होम्योपैथी चिकित्सा पद्दति – IIT वैज्ञानिकों की नजर मे

होम्योपैथी चिकित्सा पद्दति के साथ सबसे बडी दिक्कत उ्सको प्रयोगशाला मे विशवसनीयता को साबित करना है । एक सदी से होम्योपैथी विभिन्न चिकित्सा कर्मियों और विशेषकर वैज्ञानिकों के दृष्टिकोण मे एक अनबूझी पहेली सी लगती रही है । तमाम क्लीनिकल  परिणामॊ  को दरकिनार रखते हुये बात उसके वैज्ञानिक प्रमाणिकता पर ही टिक जाती है । हाल ही मे IIT मुम्बई के वैज्ञानिकों ने होम्योपैथी दवाओं  की कार्य प्रणाली को समझने की कोशिश की है । IIT मुम्बई की इस टीम के अनुसार होम्योपैथी की  मीठी गोलियों नैनोटेकोनोलोजी के सिद्दांत पर काम करती हैं । देखें पूरी रिपोर्ट   http://homeopathyresearches.blogspot.com/2010/12/iit-b-team-shows-how-homoeopathy-works.html

लेकिन मूल प्रशन कि होम्योपैथी के विरोध का  कारण क्या है ?

  • होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा
  • होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा और आवोग्राद्रो ( Avogadro’s  ) की परिकल्पना

होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा

होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा को विस्तार मे समझने के लिये औषधि निर्माण की प्रक्रिया को समझना पडेगा । होम्योपैथिक औषधियों मे प्राय: दो प्रकार के स्केल प्रयोग किये जाते हैं ।

क) डेसीमल स्केल ( Decimal Scale )

ख) सेन्टीसमल स्केल ( Centesimal Scale )

क) डेसीमल स्केल मे दवा के एक भाग को vehicle ( शुगर आग मिल्क ) के नौ भाग से एक घंटॆ तक कई चरणॊं मे विचूर्णन ( triturate ) किया जाता है । इनसे बनने वाली औषधियों को X शब्द से जाना जाता है जैसे काली फ़ास 6x इत्यादि । 1X  बनाने के लिये दवा का एक भाग और दुग्ध-शर्करा का ९ भाग लेते हैं , 2X के लिये 1X का एक भाग और ९ भाग दिग्ध शर्करा का लेते हैं ; ऐसे ही आगे कई पोटेन्सी बनाने के लिये पिछली पोटेन्सी का एक भाग लेते हुये आगे की पावर को बढाते हैं । डेसीमल स्केल का प्रयोग ठॊस पदार्थॊं के लिये किया जाता है ।

ख) सेन्टीसमल स्केल मे दवा के एक भाग को vehicle ( एलकोहल) के ९९ भाग से सक्शन किया जाता है । इनकी इनसे बनने वाली औषधियों को दवा की शक्ति या पावर से जाना जाता है । जैसे ३०, २०० १००० आदि । सक्शन सिर्फ़ दवा के मूल अर्क को एल्कोहल मे मिलाना भर नही है बल्कि उसे सक्शन ( एक निशचित विधि से स्ट्रोक देना )  करना है । आजकल सक्शन के लिये स्वचालित मशीन का प्रयोग किया जाता है जब कि पुराने समय मे यह स्वंय ही बना सकते थे । पहली पोटेन्सी बनाने के लिये दवा के मूल अर्क का एक हिस्सा और ९९ भाग अल्कोहल लिया जाता है , इसको १० बार सक्शन कर के पहली पोटेन्सी तैयार होती है ; इसी तरह दूसरी पोटेन्सी के लिये पिछली पोटेन्सी का एक भाग और ९९ भाग अल्कोहल ; इसी तरह आगे की पोटेन्सी तैयार की जाती हैं ।

होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा और आवोग्राद्रो ( Avogadro’s  ) की परिकल्पना

रसायन विज्ञान के नियम के अनुसार किसी भी वस्तु को तनु करने की एक परिसीमा है और इस परिसीमा मे रहते हुये यह आवशयक है कि उस तत्व का मूल स्वरुप बरकरार रहे । यह परिसीमा आवोग्राद्रो की संख्या ( 6.022 141 99 X 1023 ) से संबधित है जो होम्योपैथिक पोटेन्सी 12 C से या 24 x से मेल खाता है । यानि आम भाषा मे समझें तो होम्योपैथिक दवाओं की १२ वीं पोटेन्सी और 24 X पोटेन्सी मे दवा के तत्व विधमान रहते हैं उसके बाद नही । होम्योपैथिक के विरोधियों के हाथ यह एक तुरुप का पत्ता है  और जाहिर है उन्होने इसको खूब भुनाया भी ।

यह बिल्कुल सत्य है कि रसायन शास्त्र के अनुसार होम्योपैथी समझ से बिल्कुल परे है । लेकिन पिछले २४ वर्षों  मे १८० नियंत्रित ( controlled ) और ११८  यादृच्छिक ( randomized )  परीक्षणों को अलग -२ ४ मेटा तरीकों  से होम्योपैथी का विश्लेषण करने के उपरांत प्रत्येक मामले में  शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि होम्योपैथी दवाओं से मिलने वाले परिणाम प्लीसीबो से हट कर हैं ।

देखें होम्योपैथी -तथ्य एवं भ्रान्तियाँ " प्रमाणित विज्ञान या केवल मीठी गोलियाँ "( Is Homeopathy a trusted science or a placebo )

IIT-B team shows how homeopathy works

Source : The Times of India 16 dec 2010
Mumbai: Six months after the British Medical Association wrote off homoeopathy as “witchcraft’’ that had no scientific basis, we may now have an irrefutable answer to what makes this ancient form of medicine click. Scientists from the Indian Institute of Technology-Bombay (IIT-B) have established that the sweet white pills work on the principle of nanotechnology.
    Homeopathic pills—made of naturally occurring metals such as gold and copper-—retain their potency even when diluted to a nanometre or one-billionth of a metre, states the IIT-B research published in the latest issue of Homoeopathy, a peer-reviewed journal published by the reputed Elsevier. IIT-B’s chemical engineering department bought commonly available homoeopathic pills from neigbourhood shops, prepared highly diluted solutions and checked under powerful electron microscopes to find nanoparticles of the original metal.
    “Our paper showed that certain highly diluted homoeopathic remedies made from metals still contain measurable amounts of the starting material, even at extreme dilutions of 1 part in 10 raised to 400 (200C),’’ said Dr Jayesh Bellare. His student, Prashant Chikramane, presented the paper ‘Extreme homoeopathic dilutions retain starting materials: A nanoparticulate perspective’, as part of his doctoral thesis. IIT theory proves what some homoeopaths have always known
    Homoeopathy was established in the late 18th century by German physician Samuel Hahnemann. While it is widely popular in certain countries, especially India, the British Medical Association and the British parliament have in recent times questioned homoeopathy’s potency. Around four years ago, British research papers rubbished homoeopathy as a mere “placebo’’.
    “Homoeopathy has been a conundrum for modern medicine. Its practitioners maintained that homeopathic pills got more potent on dilution, but they could never explain the mechanism scientifically enough for the modern scientists,’’ said Bellare. For instance, if an ink-filler loaded with red ink is introduced into the Powai lake, Bellare said, there would be no chance of ever tracing it. “But the fact is that homoeopathic pills have worked in extreme dilutions and its practitioners have been able to cure tough medical conditions,” he added.
    “We had analyzed ayurvedic bhasmas a few years ago and found nanoparticles to be the powering agent ,” the team members said. For the first time, scientists used equipment like transmission electron microscope, electron diffraction and emission spectroscopy to map physical entities in extremely dilution. They could measure nanoparticles of gold and copper (the original metal used in the medicines).
    American homoeopaths—Dr Joh Ives from Samueli Institute in Virginia and Joyce C Fryce from the Centre of Integrative Medicine, University of Maryland—said, “We are all familiar with the simple calculations showing that a series of 1:99 dilutions done sequentially will produce a significant dilution of the starting material in very short order,” they wrote in a special editorial in the journal. But as dilution increases, this theory goes awry. “(But) Chikramane et al found that, contrary to our arithmetic, there are nanogram quantities of the starting material still present in these ‘high potency’ remedies.’’
    The hypothesis is that nanobubbles form on the surface of the highly diluted mixtures and float to the surface, retaining the original potency. “We believe we have cracked the homoeopathy conundrum,’’ said Bellare. According to homoeopath Dr Farokh J Master, the IIT theory has proven something what practitioners have always known. “My instruction to my patients has always been to dilute the pills in water and stir it 10 times with a spoon. Then remove the spoon , dip it in another cup of water and stir 10 times. I advise my patients to do this in five cups before discarding the first four cups and then drinking the fifth cup in two equal doses,’’ said Master.
MEDICAL FACTS
FOR…
Homeopathy works on the principles of nano-particles, say IIT-B’s department of chemical engineering team
    Using state-of-the art techniques, they could find particles of the original element as small as one-billionth of a metre
    The hypothesis is that a nanoparticle-nanobubble rises to the surface of the diluted solution; it is this 1% of the top layer that is collected and further diluted. So, the concentration remains
AGAINST…
Homeopathy is merely a placebo, said a meta-analyses published in the Lancet in 2005.
    The British Medical Association said that homeopathy had no scientific basis; dub it witchcraft
    Many National Health Services in the UK excluded homeopathy from their purview

3 responses to “होम्योपैथी चिकित्सा पद्दति – IIT वैज्ञानिकों की नजर मे

  1. —वास्तव में आधुनिक विग्यानी प्रत्येक वस्तु व क्रिया को प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में देखना चाहते हैं जबकि दर्शन के अनुसार–अनुमान प्रमाण( जो अनुभव पर आधारित है )भी एक प्रत्यक्ष प्रमाण है जो कि उच्चतम अवस्था में पहुंचे हुए अत्यन्त अनुभवी आत्म( या ग्यान- विग्यान) को ही दिखाई देता है–यह नेनो-तकनीक के ही समान है–अभी आधुनिक विग्यान उतनी ऊंचाई पर, गहराई पर नहीं पहुंचाहै—
    —होम्योपेथिक का सिद्दान्त—आयुर्वेदिक चिकित्सा के रस-भस्म विग्यान में मौज़ूद है( वस्तुतः आयुर्वेद में चिकित्सा-जगत का प्रत्येक सिद्धान्त मौज़ूद है..एलोपेथिक भी) जहां रस व भस्म व अन्य दवायें बनाने के लिये…१० कपर्छण(१० बार छानना), १०० खरल( १०० बार पीसना), २० भपका ( २० बार स्टीमिन्ग) आदि..औषधि की शक्ति/ पोटेन्सी बढाने के लिये प्रयोग किया जाता है…

  2. डा० टन्डन जी, जो काम होम्योपैथी के डाक्टरों को करना चाहिये, वह काम ्दूसरे वैग्यानिक कर रहे है / सवाल यह है कि होम्योपैथ क्या कर रहे है ? जवाब भी मै ही दिये दे रहा हूं /

    इस देश के होम्योपैथ सिवाय पालिटिक्स करने और एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में लगे है / होम्योपैथी के नेता गण अपनी दूकाने चलाने मे लगे हुये है और उसी मे ही सारी उर्जा बर्बाद किये दे रहे है / होम्योपैथी के मेडिकल कालेजों का क्या हाल है , यह किसी से भी छुपा हुआ नहीं है / लड़्के क्या पढके हासिल कर लेन्गे यह स्वयम एक रिसर्च का विषय है /

    याद करिये उत्तर् प्रदेश के एक कैबिनेट पूर्व मन्त्री एक होम्योपैथिक कालेज के प्रधानचार्य रहे / पान्च साल तक कुर्सी तोड़्ते रहे और होम्योपैथी के लिये क्या करके गये ? क्या कभी किसी ने विचार किया है ?

    मैने ELECTRO HOMOEO GRAPHY ; EHG HomoeopathyScan technology को Develop किया , जो आयुर्वद की तकनीक Electro Tridosha Graphy ; ETG AyurvedaScan से कई वर्षों के अथक परिश्रम करने के पश्चात हासिल की गयी है / आयुर्वेद की तकनीक का परीक्षण और इसकी मान्यता तो भारत सरकार के स्वास्थय मन्त्रालय ने दे दी है और यह तकनीक अब मरीजों को on payment उपलब्ध है / हमने अभी अभी Electro Homoeo Scan ; EHG HomeopathyScan की सेवाये on payment उपलब्ध करा दी है और इस तकनीक के परिणामों से आम जन बहुत प्रभावित है /

    वास्तविकता यह है कि होम्योपैथ डाक्टरों के अन्दर कोई भी जील इस तरह की नहीं दिखी , जो सही रिसर्च करने के लिये बहुत जरूरी है / जो भी रिसर्च की गयी है वे आम जनता से बहुत दूर है और उनका प्रक्टिकल अप्लीकेशन किसी महत्व का ही नही है / न ही इस तरह के रिसर्च से आम जनता पर कोई असर होता है /

  3. The requisites of a NANO explanation are that the starting particle- that is the drug in homeopathy ,should remain unaltered till end .In fact our own ideas has been that the drug changes into energy and should not be available in higher potencies. We have been listening of recovery of starting particles of homeopathic medicines in lower and lower-medium potencies. One time use of sophisticated techniques to explain the availability of these particles in potencies where they should not be mathematically present kept our minds puzzled, yet we were fascinated to learn that our own medicines have such a strong scientific interest. Today NANO has become a new avatar and we can not be unaffected from its rationality.
    Coming to Homeopathic way of understanding just press a coin made of metal say one rupee coin on the sand or clay and take it out. The sand looks bearing the marks of coin .It resembles the coin but lacks the rigidity of coin. The coin is the drug, the sand is the vehicle, the pressure over coin is the force offered in potentisation (trituration or dilution),the impressed sand is the medicine. We can create more such impressions until the coin is with us. This drug particle, the coin must remain in its original shape, to create more medicinal particles .Do the impressed particles which are now medicines serve as drugs to next potentisation level? Or again the same coin is needed to create impressions? . If the same coin is used over the already impressed sand the new structured particle will be doubly impressed by now. ? Is it the 2nd potency. According to NANO the starting particle remains present till end that is the coin must survives till then. If it is consumed or lost or taken out at any level further process of potentisation should stop.(It is different from catalysts taking part in many chemical reactions,or fossils bearing impressions beyond the eating up of original organism.)
    One section of us has been assuming that in potentization the drug particles convert into smaller particles and release energy , as if molecule into atom, atom into electron-proton-neutron…..and so on to still un-discovered particles, quite like atomic and molecular energy. This view is now out of consideration.
    Asking for a NANO explanation to homeo medicines we must be able to demonstrate at least one drug particle in a concluded solution. This is what the IIT genius has been able to do.
    This should be big leap in our pharmacopoeia .All aspects of homeopathy must be influenced on accepting this explanation for homeopathic medicines. We hope the discussion is carried on ..

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