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डॉ. क्रिश्चियन फ्राइडरिक सैमुअल हैनिमेन- जन्म दिवस पर विशेष ( A Tribute to Dr Samuel Hahnemann )

१० अप्रेल २००९ में लिखी हुई यह पोस्ट कल भी सामायिक थी ,आज भी है और कल भी रहेगी। विषम परिस्थितयॊं मॆ होम्योपैथी का उद्‌गम और उसकी यात्रा न सिर्फ़ गर्व का अनुभव कराती है बल्कि उस महान चिकित्सक के प्रति नतमस्तक होने के लिये प्रेरित करती है । देखॆ पुरानी पोस्ट डॉ. क्रिश्चियन फ्राइडरिक सैमुअल हैनिमेन- जन्म दिवस पर विशेष ( A Tribute to Dr Samuel Hahnemann )


इतिहास के चन्द पन्नों को समटेने की कोशिश करते हुये आँखे नम सी हो जाती हैं । मेरे सामने ब्रैडफ़ोर्ड की ” लाइफ़ एन्ड लेटर आफ़ हैनिमैन ” और हैल की ” लाइफ़ एन्ड वर्कस आफ़ हैनिमैन ” के उडते हुये पन्ने मानों वक्त को एक बार फ़िर समेट सा  रहे हैं । यह पुस्तकें मैने शौकिया अपने कालेज के दिनों मे ली थी लेकिन कभी भी पढने की फ़ुर्सत न मिली  । पिछ्ले साल जब hpathy.com के डा. मनीष भाटिया की भावपूर्ण जर्मनी  यात्रा को पढने का अवसर मिला तब इस लेख को लिखने की सोची थी लेकिन फ़िर आलसवश टल गया । १० अप्रेल हैनिमैन की जन्म तिथि के रुप मे जाना जाता है । मुझे नही लगता कि किसी भी अन्य पद्दति मे चिकित्सक अपने सिस्टम के संस्थापकों से इतना नही जुडॆ  हैं जितना कि एक होम्योपैथ । बहुत से कारण हैं लेकिन सबसे बडा कारण है होम्योपैथी का विषम परिस्थियों मे उद्‌भव । हैनिमैन अपनी जिंदगी मे वह सब कुछ बहुत आसानी से पा सकते थे अगर वह वक्त के साथ समझौता कर लेते लेकिन उन्होने नही किया । किसी ने सही कहा है , “कीर्तियस्य स जीवति “ – आज कौन कह सकता है कि हैनिमैन इस जगत मे नही हैं ।

डॉ. क्रिश्चियन फ्राइडरिक सैमुअल हैनिमेन  का जन्म सन्‌ १७५५ ई. की १० अप्रेल को जर्मनी मे सेक्सनी प्रदेश के  माइसेन नामक छॊटे से गाँव मे हुआ था  । एक बेहद गरीब परिवार मे जन्मे हैनिमैन का बचपन अभावों और गरीबी  मे बीता । आपके पिता एक पोर्सीलीन पेन्टर थे ,  सीमित संस्धानों  को देखते हुये  हुये वह चाहते थे कि उनका पुत्र भी इस व्यवसायाय मे रुचि दिखाये । लेकिन अनेक प्रतिभाओं के धनी हैनिमैन को यह मन्जूर नही था । अनेक भाषाओं के ज्ञाता हैनिमैन ने जीवन संघर्ष की शुरुआत  रसायन और अन्य  ग्रन्थों के अंग्रेजी भाषा से जर्मन मे अनुवाद से प्रारम्म्भ  की । सन्‌ १७७५ मे हैनिमैन लिपिजिक मेडिकल की पढाई के लिये निकल पडे , लिपेजेक मेडिकल कालेज मे हैनिमैन को उनके प्रोफ़ेसर डा. बर्ग्रैथ का भरपूर साथ मिला जिसके कारण उनकी पढाई के कई साल पैसों की तंगी के बिना भी चलते रहे ।

हैनिमैन की जिदंगी का महत्वपूर्ण हिस्सा खानाबदोशों की जिदंगी की तरह से बीता । वियाना से हरमैन्स्ट्डट ( जो अब शीबू , रोमेनिया के नाम से जाना जाता है ) जहाँ डा. क्युंरीन ने हैनिमैन को मेडिकल की पढाई के बाद नौकरी  दिलाने मे मदद की । सन्‌ १७७९  मे   हैनिमैन ने मेडिकल की पढाई पूरी की और जर्मनी के कई छॊटे गाँवों मे प्रैक्टिस करनी आरम्भ की लेकिन पाँच साल की प्रैकिटस के बाद उन्होने उस समय के प्रचलित तरीकों से तंग आकर प्रैक्टिस छोड दी । उस समय की मेडिकल चिकित्सा पद्दति आज की तरह उन्नत  न थी । इसी दौरान १७८२ मे हैनिमैन का विवाह जोहाना लियोपोल्डाइन से हुआ जिससे बाद मे उनसे ११संताने हुयीं। सन्‌ १७८५ से १७८९ तक हैनिमैन की जीवका का मुख्य साधन अंग्रेजी से    जर्मनी मे अनुवाद और रसायन शास्त्र मे शोधकार्यों से रहा । इसी दौरान हैनीमैन ने आर्सेनिक पाइसिन्ग पर शोध पत्र  जारी किया  । सन्‌ १७८९ मे हैनिमैन एक बार फ़िर सपरिवार लिपिजिक की तरफ़ चल दिये । “मरकरी का  सिफ़लिस मे कार्य” हैनिमैन ने सालयूबल मरकरी के रोल को अपने नये शोध पत्र मे वर्णित किया ।

सन्‌ १७९१ , ४६ वर्षीय हैनिमैन के लिये महत्वपूर्ण रहा । उनके नये विचारों को नयॊ दिशा देने मे कलेन की मैटिया मेडिका का अनुवाद रहा । एक बार जब  डाक्‍टर कलेन की लिखी “कलेन्‍स मेटेरिया मेडिका” मे वर्णित कुनैन नाम की जडी के बारे मे अंगरेजी भाषा का अनुवाद जर्मन भाषा में कर रहे थे तब डा0 हैनिमेन का ध्‍यान डा0 कलेन के उस वर्णन की ओर गया, जहां कुनैन के बारे में कहा गया कि ‘’ यद्यपि कुनैन मलेरिया रोग को आरोग्य करती है, लेकिन यह स्वस्थ शरीर में मलेरिया जैसे लक्षण पैदा करती है।
हैनिमैन ने कलेन की यह बात पर तर्कपूर्वक विचार करके कुनैन जड़ी की थोड़ी थोड़ी मात्रा रोज खानीं शुरू कर दी। लगभग दो हफ्ते बाद इनके शरीर में मलेरिया जैसे लक्षण पैदा हुये। जड़ी खाना बन्द कर देनें के बाद मलेरिया रोग अपनें आप आरोग्य हो गया। इस प्रयोग को  हैनिमेन ने कई बार दोहराया और हर बार उनके शरीर में मलेरिया जैसे लक्षण पैदा हुये। क्विनीन जड़ी के इस प्रकार से किये गये प्रयोग का जिक्र डा0 हैनिमेन नें अपनें एक चिकित्‍सक मित्र से किया। इस मित्र चिकित्सक  नें भी  हैनिमेन के बताये अनुसार जड़ी का सेवन किया और उसे भी मलेरिया बुखार जैसे लक्षण पैदा हो गये।
हैनिमैन ने अपने प्रयोगों  को जारी रखा तथा  प्रत्येक जडी, खनिज , पशु उत्पादन, रासायनिक मिश्रण आदि का स्वयं पर प्रयोग किया। उन्होने  पाया कि दो तत्व समान लक्षण प्रदान नही करते हैं। प्रत्येक तत्व के अपने विशिष्ट लक्षण होते हैं। इसके अतिरिक्त लक्षणों को भौतिक अवस्था में परिष्कृत नही किया जा सकता है। प्रत्येक परीक्षित तत्व ने मस्तिष्क तथा शरीर की संवेदना को भी प्रभावित किया। उन्हे उस समय की चिकित्सा पद्घति ने विस्मित कर दिया तथा उन्होने रोग उपचार की एक पद्धति को विकसित किया जो सुरक्षित, सरल एवं प्रभावी थी। उनका विश्वास था कि मानव में रोगों से लडने की स्वतः क्षमता होती है तथा रोग मुक्त होने के लिए मानव के स्वयं के संघर्ष रोग लक्षणों को प्रतिबिम्बित करते हैं।

कुछ समय बाद उन्‍होंनें शरीर और मन में औषधियों द्वारा उत्‍पन्‍न किये गये लक्षणों, अनुभवो और प्रभावों को लिपिबद्ध करना शुरू किया। हैनिमेन की अति सूक्ष्म दृष्टि और ज्ञानेन्द्रियों नें यह निष्कर्ष निकाला कि और अधिक औषधियो को इसी तरह परीक्षण करके परखा जाय। हैनिमैन अब तक पहले की भाँति एलोपैथिक अर्थात स्थूल मात्रा मे ही दवाओं का प्रयोग करते थे । लेकिन उन्होने देखा कि रोग आरोग्य होने पर भी कुछ दिन बाद नये लक्षण उत्पन्न होते हैं । जैसे क्विनीन का सेवन करने पर ज्वर तो ठीक हो जाता है पर उसके बाद रोगी को रक्तहीनता , प्लीहा , यकृत , शोध , इत्यादि अनेक उपसर्ग प्रकट होकर रोगी को जर्जर बना डालते हैं । हैनिमैन ने दवा की मात्रा को घटाने का काम आरम्भ किया । इससे उन्होने निष्कर्ष निकाला कि दवा की परिमाण या मात्रा भले ही कम हो , आरोग्यदायिनी शक्ति पहले की तरह शरीर मे मौजूद रहती है और दवा के दुष्परिणाम भी पैदा नही  होते ।
इस प्रकार से किये गये परीक्षणों और अपने अनुभवों को डा0 हैनिमेन नें तत्कालीन मेडिकल पत्रिकाओं में ‘’ मेडिसिन आंफ एक्‍सपीरियन्‍सेस ’’ शीर्षक से लेख लिखकर प्रकाशित कराया । इसे होम्योपैथी के अवतरण का प्रारम्भिक स्वरुप कहा जा सकता है। होम्योपैथी शब्द यूनानी के दो शब्दों (Homois ) यानि सदृश (Similar ) और पैथोज ( pathos ) अर्थात रोग (suffering) से बना है । होम्योपैथी का अर्थ है सदृश रोग चिकित्सा । सदृश रोग चिकित्सा का सरल अर्थ है कि जो रोग लक्षण जिस औषध के सेवन से उत्पन्न होते हैं , उन्हीं लक्षणॊं की रोग मे सदृशता होने पर औषध द्वारा नष्ट किये जा सकते हैं । यह प्रकृति के सिद्दांत “ सम: समम शमयति ” यानि similia similbus curentur पर आधारित है । लेकिन हैनिमैन के शोध को तगडे विरोध का सामना करना पडा और हैनिमैन पर उनकॆ दवा बनाने के तरीको पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई ।

लेकिन सन्‌ १८०० मे हैनिमैन को अपने नये तरीको से सफ़लता मिलनी शुरु हुयी जब स्कारलैट फ़ीवर नाम के महामारी मे बेलोडोना का सफ़ल रोल पाया गया । एक बार फ़िर हैनिमैन अपने समकक्ष चिकित्सकों के तगडे विरोध का कारण बने ।

सन्‌  १८१० हैनिमैन ने आर्गेनान आफ़ मेडिसन का पहला संस्करण निकाला जो होम्योपैथी फ़िलोसफ़ी का महत्वपूर्ण स्तंभ था । १८१४ तक जाते-२ हैनिमैन ने अपने , अपने परिवार और कई मित्र चिकित्सकॊ जिनमे गौस , स्टैफ़, हर्ट्मैन और रुकर्ट प्रमुख थे ,  के ग्रुप पर दवाओं कॊ परीक्षण करना प्रारम्भ किया । इस समूह को हैनिमैन ने प्रूवर यूनियन का नाम दिया ।

सन्‌ १८१३ मे हैनिमैन को एक बार फ़िर सफ़लता हाथ लगी । जब नेपोलियन की सेना के जवानों के बीच टाइफ़स महामारी बन के उभरी । बहुत जल्द ही यह माहामारी जरमनी  मे भी आ गई , इस बार हैनिमैन को ब्रायोनिया और रस टाक्स से  सफ़लता हाथ लगी । सन्‌ १८२० मे  लिपिजक शहर की काउनसिल से हैनिमैन के कार्यों पर पूरी तरह से रोक लगा दी और सन १८२१ मे हैनिमैन को शहर से बाहर जाने का रास्ता दिखाया । हैनिमैन कोथन की तरफ़ चल दिये , यहाँ  के ड्यूक फ़रडनीनैन्ड जो हैनिमैन की दवा से लाभान्वित हो चुके थे , कोथन मे नये तरीको से प्रैकिटस और दवाओं को बनाने की इजाजत दी । कोथन मे हैनिमैन लगभग १२ साल तक रहे और यहाँ से होम्योपैथी को नया आधार मिला ।

इसी दौरान कोथन मे हैनिमैन  जटिल रोगों और मियाज्म पर किये कार्यों को सामने ले कर आये  । सन १८२८ मे हैनिमैन ने chronic diseases पर पहला संस्करण निकाला । हैनिमैन की विचारधारा के एक तरफ़ तो सहयोगी भी थे जिनमे बोनिगहसन , स्टाफ़ , हेरिग और गौस थे उधर दूसरी तरफ़ कुछ साथी चिकित्सक जिनमे डा. ट्रिन्क्स ने असहोयग का रास्ता अपनाते हुये उनके नये कार्यों को समय से प्रकाशन होने मे अडंगे लगाये ।

सन्‌ १८३१ मे होम्योपैथी को एक बार फ़िर से सफ़लता हाथ लगी , इस बार रुस के पशिचमी भाग से महामारी के रुप मे फ़ैलता  हुआ कालरा मे होम्योपैथिक औषधियों जिनमे कैम्फ़र , क्यूपरम और वेरटर्म ने न जाने कितने रोगियों की जान बचायी

कोथन मे हैनिमैन को डा. गोटफ़्रेट लेहमन का अभूतपूर्व सहयोग मिला ,। लेकिन लिपिजिक मे हैनिमैन नकली होम्योपैथों के रुप मे बढती भीड से काफ़ी खफ़ा हुये । सन्‌ १८३३ मे लिपिजिक मे पहला होम्योपैथिक अस्पताल डा. मोरिज मुलर के तत्वधान मे खुला ; सन्‌ १८३४ तक हैनिमैन बडे चाव से इस अस्पताल मे अपना सहयोग देते रहे । लेकिन सन्‌ १८३५ मे हैनिमैन के पैरिस के लिये रवाना होते ही जल्द ही अस्पताल पैसे की तंगी के कारण  १८४२ मे बन्द करना पडा ।

हैनिमैन  की जीवन के आखिरी क्षण कुछ रोमांन्टिक नावेल से कम नही थे । सन्‌ १८३४ मे ३२ वर्षीय  खूबसूरत मैरी मिलानी ८० साल के  हैनिमैन की जिंदगी मे आयी और  मात्र तीन महीने की मुलाकात के बाद उनकी जिंदगी के हमसफ़र हो गयी । मिलानी का रोल हैनिमैन की जिदगी मे बहुत ही विवादस्तमक रहा । उनका मूल  उद्देशय हैनिमैन के नयी चिकित्सा पद्दति मे था । इसके बाद की घटनाये इस बात का पुख्ता सबूत थी कि मिलानी किस उद्देशय से आयी थी ।

लेकिन यह भी सच था कि कई साल के संघर्ष, गरीबी और मुफ़लसफ़ी के बाद हैनिमैन ने अपनी खूबसूरत पत्नी के साथ फ़्रान्स की उच्च सोसयटिइयों मे जगह बनाई । जीवन के आखिरी सालों  मे मिलानी ने हैनिमैन को उनके पहली पत्नी से हुये  संतानों से दूर कर दिया और पैरिस मे हैनिमैन को अपने नये प्रयोगों को जारी रखने को कहा । फ़्रान्स मे हैनिमैन ने LM पोटेन्सी पर किये कार्यों को आखिरी जामा पहनाया । फ़्रान्स मे होम्योपैथी की शोहरत जर्मनी से अधिक फ़ैली , यहाँ‘ एक तो अंडगॆ कम थे और बाकी एलोपैथिक चिकित्सकॊ मे भी  नयी चिकित्सा पद्द्ति को अजमाने मे दिलचस्पी भी थी । आर्गेनान का छटा संस्करण फ़्रान्स मे ही हैनिमैन ने लिखा लेकिन मिलानी के रहते सन्‌ १८४३ मे हैनिमैन की मृत्यु के बाद भी उसका प्रकाशन न हो पाया । ८८ वर्षीय हैनिमैन सन्‌ १८४३ मे मृत्यु को प्राप्त हुये । लेकिन जाते-२ वह होम्योपैथिक जगत को आर्गेनान का छटा  बेशकीमती संस्करण देते गये । मिलानी के चलते यह महत्वपूर्ण संस्करण जिसमे हैनिमैन ने LM पोटेन्सी की जोरदार वकालत की , प्रकाशित न हो पाया । मिलानी इसके बदले मे प्रकाशक से मॊटी रकम चहती थी जिसका मोल भाव हैनिमैन के रहते न हो पाया । हैनिमैन की मृत्यु के कई साल के बाद सन्‌ १९२० मे इस संस्करण को विलियम बोरिक और सहयोगियों की मदद से प्रकाशित किया गया । लेकिन तब तक पूरे विश्व मे होम्योपैथिक चिकित्सकों के मध्य आर्गेनान का पाँचवा संस्करण लोकप्रिय हो चुका था और आज भी हम छटे संस्करण की और विशेष कर LM पोटेन्सी के लाभों से अन्जान ही रह गये ।

मिलानी का विवादों से भरा रोल हैनिमैन को दफ़नाने मे भी रहा । एक अनाम सी जगह मे हैनिमैन को उन्होने गोपनीय ढंग से दफ़नाया  । बाद मे विरोध के चलते हैनिमैन के पार्थिव शरीर को एक दूसरी कब्र मे दफ़नाया गया जिसके ऊपर वर्णित किया गया , ” Non inutilis vixi , ” I have not lived in a vain ” ” मेरी जिंदगी व्यर्थ  नही गयी ”

रसायन और मेडेसिन  मे ७० से ऊपर मौलिक कार्य, लगभग दो दर्जन से अधिक पुस्तकों का अंग्रेजी , फ़्रेन्च, लैटिन और ईटालियन से जर्मन भाषा मे अनुवाद , अपने दम और तमाम विरोधों के बीच पूरी पद्दति का बोझा उठाये हैनिमैन को कम कर के आँकना उनके साथ नाइन्साफ़ी होगी । और सब से से मुख्य बात वह मृदुभाषी थे , अपने मित्र स्टैफ़ को लिखे पत्र मे वह लिखते हैं , “ Be as sparing as possible with your praises . I do not like them . I feel that I am only an honest , straightforward man who does no more than his duty . ”

रात बहुत हो चुकी है , मुझे लगता है अब सो जाना चाहिये , कल फ़िर १० अप्रेल होगी , एक बार फ़िर हम किसी न किसी होम्योपैथिक कालेज के प्रांगण मे हैनिमैन को याद कर रहे होगें लेकिन होम्योपैथिक की शिक्षा प्रदान देने वाले संस्थान अपने आप से पूछ के देखें कि इतने सालों मे हम एक दूसरा हैनिमैन क्यूं नही बना पाये ? हमे इन्तजार है उस पल का , एक नये अवतरित होते हैनिमैन का और आर्गेनान के साँतवें संस्करण का भी …….
अलविदा …
शुभरात्रि ।

यह भी देखें :

सर्दियों मे डायरिया और होम्योपैथी उपचार ( Cold Diarrhoea & Homeopathy )

पिछ्ले कुछ हफ़्तों से लगभग सभी प्राइवेट क्लीनिक और सरकारी अस्पतालॊ मे डायरिया या दस्तों के रोगी बढे हैं । इनमे से  नवजात शिशु और कम आयु के बच्चॊ की तादाद बहुत अधिक है ।

सर्दियों मे उल्टी और दस्त गर्मी के मुकाबले अधिक खतरनाक होते हैं । इन दिनों की मुख्य वजह ठंड होती है । सर्दियां शुरू होते ही रोटा वायरस सक्रिय हो जाता है। विंटर डायरिया रोटा वायरस के कारण ही होता है।
यह मौसम स्वास्थ के दृषिकोण से रोगरहित रहता है। बीमारियां बहुत कम पास फ़टकती हैं, लेकिन ऐसे बच्चे जो कमजोर होते हैं और जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कम होती है , उन्हें संक्रमण की संभावना ज्यादा होती है। वह अक्सर विंटर डायरिया की चपेट में आ जाते हैं। आमतौर पर डायरिया एक हफ्ते में ठीक हो जाता है लेकिन अगर ये इससे ज्यादा समय तक रहे तो ये क्रॉनिक डायरिया कहलाता है और इसका इलाज समय पर न होने से ये खतरनाक भी हो सकता है लेकिन इसे जरा सी सावधानी बरत कर ठीक भी किया जा सकता है।

यदि दस्त का समुचित इलाज न किया जाये तो निर्जलीकरण ( शरीर मे पानी की कमी आ जाना ) हो सकती है । शरीर मे जल और अन्य द्र्व्यों की कमी के कारण मृत्यु भी हो सकती है ।

निर्जलीकरण की पहचान और लक्षण:

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दस्त से बचाव के उपाय :

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  • मल त्याग के बाद बच्चों मे साबुन से हाथ धोने की आदत डालें ।
  • खाने से पहले हाथ अवशय साफ़ करें।
  • फ़ल और सब्जियाँ धो के खायें ।
  • खाध पदर्थों को ढक के रखें ।

क्या करें :

  • शिशु मे पानी की कमी को पूरा करें ।
  • शिशुओं को W.H.O. ओ.आर.एस. लगातार देते रहें ।
  • स्तनपान जारी रखें ।
  • शिशु का खाना बन्द न करें , बल्कि उसे नरम खाध पदार्थ जैसे केला , चावल , उबले आलू आदि देते रहें ।

याद रखें :

  • दस्त के सभी रोगियों का निर्जलीकरण के लिये वर्गीकरण करें । जहाँ गम्भीर निर्लजीकरण हो उसे क्लीनिक मे I.V. fluid से manage करें या अस्पताल रेफ़र करें ।
  • यदि मल मे खून आ रहा हो तो उसे पेचिश के लिये वर्गीकृत करें और औषधि के चुनाव के लिये प्लान दो को देखें ।

क्या न करें :

  • शिशु को सिर्फ़ ग्लूकोज या अकेला चीनी का घोल न दें । सिर्फ़ ग्लूकोज आधारित घोल शिशु के पेट में fermentation पैदा करते हैं जिससे बैक्टर्यिल संक्रमण की संभावनायें बढ जाती हैं ।
  • ऐसे तरल पदार्थ न दें जिसमें कैफ़ीन हो जैसे कोला या काँफ़ी ।
  • दूध या दूध से बनी वस्तुओं न दें ।

घर मे तैयार नमक-चीनी का घोल या W.H.O. ORS  में किसको चुनें :

घर मे बनाये गये नमक-चीनी के घोल मे सबसे बडी दिक्कत सही अनुपात का मिश्रण न हो पाना है जिससे या तो नमक की अधिकता हो जाती है या फ़िर चीनी का अनुपात बढ जाता है जो दोनॊ ही हालातों मे शिशु के लिये  हानिकारक सिद्द होती है । लेकिन फ़िर भी अगर O.R.S. उपलब्ध नही है तो यह तरीका कारगर है ।

बनाने की विधि :

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एक लीटर अथवा ५ ऊबले और ठंडे किये पानी मे १ छॊटा चम्मच नमक एवं ८ छॊटॆ चम्मच चीनी डालकर अच्छी तरह घोल ले और इस मिश्रण को २४ घंटॆ के अन्दर ही प्रयोग करें । बाकी बचे मिश्रण को फ़ेंक दें ।

होम्योपैथिक औषधियाँ :

शिशुओं मे आम प्रयोग होने वाकी होम्योपैथिक औषधियों की यह एक संक्षिप्त जानकारी है । [नोट : स्वयं चिकित्सा करने की गलती न करें , आप का चिकित्सक ही आपको सही सलाह दे सकता है । ]

Winter Diarrhoea के अधिकतर रोगी Dulacamara , Aconite या Nux Moschata से अल्प समय मे स्वस्थ हो जाते हैं ।

 RECTUM – DIARRHEA – cold – taking cold, after ( source : Syntehesis 9.0 )
acon. agra. Aloe ant-t. ars. bar-c. bar-s. Bell. Bry. Calc. camph. Caust. Cham. chin. chinin-ar. coff. coloc. con. cop. DULC. elat. gamb. graph. guar. Hyos. Ip. Jatr-c. kali-c. kreos. laur. lil-t. merc. Nat-ar. Nat-c. nat-s. nit-ac. NUX-M. Nux-v. op. Ph-ac. podo. puls. Rhus-t. rumx. sabin. samb. sang. sel. sep. Sulph. tub. verat. zing.

 RECTUM – DIARRHEA – winter
asc-t. nat-s. Nit-ac.

अगर डल्कामारा या नक्स मासकैटा कार्य नही कर रही है तो प्लान A या फ़िर प्लान B से लक्षणॊ का चुनाव करे ।

1. प्लान “A”

2. प्लान “B ”:

Homoeopathy Doctor Manoj Rajoria elected to Indian Parliament

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Homoeopathy Doctor Manoj Rajoria BHMS, MD (Hom) has been elected to Indian Parliament

Whole Homoeopathic Fraternity in India  is proud of  Dr.Manoj Rajoria from Rajasthan.

We congratulate you on your success and becoming MP, You will be the voice of thousands of Homoeopaths in the Parliament. You are a dedicated Homoeopath and we know you will work for Homoeopathy too.

Dr Manoj Rajoria, Candidate of 15th Lok Sabha, Affiliated to Bharatiya Janata Party (BJP) serving Karauli Dholpur (RJ) Lok Sabha Constituency.

He took his BHMS from Dr. M.P.K. Homoeopathic Medical College Jaipur

Post Graduate Homoeopathy from  Rajasthan University in 2006

Mobile Phone :  096 67 211234

Website : http://www.drmanojrajoria.com

Source : homeobook.com

मेरी डायरी से – एवियरी “ Aviare ”

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एवियरी को होम्योपैथिक मे लाने का श्रेय पैरिस के  डा. कार्टियर और अन्य होम्योपैथिक चिकित्सकों को  रहा । यह एवियन तपेदिक के जीवाणु से तैयार की जाती है । सन्‌ १८९६ में इन्टर्नेशनल होम्योपैथिक कान्फ़्रेन्स , पैरिस मे उन्होने यह शोध पत्र प्रस्तुत किया । इसको विस्तृत रुप से पढने के लिये देखे यहाँ । फेफड़ों के apices पर Aviaire प्रमुखता से कार्य करती है ।

एवियन तपेदिक के जीवाणु को मानव तपेदिक के जीवाणु साथ पहचान तो की गई है, लेकिन इन दोनों  nosodes के नैदानिक गुण समान नहीं हैं । यह एक अचरज की बात है कि एवियरी का उपयोग होम्योपैथिक चिकित्सकों मे लगभग नगणय सा रहा है ; संभवत:  इस औषधि की ड्र्ग प्रूविगं सम्पूर्ण रुप न होने के कारण । लेकिन फ़िर भी विशेषकर जाडे के दिनों मे शिशुओं और बच्चों में शवास संम्बन्धित संमस्याओं मे इसका उपयोग बेहद उपयोगी  है । एवियरी को अकेले भी प्रयोग किया जा सकता है और पर्यायक्रम ( alternate ) मे अन्य होम्य्पैथिक दवाओं के साथ भी । जैसे निम्म पोटेन्सी ( विशेषकर LM में ) Aconite  , ipecac , Antim Tart और अन्य औषधियों के  लक्षण अनुसार  । लेकिन पर्याक्रम में इसका कार्य अधिक बेहतर है ।

अन्य होम्योपैथिक दवाओं जैसे Bacillinum, Tuberculinum और Arsenic Iodide से इसकी तुलना की जा सकती है ।

क्लार्क की इन्साक्लोपीडिया मे एवियरी का उल्लेख है लेकिन संक्षिप्त रुप में । क्लार्क लिखते हैं :

Aviaire.
A preparation of chicken-tuberculosis introduced by Dr. Cartier and other homeopaths of Paris.
Clinical.-Bronchitis. Influenza. Measles. Phthisis.
Characteristics.-Dr. Cartier gave an account of this nosode in his paper read at the International Hom?opathic Congress, 1896 (Transactions, Part “Essays and Communications,” p. 187). Aviaire acts most prominently on the apices of the lungs, and it corresponds most closely to the bronchitis of influenza, which simulates tuberculosis, having cured several hopeless-looking cases. It has also done excellently in some cases of bronchitis following measles. The bacillus of avian tuberculosis has been identified with that of human tuberculosis, but the clinical properties of the two nosodes are not identical.
Relations.-Compare: Bacil., Bacil. t., Tuberc., Ars. i.

एक बार फ़िर से जब स्वाइन फ़्लू के केस लखनऊ मे देखे जा रहे हैं , एक पुरानी लेकिन आज भी महत्व रखने वाली पोस्ट को reblog कर रहा हूँ ।

होम्योपैथी-नई सोच/नई दिशायें

मिनेटेस डाट काम पर शेरी ने इन्फ़्लून्जियम पर कुछ रोचक आँकडॆ दिये ।  1918 से 1957 तक इस औषधि के स्त्रोत फ़्लू से ग्रस्त रोगियों के नासिक स्त्राव और  रक्त के सैम्पल से लिये गये । और  इनमे से अधिकतर उन रोगियों से जो 1918 के फ़्लू की महामारी से ग्रस्त थे ।

1957 के बाद से दवा बनाने के  ढंग  मे बदलाव आया और दवा का स्त्रोत फ़्लू वैक्सीन से लिया गया । इग्लैंड की नेलसन होम्यो लैब इसकी मुख्य निर्माता और विक्रेता हैं और 1918 से 1957  अब तक लगभग 13 अलग –2 सैम्पल ला चुके हैं । इनमे से अधिकतर सैम्पल इसके पूर्व वर्ष मे हुये फ़्लू के वैक्सीन  से लिये गये हैं । 1918 का फ़्लू वाइरस मुख्यत: H1N1 वाइरस था और यह अब तक के सबसे अधिक खतरनाक वाइरस की श्रेणी मे आता है । होम्योपैथिक दृष्टिकोण से मुख्य है इसकी प्रूविग जिससे उत्पन्न लक्षण…

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होम्योपैथी दवाओं के लिए नोएडा में पौधों का संरक्षण

Homeopathic medication

होम्योपैथी पद्दति में  करीब 1400 प्रकार की दवाएं पौधों से बनती हैं। इनमें 50 से ज्यादा पौधे ऐसे हैं, जिनका इस्तेमाल सिर से लेकर पैर तक के रोगों की कारगर दवा बनाने के लिए किया जाता है। ऐसे ही चार दर्जन से अधिक पौधों का सेक्टर-24 स्थित केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान केंद्र संरक्षण कर रहा है। इसके लिए अनुसंधान केंद्र में ग्रीन हाउस बनाने की भी तैयारी है। इस केंद्र में नई दवाओं को इजाद करने के लिए कई शोध भी किए जा रहे हैं।
अनुसंधान केंद्र के वनस्पति वैज्ञानिक अरुण कुमार तिवारी ने बताया कि हर छोटे और बड़े औषधीय पौधे की अपनी खासियत होती है। यह पौधे गंभीर बीमारियों के इलाज की क्षमता रखते हैं। यही वजह है कि यहां पौधों से दवाएं बनाने के अलावा उनकी अन्य गुणवत्ताओं की खोजों पर भी काम किया जाता है। समय-समय पर किए जाने वाले शोधों से बेहतरीन दवा इजाद की जाती है। एक दवा को बनाने के लिए एक ही प्रजाति के तीन से चार पौधों का रस निकाला जाता है। जिस पौधे से ज्यादा रस निकालता है, उसी से ज्यादा कारगर दवा बनती है। रस को सुखाया जाता है और एल्कोहल मिलाकर दवा बनाई जाती है। अरुण कुमार ने बताया कि अनुसंधान केंद्र की छत पर एक छोटा सा ग्रीन हाउस बनाया जाएगा, जिसमें पौधे और भी सुरक्षित रहेंगे।
कुछ प्रमुख पौधे
 वसाका
इस्तेमाल में आने वाला भाग- पत्तियां
उपयोग- सर्दी-जुकाम, खांसी
——
आंवला
इस्तेमाल में आने वाला भाग- फल
उपयोग- रक्त शोधक
——-
 इमली
इस्तेमाल में आने वाला भाग- फल
उपयोग- सर्दी-जुकाम, बदजहमी
——-
सलपर्णी
इस्तेमाल में आने वाला भाग- जड़
उपयोग- बुखार, सिरदर्द, मेनेनजाइटिस
—–
 लाेंग
इस्तेमाल में आने वाला भाग- फल
उपयोग- बुखार, कफ निस्सारक
——
अश्वगंधा
इस्तेमाल में आने वाला भाग- जड़ें
उपयोग- फेरेंजाइटिस, बवासीर और बुखार
——
सतावर
इस्तेमाल में आने वाला भाग- अंकुरित हिस्सा
उपयोग- मधुमेह
——
 जामुन
इस्तेमाल में आने वाला भाग- बीज
उपयोग- मधुमेह और मुहांसे
——
एलोवेरा
इस्तेमाल में आने वाला भाग- पत्तियां
उपयोग- बवासीर और डायरिया
——-
पौधा- गिलोय
इस्तेमाल में आने वाला भाग- तना और जड़
उपयोग- पीलिया और कमजोरी
——–
पौधा- पत्थर चूर
इस्तेमाल में आने वाला भाग- पत्तियां
उपयोग- पेशाब संबंधी दिक्कतों का इलाज
——-
पौधा- कालमेध
इस्तेमाल में आने वाला भाग- पूरा पौधा
उपयोग-सर्दी- जुकाम, खांसी और पीलिया
——
पौधा- जटरोफा
इस्तेमाल में आने वाला भाग- बीज
उपयोग- हैजा, डायरिया, बदहजमी
——-
पौधे- कुंदरू
इस्तेमाल में आने वाला भाग- पत्तियां
उपयोग- मधुमेह
——-
पौधे- सर्पगंधा
इस्तेमाल में आने वाला भाग- जड़े
उपयोग- हाइपरटेंशन
——-
पौधा- सतावर
इस्तेमाल में आने वाला भाग- जड़
उपयोग- महिलाओं के लिए शक्तिवर्धक
———-
(इनको मिलाकर करीब 50 किस्मों के पौधे अनुसंधान केंद्र में मौजूद हैं)

2013 के मध्य में शुरू होगा म्यूजियम
अनुसंधान केंद्र की सबसे ऊपरी मंजिल पर बन रहा म्यूजियम 2013 के मध्य में शुरू होगा। अनुसंधान केंद्र के उपनिदेशक डॉ. सुनील कुमार ने बताया कि इस म्यूजियम में होम्योपैथी की शुरुआत, दवाओं और भविष्य में होने वाले शोध की जानकारी थ्री-डी और फोर-डी के जरिए दी जाएगी। म्यूजियम में 50 सीटों का एक छोटा सा हॉल भी होगा, जिसमें होम्योपैथी पर डॉक्यूमेंट्री मूवी दिखाई जाएगी।

साभार : अमर उजाला दिनांक १०-४-२०१२

E-HOMOEO

Repertory of "sensation as if"

The basis of the material was secured from three major works : Hering’s Guiding Symptoms, Clarke’s Dictionary and Allen’s Handbook. Frequent references have been made to Allen’s Encyclopædia. Other volumes less well known, and including Anshutz’s New, Old and Forgotten Remedies , have served in adding further symptoms.

View original post 158 और  शब्द

चेस्टनट–होम्योपैथिक और बैचफ़्लावर पद्दतियों मे उपयोग ( Chestnut–Homeopathic & Bach flower uses )

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गत सप्ताह नैनीताल भ्रमण के दौरान मुक्तेशवर जाते समय भवाली में फ़लॊ की मार्केट को देखकर रुकने का मोह छोड न पाया । कुछ नये फ़ल मुझे दिखे जो यहाँ मैदानी इलाकों मे कम ही दिखते हैं । इनमें से चेस्ट्नेट और कोका थे । रसीला फ़ल कोका तो मुक्तेशवर पहुँचते-२ समाप्त हो गया लेकिन चेस्ट्नेट काफ़ी संख्या मे बच गये जो  अभी भी लखनऊ आने पर भवाली और मुक्तेशवर की याद दिला रहे हैं ।

चेस्ट्नेट को देखकर भवाली मे मुझे उसके होम्योपैथिक और बैचफ़्लावर दवाओं मे प्रयोगों का स्मरण हो गया । चेस्ट्नेट की कई प्रजातियाँ होम्योपैथिक और बैचफ़्लावर मे इस्तेमाल लाई जाती हैं जिनमें रेड चेस्टनट (Red Chestnut) ,  स्वीट चेस्टनेट (Sweet Chestnut) , व्हाइट चेस्टनट (White Chestnut)  तथा चेस्टनट बड (Chestnut Bud) प्रमुख हैं । इनमे से चेस्टनट बड (Chestnut Bud) या एस्कुलस हिप ( Aesculus Hipp ) बैचफ़्लावर और होम्योपैथी दोनॊ ही मे प्रयोग लाई जाती है लेकिन दवाओं की कार्यप्रणाली दोनॊ ही मे जमीन आसमान का अन्तर है । इन चारों चेस्ट्नट को संक्षेप मे समझने के पहले चेस्टनट पर एक नजर डाल लें ।

Chestnut

साभार : विकीपीडिया

शाहबलूत ( चेस्टनट )  बादाम की प्रजाती का फल है यह अखरोट का ही एक रुप माना जाता है.शाहबलूत भूरे एवं लाल रंग का छोटा सा फल है जिसका उपयोग मेवे के रुप में भी किया जाता है इसका मूल स्थान ग्रीस रहा वहां से यह यूरोप में आया और संपूर्ण विश्व में फैल गया यूरोप ,एशिया और अफ्रीका के देशों में यह प्रतिदिन इस्तेमाल होने वाला भोज्य पदार्थ है. अभी भी चीन, जापान में एक महत्वपूर्ण खाद्य फसल है, और दक्षिणी यूरोप, जहां वे अक्सर ब्रेड बनाने में इस्तेमाल होता है और इतना प्रसिद्ध है की इसे एक प्रकार का उपनाम दिया गया रोटी का पेड़.
शाहबलूत में पौष्टिक तत्व शाहबलूत में बादाम एवं अखरोट के बराबर कैलोरी मौजूद होती है इसमें का विटामिन सी, कार्बोहाइड्रेट, आयरन, वसा, प्रोटीन इत्यादि तत्व मौजूद होते हैं इसमें स्टार्च की अधीकता देखी जा सकती है.
शाहबलूत का उपयोग शाहबलूत को अनेक प्रकार के व्यंजनों में किया जाता है.यह आलू के स्थान पर उपयोग में लाया जा सकता है यूरोप, अफ्रीका मे तो यह आलू के विकल्प के रूप में प्रयोग किया जाता है.इसे छीलकर या ऐसे ही कच्चा भी खाया जाता है ओर इसके अतिरिक्त यह पकाकर, तलकर, उबालकर, जैसे भी चाहें उपयोग कर सकते हैं.इसे बनाने का सबसे अच्छा तरीका बेक करना है बेक करने पर यह आलू जैसा स्वाद देता है यह विधि तुर्की, स्पेन उत्तरी चीन, ग्रीस, फ्रांस, कोरिया और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में लोकप्रिय है.
शाहबलूत से आटा भी तैयार किया जाता है जो ब्रेड बनाने के लिए तो इस्तेमाल किया जाता है इसके साथ ही इसे केक, पैनकेक्स, पास्ता,इत्यादी में उपयोग होता है इसे सूप,सास तथा रसेदार सब्जियों में डाला जाता है जिससे उनमे गाढा पन आए तथा यह भोजन का एक पौष्टिक रुप है इसके आटे से बनी रोटी ज्यादा समय तक ताजी रहती है.
शाहबलूत के स्वास्थ्य लाभ शाहबलूत स्वास्थ्य के लिए फ़ायदेमंद है यह अनेक रोगों में औषधि रुप में इस्तेमाल होता है खांसी, जुकाम, में इसका सेवन लभदायक होता है श्वास संबंधी समस्याओं मे इस फल को पानी में उबालकर इसका अर्क रोगी को पिलाना चाहिए.शाहबलूत को पीस कर उसमे शहद मिलाकर सेवन करने से काली खांसी में आराम आता है.इस फल के पत्ते से सिरप और टॉंनिक का निर्माण भी किया जाता है.

( साभार : निशामधुलिका.काम )

होम्योपैथिक और बैचफ़्लावर दवाओं मे उपयोग :

एस्कुलस हिप्पोकास्टनम (Aesculus hippocastanum ) होम्यपैथिक उपयोगों मे एस्कुलस की पहचान बवासीर की उपयोगी औषधियों मे से की जाती है विशेषकर बादी बवासीर जहाँ शुष्कता के कारण मल त्याग भारी पीडादायक होता है । इसी शुष्कता के कारण रोगी को किरच सा चुभने का दर्द उत्पन्न होता है जो इस  औषधि की विशेषता है । इस औषधि का एक अन्य महत्वपूर्ण लक्षण sacro ilaic joint का कटिशूल है और यही कारण है कि यह sacroiliitis की एक विशेष औषधि है । रोगी को महसूस होता है कि कमर लगभग टूटने वाली है और कोई भी शारिरिक स्थिति उसका निवारण नही कर पाती है ।

बैच फ़्लावर दवायें  होम्योपैथिक दवाओं से बिल्कुल अलग हैं , डां बैच के अनुसार , “मनुष्य का शारिरक दु:ख मानसिक रोग का संकेत देता है “ यही वजह है कि बैच फ़्लावर दवायें मानसिक रोगों और psychosomatic diseases  में बहुत प्रभावी रोल दिखाती हैं ’ हर बैच फ़्लावर दवाओं की एक मुख्य थीम है  और चिकित्सक को रोगी में उस मुख्य थींम को ढूँढंना पडता है जैसे इन ४ चेस्ट्नट दवाओं के थींम  अलग –२ हैं ’

रेड चेस्टनट (Red Chestnut) :

Botanical: Aesculus Carnea
Family: Hippocastanaceae
Homeopathic remedy: Not used, although members of the Aesculus genus – Aesculus Hippocastanum  and Aesculus Glabra are used.

दूसरॊं के लिये चिन्ता और डर रेड चेस्टनट का स्वभाव है . अगर बच्चा समय पर घर नही पहुँचा तो चिन्ता और अगर भाग कर रोड पार करने लगा तो चिन्ता कि कहीं किसी गाडी के नीचे न आ जाये . व्यर्थ की चिन्ता विशेशकर प्रियजनों की रेड चेस्टनट की मुख्य थीम है ’

स्वीट चेस्टनेट (Sweet Chestnut) :

Botanical: Castanea Sativa 
Family: Fagaceae
Homeopathic remedy:  Castanea Vesca

मनुष्य की ऐसी मानसिक अवस्था जिसमॆ  उसे पूर्ण मायूसी हो  जाये , कोई सहारा न दिखे औए वह अपने को लाचार समझने लगे . स्वीट चेस्ट्नट की मुख्य थीम है , “ बेहद मानसिक पीडा , घोर निराशा , मायूसी , बिल्कुल हौसला छॊड देना ” हाँलाकि ऐसे व्यक्ति सामान्य जिन्दगी मे निडर और बहादुर होते हैं ।

व्हाइट चेस्टनट (White Chestnut) :

Botanical: Aesculus Hippocastanum
Family: Hippocastanaceae
Homeopathic remedy: Aesculus Hippocastanum

मुझे याद नही पडता कि व्हाइट चेस्टनट और क्रैब एपल को छॊडकर बाकी कोई बैचफ़्लावर दवा क्लीनिक मे इतनी अधिक प्रयोग की होगी । Obscessive compulsive Neorosis , schizophrenia और कई तरह के  psychosis मे इसका उपयोग व्यापक है । और होगा  भी क्यूँ नहीं , इसकी थीम ही ऐसी है , “ पुराने और गैरजरुरी  ख्यालों मे खोये रहना , तमाम प्रयत्त्न करने के बावजूद भी जो मन मे आ जाये उसे निकाल न पाना , मन ही मन अपने आप से बाते करना और दलीलें करना’।” डां बैच लिखते हैं कि ग्रामोफ़ोन के रिकार्ड की तरह विचारों की सुई सदा घूमती रहती है ।

डां कृष्णामूर्ति ने “An exploratory study on Dr. Bach flower remedies of England” मे इस दवा के प्रयोगों का वर्णन निम्म प्रकार किया :

१. मरिज का अपने आप से बातें करना या एक ही बात या क्रिया को बार-२ दोहराना

२. मन में नापसन्द विचारों का चक्कर लगना ।

३. गिनती गिना, बार-२ दरवाजा बन्द है या नही इसको चेक करना ।

४. बडे हिसाब से प्लान बनाना और फ़िर उस पर अमल न करना ।

५. वहम( delusions ), , भ्लावा ( illusions ), छाया ( hallucinations ) , भूत –प्रेत देखना या उनकी आवाज सुनना ।

 

चेस्टनट बड (Chestnut Bud) :

Botanical: Aesculus  indica

Family: N.O. Sapindaceae

चेस्ट्नट बड की मुख्य थींम मे वह व्यक्ति जिसमे ध्यान का अभाव हो , एक ही गलती को बार-२ करे और टालामटोल की भावना से ग्रस्त हो . स्वभावत : कुछ वच्चे इससे  ग्रसित रहते हैं , पढने लिखने मे ध्यान नही लगाते और हर चीज को सीखने मे आना कानी करते हैं ।

तो अगली बार जब आप चेस्टनट खायें तो होम्योपैथिक और बैचफ़्लावर उपयोगों को न भूलें ।

सेन्टिसमल स्केल से LM स्केल तक का सफ़र

lm

पिछ्ले ३ महीनों मे जो महत्वपूर्ण परिवर्तन क्लीनिकल प्रैक्टिस  मे किये उसमे आर्गेनान के ६वें संस्करण का अनुकरण करते  हुये LM पोटेन्सी को अपनाना था । हाँलाकि इसका मन तो पिछ्ले साल ही बना लिया था  लेकिन लखनऊ मे LM दवाओं की उपलब्धता न के बराबर है , इस साल २ आर्डर SBL Limited  को भेजे लेकिन उनमे से एक काफ़ी लम्बे अर्से बाद प्राप्त हुआ । गत एक महीने में LM पोटेन्सी से मिल रहे परिणाम मुझे आशचर्यचकित करते रहे हैं । बिल्कुल साफ़ शब्दों मे कहना चाहूगाँ कि यह परिणाम सेन्टिसमल स्केल से अलग , त्वरित और बगैर किसी रोग मे बढोतरी ( Homeopathic aggravation ) किये थे । हाँलाकि शुरुआत इतनी सहज न थी , इतने लम्बे समय से सेन्टिसमल का साथ छोड्ना भी आसान न था । रोगियों के डेटाबेस को एक बार फ़िर से खंगालना पडा और  आर्गेनान आफ़ मेडिसन के छ्वाँ संस्करण को भी एक बार फ़िर से पढने की आवशयकता  पड गई  । हाँलाकि आज से २५ साल पहले तो आर्गेनान सिर्फ़ पास होने के लिये ही  पढी थी Smile। उन जटिल रोगियों मे जहाँ सेन्टिसमल पोटेन्सी की दवायें सही चुनाव होने के बावजूद काम नही कर रही थी या काम करने के बाद उनका action रुक सा गया था , उनमे बगैर दवा बदले LM को प्रयोग  किया , और  आजकल  जब इन महीनों मे वाइरल इन्फ़ेकशन आदि एक्यूट रोग बढ जाते हैं उनमें भी  आरम्भ मे करीब ३०% रोगियों और अब इधर ३ सप्ताह के बाद लगभग ६०% रोगियों में    LM   का प्रयोग कर रहा हूँ  और परिणाम आशचर्य़ चकित करने वाले रहे । जटिल रोगों ( chronic cases ) मे रुकी हुई progress को दोबारा और बगैर लक्षणॊं मे बढोतरी हुये देखा और वहीं एक्यूट रोगों मे इतनी त्वरित  प्रक्रिया  पहले कभी न देखी ।   फ़िलहाल मै ०/३ से ०/५ तक की पोटेन्सी प्रयोग कर रहा हूँ । आगे आने वाली कई पोस्ट LM  से मिल रहे परिणामों से संबधित रहेगीं ।

आखिर LM पोटेन्सी ही क्यूँ :

इसके लिये आर्गेनान के ५ वें  और ६ वे संस्करण को देखना पडेगा । हैनिमैन ने अपने जीवन काल मे होम्योपैथी चिकित्सा पद्दित मे निरंतर बदलाव किये , उनमे से एक महत्वपूर्ण बदलाव उनके जीवन के अंतिम दस वर्षॊं  मे था जिसमे उन्होंने होम्योपैथिक दवाऒं की मात्रा को और अधिक तनु और डायनामायिज किया और उसके परिणाम उनको बिल्कुल अलग दिखे । हैनिमैन इस बात से अनभिज्ञ नही थे कि अनेक संवेदनशील  रोगियों मे होम्योपैथिक औषधियाँ रोग के लक्षणॊं को बढा देती है । और उसके बाद शुरु होती है एक अंतहीन इंतजार की प्रक्रिया । भले ही होम्योपैथिक aggravation को होम्योपैथ दवा की क्रिया का एक हिस्सा मानें लेकिन कष्ट मे घिरा रोगी चिकित्सक के कहे अनुसार कम बल्कि  अधिकतर केस मे वह ऐलोपैथिक दवा लेकर होम्योपैथी मे वापस न आने की कसम खा लेता है ।

४ और ५ वें संस्करण  को अपनाने का सबसे अधिक नुकसान होम्योपैथिक प्रैक्टिस मे आये नौसिखियों और शौकिया लोगों ने किया और इन शैकिया होम्योपैथिक करने वालों को मुझे याद है कि नेशनल होम्योपैथिक कालेज ,  लखनऊ  के भूतपूर्व प्राचार्य प्रो. डां जी. चौधरी ने  बौक्सोपैथ ’ Boxopath ‘ की संज्ञा दे डाली   Secret telling smile  । अंधाधुन पोटेन्सी के साथ खिलवाड एक आम बात सी हो गई है ।   केन्ट “ Lesser Writings “ मे लिखते हैं

“ I should rather be in a room with a dozen people slashing with razors than in the hands of an ignorant prescriber of high potencies . They are means of tremendous harm , as well as of tremendous good . “ Kent -Lesser writings

सेन्टिसमल स्केल मे जहाँ दवा का अनुपात १:१०० का रहता है वहीं LM मे १: ५०००० का और हर step  पर succussions   १०० । ( सेन्टीसमल मे १० succussions ) नीचे दिये चार्ट से समझें ) औषधि को इस लेवल तक तनु किये जाने से जहाँ औषधि की पावर कई गुना बढ जाती है वहीं succussions की वजह से दवा से रोग की बढॊतरी की संभावना न के बराबर रह जाती है ।

LM पोटॆन्सी की उपलब्धता ०/१ से ०/३० तक  रहती है वहीं सेन्टीसमल मे पोटेन्सी  की  उपलब्धता  ३०-२००-१०००-१००००-५०००००-CM मे रहती है ।

Homeopathic Pharmacy Terminology

Courtesy : Valerie Sadovsky

Mother tincture

Alcohol extract of a soluble substance not potentized. Usually stored in 87% to 100% alcohol

Liquid stock bottle

Potentized remedy in solution (i.e. Sulphur 12c) preserved with 87% – 100% alcohol

Remedy solution bottle

1 pellet (#10) poppy seed size, of a lm potency or c potency is put in 4oz. of water + 2 to 3 teaspoons of 90-95% ethyl alcohol (Everclear). Succuss this bottle 8-10 times before taking out each dose (1-3 teaspoons) to put in the dosage cup

Dosage cup

A 4oz. cup of distilled water with 1-3 teaspoons from the remedy solution bottle. Stir vigorously, take 1 teaspoon as 1 dose

Succussion

To hit against a resilient object such as a leather bound book or the palm of your hand

Triturate

Grind in a mortar and pestle

Potency Symbols

LM
1:50,000 (50 millesimal scale); also written as LM/1, LM/2, 0/1, 0/2, or Q1, Q2, etc.
X
1:10 (decimal scale); also written as D in Europe
C
1:100 (centesimal scale); also written as CH in Europe
1M
1,000 C (centesimal scale)
10M
10,000 C (centesimal scale)
50M
50,000 C (centesimal scale)
CM
100,000 C (centesimal scale)
How to Make a 3C Trituration

1. 1 grain of plant, mineral, metal, etc., + 100 grains of milk sugar and triturated for 1 hour = 1C potency (trituration is done in three stages of twenty minutes each; see The Organon, paragraph 270 and footnote #150)

2. 1 grain of 1C + 100 grains of milk sugar + triturated for 1 hour = 2C potency

3. 1 grain of 2C + 100 grains of milk sugar + triturated for 1 hour = 3C potency

How to Make an LM Potency from a 3C Trituration

1. 1 grain of 3C potency diluted in 500 drops (100 drops alcohol and 400 drops water) = LM/0 (see The Organon, paragraph 270)

2. 1 drop of LM/0 + 100 drops of alcohol + 100 succussions = LM/1 potency

1 drop of LM/1 is put on 500 granules of milk sugar (#10 pellets)

3. 1 granule of LM/1 dissoved in one drop of water + 100 drops of alcohol + 100 succussions = LM/2 potency

  1 drop of LM/2 is put on 500 granules of milk sugar (#10 pellets)

4. 1 granule of LM/2 dissolved in one drop of water + 100 drops of alcohol + 100 succussions = LM/3 potency (continue this process up to the LM/30 potency)

“Mass Production” Method

Supplies:
Poppy seed size pellets of sac lac.
Distilled water.
Everclear.
“Wet” measurement vial (W-MV) : 1 dram vial with 1 drop of water and 100 drops of Everclear.
“Dry” measurement vial (D-MV): 1 dram vial with 500 poppy seed size pellets of sac lac.
Unbleached coffee filter.
Pipette.
Empty clear 1 dram vial.
Empty amber 1 dram vial.
Sticky labels.
Method:
1. Put 1 pellet of LMn in a clear 1 dram vial. Using the pipette, add 1 drop of water and let it dissolve.
2. Place this vial side to side to the W-MV and fill it in with Everclear to the level of W-MV.
3. Succuss 100 times.
4. Place an empty clear 1 dram vial side to side to the D-MV, fill it in with sac lac pellets to the level of D-MV.
5. Spread the pellets on the coffee filter and pour the prepared solution over them. Let dry for 1 day.
Put into an amber vial, cork and label as LMn+1
To Dispense to a Patient:
Mix 4 oz of distilled water with 3 tea spoons of Everclear. Fill 2/3 of 6 oz amber bottle with this mixture. Add 1 pellet of LM.
Before each dose, the patient should succuss the bottle, put 1 tea spoon in
4 oz. of pure water, stir and take one tea spoon out of it.

फ़िर क्या कारण हैं  कि LM के प्रयोगकर्ता कम दिखाई पडते हैं :

LM पोटेन्सी आर्गेनान के ६ वें संस्करण मे आई जिसको हैनिमैन ने १८४२ मे अपनी मृत्यु से पहले के  दस वर्ष के दौरान  पूरा किया । कई होम्योपैथ मानते हैं कि आर्गेनान के ५ और ६ वें संस्करण मे कुछ खास फ़र्क नही है , लेकिन वह गलत हैं । आर्गेनान का यह अन्तिम संस्करण हैनिमैन की बदलती और उच्च सोच का माध्यम रहा । इस संस्करण मे ६० नये aphorisms डाले गये,  ४९ आंशिक एडीशंस किये गये और ५ वें संस्करण के ४० aphorisms को हटा दिया गया । लेकिन अफ़सोस हैनिमैन प्रकाशक से मनमुटाव के कारण   उसको उस वर्ष प्रकाशित न कर सके और  अगले ही वर्ष उनका देहांत हो गया । हैनिमैन के दूसरी पत्नी मैलेनी ने तमाम वादों के बाद भी इस छ वे संस्करण को प्रकाशित होने न दिया । विस्तृत मे देखें यहाँ । वह एक मोटी रकम चाहती थी और कोई प्रकाशक उनको देने को तैयार न हुआ और आर्गेनान का यह संस्करण उनके जीते जी भी प्रकाशित न हो पाया । औरॊ की तरह  हैनिमैन के पौत्र सुस हैनिमैन ने भी “ छ  वें संस्करण “ को प्रकाशित करवाना चाहा लेकिन मेलेनी ने उनको ऐसा न करने के लिये आगाह किया ।

“I beg to inform you that the exclusive rights to publish the 6th edition belongs solely to me and I possess th 6th edition of the Organon written by my late husband’s hand .Dr Suss’swork can have no claim whatever to be genunine . “

सन १८७८ मे मेलेनी की मृत्यु के बाद  यह हस्तलिपि जर्मनी मे सुरक्षित रही और सन १९२० मे यह पहली बार  डां विलियम बोरिक के अथक प्रयास से प्रकाशित हुई । सन १९२१ मे डा विलियम बोरिक ने ही  इसका अंग्रेजी अनुवाद भी  प्रकाशित किया । लेकिन तब तक होम्योपैथी चिकित्सा पद्दित कई देशॊं मे अपनी अच्छी पैठ बना चुकी थी और इस दौरान के चिकित्सक   ४  संस्करण के “ wait and watch “ तरीकों पर चलना शुरु हो चुके थे ।

छ्वे संस्करण के दिशानिर्देश को पूरी तरह से १९५० मे फ़्रांस के डां चार्लस फ़ौहद ने जारी किया | सन १९५७ में जेनेवा के  डा पियेर शिडिमिड ने एक पुस्तक प्रकाशित की , ’ Hidden Treasures of the 6th Edition of the Organon ’ । भारत मे LM को लाने का श्रेय सन १९५७ मे डां चौधरी के परिवार को रहा और आज भी विशव मे सबसे अधिक LM प्रयोगकर्ता भारत मे ही हैं । लेकिन इसके बावजूद  केन्ट के तरीकॊं पर चलने वालों की संख्या अपने देश मे कही अधिक है क्योंकि अधिकतर होम्योपैथी चिकित्सा संस्थानों  की ओ.पी.डी. मे आज भी पुराने संस्करण के तरीकों को ही  अपनाया जाता है ।

दूसरा एक और सबसे बडा कारण होम्योपैथिक दवा निर्माताओं का  होम्योपैथिक के मूल स्वरुप को बढावा न देना रहा । व्यवासायिक दौर मे प्रवेश कर  रही  होम्योपैथी  मे सबसे बडी  दिक्कत पेटेन्ट और काम्बीनेशन को बढावा देना भी है । बेतुके काम्बीनेशन से लैस अधिकतर निर्माता अपने पेटेन्ट प्रोडक्ट पर तो ध्यान देते हैं लेकिन मूल स्वरुप को नही । आखिर उनकी कमाई तो पेटेन्ट से ही होती है Angry smile

लक्षणॊं मे बढोतरी ( Aggravations ) और आर्गेनान के छ वें संस्करण मे  हैनिमैन का  नजरिया  :

लेकिन छ वाँ संस्करण कई मायने मे अलग था ।  ५ वें संस्करण को अतीत मानते हुये  हैनिमैन ने aphorism 246 के foot note मे लिखा :

footnote 132 of § 246 Sixth Edition

HAHNEMANN

What I said in the fifth edition of the organon, in a long note to this paragraph in order to prevent these undesirable reactions of the vital energy, was all the experience I then had justified. But during the last four or five years, however, all these difficulties are wholly solved by my new altered but perfected method. The same carefully selected medicine may now be given daily and for months, if necessary in this way, namely, after the lower degree of potency has been used for one or two weeks in the treatment of chronic disease, advance is made in the same way to higher degrees, (beginning according to the new dynamization method, taught herewith with the use of the lowest degrees).

footnote 156 § 270 Sixth Edition

HAHNEMANN

…..by means of this method of dynamization (the preparations thus produced, I have found after many laborious experiments and counter-experiments, to be the most powerful and at the same time mildest in action, i.e., as the most perfected) the material part of the medicine is lessened with each degree of dynamization 50,000 times yet incredibly increased in power…..

डेसीमल और सेन्टिसमल पोटेन्सी के साथ LM पोटेन्सी  किसी भी होम्योपैथिक चिकित्सक की प्रैक्टिस का उपयोगी हिस्सा हो सकती  है । आवशयकता है समयानुसार उनको विभिन्न रोगों मे प्रयोग करने का और परिणाम निकालने का ….

संबधित पोस्ट :

pkt 2

Blog Author ( ब्लाग रचयिता ) : डा. प्रभात टन्डन
जन्म भूंमि और कर्म भूमि लखनऊ !! वर्ष १९८६ में नेशनल होम्योपैथिक कालेज , लखनऊ से G.H.M.S. किया , और सन १९८६ से ही इन्टर्नशिप के दौरान से ही प्रैक्टिस मे संलग्न .. वर्ष १९९४ मे P.H.M.S. join करते-२ मन बदला और तब से प्राइवेट प्रैक्टिस मे ………. आगे देखें

Clinic : Meo Lodge , Ramadhin Singh Road , Daligunj , Lucknow
E mail : drprabhatlkw@gmail.com
Landline No : 0522-2740211. 0522-6544031
Mobile no : xxxxxxxxx

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व्यक्तित्व विकास, शारीरिक भाषा और होम्योपैथी – एक अभिनव अवधारणा ( Constitutional Prescribing ,Body Language and Homeopathy )

होम्योपैथिक प्रिसक्राबिंग मे विवधिता अकसर देखी जा सकती है । लगभग हर चिकित्सक का औषधि सेलेकशन अन्य से भिन्न ही दिखता है । एक उचित सिमिलमम को सर्च करने के लिये कई  चिकित्सक सम्पूर्ण लक्षण ( totality of symptoms ) लेने पर यकीन करते है , कई मियाज्म (miasm ) आधारित प्रिसक्र्पशन पर पर , कुछ उन अनोखे लक्षण  को  तलाशते हैं ( rare , uncommon & striking symptoms ) जो रोग के सामान्य लक्षण से अलग दिखता है ; कई डां सहगल के तरीकों का अनुकरण करते हुये सिर्फ़  मानसिक लक्षण पर  प्रिसक्राइब करते हैं और कई डां प्रफ़ुल्ल विजयकर  का अनुकरण करते हैं जिनमें  रोगी की गतिविधि, ठंडक और गर्मी से सहिषुण्ता/असहिषुणता ( thermal ), प्यास और शारीरिक या मानसिक लक्षण में  बदलाव औषधि सेलकशन के लिये पर्याप्त मापदंड रहता है ।

  इनमे से वह भी हैं जो शरीर की भाषा ( Body language )  और Constitution को आधार मानकर प्रिसक्राबिग  करते हैं । शारिरिक भाषा हमारे चारों तरफ है. यह एक दिलचस्प विषय है और एक है रोमांचकारी अनुभव भी । शारिरिक भाषा मौखिक संचार में तो एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती ही है लेकिन  एक होम्योपैथ के लिये तो रोगी की शारिरिक भाषा को समझना और भी आवशयक हो जाता है । भले ही रोजमर्रा की जिदंगी मे इसकी कोई अहमियत न हो लेकिन अगर हम नैदानिक(clinical) बिदुं से अगर हम उसका उपयोग करे तो उसके प्रयोग सार्थक सिद्ध होते है ।

pt in clinic

रोगी का परमार्श कक्ष मे प्रवेश करना , उसका उठना/बैठना , वार्तालाप करते समय उसके चेहरे के हाव भाव आदि एक उचित सिमिलिमम की आवशयकताओं को पूरा करते हैं ।  इसकी उपयोगिता सिर्फ़ किताबी ज्ञान तक ही सीमित नही है बल्कि यह अन्य क्षेत्रों भी उपयोगी है जैसे :

  • एक तरफ़ा रोगों मे जहाँ लक्षण न के बराबर दिखाई पड्ते हों ।
  • मनश्चिकित्सीय रोगियो में
  • बाल रोगों मे
  • विरोधाभासी लक्षणॊं मे
  • बहरे, गूंगे और मन्द बुद्दि रोगियों मे
  • समृद्ध और जटिल मेटेरिया मेडिका और रेपर्टिरी के अध्यन्न को सरल बनाने मे ।
  • शरीर की भाषा की मदद से रुब्रिक्स को समझने मे ।
  • और सबसे मुख्य बात कि यह बहुत बहूमूल्य  समय बचाता है ।

इसी तरह Constituitional  प्रेसक्राइबिग की भी होम्योपैथिक औषधि चुनाव  मे एक महत्वपूर्ण भूमिका है ।   होम्योपैथिक आधारित constituition का तात्पर्य एक इन्सान के मानसिक और शारिरिक व्यक्तित्व  को परिभाषित करना है । लेकिन यह भी एक सत्य है कि इसकी बुनियाद हैनिमैन ने नही रखी । गैलन (130-200 ई.पू.) और हिप्पोक्रेट्स (400 ई.पू.)  ने मनुष्य के व्यक्तित्व को समझने का प्रयास किया । जहाँ हिप्पोक्रेट्स (400 ई.पू.) का मानना था कि शरीर चार humors अर्थात रक्त,कफ, पीला पित्त और काला पित्त से बना है. Humors का असंतुलन, सभी रोगों का कारण है . वही गैलन Galen (130-200 ई.) ने इस शब्द  का इस्तेमाल  शारीरिक स्वभाव के लिये किया , जो यह निर्धारित करता है  कि शरीर  रोग के प्रति किस हद तक संवेदन्शील है । हिप्पोक्रेट के  Humour शब्द का तात्पर्य शरीर मे प्रवाहित हो रहे तरल पद्दार्थ से था हाँलाकि यह तकनीकी रुप से यह प्रचलित भावनाओं से जुडा था जैसे :

  • प्रसन्नता या खुशी का रक्त से संबध – सैन्गूयूनि टेम्परामेन्ट (Sanguine Temperament)
  • कफ़ का चिंता और मननशीलता से संबध – फ़ेलेगमेटेक ( phlegmatic Temperament)
  • पीले पित्त का क्रोध से संबध – कोरिक (Choleric Temperament)
  • उदासी का काले पित्त से – मेलोन्कोलिक (Melancholic Temperament)

hippocratic temperament

4 humours in respective order: choleric, melancholic, phlegmatic, and sanguine

इन चार स्वभावों को हम एक सक्षिप्त  उदाहरंण से  आसानी से समझ सकते हैं । एक होटल मे चार मित्र  सूप पीने जाते है । लेकिन अचानक चारों की नजर सूप मे तैरते बाल की तरफ़ पड जाती है  पहला  मित्र देखते ही आग बबूला हो उठा , गुस्से से उसने सूप का प्याला वेटर के मुँह पर दे मारा ( Choleric ) , दूसरे ने मुँह बनाया  अपने कोट को झाडा और सीटी बजाता हुआ निकल गया (Sanguine) , और तीसरा रुँआसा सा हो गया और बोला कि यह सब उसी की जिदंगी मे अक्सर क्यूं होता रहता है (Melancholic ) और चौथा मित्र तो बडे दिमाग वाला निकला , सूप मे से बाल को किनारे किया ;सूप पिया और वेटर से नुकसान हुये सूप के बदले दूसरे सूप की फ़रमाईश भी कर डाली ( phlegmatic)

इन चार स्वभावों को देखने  से यह लगता है कि अमुक स्वभाव अच्छा या बुरा होता है , लेकिन  ऐसा नही है , प्रत्येक स्वभावों के धन पक्ष भी है और ॠण पक्ष भी । हाँ उचित सिमिलिमन से हम उन कमजोरियों को कम अवशय कर सकते हैं या यो कहें कि  ॠण पक्ष  को धन पक्ष मे बदल सकते हैं ।

एक नजर देखते हैं इन चार स्वभावों मे धन पक्ष और ॠण पक्ष की :

सैन्गूयूनि टेम्परामेन्ट (Sanguine Temperament):

धन पक्ष : हमेशा प्रसन्न रहने वाले, आत्मविशवास से भरपूर , आशावादी , बहिर्मुखी और जीवन को जीने वाले ।

ॠण पक्ष :आत्मसंतोष की कमी , संवेदन्शील, अल्पज्ञता, अस्थिरता, बाहरी दिखावा करने वाले और ईर्ष्या को झुकाव ।

फ़ेलेगमेटेक टेम्परामेन्ट ( phlegmatic Temperament) :

धन पक्ष :   अच्छी तरह से संतुलित,  जीवन के साथ संगत, भरोसेमंद, रचनात्मक और विचारशील, संतुष्ट

ॠण पक्ष : आलसी, अकर्मण्य . अपने  कर्तव्य की उपेक्षा ,  दुविधाग्रस्त, अपने कर्तवों  को टालने वाले , महत्वाकांक्षा विहीन ,  दूसरों को भी प्रेरित न कर पाना

कोरिक टेम्परामेन्ट (Choleric Temperament) :

धन पक्ष : मजबूल इच्छाशक्ति वाले , दुनिया को अपने तरीके से चलाने वाले , आत्मविशवास से भरपूर

ॠण पक्ष : प्रचंड गुस्सा , अपने को श्रेष्ठ समझना , विरोधों को सहन न कर पाना , सहानभूति का अभाव , जीवन मे छ्ल , कपट और पाखंड का सहारा लेना

मेलोन्कोलिक टेम्परामेन्ट (Melancholic Temperament) :

धन पक्ष : प्रतिभाशाली, बेहद रचनात्मक , संवेदनशील, सपने देखने वाले , अतंर्मुखी, विचारशील,  आत्म त्याग की भावना से भरपूर , जिम्मेदार, विश्वसनीय

ॠण पक्ष : चिंता और अवसाद ग्रस्त , अपनी प्रतिभा का कम उपयोग करने वाले , मुखरता की कमी , आसानी से किसी को माफ़ न कर पाना , बेहद संवेदनशील


मन और शरिरिक गठन की गहरी जडॆं
पाइथागोरस से जुडी हैं
उदर हिप्पोक्रेट्स से
शाखायें पेरासेलसस में
और फ़ल वास्तव मे हैनिमैन से जुडॆ हैं ।

हैनिमैन की प्रशंसा करनी होगी कि उन्होने Hippocratic temperaments और humors को मैटेरिया  मेडिका मे एकीकृत कर के हमे यह दिखाया  कि हम किसका इलाज कर रहे हैं और वह किस से पीडित है ।
आर्गेनान आफ़ मेडिसन मे हैनिमैन लिखते हैं :
HAHNEMANN

Aphor .211

This is true to such an extent, that the state of patient’s Mind and Temperament (Gemuethszustand) is often of most decisive importance in the Homoeopathic selection of a remedy, since it is a sign possessing a distinct peculiarity, that should least of all escape the accurate observation of the physician.

यह बात किसी सीमा तक सही और सत्य है कि रोगी की मानसिक दशा रोग के लिये उपयुक्त औषधि चुनने मे बहुत सहायक होती है । जो चिकित्सक सावधानी के साथ इस निर्णायक मानसिक लक्षण पर दृष्टि रखतेहैं उनकी तीक्ष्ण नजर से रोगी के रोग का कोई भी लक्षण छिपा नही रह सकता |

क्लीनिकल प्रकैटिस मे Constituitional prescribing की भूमिका :

रोगी को देखते हुये मूल स्वभाव को तो हम देखते ही हैं लेकिन रोग ग्रस्त मनुष्य में जब वह स्वभाव मूल  से भिन्न दिखाई पडता है तो उसकी भूमिका और भी अधिक बढ जाती है । जैसे  एक कैल्कैरिया कार्ब का रोगी जो phlegmatic स्वभाव का है किसी कारण वश बहुत उग्र हो जाता है ( Choleric)  तो उसका यह भिन्न स्वभाव दवा का  सेलेक्शन मे भिन्न्ता ला सकता है । इसी तरह मृदु भाढी पल्साटिला नारी तनाव को झेलने मे अपने को असहज  पाती है तो उसमे होने वाले स्वभावों मे अन्तर दवा के चुनाव मे फ़र्क डाल सकते हैं ।

लुक डि फ़िशर ने Hahnemann Revisited पुस्तक  मे एक उदाहरण के जरिये सचित्र इसको समझाया है ।

एक फ़ास्फ़ोर्स व्यक्त्तित्व का इन्सान जो अपनी यात्रा अपने ही व्यक्तित्व मे न कर पाया । कारण समय-२ उसके जीवन  चक्र मे आने वाले परिवर्तन ।  चित्र पर किल्क करें और देखें ।

रोगी मे आने वाले स्वभावों मे अन्तर मानसिक लक्षणॊं की श्रेणी मे आते हैं । और दवा चुनाव मे वह अपनी वरियता सबसे ऊपर रखते हैं । नये रोगों ( acute diseases ) मे इनकी भूमिका भले ही बहुत न हो लेकिन जटिल और पुराने रोगों मे यह दवा चुनाव मे महत्वपूर्ण आधार बनते हैं ।

§ 5

HAHNEMANN Useful to the physician in assisting him to cure are the particulars of the most probable exciting cause of the acute disease, as also the most significant points in the whole history of the chronic disease, to enable him to discover its fundamental cause, which is generally due to a chronic miasm. In these investigations, the ascertainable physical constitution of the patient (especially when the disease is chronic), his moral and intellectual character, his occupation, mode of living and habits, his social and domestic relations, his age, sexual function, etc., are to be taken into consideration.

सूत्र ५-रोग के मूल कारण की खोज

रोग नया हो या पुराना चिकित्सक को बीमारी के मूल कारणॊं की खोज करना नितान्त आवशयक  है । नये रोगों मे रोग उत्पन्न करने और रोग को उत्तेजना देने वाले कारणॊं पर तथा पुरानी बीमारियों मे रोग के इतिहास पर चिकित्सकों को बहुत अधीरता और सावधानी से विचार करना चाहिये क्योंकि ऐसा करने पर ही रोग के मूल कारण का पता लग सकता है । वस्तुत: चिकित्सक को रोगी की शरीर रचना और प्रकृति – गठन , शक्ति , स्वभाव , आचरण , च्यवसाय , रहन सहन , आदतें , समाजिक तथा परिवारिक संबन्ध , आयु, ज्ञान्निद्र्यों के व्यवाहार पर पूरी तरह से विचार कर लेना चाहिये ।

    § 213

    We shall, therefore, never be able to cure conformably to nature – that is to say, homoeopathically – if we do not, in every case of disease, even in such as are acute, observe, along with the other symptoms, those relating to the changes in the state of the mind and disposition, and if we do not select, for the patient’s relief, from among the medicines a disease-force which, in addition to the similarity of its other symptoms to those of the disease, is also capable of producing a similar state of the disposition and mind.1

    1 Thus aconite will seldom or never effect a rapid or permanent cure in a patient of a quiet, calm, equable disposition; and just as little will nux vomica be serviceable where the disposition is mild and phlegmatic, pulsatilla where it is happy, gay and obstinate, or ignatia where it is imperturbable and disposed neither to be frightened nor vexed.

सूत्र २१३ – रोग के इलाज के लिये मानसिक दशा का ज्ञान अविवार्य

इस तरह , यह बात स्पष्ट है कि हम किसी भी रोग का प्राकृतिक ढंग से सफ़ल इलाज उस समय तक नही कर सकते जब तक कि हम प्रत्येक रोग , यहां तक नये रोगों मे भी  , अन्य लक्षणॊं कॆ अलावा रोगी के स्वभाव और मानसिक दशा मे होने वाले परिवर्तन पर पूरी नजर नही रखते । यादि हम रोगी को आराम पहुंचाने के लिये ऐसी दवा नही चुनते जो रोग के सभी लक्षण  के साथ उसकी मानसिक अवस्था या स्वभाव पैदा करनेच मे समर्थ है तो रोग को नष्ट करने मे सफ़ल नही हो सकते ।

सूत्र २१३ का नोट कहता है :

ऐसा रोगी जो धीर और शांत स्वभाव का है उसमे ऐकोनाईट और नक्स कामयाब नही हो सकती , इसी तरह एक खुशमिजाज नारी मे पल्साटिला या धैर्यवान नारी मे इग्नेशिया  का रोल नगणय ही  रहता है क्योंकि यह रोग और औषधि की स्वभाव से मेल नही खाते ।

यही कारण है कि  पोलिक्रेस्ट होम्योपैथिक दवाओं अपना अलग-२ स्वभाव  को दिखलाती हैं । हिपोक्रेट के इस विभाजन को हैनिमैन , केन्ट , हेरिंग और ऐलेन ने मैटेरिया मेडिका मे जगह –२ प्रयोग किया है । जैसे पल्साटिला के बारे मे हैनिमैन लिखते हैं , “ Pulsatilla  is suited to a low , tearful , changeable , plegmatic temparemt “ और फ़ास्फ़ोरस के बारे मे लिखा “ quick movements , rapid resolutions , and a cheeful mood are more often found in phosphorous . औषधियों के स्वभावों को जानने के लिये मैटेरिया मेडिका का अध्यन्न तो अनिवार्य शर्त है और उससे बढकर रिपर्टेरी मे MIND SECTION मे चिन्हित उन रुब्रिक्स को समझना और रोगी की भाषा मे बदलने की माहरत होनी चाहिये ।

Visible Code” in Repertorial Perspective – Important Rubrics

Mind Chapter

1. Activity, Mental

2. Actions, behaviour

3. Agony, anguish

4. Alert, mentally

5. Anger

6. Answers, general

7. Antics, plays

8. Anxiety

9. Automatic, behaviour

10. Aversion, general

11. Awkward

12. Bashful

13. Bites

14. Boredom, ennui

15. Busy

16. Caressed, agg.

17. Cheerful

18. Childish, behaviour

19. Clinging

20. Clothed, improperly

21. Crying

22. Dancing

23. Faces, makes

24. Frown, disposed to

25. Gestures, makes

26. Gloomy, morose

27. Grimaces, makes

28. Hatred feelings

29. Hurried

30. Hyperactive, children

31. Impolite

32. Indifference

33. Kicking, behaviour

34. Laughing, behaviour

35. Laziness, indolence

36. Moaning

37. Mocking

38. Plays, with his fingers

39. Rage

40. Restlessness

41. Screaming, shrieking

42. Serious, behaviour

43. Shameless

44. Sighing, emotional

45. Singing

46. Sit, inclination to

47. Sits, general

48. Speech, general

49. Smiling

50. Suspicious

51. Sympathetic

52. Torpor

53. Violent, behaviour

54. Walking, behaviour

55. Washing, hands

56. Whistling

57. Witty

58. Yielding

(II) Children chapter

(III) Legs

(IV) Limbs

(V) Generals

 source : murphy repertory

courtesy : Dr Rajoo Kulkarani -body language and homeopathy PPS cure 7

मैटेरिया मेडिका और रिपर्ट्री मे इन चार constitutions से संबधित रुब्रिकस और औषधियों के बारे मे विस्तार से ग्रुप दिये हैं जैसे synthesis में : :source -synthesis 9

  • सैन्गूयूनि टेम्परामेन्ट (Sanguine Temperament):  Rubric mentioned under cheerful/confident/optimistic
  • फ़ेलेगमेटेक टेम्परामेन्ट ( phlegmatic Temperament) : Rubric mentioned under dullness /indifference/slowness
  • कोरिक टेम्परामेन्ट (Choleric Temperament) : passionate
  • मेलोन्कोलिक टेम्परामेन्ट (Melancholic Temperament) : despair/ grief / sadness

 

संभावित औषधियाँ : source -murphy repertory :

 Constitutions – CHOLERIC, constitutions
acon. ars. aur. BRY. carb-v. Caust. CHAM. coff. FERR. Hep. HYOS. kali-p. Kalm. Lach. Lyc. nat-m. Nit-ac. NUX-V. Phos. Plat. sec. Sil. sulph.

 Constitutions – SANGUINE, constitutions
Acon. ars. aur. Calc. calc-p. Cham. chin. Chinin-s. Coff. FERR. HYOS. Ign. murx. Nit-ac. Nux-v. PHOS. plat. Puls. Sang.

 Constitutions – PHLEGMATIC, constitutions
aloe Am-m. ant-t. Bell. calad. CALC. Caps. Chin. Clem. cocc. cycl. Dulc. ferr-p. hep. kali-bi. kreos. Lach. Merc. mez. Nat-c. Nat-m. PULS. seneg. Sep.

 Constitutions – MELANCHOLIC, constitutions
Acon. anac. AUR. Aur-m. bell. Bry. Calc. chin. cocc. Colch. Graph. IGN. Lach. Lil-t. Lyc. murx. NAT-M. Plat. PULS. Rhus-t. staph. stram. Sulph. verat.

 

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Blog Author ( ब्लाग रचयिता ) : डा. प्रभात टन्डन
जन्म भूंमि और कर्म भूमि लखनऊ !! वर्ष १९८६ में नेशनल होम्योपैथिक कालेज , लखनऊ से G.H.M.S. किया , और सन १९८६ से ही इन्टर्नशिप के दौरान से ही प्रैक्टिस मे संलग्न .. वर्ष १९९४ मे P.H.M.S. join करते-२ मन बदला और तब से प्राइवेट प्रैक्टिस मे ………. आगे देखें

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