का त्याग कर देना चाहिये । आधुनिकता के दौर मे खान -पान मे सब कुछ चलता है का शोर बहुत है लेकिन हम अपने तरफ़ यह नही देखते कि हम क्या खा रहे हैं। कई बीमार जानवरों के माँस के सेवन करने से नाना प्रकार के कृमि और अंडें खाने के साथ कृमिकोष (cyst) के रूप में आँतो के अन्दर चले जाते हैं।
    इसी तरह बच्चों मे अंट -संट (junk food) खाने की प्रवृति ने भी लियोकोडर्मा की बढती हुई समस्या मे इजाफ़ा किया है. 
  • l08.jpg  डा मौफ़टी के अनुसार ऐसे भोज्य तत्वों का समावेश खाने मे करना चाहिये जिनमे सोरेलिन (psoralen )की मात्रा अधिक हो जैसे चुकन्दर, गाजर, छुआरे, पालक आदि ।
  • dsc00639.jpg आटे मे से चोकर को हटाने की कवायद इधर अधिक देखी जाने लगी है , लेकिब जहाँ चोकर के तन्तु (fibre) पाचन क्रिया को आसान बनाते हैं , वही दूसरी तरफ़ शरीर मे आवशयक सोरेलिन भी सप्लाई करते हैं।
  • अमिबिक संक्रमण (Amoebiasis) और जियारडिया के संक्रमण (giardiasis) के सफ़ेद दाग के रोगियों मे प्रमाण मिलने से हमारी नजर दूषित पानी की तरफ़ भी जाती है, जहाँ तक सभव हो पानी को उबाल कर पीना चाहिये , विशेष कर लखनऊ और कानपुर जैसे शहरों के लिये तो यह बहुत ही आवशयक है।
  •  दूध या दूध से बनी वस्तुयें, खट्टे और रस भरे फ़ल भी आयुर्वेद चिकित्सा पद्दति के अनुसार हानिकारक है।

 

अगले भाग मे हम देखेगें लियकोडर्मा  पर हुये  होम्योपैथिक शोध-कार्य और साथ ही में प्रमुख होम्योपैथिक चिकित्सकों के मत ।

क्रमश: आगे जारी ……

 

संबधित पोस्ट :

1. VITILIGO & HOMEOPATHY
2. Leucoderma and Homeopathy ( सफ़ेद दाग और होम्योपैथी)
3. सफ़ेद दाग और होम्योपैथी- आशा की एक किरण -भाग-१ (Leucoderma & homeopathy- an ultimate hope -Part-1)
4.coming soon ….सफ़ेद दाग और होम्योपैथी- आशा की एक किरण -भाग-3 (Leucoderma & homeopathy- an ultimate hope -Part-3)


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सफ़ेद दाग और होम्योपैथी- आशा की एक किरण -भाग-१ (Leucoderma & homeopathy- an ultimate hope -Part-1)

  leucoderma लियकोडर्मा पर पिछली दो पोस्टों से अब की बार कुछ हट कर बात करते हैं। लेकिन यह बिल्कुल आवशयक नही कि मेरे तरीके दूसरे होम्योपैथिक चिकित्सक पसन्द करें और एक राय बनायें । सच तो यह है कि आज होम्योपैथी क्लासिकल और नान -क्लासिकल होम्योपैथी मे बुरी तरह से फ़ँस कर रह गयी है। हर चिकित्सक का औषधि देने का तरीका अलग-2 होता है , भले ही हम अपने को कितने सिद्दांत्वादी कह ले , लेकिन कही न कही हम करते वही हैं जो हम किलीनिकल प्रैकिटिस मे सीखते हैं। क्या क्लासिकल होम्योपैथी गलत है- बिल्कुल नहीं , मेरे यह लिखने का तात्पर्य यह कदापि नहीं है । हैनिमैन ने भी आर्गेनान मे अपने जीवित रहने तक छह बार सुधार किया , लेकिन उसके बाद क्या हुआ ? कुछ दिन पूर्व कलकत्ता के डां शयामल बैनर्जी ने बातों – 2 मे बहुत ही महत्वपूर्ण इशारा किया और मै डा बैनर्जी की बात से काफ़ी हद तक सहमत भी हूँ । बतौर डा बैनर्जी

“अकसर रिपर्टार्जेशन करते समय या तो पोलीक्रेस्ट औषधिया सामने आती हैं या ऐसी औषधियाँ जो कुछ मिलती हुयी या काफ़ी हद तक मिलती प्रतीत होती हु्यी या ऐसी मे वह औषधियाँ जो मियाज्म की पृष्ठभूमि से हैं लेकिन ऐसी औषधियाँ जो नयी और हाल ही मे आयी हैं वह लगभग छूट ही जाती हैं …. ”

यह बात काफ़ी हद तक सच भी है ।

 कुछ इसी तरह के विचार डां देश बन्धु वाजपेजी जी ने मेरी एक पोस्ट सेंकड प्रिसक्र्पशन और सही पोटेन्सी के चुनाव पर रखी थी । आपके अनुसार,

Since commence of Homeopathic doctrine in existence from Medicine of Experiences unto the appearance of the Organon of Medicine 6th edition, Hahnemann have changed many times his doctrine and philosophy, which he laid down in earliest period in their subsequent editions. These changes are itself proved that there is need to make much more changes in the practical way. Why we forget that Boenninghausen convinced Hahnemann for alternation of medicine rule inclusion in Organon. If you go Hahnemannian Life History and also in some writings, Hahnemann himself used and advocated alternation of two remedies at a time. Why you forget the famous trio of Boenninghausen, which is still effective in Spasmodic croup.But due to opposition of the then followers Hahnemann geared back to include this law.

हाल के दिनो मे देखें काफ़ी नयी होम्योपैथिक औषधियाँ प्रयोग के लिये तैयार हैं , लेकिन बात वही आ कर फ़ँस जाती है कि इनका उपयोग करने की जहमत कौन उठाये ।  ओ. बी. जूलियन की मैटिया मेडिका , डा घोष की ड्र्ग्स आफ़ हिन्दुस्तान, ऎन्शुट्ज की रेअर होम्योपैथिक मेडिसिन्स मे बहुत सी नयी औषधियों का समावेश है , उनको व्यवहार मे लाना तो होगा , मगर कैसे ? जब आप उनका उपयोग ही नही करोगे तो कहाँ से वह कसौटी पर उतरेगीं, जबकि इन औषधियों का कार्य कई रोगों मे अधिक त्वरित है। यही हाल बैच फ़्लावर औषधि और मदर टिन्चर के साथ भी है । डां रौजर वान वैन्डर्वुर्ड की कम्पलीट रिपर्ट्री को खोल कर देखें तो बहुत सी औषधियों के क्लीनिकल प्रमाण लियकोडर्मा मे दिखते हैं , यह बात अलग कि इनमे से अधिकांश औषधि भारत मे नही मिलती , और शायद इनका न मिलने का कारण होम्योपैथिक चिकित्सकों द्वारा नयी औषधियों के प्रति अरुचि दिखाना   है ।
लेकिन मैने पाया कि पुराने और जटिल रोगों मे अगर हम क्लासिकल और नान-क्लासिकल होम्योपैथी का संगम ले कर चलते हैं तो उनके परिणाम अधिक सुखद दिखते हैं। मै समझता हूँ कि बहुत से होम्योपैथिक चिकित्सक इनका प्रयोग सफ़लता पूर्वक कर रहे हैं लेकिन बोलने की हिमाकत नही करते क्योंकि फ़िर उनकी टाँग- खिचाई यह क्लासिकल वाले कुछ अधिक ही कर डाल देते हैं ) , तो जाहिर है कि कि मै हैनिमैन और केन्ट के तरीको से थोडा हट कर बात कर रहा हूँ, हाँ , यही सत्य है, कम से कम लियकोडरमा के रोगियों मे मै अपने ही तरीके से चलना पसन्द करता हूँ। हर साल कुछ नये रोगी लियकोडर्मा के मिलते रहते हैं , कुछ इनमे से ठीक होते हैं तो कुछ नही भी और कुछ बिना समय दिये ही जल्दी भाँगने मे भलाई समझते हैं , इतने सालों मे मै अपने कोई रिकार्ड व्यवस्थित न रख पाया लेकिन गत वर्ष होम्पैथ के case analysis साफ़्टवेऐर से लियकोडर्मा के रोगियों की सही ढँग से समीक्षा करने का मौका पडा । इस एक साल के दौरान २२ रोगी लिये गये जिनमें से ७ रोगियों ने १-२ महीने के अन्तराल पर इलाज छोडा , बाकी बचे १५ , इनमे से ७ पूर्णतया ठीक हुये और ४ को कुछ महीने के बाद मना करना पडा क्योंकि इनमे रोग  के पैच काफ़ी बडॆ थे और बाकी बचे ४ जिनका इलाज अभी चल रहा है और रोग मे कमी दिखा रहे हैं।
वैसे जब मै अपने तरीको की ही बात करूँ तो सबसे पहले रोग के प्रमुख कारण ,लियकोडर्मा रोगियों के लिये आहार और पथ्य,  विभिन्न होम्योपैथिक और दूसरी पद्दतियों के चिकित्सकों के मत और  उनके सफ़ल तरीको   पर भी एक चर्चा कर लेना आवशयक समझता हूँ। साथ ही में कुछ टिप्स B.H.M.S. छात्रॊं के लिये भी, विशेष कर रिपर्टाराजेशन करते समय आने वाली दुशवारियों और उनके हल पर भी रहेगीं । एक नजर हम डा सहगल की  “Revolutionized Homoeopathy  यानि इन्कलाबी होम्योपैथी ” पर भी डालेगें और साथ ही मे बैच फ़्लावर पर भी एक नजर रहेगी । लेकिन यह सब देखेगें किसी दूसरी पोस्ट में ।  बास आज इतना ही !

क्रमश: आगे जारी ………

 देखें  लियकोडर्मा पर संबधित पोस्ट :

VITILIGO & HOMEOPATHY

1.What is vitiligo/leucoderma?

Vitiligo is a pigmentation disorder in which special skin cells (melanocytes) that produce the pigment melanin in the skin as well as the tissues (mucous membranes) that line the inside of the mouth, nose, and genital and rectal areas, and the retina of the eyes are destroyed. As a result, white patches of skin appear on different parts of the body. The hair that grows in areas affected by vitiligo may also turn white.

2.Symptoms of vitiligo?

The typical appearance of Vitiligo is a milky white de-pigmented spot or spots. It may vary from a single white spot to multiple spots. The shape too is a variable. In some cases generalized de-pigmentation observed all over the body. It has a tendency to start as a single spot and gradually grow in size and number. It may present with a single or several spots on limbs or abdomen or back and then spreading to other parts of the body. Some cases showing affection of the muco-cutaneous junctions such as finger-tips, corners of the mouth, private parts, around eyes. The spread of the disorder is usually slow and progressive. Symmetrical appearance on both the sides of the body (say, on the legs, hands, etc.) is common. In rare cases one finds vitiligo spreading all over the body.

Associated Skin Disorders:

At times, you may find Vitiligo associated with one or more of the following conditions:
° Alopecia Areata (Loss of hair)
° Premature graying of the hair
° Lichen Planus
° Lichen sclerosus
° Psoriasis
° Halo Naevus
° Ichthyosis

Associated Systemic Disorders:

There are several systemic diseases (affecting the entire body system), which are at times associated with Vitiligo:
° Thyroid Disorders (Hypo and Hyperthyroidism)
° SLE (Systemic Lupus Erythematosus)
° Pernicious Anemia
° Addison’s Disease
° Collagen Diseases
° Grave’s Disease
° Diabetes Mellitus

It may be noted that the sufferers of Vitiligo need not be unduly scared of the above disease conditions, as they should not be regarded as the complications of Vitiligo in every case.

3.Causes of vitiligo?

The cause of vitiligo is not fully known, but there are several theories. One theory of some substance is that people with vitiligo develop antibodies that, instead of protecting them, turn upon them and destroy their own melanocytes, the special cells that produce the pigment melanin that colors their skin.

Another theory is that the melanocytes somehow attack and destroy themselves. Finally, some people with vitiligo have reported that a single event such as a severe sunburn or an episode of emotional distress seem to have triggered their vitiligo. Events of this nature, however, have not been scientifically proven to cause vitiligo and may simply be coincidences.

Who is affected by vitiligo?

About 1 to 2% of people in the world, or 40 to 50 million people, have vitiligo. In the United States alone, 2 to 5 million people have the disorder.

Ninety-five percent of people who have vitiligo develop it before their 40th birthday. The disorder affects all races and both sexes equally.

3.Is vitiligo inherited?

Yes, in some cases it is. Vitiligo may be hereditary and run in families. Children whose parents have the disorder are more likely to develop vitiligo. However, most children will not get vitiligo even if a parent has it, and most people with vitiligo do not have a family history of the disorder.

There are a sizable number of inherited disorders associated with vitiligo. To illustrate, they include: albinism of the ocular type, autoimmune polyendocrinopathy syndrome, congenital deafness with vitiligo and achalasia, dyschromatosis symmetrica hereditaria, ermine phenotype, familial histiocyctic reticulosis, kabuki syndrome, Letterer-Siwe disease, progressive hemifacial atrophy, progressive vitiligo with mental retardation and urethral duplication, Schmidt syndrome, and the syndrome of spastic paraparesis, vitiligo, premature graying and characteristic facies.

The abundance of genetic diseases associated with vitiligo clearly reflects the fact that there are a number of genes which normally govern the development and wellbeing of the melanocyte.

4.Do the depigmented patches spread?

There is no way to predict if vitiligo will spread. For some people, the depigmented patches do not spread. However, the disorder is usually progressive, and over time the white patches often spread to other areas of the body.

For some people, vitiligo spreads slowly, over many years. For others, the diffusion occurs rapidly. Some people have reported additional depigmentation following periods of physical or emotional stress.

5.How vitiligo diagnosed?

Important factors in a patient’s medical history include: vitiligo in the family; a rash, sunburn, or other skin trauma at the site of vitiligo 2 to 3 months before depigmentation started; stress or physical illness; and premature graying of the hair (before age 35). In addition, it is important to know whether the patient or anyone in the patient’s family has had any autoimmune diseases and whether the patient is very sensitive to the sun.

The doctor then examines the patient to rule out other medical problems. The doctor may take a small sample (biopsy) of the affected skin and may also take a blood sample to check the blood-cell count and thyroid function. For some patients, the doctor may recommend an eye examination to check for uveitis (inflammation of the front portion of the eye). A special blood test to look for the presence of antinuclear antibodies (a type of autoantibody) may also be done. These evaluations can help to determine if the patient has an additional autoimmune disease.

6.Treatment of vitiligo & homeopathic approach:

As a rule, homoeopathy never looks at Vitiligo as a local disease. Vitiligo has been considered as a local expression of a system disturbance. As per the classical homoeopathy, we believe in constitutional prescribing. This calls for individual case study in every case of Vitiligo. There is no single specific remedy for all the cases of Vitiligo. The exact treatment is determined only on in-depth evaluation of individual case.

Constitutional approach:

What we understand by the Constitutional Approach in homeopathy is nothing but analysis and evaluation of various factors affecting the human constitution to determine the disease diagnosis and the exact treatment in turn. Every case of Vitiligo calls for study of the patient’s constitution which includes various aspects of his physical aspects as well as the in-depth study of the mental sphere, such as emotions, psychosocial background, behavior and personality pattern, etc.

The homeopathic remedy selected in every case after such a detail study is called the constitutional medicine, which when administered in the correct dose brings about harmony at the constitutional level, stimulating the normal pigmentation and hence induces normal skin coloration. It will be of interest to note that the homeopathy medicines are essentially oral and not in the form of creams, lotions or any local application on the skin.

Diet & Regimen:

There are a few instructions for patients regarding their diet in vitiligo especially with mention of what they should avoid during the treatment of vitiligo. Following are some of our observations based on our clinical experience of treating a large number of patients (clinical observations):

Foods that are excessively sour should be avoided. The ascorbic acid in sour foods tends to reduce melanin pigmentation. So the patients should restrict their intake of citrus foods.
Non vegetarian foods are also to be avoided as they act as a foreign body to pigment cells.
Flavoured drinks are to be avoided.
Artificial colours used in various food preparations should also be avoided.

There may not be enough scientific evidence to prove how these foods worsen vitiligo but our clinical experience has shown that many patients report worsening of their vitiligo from these items and hence they are better avoided.

Usually small amounts of milk, for example in tea or coffee, do not cause any problems. Dairy products such as butter, cheese and yoghurt are also well tolerated. If milk is excluded, it should be replaced with low lactose milk or with Soya milk. This should be discussed with a dietician to ensure that the nutritional balance is maintained.

Ginkgo Extract Effective Treatment for Vitiligo:

Healthnotes Newswire (August 21, 2003)—Supplementation with a standardized extract of ginkgo (Ginkgo biloba) may help slow the progression of skin depigmentation and actually increase pigmentation in adults suffering from vitiligo, according to a study in Clinical and Experimental Dematology (2003;28:285–7). This is encouraging news for the millions of adults that have to deal with this often difficult to treat condition.
Other nutrients that may be useful in treating vitiligo include picrorhiza (Picrorhiza kurroa), a traditional Indian herb, may also stimulate repigmentation of skin in people with vitiligo.

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