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मेरी डायरी – लखनऊ मे कहर बरपाता डॆंगूं

कम से कम मैने  अपनी २४ साल  की प्रैकिटिस मे किसी भी रोग का इतना विकराल रुप न देखा । कारण जो भी हों इस माहमारी फ़ैलने के लेकिन सच यह है कि होम्योपैथी को छॊडकर अन्य पद्दतियों का रोल केस के मैनेजमैटं को छोडकर लगभग नगणय सा रहा । अगर मै सितम्बर के आरम्भ मे बात करुं तो मुझे निराशा ही हाथ लगी क्योंकि रोगी होम्योपैथी मे रुकने को तैयार नही था । लेकिन मुझे पिछ्ले अनुभव से ज्ञात था कि यह अविशवास अधिक दिन नही रहने वाला है । और वही हुआ .. सितम्बर के दूसरे सप्ताह से अब तक का पूरा श्रॆय होम्योपैथिक औषधि यूपोटिरियम पर्फ़ोलेटम और अन्य चयनित औषधियों को रहा । और होगा भी क्यूं नही .. like cures like का इतना बढिया उदाहरण भला कहाँ मिलेगा । पिछ्ले सप्ताह जब डां राजीव सिह ने होम्योपैथिक औषधियों से अल्प समय ठीक हो रहे रोगियों का क्लीनिकल रिकार्ड , उनके पैथोलोजिकल जाँचे आदि सुरक्षित रखने को कहा तो मुझे भी यह बात काफ़ी हद तक पंसद आयी । और यही बात  अन्य होम्योपैथिक चिकित्सको से भी कहूगां कि ऐसे रिकार्ड को संभाल के रखॆं , कई स्त्रोतों पर यह काम आयेगें ।

लेकिन बात यूपोटोरियम पर्फ़ की

यूपोटोरियम पर्फ़ (Eupatorium Perfoliatum -Boneset)

कम्पोजीट परिवार का यह एक पौधा मूलत: अमेरिका और कनाडा मे पाया जाता है । बोन सॆट इसका आम नाम है । मूल अर्क बनाने के लिये पौधे की ताजी पत्तियों और फ़ूल प्रयोग मे लाये जाते है ।

होम्योपैथी मे लाने का श्रेय डां विलयम्सन को जाता है जिन्होने इसकी प्रूविगं सन १८४५ मे अपने मित्र चिकित्सकों और स्वयं पर की । और आशचर्यजनक बात यह रही कि इसके लक्षण आज की नामावली  डॆगूं/इनफ़्लून्जा आदि कई रोगॊ  के लक्षणॊं से मिलते हुये हैं  । मैलेरिया , इनफ़्लून्जा या अन्य किसी अन्य प्रकार के ज्वर या रोग मे –शरीर मे हड्डी तोड दर्द ( break-bone fever) , सिर दर्द , कमर मे ऐठंन , पित्त का वमन इत्यादि इस रोग के प्रधान लक्षण हैं

अगर आप केन्ट की होम्योपैथी मैटेरिया मेडिका मे यूपोटोरियम पर्फ़ की प्रस्तावना लेख को देखें तो पायेगें कि यह औषधि एक आम भारतीय औषधि जैसे तुलसी और अदरक जैसे गुणॊं से भरपूर कनाडा और अमेरिका मे कृषकों द्वारा प्रयोग  की जाती थी । केन्ट लिखते हैं :

Every time I take up one of these old domestic remedies I am astonished at the extended discoveries of medical properties in the household as seen in their domestic use.

All through the Eastern States, in the rural districts, among the first old -settlers, Boneset-tea was a medicine for colds. For every cold in the head, or running of the nose, every bone-ache or high fever, or headache from cold, the good old housewife had her Boneset-tea ready. Sure enough it did such things, and the provings sustain its use. The proving shows that Boneset produces upon healthy people symptoms like the colds the old farmers used to suffer from.

जितनी बार मै इन घरेलू दवाओं मे से किसी एक को लेता हूँ , उतनी ही बार घर मे ये चिकित्सा के समान ,व्यवाहार होते हुये देखकर मै आशचर्य मे पड जाता हूँ । सभी पूर्वी जमीन्दारियों मे , देहाती जिलों मे तथा पुराने आदिवासियों मे बोनसेट सर्दी की खास दवा थी । माथे को या नाक बहने वाली सर्दी के साथ प्रत्येक हड्डी मे दर्द या तेज बुखार के लिये बुद्दिमान गृहणियाँ बोनसेट की चाय को तौयार रखती थी । इसमे सन्देह नहीं कि इसने ऐसे काम किये हैं और परीक्षण ( प्रूविगं ) मे इसका व्यवहार प्रमाणित होता है । परीक्षा मे यह प्रकट होता है कि स्वस्थ मनुष्यों मे बोन सेट उस तरह के सर्दी के लक्षण लाता है जो पुराने कृषकों मे हो जाया करती थी ।

 

  • लेकिन मुख्य प्रशन कि क्या यूपोटोरिम को डेगूं की एकमात्र विशवसनीय औषधि मानें ?

उत्तर : नही , होम्योपैथिक पद्दति इसकी इजाजत नही देती । हर रोगी अपने मूल स्वभाव के कारण दूसरे रोगी से अलग होता है । यही होम्योपैथी की कहें तो विशेषता भी है और परेशानी भी । एक रोगी ठंड लगने के समय ओढना पसंद करता है और दूसरा नही करता । एक को प्यास अधिक लगती है और दूसरे को नही । रोगी अलग-२ है , उसके लक्षण अलग है जाहिर है दवा भी अलग होगी।

  • तो फ़िर एक नया चिकित्सक क्या करे , कैसे इस विशाल मैटेरिया मेडिका मे से सेलेक्शन करे ?

उत्तर : जहाँ तक संभव हो रोगी की गतिविधि, ठंडक और गर्मी से सहिषुण्ता/असहिषुणता ( थर्मल ), प्यास और शारीरिक या मानसिक लक्षण में  बदलाव पर गौर करें । इस संदर्भ मे डां प्रफ़ुल्ल विजयरकर का  एक्यूट फ़्लो चार्ट नये रोगों मे दवा के सेलेक्शन के लिये काफ़ी उपयोगी है । प्रफ़ुल्ल के इस फ़्लो चार्ट पर चर्चा हम अगले भाग मे करेगें । लेकिन यह तय है कि थेरेपेटिक्स आधारित प्रेसक्राबिगं की अपेक्षा प्रफ़ुल्ल का गतिविधि,  थर्मल , प्यास और शारीरिक या मानसिक लक्षण में  बदलाव पर वर्गीकरण अधिक कारगर है । अगले अंक मे जारी …..

 

अगले भाग मे देखें Genus epidemicus क्या है और महामारियों मे उसका क्या रोल है …

 

यह भी देखें :

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वाइरल संक्रमण और होम्योपैथी-डॆंगू और इन्फ़लूयून्जा

गतांक से आगे—-
4. डेंगू बुखार:[Dengue fever]-

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इसे हडडी तोड बुखार भी कहते हैं। इसका समय काल 3 दिन तक रहता है पर इतने थोडे से समय मे ही समूचे शरीर मे इतना दर्द होता है कि रोगी एकदम कातर हो जाता है। 3-7 दिन के इन्कूबेशन पीरियड के बाद रोग का अचानक आक्र्मण होता है, बुखार 102-106 फ़ा तक चढता है, सभी माँस पेशियों में दर्द ,जी मिचलाना, पित्त का वमन, लसिका ग्रनिथयों (lymphatic glands) का फ़ूलना, शरीर पर खसरा की तरह दाने निकलना इसके प्रमुख लक्षण हैं। एक बार ठीक हो जाने के बाद रोग दोबारा भी हो सकता है। डेंगू से बचाब के लिये मच्छरों पर नियंत्रण बहुत आवशयक है क्योंकि डेंगू बुखार का वाइरस मच्छरों के काटने से रोगी को संक्रमित करता है।
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5. इन्फ़्लुएन्जा [Influenza]-

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इन्फ़्लुएन्जा संक्रामक तो है ही और साथ मे बहुव्यापक भी है,इसका कारक भी वाइरस है। जाडा लगना,बुखार,आँख से पानी गिरना,तेज जुकाम इस रोग के प्रधान लक्षण है॥ साधारण सर्दी से इसके लक्षण मिलते जुलते हैं। आमतौर से इन्फ़्लुएन्जा का ज्वर 4-5 दिनों से अधिक नहीं रहता ; पर यदि कोई अन्य उपसर्ग साथ मे जुड जाते हैं तो आरोग्य होने मे समय लगता है। वृददों मे यह एक घातक रोग हो सकता है। रोगी अत्यंत कमजोरी की वजह से बलगम निकाल नही पाता और इसी वजह से उसकी मृत्यु हो जाती है।
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