Objectives:The objectives of the study were to evolve a group of most effective homoeopathic medicines in chronic cervicitis and cervical erosion and to identify their reliable indications, useful potencies, frequency of administration and relationship with other medicines.
Methods:The study was undertaken by Central Council for Research in Homoeopathy at its Units/Institute at Shimla, Imphal, Varanasi, Tirupathi and New Delhi. Cases of Cervicitis and Cervical erosion, presenting with vaginal discharge, low backache, lower abdominal pain/discomfort or dyspaerunia confirmed by P/V & P/S examination were enrolled in the study. Cases suffering from other chronic disease(s) or under other system of treatment were excluded from the study. Homoeopathic medicines were prescribed on the basis of totality of symptoms of each case, in mother tincture (Q) or 6C, 30C, 200C & 1M potency. A total of 3213 cases were followed up for one year. Assessment of improvement was done on predefined parameters.
Results:There was varying degrees of improvement; 261 cases were cured, 1104 cases improved markedly, 982 cases moderately, 713 cases mildly and 153 cases did not improve. Medicines found effective were: Alumina(n=114), Borax(n=67), Calcarea carbonicum(n=200), Caulophyllum(n=170), Hydrastis(n=110), Kreosotum(n=300), Lachesis(n=160), Mercurius solubilis (n=74), Natrum muriaticum(n=97), Pulsatilla(n=429) and Sepia(n=433). A few of the cases, who required repeated cauterization in the past, got cured permanently and required no cauterization after homoeopathic treatment.
Conclusion:Sepia alone emerged as the most frequently indicated medicine for Cervicitis and Cervical erosion. The objective to identify indications of homoeopathic medicines was achieved. But, other objectives, such as relationship between different medicines, could not be achieved.
डॉ. एंड्रयू ने होम्योपैथिक चिकित्सक और रॉयल होम्योपैथिक कॉलेज के संकाय के एक सदस्य के नाते होम्योपैथी के वृहद कोश का पहला संस्करण उतारा है . इस पुस्तक में एंड्रयू ने होम्योपैथिक फ़िलोसफ़ी , मैटेरिया मेडिका का व्यापक परिदृश्य प्रस्तुत किया है . डॉ. एंड्रयू की यह पुस्तक होम्योपैथिक चिकित्सक और छात्रों को विशेष लाभ पहुँचा सकती है
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This Clinical study was undertaken under guidance of Dr. V.P. Singh Central Council for Research in Homoeopathy , New Delhi at the RRI, Mumbai (May, 1989) and CRU, Chennai (October, 1991) by CCRH to ascertain whether homoeopathy can play a role in the treatment and management of HIV infection . The results obtained during the pilot study prompted a randomized placebo controlled study at Mumbai (1995-97). The results of the study were published in the British Homeopathic Journal (1999).
In between April 1998 and March 2003 , 237 HIV infected individuals including, 96 Females and 8 children less than 10 years of age were enrolled in the study .Three of these individuals were suffering from concurrent Hepatitis B infection and 2 were reactive to VDRL . Amyleum Nitrosum, Azathioprine, Cocainum Muriaticum and Cyclosporine were primarily used as medicines under trial . Other Homoeopathic medicines were used only during seasonal minor ailments based on presenting signs and symptoms.
Assessment of Outcome :
The response to the treatment was assessed at the end of the study and was based on the change in clinical presentation
The response to treatment was also assessed by the haematological and immunological investigations such as CD4/CD8 counts
Most of these investigations were conducted at the Council’s HIV Research Lab.
कृषि क्षेत्र मे होम्योपैथिक दवाओं के सफ़ल प्रयोगों के परीक्षण एक कौतुहूल और जिज्ञासा का विषय है । कम से कम होम्योपैथी को संदेह की दृष्टि से देखने वालों के लिये तो विशेष रूप से ही हाँ , कृषि क्षेत्र से जुडे वैज्ञानिकों का मानना है कि जैसे होम्योपैथी दवावों के दुष्प्रभाव मनुष्यों पर नहीं पाये जाते वैसे ही यह औषधियाँ पेड और पौधों के लिये भी सुरक्षित हैं । कम लागत की यह होम्योपैथिक दवायें कम से कम अपने देश मे किसानों को काफ़ी राहत दे सकती हैं और साथ ही मे पेड पौधों पर निर्भर रहने वाले जीव -जन्तु को असमय विलुप्त होने से बचा भी सकती हैं । हजारों होम्योपैथिक दवाओं के सफ़ल परीक्षण हो चुके हैं और इनमें से कुछ के परिणाम उपलब्ध हैं । इनमे से ९०% रिसर्च अपने देश मे ही हुयी है ; डां पंकज अवधिया जी द्वारा किये प्रयोग और पाकिस्तान में डां इफ़्ताकार वारिस द्वारा लिये गये सफ़ल परिणामों से क्या शेष विशव का होम्योपैथी से मुँह मोडना संभव है । sceptics या होम्योपैथी के बारे मे अनर्गल प्रचार-प्रसार करने वाले , सुबह शाम इस चिकित्सा पद्दति को गालियों से नवाजने वाले कितने समय तक तथ्यों से अपना मुँह मोड सकेगें ।
Duckweed (Lemna gibba L.) as a Test Organism for Homeopathic Potencies Scherr C, Simon M, Spranger J, Baumgartner S. Research Institute of Organic Agriculture, Frick, Switzerland., Society for Cancer Research, Institute Hiscia, Arlesheim, Switzerland. J Altern Complement Med. 2007 Nov;13(9):931-8
Effects of Potentised Substances on Growth Kinetics of Saccharomyces cerevisiae and Schizosaccharomyces pombe C. Scherra,c; S. Baumgartnera,b; J. Sprangerc,e; M. Simond aVerein für Krebsforschung, Institut Hiscia, Arlesheim, Schweiz bKollegiale Instanz für Komplementärmedizin (KIKOM), Universität Bern, Insel-Spital, Imhoof-Pavillon, Bern, Schweiz cForschungsinstitut für biologischen Landbau, Frick, Schweiz dInstitut für Chemie und Biologie des Meeres (ICBM), Universität Oldenburg, Deutschland eInstitut für anthroposophische Veterinärmedizin, Frick, Schweiz Forsch Komplementärmed 2006;13:298-306 (DOI: 10.1159/000095302)
किसी विषय को एक प्रभावशाली ढंग मे व्यक्त करना भी एक कला है और अगर वह विषय अपने मूल थीम से जुडा लगे तो क्या कहना । "माइन्ड मैप " कुछ इसी तरह का ओपन आफ़िस फ़्रीवेएर साफ़्टवेएर है । जावा आधारित इस साफ़्टवेएर की सहायता से मूल विषय को " root node " यानि मुख्य जड गाँठ से जॊड कर और उससे जुडे विषय को अन्य गाँठॊं और शाखाओं में दिखा सकते हैं ,शब्दों को कलात्मक ढंग से सजा सकते हैं जो किसी भी प्रोजेक्ट को अत्यन्त प्रभावशाली बनाता है । लेकिन होम्योपैथिक चिठ्ठे पर इसकी आवशयकता क्यूं पडी । मैटेरिया मेडिका मे वर्णित औषधियों के हर लक्षण महत्वपूर्ण नही होते बल्कि कुछ प्रमुख लक्षणॊं पर ही दवा का चयन करना होता है । नीचे स्क्रीनशाट मे देखॆं कि अब औषधि को समझना और याद करना कितना सरल हो गया ।
"माइन्ड मैप " को इन्सटाल करने के पहले सुनिशिचित करें कि कम्पयूटर में जावा इन्सटाल है या नहीं , अगर नहीं है तो जावा इन्सटाल करें ।
It is an image-centered diagram that represents semantic or other connections between portions of information. By presenting these connections in a radial, non-linear graphical manner, it encourages a brainstorming approach to any given organizational task, eliminating the hurdle of initially establishing an intrinsically appropriate or relevant conceptual framework to work within.
A mind map is similar to a semantic network or cognitive map but there are no formal restrictions on the kinds of links used.
The elements are arranged intuitively according to the importance of the concepts and they are organized into groupings, branches, or areas. The uniform graphic formulation of the semantic structure of information on the method of gathering knowledge, may aid recall of existing memories.
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Part 1 : Abies abies to Arctostaphylos (36 illustrations) Part 2 : Arctosraphylos (cont.) to Cannabis (33 illustrations) Part 3 : Capsicum to Citrus aurantium, var. sinensis (40 illustrations) Part 4: Citrus aurantium, var. sinensis (cont.) to Ecballium elaterium (33 illustrations) Part 5: Echinacea to Gaultheria (30 illustrations) Part 6 : Gaultheria (cont.) to Jateorhiza calumba (39 illustrations) Part 7: Juglans to Nectandra (39 illustrations) Part 8: Nepeta to Polygala senega (27 illustrations) Part 9: Polygala senega (cont.) to Ricinus (35 illustrations) Part 10 : Ricinus (cont.) to Styrax benzoin (41 illustrations) Part 11 : Styrax benzoin (cont.) to Zingiber (35 illustrations)
गत एक साल से होम्योपैथिक औषधियों पर दोहरी मार देखने को मिली है । पहले शुगर आफ़ मिल्क मे अप्रत्याशित वृद्दि से बायोकेमिक और ट्राईट्यूरेशन औषधियों के दाम आसमान छूने लगे और अब माननीय उच्चतम न्यायालय ने पौंडं पैंकिंग ( ४५० मि.ली. ) की बिक्री पर रोक लगाकर रही सही कसर पूरी कर दी ।
लेकिन सबसे पहले शुगर आफ़ मिल्क के खेल को समझते हैं । सन २००७ की शुरुआत मे शुगर आफ़ मिल्क के रेट १८००/ बैग था अगले तीन महीने मे यह रेट ३०००-३५००/ बैग तक जा पहुँचा , दो महीने बीते ही नही थे कि इसकी कीमते ६०००-९००० / तक आसमान छूने लगी और दिसम्बर २००७ तक यह १२०००/ बैग तक जा पहुँचा । समझा जाता है कि चीन की एक कम्पनी ने हालैंड की शुगर आफ़ मिल्क बनाने वाली कमपनी से अनुबंध करके शुगर आफ़ मिल्क को अपने कब्जे मे ले लिया , शायद इससे ही कीमतों मे वृद्दि दिखी । लेकिन कारण चाहे जो भी हो दवा बनाने वाली प्रमुख होम्योपैथिक कम्पनियों ने अपने स्वार्थ को साधते हुये बायोकैमिक दवाओं की कीमत ३२/ से ६५/ तक और triturations की कीमत ५० से ८५/ तक पहुँचा दी । लेकिन मजे की बात की मार्च २००८ के बाद रेट मे कमी आने के बावजूद २५ से ४५० ग्राम की पैकिंग मे रेट कम होने नही दिख रहे हैं ।
दिसम्बर २००७ मे माननीय उच्चतम न्यायालय ने पौंडं पैंकिंग ( ४५० मि.ली. ) की बिक्री पर रोक लगा कर रही सही कमर और तोड दी । केंद्र सरकार ने अल्कोहल की मात्रा वाली होम्योपैथिक दवाओं को रिटॆल मे ३० मि.ली. और अस्पताल सप्लाई हेतु १०० मि.ली. करने के निर्देश दिये । इसके विरुद्द प्रमुख कम्पनियों ने उच्च न्यायालय से स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया लेकिन इस स्थगन आदेश को दिसम्बर २००७ मे उच्चतम न्यायालय ने निरस्त कर दिया । पूरी रिपोर्ट नीचे देखें ।
केंद्र सरकार के ३० मि.ली. और १०० मि.ली. करने के निर्देश पर प्रमुख होम्योपैथिक कम्पनियों की चुप्पी संशय मे डालने वाली रही । आज से करीब २० साल पहले कलकत्ता की अधिकांश कम्पनियों का होम्योपैथिक दवाओं मे होल्ड हुआ करता था । शारदा बोएरन ( SBL INDIA ) के आने के बाद से समीकरण बदले और कलकत्ता का होल्ड टूटता दिखाई दिया । इन २० सालों मे दिल्ली की अधिकाशं कम्पनियों ने मार्केट पर कब्जा जमा लिया लेकिन सबसे बडी हिस्सेदारी SBL की रही जो प्रमुखत: फ़्रांस की कम्पनी थी । जरमनी की विल्मर शवाबे ( Willmar Scwabe India ) के आगमन से SBL और BAKSON जैसी कम्पनियों की मोनोपोली मे कोई कमी नही दिखाई दी और शवाबे को अपनी पहचान बनाने मे काफ़ी दिक्कत का सामना करना पडा । मजे की बात है कि शवाबे शुरु से ही ३० मिली और १०० मिली का निर्माण कर रहा था और ४५० मिली को उसने नही छुआ । Willmar Scwabe India के रेट शुरु से ही अन्य कम्पनियों के रेट से तिगुने ही थे ; जाहिर है कि सेल का प्रभाव सबसे अधिक इसी कम्पनी को झेलना पडा । केंद्र सरकार के निर्देश पर इन कम्पनी की चुप्पी कही मलाई खाने मे न लगी हो तो कोई ताज्जुब नही ।
आने वाले दिनो मे लगता है कई ऐलोपैथिक कम्पनियों का प्रवेश होम्योपैथिक दवा निर्माण मे होने वाला है । एक प्रमुख ऐलोपैथिक कम्पनी बूटस ( BOOTS) का होम्योपैथिक दवा निर्माण मे प्रवेश इस शंका को बल देता है । जाहिर है कि इन मल्टीनेशनल कम्पनियों को लाभ ४५० मि.ली. मे नही बल्कि ३० मि.ली. और १०० मि.ली. मे ही दिखेगा ।
चार गुना महंगी हो गई होम्योपैथिक दवाएं
स्त्रोत : दैनिक जागरण -दिनांक २५-५-२००८ लखनऊ, 25 मई : सस्ते इलाज का दावा करने वाली होम्योपैथिक पद्धति अब कम से कम गरीबों की पहुंच से बाहर होने वाली है। कुछ माह पहले तक जुकाम-बुखार में काम आने वाली आर्सेनिक टिंचर नामक होम्योपैथिक दवा की 30 एमएल की फुटकर शीशी 10 से 12 रुपये में मिल जाती थी अब इसके लिए 40 रुपये से अधिक खर्च करना पड़ेगा। केंद्र सरकार ने अल्कोहल की मात्रा वाली होम्योपैथिक दवाओं को केवल 30 एमएल की पैकिंग वाली शीशी में ही बेचने का आदेश दिया है। इस आदेश की आड़ में कम्पनियों ने 30 एमएल दवा की सीलबंद शीशी का दाम फुटकर की तुलना में चार गुना से ज्यादा कर दिया है। गौरतलब है कि सभी होम्योपैथिक दवाओं में कम से कम 70 फीसदी अल्कोहल होता है। कम्पनियां इन दवाओं को एक पौंड (450 एमएल) की सीलबंद शीशी में बाजार में उपलब्ध कराती हैं। होम्योपैथिक दवा विक्रेता एक पौंड की शीशी से ही दवा निकाल कर मरीजों को फुटकर बेचते हैं। अल्कोहल की मात्रा वाली दवाओं पर नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार ने दो वर्ष पूर्व औषधि एवं प्रसाधन अधिनियम-1945 में एक नियम 106(बी) जोड़ा था। इसके तहत कोई भी होम्योपैथिक दवा जिसमें 12 प्रतिशत या इससे अधिक अल्कोहल (या इथाईल अल्कोहल) हो, वह 30 मिलीलीटर (एमएल) से अधिक की पैकिंग में नहीं बेची जायेगी। अस्पतालों में सप्लाई के लिए 100 एमएल की शीशी में दवा बेची जा सकती है। यह नियम लागू हो पाता कि निर्माता कम्पनियों ने सभी बड़े राज्यों के उच्च न्यायालय से उक्त नियम के विरुद्ध स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया। दिसम्बर 2007 में उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालयों के स्थगन आदेशों को निरस्त कर दिया। इसी आदेश के क्रम में ड्रग कन्ट्रोलर आफ इंडिया कार्यालय ने जनवरी माह में होम्योपैथिक दवा निर्माता कम्पनियों को अप्रैल माह से केवल 30 एमएल की पैकिंग में ही दवा बेचने के निर्देश जारी किये। ऐसे में कम्पनियों ने जब 30 एमएल की पैकिंग वाली दवाओं को बाजार में उतारा को उनका दाम फुटकर की तुलना में कई गुना अधिक था। एक दवा निर्माता कम्पनी के अधिकारी डा.नरेश अरोड़ा के मुताबिक दो वजहों से दवाओं के दाम बढ़ाये गये हैं, पहला 30 एमएल शीशी की पैकिंग में खर्चा बढ़ा है और दूसरा केंद्र सरकार ने निर्माता कम्पनियों को सब्सिडी में दिये जाने वाले अल्कोहल की मात्रा में कटौती की है। कारण कुछ भी हो इसका खमियाजा गरीब मरीजों को भुगतना पड़ेगा। होम्योपैथिक दवाओं के दाम में नियंत्रण कर पाने में औषधि नियंत्रक एके पांडेय अपनी लाचारी व्यक्त करते हैं। उनके अनुसार होम्योपैथिक दवाओं के मूल्य नियंत्रण सम्बन्धी कानून न होने से इसे रोक पाना फिलहाल संभव नहीं है। केंद्रीय होम्योपैथिक परिषद के सदस्य डा.अनुरुद्ध वर्मा कहते हैं कि अभी तक अल्कोहल युक्त होम्योपैथिक दवाओं के दुरुपयोग का कोई मामला सामने नहीं आया है ऐसे में उक्त नियम को लागू करना तर्कसंगत नहीं है। मरीजों के हित में इसे वापस लेना चाहिये।
होम्योपैथिक थेरापियुटिक्स मे रोगों से सम्बन्धित औषधियों को उनके लक्षण के अनुसार याद रखना इतना आसान नही है । किसी भी रोग से सम्बन्धित औषधि अपने किसी खास लक्षण के अनुसार ही चुनी जाती है । फ़्लो चार्ट न सिर्फ़ समय की बचत करते हैं बल्कि व्यवाहिरक प्रयोग मे आ जाने पर अच्छी तरह से याद भी हो जाते हैं । आइरिश ग्रुप आफ़ होम्योपैथ के एक सदस्य एसाडोर ने cold, cough और flU से संबन्धित इस चार्ट को अपलोड किया है । पी.डी.एफ़. (pdf ) आधारित इस फ़्लो चार्ट को डाऊनलोड करने के लिये यहाँचटका लगायें ।
शिशुओं मे दस्तों का प्रकोप और उनसे होने वाली मृत्यु दर कई देशों की मजबूरी सा बन चुका है । W.H.O. की रिपोर्ट के अनुसर जहाँ १९७९ तक सालाना ४.५ मिलयन मृत्य सिर्फ़ शिशुओं मे दस्तों के कारण होती थी वहाँ अब यह घट कर लगभग १.६ मिलयन तक रह गयी हैं । अभी भी यह अनुपात काफ़ी अधिक हैं । होम्योपैथी औषधियों का प्रभाव इन दस्तॊं मे काफ़ी प्रभावी देखा गया है लेकिन व्यापक प्रचार-प्रसार के अभाव मे अभी भी होम्योपैथी जन साधारण से कोसों दूर है ।
दस्त ( Diarrhea ) क्या है ?
Diarrhea एक लैटिन शब्द है जिसका शब्दिक अर्थ है , ” Milk of the Anus ” ग्रीक शब्दिक अर्थ के अनुसार , ” Flow like a stream ” | ढीले औए पतले मल का बार-२ त्यागना , दस्त कहलाता है ।
कारण ( Aetiology)
संक्रमण : ( वायरस, बैक्टिया या परजीवी द्वारा )
किसी खाध पदार्थ के प्रति अधिक संवेदन्शीलता
किसी औषधि की प्रतिक्रिया स्वरूप
यदि दस्त का समुचित इलाज न किया जाये तो निर्जलीकरण ( शरीर मे पानी की कमी आ जाना ) हो सकती है । शरीर मे जल और अन्य द्र्व्यों की कमी के कारण मृत्यु भी हो सकती है ।
निर्जलीकरण की पहचान और लक्षण:
दस्त से बचाव के उपाय :
मल त्याग के बाद बच्चों मे सबुन से हाथ धोने की आदत डालें ।
खाने से पहले हथ अवशय साफ़ करें।
फ़ल और सब्जियाँ धो के खायें ।
खाध पदर्थों को ढक के रखें ।
क्या करें :
शिशु मे पानी की कमी को पूरा करें ।
शिशुओं को W.H.O. ओ.आर.एस. लगातार देते रहें ।
स्तनपान जारी रखें ।
शिशु का खाना बन्द न करें , बल्कि उसे नरम खाध पदार्थ जैसे केला , चावल , उबले आलू आदि देते रहें ।
याद रखें :
दस्त के सभी रोगियों का निर्जलीकरण के लिये वर्गीकरण करें । जहाँ गम्भीर निर्लजीकरण हो उसे क्लीनिक मे I.V. fluid से manage करें या अस्पताल रेफ़र करें ।
यदि मल मे खून आ रहा हो तो उसे पेचिश के लिये वर्गीकृत करें और औषधि के चुनाव के लिये प्लान दो को देखें ।
क्या न करें :
शिशु को सिर्फ़ ग्लूकोज या अकेला चीनी का घोल न दें । सिर्फ़ ग्लूकोज आधारित घोल शिशु के पेट में fermentation पैदा करते हैं जिससे बैक्टर्यिल संक्रमण की संभावनायें बढ जाती हैं ।
ऐसे तरल पदार्थ न दें जिसमें कैफ़ीन हो जैसे कोला या काँफ़ी ।
दूध या दूध से बनी वस्तुओं न दें ।
घर मे तैयार नमक-चीनी का घोल या W.H.O. ORS में किसको चुनें :
घर मे बनाये गये नमक-चीनी के घोल मे सबसे बडी दिक्कत सही अनुपात का मिश्रण न हो पाना है जिससे या तो नमक की अधिकता हो जाती है या फ़िर चीनी का अनुपात बढ जाता है जो दोनॊ ही हालातों मे शिशु के लिये हानिकारक सिद्द होती है । लेकिन फ़िर भी अगर O.R.S. उपलब्ध नही है तो यह तरीका कारगर है ।
बनाने की विधि :
एक लीटर अथवा ५ ऊबले और ठंडे किये पानी मे १ छॊटा चम्मच नमक एवं ८ छॊटॆ चम्मच चीनी डालकर अच्छी तरह घोल ले और इस मिश्रण को २४ घंटॆ के अन्दर ही प्रयोग करें । बाकी बचे मिश्रण को फ़ेंक दें ।
होम्योपैथिक औषधियाँ :
शिशुओं मे आम प्रयोग होने वाकी होम्योपैथिक औषधियों की यह एक संक्षिप्त जानकारी है । [ नोट : स्वयं चिकित्सा करने की गलती न करें , आप का चिकित्सक ही आपको सही सलाह दे सकता है । ]
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