India to tie up top institutes for advanced research in Homoeopathy


New Delhi: Buoyed by the success of the World Summit in Mumbai, the Central Council for Research in Homeopathy (CCRH) plans to have a tie-up with other research organisations with the aim of taking the health-care industry to the next level.

With recent researches having yielded information on genomics which can be juxtaposed on the effect of homeopathic medicines individualised at molecular level, CCRH director general R.K. Manchanda has called for further research in the area.

He pointed out that CCRH — an autonomous body under the government of India’s Department of Ayurveda, Yoga and Naturopathy, Unani, Siddha and Homoeopathy (AYUSH) — has been instrumental in cutting-edge research publications on cancer, Japanese encephalitis, diabetes, urolithiasis, memory function and detection of nano-particles in high homeopathic dilutions.

The council has already found integration of homeopathic and allopathic medicines to be successful in tackling MDR-TB.

Manchanda expressed happiness the huge participation in the World Homeopathy Summit on April 11-12, which CCRH held the summit in association with the Global Homeopathy Foundation, proved that homeopathy is not a placebo medicine and that it is science.

The summit was attended by scientists from Brazil and Italy as well as those from the Indian Council of Medical Research (ICMR), IIT-Bombay, Institute of Chemical Technology (ICT) Mumbai, Indian Institute of Chemical Technology (IICT) Hyderabad, Haffkine Institute Mumbai, Council of Scientific and Industrial Research (CSIR) and Bose institute – Kolkata.

“The deliberations at the summit held recently and the ocean of information on the research done into treatment of AIDS, cancer, influenza and TB and the detection of nano-particles in homeopathic medicines will definitely take homeopathy to an altogether new dimension,” he said.

Questions have been raised about homeopathy — whether it is a science at all and if it works and how does it work. “Now, we are in a position to declare to the world that researches have conclusively proved that homeopathy works, and works effectively in several cases of complicated diseases,” declared Dr Rajesh Shah, organising secretary of the summit.

Molecular biologist Dr Gaurisankar from Bose institute – Kolkata, demonstrated that cancer tumour regressed significantly after administering homeopathic nano-particles of Calcaria Carbonicum. His research has proved that high-dilution homeopathic nano-particles could kill the cancer cells and considerably reduce the cancer tumours in rats.

Snake venom transformed into a homeopathic medicine could reduce the growth of HIV virus by inhibiting RT (reverse transcriptase), an enzyme required for the multiplication of the deadly HIV, Hepatitis C and Ebola virus, studies at Indian Institute of Chemical Technology (IICT), Hyderabad, showed. IICT scientists Dr Praveen Kumar and Dr Prathama feel this research opens a new way to treat HIV and other such diseases, including Ebola.

In a study by Dr Khuda Bukshsh, genotoxic effects of arsenic trioxide poisoning were successfully treated using potentised arsenic metal, proving the very fundamental principle of homeopathy, which says that like can be cured by likes, if administered in extremely small dose.

Similarly, he demonstrated that mercury, cadmium and tin toxicity also reduced with the corresponding homeopathic medicines prepared from the same metals. “Treatment of toxicity is another area which could be addressed by homeopathy,” said GHF chairman Eswara Das, also an ex-advisor of AYUSH.

Cancer surgeon Dr Arun Jamkar, vice-chancellor of Maharashtra University of Health Sciences (MUHS), said in his keynote address that recent research has created adequate evidence for the efficacy of homeopathic medicines. He opined that homeopathy and conventional medicine could be integrated to benefit the patients.

A major research done in Brazil by Dr Leoni Bonamin and team demonstrated the preventive affects of homeopathic medicine prepared from the influenza virus. “This research opens up windows to many more research opportunities in India,” said Dr. Shah, who is also working on developing more medicines sourced from various germs.

Source :

होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा और एवोगेड्रो ( Avogadro’s ) की संख्या – क्या एवोगेड्रो की संख्या से होम्योपैथी का मूल्याकंन करना उचित है ?

homeopathy explained

होम्योपैथिक औषधियों के विरोध के प्रमुख कारणॊं मे एक प्रमुख कारण होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा   है । होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा को विस्तार मे समझने के लिये औषधि निर्माण की प्रक्रिया को समझना पडेगा । होम्योपैथिक औषधियों मे प्राय: दो प्रकार के स्केल प्रयोग किये जाते हैं ।

क) डेसीमल स्केल ( Decimal Scale )

ख) सेन्टीसमल स्केल ( Centesimal Scale )

क) डेसीमल स्केल मे दवा के एक भाग को vehicle ( शुगर आग मिल्क ) के नौ भाग से एक घंटॆ तक कई चरणॊं मे विचूर्णन ( triturate ) किया जाता है । इनसे बनने वाली औषधियों को X शब्द से जाना जाता है जैसे काली फ़ास 6x इत्यादि । 1X  बनाने के लिये दवा का एक भाग और दुग्ध-शर्करा का ९ भाग लेते हैं , 2X के लिये 1X का एक भाग और ९ भाग दिग्ध शर्करा का लेते हैं ; ऐसे ही आगे कई पोटेन्सी बनाने के लिये पिछली पोटेन्सी का एक भाग लेते हुये आगे की पावर को बढाते हैं । डेसीमल स्केल का प्रयोग ठॊस पदार्थॊं के लिये किया जाता है ।

ख) सेन्टीसमल स्केल मे दवा के एक भाग को vehicle ( एलकोहल) के ९९ भाग से सक्शन किया जाता है । इनकी इनसे बनने वाली औषधियों को दवा की शक्ति या पावर से जाना जाता है । जैसे ३०, २०० १००० आदि ।

सक्शन सिर्फ़ दवा के मूल अर्क को एल्कोहल मे मिलाना भर नही है बल्कि उसे सक्शन ( एक निशचित विधि से स्ट्रोक देना )  करना है । आजकल सक्शन के लिये स्वचालित मशीन का प्रयोग किया जाता है जब कि पुराने समय मे यह स्वंय ही बना सकते थे । पहली पोटेन्सी बनाने के लिये दवा के मूल अर्क का एक हिस्सा और ९९ भाग अल्कोहल लिया जाता है , इसको १० बार सक्शन कर के पहली पोटेन्सी तैयार होती है ; इसी तरह दूसरी पोटेन्सी के लिये पिछली पोटेन्सी का एक भाग और ९९ भाग अल्कोहल ; इसी तरह आगे की पोटेन्सी तैयार की जाती हैं ।

विरोध का मूल कारण और एवोगेड्रो ( Avogadro’s  ) की परिकल्पना

रसायन विज्ञान के नियम के अनुसार किसी भी वस्तु को तनु करने की एक परिसीमा है और इस परिसीमा मे रहते हुये यह आवशयक है कि उस तत्व का मूल स्वरुप बरकरार रहे । यह परिसीमा आवोग्राद्रो की संख्या ( 6.022 141 99 X 1023 ) से संबधित है जो होम्योपैथिक पोटेन्सी 12 C से या 24 x से मेल खाता है । यानि आम भाषा मे समझें तो होम्योपैथिक दवाओं की १२ वीं पोटेन्सी और 24 X पोटेन्सी मे दवा के तत्व विधमान रहते हैं उसके बाद नही । होम्योपैथिक के विरोधियों के हाथ यह एक तुरुप का पत्ता था और जाहिर है उन्होने इसको खूब भुनाया भी ।

यह बिल्कुल सत्य है कि रसायन शास्त्र के अनुसार होम्योपैथी समझ से बिल्कुल परे है । लेकिन पिछले २४ वर्षों  मे १८० नियंत्रित ( controlled ) और ११८  यादृच्छिक ( randomized )  परीक्षणों को अलग -२ ४ मेटा तरीकों  से होम्योपैथी का विश्लेषण करने के उपरांत प्रत्येक मामले में  शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि होम्योपैथी दवाओं से मिलने वाले परिणाम प्लीसीबो से बढ कर हैं ।

होम्योपैथी के संबध मे प्राथमिक प्रशन उभरता है कि क्या सक्शन ( succession ) किये गये SAD ( serially agitated dilutes )  को तरल वाहनों जैसे एल्कोहल या जल  ( liquid vehicles e.g. alcohol , water etc )  से अलग कर के पहचान की जा सकती है जो होम्योपैथिक औषधि के रुप मे उपचार के लिये प्रयोग किये जाते हैं । हाँलाकि इससे प्लीसीबो के आरोपों से मुक्ति नही पा जा सकती लेकिन इससे पता अवशय चलता है कि हर औषधि की अपनी विशेषता क्या है ।

एक सदी से  मेडिकल साहित्य की समीक्षा करने से पता चलता है कि ऐसे कई रिपोर्ट उपलब्ध हैं जिससे यह पहचान की जा सकती है कि इन उच्च  potentised  dilutes का प्रभाव जीवाणु , प्राणि विषयों , वनस्पति और यहाँ तक कि जन्तुओं पर भी असरदारक है । इनके लिये भौतिकी और बायोकेमिस्ट्री दोनों का ही समय-२ पर प्रमाण स्वरुप सहायता ली गई । हाँलाकि इन रिपोर्टों से SAD की आणविक संरचना समझ मे नही आती लेकिन यह बिल्कुल तय है कि यह SAD  तरल वाहनों ( liquid vehicles ) से हटकर हैं ।

इस विषय पर पहल्रे भी चर्चा हो चुकी है । देखें होम्योपैथी -तथ्य एवं भ्रान्तियाँ ” प्रमाणित विज्ञान या केवल मीठी गोलियाँ “( Is Homeopathy a trusted science or a placebo )  लेकिन नवीनतम शोघॊं मे  रसायन शास्त्री श्री बिपलब चक्र्वर्ती और डा. मो. रुहल अमीन के शोध होम्योपैथी औषधियों और एवोगेड्रो  संख्या पर प्रकाश डालने वाले हैं । उनके ब्लाग  नवीन संभवनाओं को जन्म देता है । बिपलब चक्र्वती एक समय होम्योपैथिक के बडे आलोचक रहे हैं  लेकिन पिछ्ले १० सालॊ से बिपलब और डा. अमीन होम्योपिथिक दवाओं के सांइनटैफ़िक पहलू पर कार्य कर रहे हैं । आपके कई शोध पत्र विभिन्न शोध संस्थानों द्वारा सराहे गये है ।

आवाग्रादो की परिकल्पना और होम्योपैथी के विवाद मे अमीन लिखते है :

How and Why Avogadro’s Number does not Limit efficacy of the Homeopathic Remedies.
#       Homeopathic dilutions have been used since 1800 and remained unchallenged until determination of Avogadro’s number.
#       Homeopathic remedies were challenged only after the determination of Avogadro’s number by Millikan in 1910, a number of years after homeopathy came into use.
#       A mathematical calculation based on Avogadro’s Number led to the conclusion that homeopathic dilution must be nothing but placebo after homeopathy had already been used for 109 years !!
#       It is not proper to discount homeopathy simply on the basis of Avogadro’s number without clarifying the existing fundamental contradictions in science as detailed above.
#       In conventional medicines the molecules are believed to convey the medicinal power in the living body but in homeopathic dilutions it is not the molecules of medicine but the  electrical strain induced in the vehicle, by the  substance, that conveys the medicinal power of a substance in the living body.
#       When preparing serial homeopathic dilutions the electrical strain of the latter differs from the former dilution in regards to difference in molecular orientations of water  but cannot be determined due to non-availability of any such scientific instruments and for which the homeopathic dilution cannot be held responsible.
Source : How and why Homeopathy is Scientific

डा. रुहल अमीन और श्री बिपलब चक्रवर्ती के अन्य शोध लेखों को देखने के लिये निम्म लिंक पर जायें:

Haffkine institute comes up with homeopathy drug for Tuberculosis


Source :

Haffkine Institute is a one of the oldest biomedical research institutes in the country. It was established in 1899 and is named after the scientist (Dr. Waldemar Mordecai Haffkine) who invented the plague vaccine. Since then, Haffkine Institute has emerged as a multi-disciplinary Institute engaged in training, research and testing of various aspects of infectious diseases.

MUMBAI: Haffkine Institute, the 116-year-old historical research institute in Parel that has done cutting-edge research work in the field of infectious diseases, has worked out a homeopathic medication for tuberculosis.

At a time when several western nations, including Australia and the United Kingdom, have expressed their reservations against homeopathy, Haffkine Institute delved deep into the alternative medicine’s sub-chapters on nosodes—better known as homeopathic vaccines—to prepare an anti-TB concoction. “We are not experts in homeopathy but, as microbiologists, we understand the principles of infectious diseases,” said Haffkine Institute’s director Dr Abhay Chowdhury.

His team tied up with homeopath Dr Rajesh Shah for the project, which started in March-April 2014.

Anti-TB medicines are mainly allopathic and homeopathy has had little role so far, admitted Dr Shah. “But we believe that our new nosode can complement allopathic medicines given to TB patients, including those with multi-drug-resistant TB,” he said.

In fact, a research paper published in Homeopathy Journal in 2014 said “add-on homeopathy in addition to standard therapy appears to improve outcome in MDR-TB”.

“Nosodes are used against infectious diseases such as anthrax, tuberculosis etcetera. However, there have been no new nosodes in recent times,” said Dr Shah. For the collaboration with Haffkine, he took an old nosode prepared using the sputum of a TB patient as well as other microbiological samples of patients suffering from MDR-TB, and decided to rework it.

After preparing a culture of these microorganisms, the Haffkine team worked on making the medicine using age-old homeopathic techniques but in modern settings. “Homeopathic medicines are prepared using the process of potentization or step-wise dilutions. We did the same but more scientifically by using molecular techniques,” said Dr Sandeepan Chowdhary, a scientific officer with Haffkine who was a part of the study. He said that Haffkine-nosode, which now has a standardized formula, is undergoing animal trials. [Source]

Web :

यह भी देखें :

विश्व होम्योपैथी दिवस–एक पहल यह भी ..


hah day

फोटो हैनीमैन चौराहे,  लखनऊ  की है। वर्ल्ड होम्योपैथी-डे पर शुक्रवार सुबह नेशनल होम्योपैथी मेडिकल कालेज के छात्रों का ग्रुप यहां पहुंचा और होम्योपैथी के जनक डा. हैनीमैन की मूर्ति पर लगे बैन-पोस्टर हटाकर चौराहे को साफ-सुथरा कर दिया। युवाओं ने करीब एक घंटे मेहनत की। यह देखकर अच्छा लगा कि युवा दूसरों को दोष देने के बजाय खुद कुछ कर दिखाने के लिए आगे आए हैं। लोगों को भी सबक लेना चाहिए कि वे इनकी मेहनत पर दोबारा गंदगी न फैलाएं, बल्कि उनकी इस मुहिम में उनका साथ दें।

यह भी देखें :

1. डॉ. क्रिश्चियन फ्राइडरिक सैमुअल हैनिमेन- जन्म दिवस पर विशेष ( A Tribute to Dr  Samuel Hahnemann )                                                                                                                       2.  World Homeopathy Awareness Week  
3. A bouquet of Homeopathic books in pdb format ( special 257th Hahnemann Birthday edition )

8 sleeping positions & their effects on health

सोना हर प्राणी की जिंदगी का एक अहम हिस्सा है, क्योंकि इसके बगैर जिंदगी की गाड़ी आगे बढ़ ही नहीं सकती। हर व्यक्ति के सोने का तरीका अलग-अलग होता है और उनका यही तरीका उनके बारे में कई मजेदार बातें भी बताता है। आइए, जानें आपके सोने का तरीका आपके बारे में क्या-क्या कहता है।

In what position do you sleep most often? It turns out this is a very important question. Getting enough sleep is the most important thing – but did you know that how you sleep can also impact your health?

Sleeping on your back with your arms at your side is generally considered to be the best sleeping position for spine health and it’s good for your neck too, as long as you don’t use too many pillows.

That said, back sleepers tend to snore more than those in any other position and sleep apnea is strongly associated with sleeping on the back.

Let’s take a look at eight common sleeping positions and what they do to your body.

Source :

Homeopathy for epidemics – efficacious treatment for many!

Originally posted on Clever Homeopathy:

The efficacy of homeopathy is often questioned and subjected to doubt, due to its yet unknown and unproven action mechanism. Yet, history has provided definitive proof of homeopathys effectiveness, aside of the many individually and successfully treated case-histories. Pandemics and epidemics, situations bearing a great health risk to vast numbers of people, in fact populations, have been exemplary phases of great homeopathic treatment achievement.

While the homeopathic treatment approach to such outbreaks falls somewhat short of the absolute compliance with common homeopathic prescribing methodology and its underlying philosophy, it is nonetheless the most efficient form of therapeutic intervention with regard to the historic presentation of such mass illness.

Hahnemann, the founder of classical homeopathic medicine, has always stressed in his writings that the homeopathic approach to healing is one of highest individuality and holism. He stresses this in particular in aphorism 82 of the Organon where he states that: “

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मेरी डायरी–बैच फ़्लावर रेमेडी–“ गौर्स–Gorse ”


३८ बैच फ़्लावर औषधियों मे से मै  १२-१५  दवाओं का अकसर प्रयोग करता हूँ । अधिकतर बैच फ़्लावर औषधियों  का प्रयोग अभी किया नही है । गौर्स को प्रयोग करने का पहला अनुभव बहुत अधिक संतोषजनक रहा । १५ दिन पहले मुझे जिस रोगी को देखने जाना पडा वह मेरे  एक  साथी चिकित्सक के पिता का केस था । आयु ५६ वर्ष , पिछ्ले कई  सालो से कुवैत मे किसी अच्छी सरकारी पोस्ट पर थे । डायबीटिज थी और उच्च रक्तचाप से पीडित भी  । पहला पक्षाघात का अटैक कुवैत मे ही पडा । कुछ दिन वही अस्पताल मे रहने पर जाँचॊ द्वारा मालूम पडा कि उनकॊ Tubercular meningitis भी है । इलाज शुरु हुआ लेकिन टी.बी . पर वहाँ के चिकित्सकॊ की एक राय न बन सकी । एक पक्ष Neurocysticercosis  और दूसरा चिकित्सकों का समूह टी.बी. की डाय्गोनिसस पर विभाजित रहा । टी.बी. पर कुछ दिन इलाज चलने के बाद दूसरे पक्ष के चिकित्सकों ने टी. बी. पर इलाज बन्द कर के सीसस्टीसर्कोसिस पर इलाज शुरु किया । हाँलाकि पहले इलाज के दौरान मरीज को कुछ फ़ायदा दिख रहा था ।  इस बीच  एक राय न बनने के कारण मरीज को वापस भारत जाने के लिये कहा गया ।

रोगी की पत्नी के अनुसार लखनऊ आने पर वह बेहतर हालात मे थे । उन्होने उस समय की एयर्पोर्ट की मुझे जो फ़ोटॊ दिखाई उसमे वह काफ़ी प्रसन्नचित्त और स्वस्थ दिख रहे थे ।  लखनऊ मे भी चिकित्सकों की एक राय Tubercular meningitis  की ही बनी। फ़लस्वरुप इलाज के दौरान कुछ माह के अन्दर स्वास्थ लाभ तेज हुआ और रिकवरी पूरी तरह से दिखने लगी । लेकिन साल भर के अन्दर दूसरा अटैक फ़ालिज का पडा । और फ़िर उसके बाद वह इलाज चलने के बावजूद भी रिकवर न कर पाये । टी.बी , ब्लड शुगर और  उच्च रक्तचाप   की दवाईयाँ पहले से ही चल रही थी । और वह अब पक्षाघात ( Hemiplegia )  के लिये होम्योपैथिक राय मुझसे लेना चाहते थे ।

अधिकतर फ़ालिज ग्रस्त रोगियों मे सबसे बडी  समस्या उनके अवसादों को लेकर होती है । और यहाँ भी समस्या डिप्रेशन को लेकर ही थी । DPR ( deep plantar reflexes – Babsinki sign ) पाजीटिव दिखने के बावजूद  भी रोगी मे movements काफ़ी हद तक सामान्य थे । इन हालात को देखकर मुझे लगा कि शायद कुछ उम्मीद बन सकती है लेकिन रोगी के साथ मुख्य समस्या मानसिक अवसाद की थी । रोगी की पत्नी के अनुसार न तो वह उनको सहयोग देना चाहते थे और न ही अपने फ़िजियोथिरेपिस्ट को । रोना ,  बात –२ पर क्रोधित होना । जीबन के प्रति निराशा के भाव उनकी बातचीत से ; जो हाँलाकि पक्षाघात के कारण स्पष्ट न थी , साफ़ नजर आ रही थी ।

पहले से ही कई अति आवशयक दवायें चल रही थी और उनको बन्द करके होम्योपैथिक दवाओं को चलाने की कोई वजह नही थी । लेकिन क्या होम्योपैथिक और बैच फ़्लावर कार्य करेगी , यह अवशय संशय था । constitutional/ pathological सेलेक्शन मे से पैथोलोजिकल सेलेक्शन को अधिक मह्त्व दिया जो कि वर्तमान लक्षणॊं मे से प्रमुख थे ।

Opium LM पोटेन्सी पहली चुनाव बना  और अब बारी थी रोगी के अवसादॊ की । बैच फ़्लावर को एक बार फ़िर से अवसादों के लिये मुख्य जगह दी गई । और दवा का सेलक्शन गौर्स पर टिका | लगभग २ सप्ताह के बाद  रोगी की पत्नी और उनके घर के अन्य सद्स्यों ने रोगी की स्वास्थ की प्रगति , ( विशेषकर उनके अवसादों ) को काफ़ी अधिक संतोषजनक बताया । उनके अनुसार रोगी बेहतर हालात में है ,  प्रसन्नचित्त रहते हैं और अपने कार्यों को स्वंय करने की कोशिश करते हैं ,  जो पहले कभी न देखी गई । यह तो आगे आने वाला समय बतायेगा कि अन्य मुख्य लक्षणॊ मे कहाँ तक प्रगति आती है लेकिन Mind – Body connections मे बैच फ़्लावर के महत्व की भूमिका को  नंजर अंदाज नही किया जा सकता ।

आखिर गौर्स ने क्या कियागौर्स का मुख्य लक्षण है – पूर्ण नाउम्मीदी ( Hopelessness ) . रोगी को यह विशवास होता है कि वह अब ठीक नही हो सकता । और या तो वह चिकित्सक को बेमन से मिलता है या फ़िर मजबूरी मे । ( ऋण पक्ष ) ऐसे रोगियों को गौर्स दोबारा जिन्दगी से लडने के लिये संबल प्रदान करता है । ( धन पक्ष )

बात जब गौर्स की है तो बैच फ़्लावर दवाओं मे नाउम्मीदी ( Hopelessness ) की अन्य दवाये भी है , जैसे :

१. Gentian ( जैन्सियन) : इसमे शक और मायूसी तो होती है लेकिन नाउम्मीदी बिल्कुल नही होती ।

२. Sweet chest Nut ( स्वीट चेस्ट नट ) : इसमे पूर्ण निराशा , जैसे सब कुछ खो गया हो और बाकी कुछ रह न गया हो ।

३. Wild Rose ( वाइल्ड रोज ) : अपनी बीमारी के लिये वह अपने पिछ्ले कर्मॊ का फ़ल समझता है ।

४. गौर्स ( Gorse ) : किसी लम्बी बीमारी मे कई ईलाज कराने के बाद वह मायूस हो जाता है और अपनी उम्मीद छोड बैठता है ।

बैच फ़्लावर की कुछ विशेष खूबियाँ मुझे इस पद्द्ति की तरफ़ आकृष्ट करती हैं । जहाँ होम्योपैथिक दवाओं मे अन्य दवाओं के साथ चलाने का झमेला रहता है वही बैच को किसी भी पद्द्ति के साथ समावेशित किया जा सकता है ।


Scientific name: Ulex
Family Fabaceae.
Rank: Genus
Higher classification: Faboideae

Keyword – Hope | Bach Group – Uncertainty

Gorse is the remedy for those who suffer great uncertainty in the process of life, causing them to experience feelings of hopelessness and despair. This is a state sometimes found in those with a long-term illness who have lost all hope of recovery or in those whose experiences have caused them to view life ‘as a lost cause’. When this state is very deep rooted a person may have dark rings under the eyes or be prone to sigh a lot. Taken over a period of time Gorse will help to dispel these dark feelings and promote new hope and vision for the future.

Dr Bachs description of Gorse:-

“Very great hopelessness, they have given up belief that more can be
done for them. Under persuasion or to please others they may try
different treatments, at the same time assuring those around that
there is so little hope of relief”

From the Twelve Healers & Other Remedies – By Dr Edward Bach ( 1936 edition)

यह भी देखें :