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India to tie up top institutes for advanced research in Homoeopathy


New Delhi: Buoyed by the success of the World Summit in Mumbai, the Central Council for Research in Homeopathy (CCRH) plans to have a tie-up with other research organisations with the aim of taking the health-care industry to the next level.

With recent researches having yielded information on genomics which can be juxtaposed on the effect of homeopathic medicines individualised at molecular level, CCRH director general R.K. Manchanda has called for further research in the area.

He pointed out that CCRH — an autonomous body under the government of India’s Department of Ayurveda, Yoga and Naturopathy, Unani, Siddha and Homoeopathy (AYUSH) — has been instrumental in cutting-edge research publications on cancer, Japanese encephalitis, diabetes, urolithiasis, memory function and detection of nano-particles in high homeopathic dilutions.

The council has already found integration of homeopathic and allopathic medicines to be successful in tackling MDR-TB.

Manchanda expressed happiness the huge participation in the World Homeopathy Summit on April 11-12, which CCRH held the summit in association with the Global Homeopathy Foundation, proved that homeopathy is not a placebo medicine and that it is science.

The summit was attended by scientists from Brazil and Italy as well as those from the Indian Council of Medical Research (ICMR), IIT-Bombay, Institute of Chemical Technology (ICT) Mumbai, Indian Institute of Chemical Technology (IICT) Hyderabad, Haffkine Institute Mumbai, Council of Scientific and Industrial Research (CSIR) and Bose institute – Kolkata.

“The deliberations at the summit held recently and the ocean of information on the research done into treatment of AIDS, cancer, influenza and TB and the detection of nano-particles in homeopathic medicines will definitely take homeopathy to an altogether new dimension,” he said.

Questions have been raised about homeopathy — whether it is a science at all and if it works and how does it work. “Now, we are in a position to declare to the world that researches have conclusively proved that homeopathy works, and works effectively in several cases of complicated diseases,” declared Dr Rajesh Shah, organising secretary of the summit.

Molecular biologist Dr Gaurisankar from Bose institute – Kolkata, demonstrated that cancer tumour regressed significantly after administering homeopathic nano-particles of Calcaria Carbonicum. His research has proved that high-dilution homeopathic nano-particles could kill the cancer cells and considerably reduce the cancer tumours in rats.

Snake venom transformed into a homeopathic medicine could reduce the growth of HIV virus by inhibiting RT (reverse transcriptase), an enzyme required for the multiplication of the deadly HIV, Hepatitis C and Ebola virus, studies at Indian Institute of Chemical Technology (IICT), Hyderabad, showed. IICT scientists Dr Praveen Kumar and Dr Prathama feel this research opens a new way to treat HIV and other such diseases, including Ebola.

In a study by Dr Khuda Bukshsh, genotoxic effects of arsenic trioxide poisoning were successfully treated using potentised arsenic metal, proving the very fundamental principle of homeopathy, which says that like can be cured by likes, if administered in extremely small dose.

Similarly, he demonstrated that mercury, cadmium and tin toxicity also reduced with the corresponding homeopathic medicines prepared from the same metals. “Treatment of toxicity is another area which could be addressed by homeopathy,” said GHF chairman Eswara Das, also an ex-advisor of AYUSH.

Cancer surgeon Dr Arun Jamkar, vice-chancellor of Maharashtra University of Health Sciences (MUHS), said in his keynote address that recent research has created adequate evidence for the efficacy of homeopathic medicines. He opined that homeopathy and conventional medicine could be integrated to benefit the patients.

A major research done in Brazil by Dr Leoni Bonamin and team demonstrated the preventive affects of homeopathic medicine prepared from the influenza virus. “This research opens up windows to many more research opportunities in India,” said Dr. Shah, who is also working on developing more medicines sourced from various germs.

Source : http://www.homeobook.com/india-to-tie-up-top-institutes-for-advanced-research-in-homoeopathy/

होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा और एवोगेड्रो ( Avogadro’s ) की संख्या – क्या एवोगेड्रो की संख्या से होम्योपैथी का मूल्याकंन करना उचित है ?

homeopathy explained

होम्योपैथिक औषधियों के विरोध के प्रमुख कारणॊं मे एक प्रमुख कारण होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा   है । होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा को विस्तार मे समझने के लिये औषधि निर्माण की प्रक्रिया को समझना पडेगा । होम्योपैथिक औषधियों मे प्राय: दो प्रकार के स्केल प्रयोग किये जाते हैं ।

क) डेसीमल स्केल ( Decimal Scale )

ख) सेन्टीसमल स्केल ( Centesimal Scale )

क) डेसीमल स्केल मे दवा के एक भाग को vehicle ( शुगर आग मिल्क ) के नौ भाग से एक घंटॆ तक कई चरणॊं मे विचूर्णन ( triturate ) किया जाता है । इनसे बनने वाली औषधियों को X शब्द से जाना जाता है जैसे काली फ़ास 6x इत्यादि । 1X  बनाने के लिये दवा का एक भाग और दुग्ध-शर्करा का ९ भाग लेते हैं , 2X के लिये 1X का एक भाग और ९ भाग दिग्ध शर्करा का लेते हैं ; ऐसे ही आगे कई पोटेन्सी बनाने के लिये पिछली पोटेन्सी का एक भाग लेते हुये आगे की पावर को बढाते हैं । डेसीमल स्केल का प्रयोग ठॊस पदार्थॊं के लिये किया जाता है ।

ख) सेन्टीसमल स्केल मे दवा के एक भाग को vehicle ( एलकोहल) के ९९ भाग से सक्शन किया जाता है । इनकी इनसे बनने वाली औषधियों को दवा की शक्ति या पावर से जाना जाता है । जैसे ३०, २०० १००० आदि ।

सक्शन सिर्फ़ दवा के मूल अर्क को एल्कोहल मे मिलाना भर नही है बल्कि उसे सक्शन ( एक निशचित विधि से स्ट्रोक देना )  करना है । आजकल सक्शन के लिये स्वचालित मशीन का प्रयोग किया जाता है जब कि पुराने समय मे यह स्वंय ही बना सकते थे । पहली पोटेन्सी बनाने के लिये दवा के मूल अर्क का एक हिस्सा और ९९ भाग अल्कोहल लिया जाता है , इसको १० बार सक्शन कर के पहली पोटेन्सी तैयार होती है ; इसी तरह दूसरी पोटेन्सी के लिये पिछली पोटेन्सी का एक भाग और ९९ भाग अल्कोहल ; इसी तरह आगे की पोटेन्सी तैयार की जाती हैं ।

विरोध का मूल कारण और एवोगेड्रो ( Avogadro’s  ) की परिकल्पना

रसायन विज्ञान के नियम के अनुसार किसी भी वस्तु को तनु करने की एक परिसीमा है और इस परिसीमा मे रहते हुये यह आवशयक है कि उस तत्व का मूल स्वरुप बरकरार रहे । यह परिसीमा आवोग्राद्रो की संख्या ( 6.022 141 99 X 1023 ) से संबधित है जो होम्योपैथिक पोटेन्सी 12 C से या 24 x से मेल खाता है । यानि आम भाषा मे समझें तो होम्योपैथिक दवाओं की १२ वीं पोटेन्सी और 24 X पोटेन्सी मे दवा के तत्व विधमान रहते हैं उसके बाद नही । होम्योपैथिक के विरोधियों के हाथ यह एक तुरुप का पत्ता था और जाहिर है उन्होने इसको खूब भुनाया भी ।

यह बिल्कुल सत्य है कि रसायन शास्त्र के अनुसार होम्योपैथी समझ से बिल्कुल परे है । लेकिन पिछले २४ वर्षों  मे १८० नियंत्रित ( controlled ) और ११८  यादृच्छिक ( randomized )  परीक्षणों को अलग -२ ४ मेटा तरीकों  से होम्योपैथी का विश्लेषण करने के उपरांत प्रत्येक मामले में  शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि होम्योपैथी दवाओं से मिलने वाले परिणाम प्लीसीबो से बढ कर हैं ।

होम्योपैथी के संबध मे प्राथमिक प्रशन उभरता है कि क्या सक्शन ( succession ) किये गये SAD ( serially agitated dilutes )  को तरल वाहनों जैसे एल्कोहल या जल  ( liquid vehicles e.g. alcohol , water etc )  से अलग कर के पहचान की जा सकती है जो होम्योपैथिक औषधि के रुप मे उपचार के लिये प्रयोग किये जाते हैं । हाँलाकि इससे प्लीसीबो के आरोपों से मुक्ति नही पा जा सकती लेकिन इससे पता अवशय चलता है कि हर औषधि की अपनी विशेषता क्या है ।

एक सदी से  मेडिकल साहित्य की समीक्षा करने से पता चलता है कि ऐसे कई रिपोर्ट उपलब्ध हैं जिससे यह पहचान की जा सकती है कि इन उच्च  potentised  dilutes का प्रभाव जीवाणु , प्राणि विषयों , वनस्पति और यहाँ तक कि जन्तुओं पर भी असरदारक है । इनके लिये भौतिकी और बायोकेमिस्ट्री दोनों का ही समय-२ पर प्रमाण स्वरुप सहायता ली गई । हाँलाकि इन रिपोर्टों से SAD की आणविक संरचना समझ मे नही आती लेकिन यह बिल्कुल तय है कि यह SAD  तरल वाहनों ( liquid vehicles ) से हटकर हैं ।

इस विषय पर पहल्रे भी चर्चा हो चुकी है । देखें होम्योपैथी -तथ्य एवं भ्रान्तियाँ ” प्रमाणित विज्ञान या केवल मीठी गोलियाँ “( Is Homeopathy a trusted science or a placebo )  लेकिन नवीनतम शोघॊं मे  रसायन शास्त्री श्री बिपलब चक्र्वर्ती और डा. मो. रुहल अमीन के शोध होम्योपैथी औषधियों और एवोगेड्रो  संख्या पर प्रकाश डालने वाले हैं । उनके ब्लाग http://www.aminchakraborty.blogspot.in/  नवीन संभवनाओं को जन्म देता है । बिपलब चक्र्वती एक समय होम्योपैथिक के बडे आलोचक रहे हैं  लेकिन पिछ्ले १० सालॊ से बिपलब और डा. अमीन होम्योपिथिक दवाओं के सांइनटैफ़िक पहलू पर कार्य कर रहे हैं । आपके कई शोध पत्र विभिन्न शोध संस्थानों द्वारा सराहे गये है ।

आवाग्रादो की परिकल्पना और होम्योपैथी के विवाद मे अमीन लिखते है :

How and Why Avogadro’s Number does not Limit efficacy of the Homeopathic Remedies.
#       Homeopathic dilutions have been used since 1800 and remained unchallenged until determination of Avogadro’s number.
#       Homeopathic remedies were challenged only after the determination of Avogadro’s number by Millikan in 1910, a number of years after homeopathy came into use.
#       A mathematical calculation based on Avogadro’s Number led to the conclusion that homeopathic dilution must be nothing but placebo after homeopathy had already been used for 109 years !!
#       It is not proper to discount homeopathy simply on the basis of Avogadro’s number without clarifying the existing fundamental contradictions in science as detailed above.
#       In conventional medicines the molecules are believed to convey the medicinal power in the living body but in homeopathic dilutions it is not the molecules of medicine but the  electrical strain induced in the vehicle, by the  substance, that conveys the medicinal power of a substance in the living body.
#       When preparing serial homeopathic dilutions the electrical strain of the latter differs from the former dilution in regards to difference in molecular orientations of water  but cannot be determined due to non-availability of any such scientific instruments and for which the homeopathic dilution cannot be held responsible.
Source : How and why Homeopathy is Scientific

डा. रुहल अमीन और श्री बिपलब चक्रवर्ती के अन्य शोध लेखों को देखने के लिये निम्म लिंक पर जायें:

Homoeopathic therapy for lower urinary tract symptoms in men with Benign Prostastic Hyperplasia: An open randomized multicentric placebo controlled clinical trial

Benign Prostatic Hyperplasia (BPH) is the most common condition in ageing men, associated with Lower Urinary Tract Symptoms (LUTS). Being a cause of significant morbidity in ageing man, various observational studies were conducted by the Council with a positive outcome. This protocol has been prepared to further ascertain the usefulness of constitutional/organ remedies in LUTS for men with BPH in a randomized control setting.

Objectives: The primary objective is to compare the changes in IPSS (International Prostate Symptom Score) within the three groups enrolled for the study (Constitutional remedy/Constitutional + Organ remedy/Placebo). The secondary objectives are to compare the changes in Prostate volume, Post Void Residual Urine (PVRU), Uroflowmetry and in WHOQOL-BREF.

Material and Methods: It is an open randomized placebo controlled clinical trial. The prescription of the constitutional remedies/organ remedies/placebo is done as per the randomization chart and the selection of these remedies is done as per the guidelines laid in the Organon of Medicine. The outcome measures including IPSS (monthly), prostate volume, post void residual urine, uroflowmetry and the WHOQOL-BREF are assessed at baseline, three and six months interval.

Discussion:Results from this trial will help in constructing treatment strategy for BPH patients with lower urinary tract symptoms in improving their quality of life.

Trial Registration: Clinical Trial Registry – India: CTRI/2012/05/002649.

Keywords: Homoeopathy, Prostate, Post void residual urine, Prostate volume, Uroflowmetry

Download link : https://app.box.com/s/x2uj1sn304k867fo0exd

होम्योपैथी दवाओं के लिए नोएडा में पौधों का संरक्षण

Homeopathic medication

होम्योपैथी पद्दति में  करीब 1400 प्रकार की दवाएं पौधों से बनती हैं। इनमें 50 से ज्यादा पौधे ऐसे हैं, जिनका इस्तेमाल सिर से लेकर पैर तक के रोगों की कारगर दवा बनाने के लिए किया जाता है। ऐसे ही चार दर्जन से अधिक पौधों का सेक्टर-24 स्थित केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान केंद्र संरक्षण कर रहा है। इसके लिए अनुसंधान केंद्र में ग्रीन हाउस बनाने की भी तैयारी है। इस केंद्र में नई दवाओं को इजाद करने के लिए कई शोध भी किए जा रहे हैं।
अनुसंधान केंद्र के वनस्पति वैज्ञानिक अरुण कुमार तिवारी ने बताया कि हर छोटे और बड़े औषधीय पौधे की अपनी खासियत होती है। यह पौधे गंभीर बीमारियों के इलाज की क्षमता रखते हैं। यही वजह है कि यहां पौधों से दवाएं बनाने के अलावा उनकी अन्य गुणवत्ताओं की खोजों पर भी काम किया जाता है। समय-समय पर किए जाने वाले शोधों से बेहतरीन दवा इजाद की जाती है। एक दवा को बनाने के लिए एक ही प्रजाति के तीन से चार पौधों का रस निकाला जाता है। जिस पौधे से ज्यादा रस निकालता है, उसी से ज्यादा कारगर दवा बनती है। रस को सुखाया जाता है और एल्कोहल मिलाकर दवा बनाई जाती है। अरुण कुमार ने बताया कि अनुसंधान केंद्र की छत पर एक छोटा सा ग्रीन हाउस बनाया जाएगा, जिसमें पौधे और भी सुरक्षित रहेंगे।
कुछ प्रमुख पौधे
इस्तेमाल में आने वाला भाग- पत्तियां
उपयोग- सर्दी-जुकाम, खांसी
इस्तेमाल में आने वाला भाग- फल
उपयोग- रक्त शोधक
इस्तेमाल में आने वाला भाग- फल
उपयोग- सर्दी-जुकाम, बदजहमी
इस्तेमाल में आने वाला भाग- जड़
उपयोग- बुखार, सिरदर्द, मेनेनजाइटिस
इस्तेमाल में आने वाला भाग- फल
उपयोग- बुखार, कफ निस्सारक
इस्तेमाल में आने वाला भाग- जड़ें
उपयोग- फेरेंजाइटिस, बवासीर और बुखार
इस्तेमाल में आने वाला भाग- अंकुरित हिस्सा
उपयोग- मधुमेह
इस्तेमाल में आने वाला भाग- बीज
उपयोग- मधुमेह और मुहांसे
इस्तेमाल में आने वाला भाग- पत्तियां
उपयोग- बवासीर और डायरिया
पौधा- गिलोय
इस्तेमाल में आने वाला भाग- तना और जड़
उपयोग- पीलिया और कमजोरी
पौधा- पत्थर चूर
इस्तेमाल में आने वाला भाग- पत्तियां
उपयोग- पेशाब संबंधी दिक्कतों का इलाज
पौधा- कालमेध
इस्तेमाल में आने वाला भाग- पूरा पौधा
उपयोग-सर्दी- जुकाम, खांसी और पीलिया
पौधा- जटरोफा
इस्तेमाल में आने वाला भाग- बीज
उपयोग- हैजा, डायरिया, बदहजमी
पौधे- कुंदरू
इस्तेमाल में आने वाला भाग- पत्तियां
उपयोग- मधुमेह
पौधे- सर्पगंधा
इस्तेमाल में आने वाला भाग- जड़े
उपयोग- हाइपरटेंशन
पौधा- सतावर
इस्तेमाल में आने वाला भाग- जड़
उपयोग- महिलाओं के लिए शक्तिवर्धक
(इनको मिलाकर करीब 50 किस्मों के पौधे अनुसंधान केंद्र में मौजूद हैं)

2013 के मध्य में शुरू होगा म्यूजियम
अनुसंधान केंद्र की सबसे ऊपरी मंजिल पर बन रहा म्यूजियम 2013 के मध्य में शुरू होगा। अनुसंधान केंद्र के उपनिदेशक डॉ. सुनील कुमार ने बताया कि इस म्यूजियम में होम्योपैथी की शुरुआत, दवाओं और भविष्य में होने वाले शोध की जानकारी थ्री-डी और फोर-डी के जरिए दी जाएगी। म्यूजियम में 50 सीटों का एक छोटा सा हॉल भी होगा, जिसमें होम्योपैथी पर डॉक्यूमेंट्री मूवी दिखाई जाएगी।

साभार : अमर उजाला दिनांक १०-४-२०१२

Treating Acute infections in Homeopathy – एक्यूट संक्रमणॊं का होम्योपैथी मे उपचार

जुलाई से लेकर सितम्बर तक के ज्वरों मे लगभग एक तरह की  समानता देखी जाती है । ज्वर की प्रवृति मे तेज बुखार, ठंड लगने के साथ, तेज सरदर्द ,वमन , बदन का टूटना आदि प्रमुख्ता से रहते हैं . लेकिन कुछ विशेष अन्तर भी रहते हैं जिनके आधार पर इनकी पहचान की जा सकती है , विशेषकर उन इलाकों मे जहाँ महँगे जाँच करवाना संभव नही होता .

क्रं. मलेरिया डेगूं चिकिनगुनिया
1. ठँड से काँपना, जिसकी पहचान डाइगोनिस्टिक किट और ब्लड स्मीर से की जाती है . डॆगूं मे अधिकतर रक्त से संबधित समस्यायें होती हैं जैसे त्वचा पर छॊटॆ लाल दाग जो WBC और platelet की कमी से होते हैं . चिकिनगुनिया में जोडॊं ( संधिस्थलों ) मे दर्द और सूजन अधिक रहती है .
2.   डॆगूं का बढना जो WBC और PLatelet ( < 100000/L ) की संख्या मे कमी से लगाया जाता है . चिकनगुनिया में WBC और platelet की संख्या मे विशेष फ़र्क नही पडता.
3.   Positive Torniquet Test : Blood pressure cuff को पांच मिनटॊं तक systolic और diastolic blood pressure के बीच के अंक पर फ़ुलाये रखें . यदि प्रति स्कैवेर इंच मे दस से अधिक छॊटॆ लाल चकत्ते दिखाई दें तो जाँच का परिणाम निशिचित रुप से positive है .  

लेकिन अगर इस बार देखें तो ज्वर की प्रकृति अलग सी देखी गई है । गत वर्ष जहाँ  डॆगूं और चिकिनगुनिया का संक्रमण अधिक था वहीं इस बार मलेरिया के केस बहुतायात मे पाये गये । आम तौर से यह समझा जाता है कि होम्योपैथी चिकित्सा पद्दति सिर्फ़ लक्ष्णॊं पर आधारित चिकित्सा पद्द्ति है और उसमे डाइगोनिसस का विशेष स्थान नही है । लेकिन यह सच नही है , विशेषकर एक्यूट रोगों मे डाइगोसिस आधारित चिकित्सा दवा के सेलेकशन मे मदद करती है और व्यर्थ  का कनफ़्यूजन  नही खडा करती । एक्यूट रोगों मे सेलेक्शन के विकल्प कई हैं ( नीचे देखें ) , इनमें क्लासिकल होम्योपैथी भी है , काम्बीनेशन  भी , मदर टिन्चर भी , क्या सही या या क्या गलत यह पूर्ण्तया चिकित्सक के विवेक पर निर्भर है , लेकिन अगर लक्षण स्पष्ट हों तो क्लासिकल को पहली पंसद बनायें नही तो और तरीके तो हैं ही 🙂

एक्यूट रोगों में सेलेकशन के विकल्प :

१. disease specific औषधियाँ:

specifics का रोल न होते हुये भी इस सच को नजरांदाज करना असंभव है कि कई एक्यूट रोगों मे इलाज disease specific ही होता है जैसे टाइफ़ायड मे baptisia , Echinacea , infective hepatitis में chelidonium , kalmegh  , Dengue  मे eup perf  , acute diarrhoea मे alstonia , cyanodon , आम वाइरल बुखार में Euclayptus  ,Canchalgua ,  मलेरिया के लिये  विभिन्न एर्टेमिसिआ (कोम्पोसिटी) प्रजातियां जैसे कि एर्टेमिसिआ एब्रोटनुम (एब्रोटनुम), एक मारिटिमा (सिना), एक एब्सिनठिअम (एब्सिनठिअम) , chinum sulph, china , china ars आदि ।

२. सम्पूर्ण लक्षण के आधार पर: (Totality of symptoms )

अक्सर होमियोपैथी चिकित्सा नीचे लिखे गए लक्षणो को ध्यान में रखकर दी जाती है –

  • ठंड और बुखार के प्रकट होने का समय
  • शरीर का वह भाग, जहां से ठंड की शुरूआत हुई और बढी।
  • ठंड या बुखार की अवधि
  • ठंड, गर्म और पसीना आने के चरणों की क्रमानुसार वृद्धि
  • प्यास/ प्यास लगना/ प्यास की मात्रा/ अधिकतम परेशानी का समय
  • सिरदर्द का प्रकार और उसका स्थान
  • यह जानना कि लक्षणों के साथ साथ जी मतलाना/ उल्टी आना/ या दस्त जुडा हुआ है या नहीं।

३. NWS ( Never well since ) :

अगर रोग का कारण specific हो जैसे रोगी का बारिश के पानी मे भीगना ( Rhus tox ) , दिन गर्म लेकिन रातें ठंडी ( Dulcamara ), ठंडी हवा लगने से (aconite ), अपच खाना खाने से ( antim crud , pulsatilla आदि )

४. रोगी की गतिविधि ( Activity ) , ठंडक और गर्मी से सहिषुण्ता/असहिषुणता ( Thermal  ), प्यास (Thirst )और मानसिक लक्षण में  बदलाव ( changes in mental attitude of the patient ) ;

डां प्रफ़ुल्ल विजयरकर का यह वर्गीकरण एक्यूट रोगों में संभवत: दवा सेलेकशन का सबसे अधिक कारगर तरीका है । लेकिन यह सिर्फ़ एक्यूट इन्फ़ेशन के लिये ही है , जैसा नीचे दिये चार्ट १ से स्पष्ट है कि यह indispositions और Acute Exacerbations of Chronic diseases  मे इसका कोई रोल नही है । प्रफ़ुल्ल के सूत्र आसान है , गणित की गणनाओं की तरह , रोग के दौरान रोगी की गतिविधि ( decreased , increased or no change ) , ठंडक और गर्मी से सहिषुण्ता/असहिषुणता ( Thermal : chilly / hot ) ,  प्यास (Thirst ( increased or decreased )  और मानसिक लक्षण में  बदलाव ( changes in mental attitude of the patient : diligent or non diligent ) पर गौर करें , और यह तब संभव है जब मैटेरिया मैडिका पर पकद मजबूत हो । उदाहारणत: एक रोगी जो तेज बुखार की हालत में सुस्त और ठंडक को सहन नही कर पा रहा है , प्यास बिल्कुल भी नही है और आस पास के वातावरण मे उसका intrest बिल्कुल् भी  नही है , उसका सूत्र  DCTL   (Axis : Dull +Chilly+thirstless ) होगा । इस ग्रुप में Sepia ,Gels ,Ac. Phos ,Ignatia ,Staph ,Ipecac ,Nat-Carb ,China  प्रमुख औषधियाँ हैं , चूँकि स्वभावत: वह किसी भी कार्य को करने मे अरुचि दिखा रहा है इस ग्रेड मे सीपिया प्रमुख औषधि होगी । जो चिकित्सक प्रफ़ुल्ल का अनुकरण करते हैं वह अच्छी तरह से जानते हैं कि उनके सूत्र कितने प्रभावी हैं ।

DCTL   (Axis : Dull +Chilly+thirstless )
4)Sepia 5)Gels 6)Ac. Phos 7)Ignatia 8)Staph 9)Ipecac 10)Nat-Carb 11)China

DCT (Axis : Dull+chilly+thirsty)
12)Nux-vom 13)Eup-per 14)Phos 15)Calc-c 16)Bell 17)China 18)Silicea 19)Hyos

DHTL (Axis : Dull+hot+thirstless)
20)Puls 21)Bry 22)Apis 23)Lach 24)Sulph 25)Lyc 26)Thuja 27)Opium 28)Carbo-v

DHT ( Axis : Dull+hot+thirsty)
29)Bry 30)Nat. Mur 31)Sulph 32)Lyc 33)    Merc. S. 34)Apis   

विस्तार से यहाँ बताना संभव नही है लेकिन अधिक जानकारी के लिये यहाँ और यहाँ देखें ।


                           चित्र १ : Dr Praful Vijayakar’s Acute system :

            साभार : http://www.hompath.com/VFeatures.html



S. No Acute Infection  Indisposition Acute Exacerbations of Chronic disease
1 Viral  fevers, Influenza, tonsilitis ,Sore Throat, Typhoid,  Pneumonia, Pneumonitis, Lung Abscess , Septicaemia, Food poisoning,Infective diarrhoea, Dysentry,Urinary tract colics,  Pleurisy. Treatment not required




                 ्चित्र २

flow chart of acute cases

                                                  चित्र३ ( Flow chart of Acutes by Dr Praful Vijarkar )


                                      चित्र ४ साभार : http://www.hompath.com/VFeatures.html


किसी भी एक्यूट केस और विशेषकर संक्रमण रोगों मे हैनिमैन द्वारा प्रतिपादित आर्गेनान के तीन सूत्र  १०० -१०२ को पढने  से हैनिमैन की विचारधारा का स्पष्ट मूलाकंन किया जा सकता है । यह भी अजीब इत्फ़ाक है कि जिस आर्गेनान को डिग्री लेने के लिये सिर्फ़ पढा जाता हो उसका सही मूल्याकंन प्रैक्टिस के दौरान अधिक बेहतर तरीके से किया जा सकता है । 🙂

हैनिमैन लिखते है :


सूत्र १०० – महामारी और संक्रामक रोगों का उपचार

महामारी और बडे पैमाने पर फ़ैलने वाले संक्रामक रोगों की चिकित्सा करने के सिलसिले मे चिकित्सक को इस जाँच पडताल के चक्कर मे नहीं पडना चाहिये कि उस नाम की या उस प्रकार की बीमारी का प्रकोप पहले हो चुका है या नही । इस प्रकार की जिज्ञासा व्यर्थ है क्योंकि उस जानकारी को आधार बना कर वर्तमान महामारी या रोग की चिकित्सा करना जरुरी नही । चिकित्सक को तो उसे एक नया रोग मान लेना चाहिये और यही मानकर उसे रोग का सम्पूर्ण चित्र अपने मस्तिष्क मे बैठाने का प्रयास करना चाहिये । इसी प्रकार किसी भी औषधि  का  वैज्ञानिक आधार करने के लिये यह जरुरी है कि वह उस औषधि को जाने और भली भाँति परीक्षण कर ले । चिकित्सक को अपने मन मे यह धारण कभी भी न बन्ननी चाहिये कि रोग बहुत कुछ पिछ्ले रोग से मिलता हुआ है तथा रोगी मे लगभग वही लक्षण विधमान है जो पहले किसी रोग मे हो चुके हों । यदि चिकित्सक सावधानी से रोगी का परीक्षण करेगे तो यह पायेगे कि कि यह नई माहमारी पिछली माहमारी से सर्वथा भिन्न्न है और लोगों ने भ्रम वश उसे एक ही नाम दिया है । यह भिन्नता संक्रामक रोगों के अतिरिक्त बडे पैमाने पर होने वाले अन्य रोगों मे भी पायी जाती है । परन्तु खसरा , चेचक आदि संक्रामक रोगों पर यह नियम नही लागू होता ।

§ 100

In investigating the totality of the symptoms of epidemic and sporadic diseases it is quite immaterial whether or not something similar has ever appeared in the world before under the same or any other name. The novelty or peculiarity of a disease of that kind makes no difference either in the mode of examining or of treating it, as the physician must any way regard to pure picture of every prevailing disease as if it were something new and unknown, and investigate it thoroughly for itself, if he desire to practice medicine in a real and radical manner, never substituting conjecture for actual observation, never taking for granted that the case of disease before him is already wholly or partially known, but always carefully examining it in all its phases; and this mode of procedure is all the more requisite in such cases, as a careful examination will show that every prevailing disease is in many respects a phenomenon of a unique character, differing vastly from all previous epidemics, to which certain names have been falsely applied – with the exception of those epidemics resulting from a contagious principle that always remains the same, such as smallpox, measles, etc.

सूत्र १०१- महामारी का निदान

बहुधा ऐसा होता है कि चिकित्सक किसी संक्रामक रोग से पीडित व्यक्ति  को पहली बार देखने पर समझ न पाये । लेकिन उसी प्रकार के कई रोगियों को देखने के बाद चिकित्सक को रोग के सभी लक्षण और चिन्ह याद हो जायेगें । यदि चिकित्सक  तीक्ष्ण निरीक्षण वाला है तो एक या दो रोगी को देखने के बाद ही रोग के लक्षण उसके मन मे अंकित हो जायेगें और अपनी इस  जानकारी के आधार पर वह सामान लक्षण वाली दवा का चुनाव कर सकेगा ।

§ 101

It may easily happen that in the first case of an epidemic disease that presents itself to the physician’s notice he does not at once obtain a knowledge of its complete picture, as it is only by a close observation of several cases of every such collective disease that he can become conversant with the totality of its signs and symptoms. The carefully observing physician can, however, from the examination of even the first and second patients, often arrive so nearly at a knowledge of the true state as to have in his mind a characteristic portrait of it, and even to succeed in finding a suitable, homoeopathically adapted remedy for it.

सूत्र १०२ – माहामारियों के ल्क्षण

महामारियों से पीडित रोगियों के लक्षण  लिखते-२ चिकित्सकों के मस्तिष्क मे रोग का चित्र और भी अधिक स्पष्टता से उभर आता है । इस प्रकार लिखे गये विवरण से रोग की और ही विशेषतायें उभर कर आ जाती हैं परन्तु इसके साथ ही कुछ लक्षण ऐसे भी प्रकाश मे आते हैं जो केवल कुछ रोगियों मे प्रकट होते हैं और सभी रोगियों मे नही पाये जाते । अत: विभिन्न प्रकृति के अनेक रोगियों को देख कर रोग की यथार्थ जानकरी प्राप्त की जा सकती है ।

§ 102

In the course of writing down the symptoms of several cases of this kind the sketch of the disease picture becomes ever more and more complete, not more spun out and verbose, but more significant (more characteristic), and including more of the peculiarities of this collective disease; on the one hand, the general symptoms (e.g., loss of appetite, sleeplessness, etc.) become precisely defined as to their peculiarities; and on the other, the more marked and special symptoms which are peculiar to but few diseases and of rarer occurrence, at least in the same combination, become prominent and constitute what is characteristic of this malady.1 All those affected with the disease prevailing at a given time have certainly contracted it from one and the same source and hence are suffering from the same disease; but the whole extent of such an epidemic disease and the totality of its symptoms (the knowledge whereof, which is essential for enabling us to choose the most suitable homoeopathic remedy for this array of symptoms, is obtained by a complete survey of the morbid picture) cannot be learned from one single patient, but is only to be perfectly deduced (abstracted) and ascertained from the sufferings of several patients of different constitutions.

आर्गेनान के इन तीन सूत्रॊं को पढने के बाद हैनिमैन के “Genus Epidemics ‘ की परीभाषा को आसानी से समझा जा सकता है । संक्रामक रोगों मे एक ही सत्र मे चुनी गई औषधि जो कई रोगियों मे व्याप्त लक्षणॊं को कवर करती है  , जीनस इपीडिमिकस कहलाती है । यही कारण था कि पिछ्ले कई महामरियों मे होम्योपैथिक दवाओं ने अपना सर्वष्रेष्ठ असर दिखलाया ।

पूरक और वैकल्पिक चिकित्सा पद्दतियों और पशु होम्योपैथिक चिकित्सा के पहले डॆटाबेस का शुभारंभ (Launch of CAM Quest Database & Homeopathic Veterinary Database (VetCR))

जर्मनी में हाल ही में Carstens फाउंडेशन ने सीएएम में एक उत्कृष्ट क्लीकिल रिसर्च का ऑनलाइन डेटाबेस शुरू किया है. एक्यूपंक्चर, anthroposophic चिकित्सा, आयुर्वेद, bioenergetics, हर्बल चिकित्सा, होम्योपैथी, मैनुअल चिकित्सा, मन शरीर चिकित्सा और TCM: नौ विभिन्न उपचारोंको को इस अध्ययन मे शामिल किया गया है.
इस डेटाबेस मे जर्मनी  मे होम्योपैथिक केसों की रिपोर्ट की एक बड़ी संख्या शामिल है .वर्तमान में  यह डेटाबेस अंग्रेजी और फ्रेंच में उपलब्ध है,  लेकिन आगे  अन्य यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद करने की योजना है.  इस साइट पर जाने के लिये  http://www.cam-quest.org&nbsp; पर किल्क करें .
पहला होम्योपैथिक पशु चिकित्सा डेटाबेस (VetCR)
पशु चिकित्सा होम्योपैथी के मामले में नैदानिक ​​अनुसंधान के पहले डेटाबेस अब ऑनलाइन उपलब्ध है. मूल पशु चिकित्सा के अध्ययन पर सभी उपलब्ध साहित्य , यादृच्छिक चिकित्सीय परीक्षण, गैर यादृच्छिक चिकित्सीय परीक्षण, पर्यवेक्षणीय अध्ययन, औषधि की प्रूविगं इस साईट पर सुलभता से उपलब्ध है . इस साईट पर जाने के लिये http://www.carstens-stiftung.de/clinresvet/index.php प्रर किल्क करें .

Launch of CAM-QuestDatabase
The Carstens Foundation in Germany has recently launched an excellent online database of clinica lresearch in CAM. Studies in nine different therapies have been included: acupuncture, anthroposophic medicine, ayurveda, bioenergetics, herbal medicine, homeopathy, manual medicine, mind-body medicine and TCM.
The database includes a large number of German homeopathic case reports and provides the facility to perform searches by disease, therapy and study design. The ‘quick search’ function provides a synopsis of studies using the most common therapies for the most common diseases whilst the ‘expert search’ function enables a detailed, comprehensive search across the CAM therapies and full range of diseases within the database.
At present the database is available in English, French, Dutch and German, but there are plans to translate it into all European languages. It is accessible free of charge at  http://www.cam-quest.org
First Homeopathic Veterinary Database (VetCR)
The first database of clinical research in veterinary homeopathy is now accessible online. Containing all available literature on original veterinary studies it provides access to approximately 200 entries of randomised clinical trials, non-randomised clinical trials, observational studies, drug provings, case reports and case series.
Produced by the Carstens Foundation, the database is freely available at [ http://www.carstens-stiftung.de/clinresvet/index.php

Immunology and Homeopathy ( होम्योपैथिक औषधियों की प्रतिरक्षण प्रणाली मे भूमिका )

होम्योपैथी दवाओं की शरीर की प्रतिरक्षण प्रणाली मे क्या भूमिका है , इस संदर्भ मे शोध पत्र हाल ही में आक्सफ़ोर्ड जर्नल मे प्रकाशित हुआ । यह शोध ईटली के department of medicine और sciences  के पौलो बेलवेटी , अनीता कम्फ़ोर्टी और रिचर्ड ओरटॊनी के तत्वधान मे हुआ । ४ भागों मे प्रकाशित यह शोध पत्र होम्योपैथी का इतिहास ,उच्च शक्ति की होम्योपैथिक औष्धियों ( आवोग्रादो सीमा के बाहर ) की  प्रतिरक्षण प्रणाली की सूक्ष्म कोशिकायें पर कार्य , होम्योपैथी दवाओं की पशुओं और पौधों  पर कार्य  और  नैदानिक (clinical ) परीक्षणॊं मे होम्योपैथिक की भूमिका पर प्रकाश डालता हुआ है । संबधित शोध पत्रों को डाउनलोड करने के लिये नीचे दिये लिंक पर चटका लगायें ।

Immunology and Homeopathy. 1. Historical Background  

Immunology and Homeopathy. 2. Cells of the Immune System and Inflammation                                                                       

Immunology and Homeopathy. 3. Experimental Studies on :
Animal Models

Immunology and Homeopathy. 4. Clinical Studies—Part 1 

Immunology and Homeopathy. 4. Clinical Studies—Part 2

Immunology and Homeopathy. 5. The Rationale of the ‘Simile’

Download Link : http://www.box.net/shared/j0d15xxfui

Immunology and Homeopathy. 1. Historical Background
Paolo Bellavite1
, Anita Conforti
, Valeria Piasere1
and Riccardo Ortolani
Department of Scienze Morfologico-Biomediche,
Department of Medicina e Sanita ` Pubblica and
Association for Integrative Medicine ‘Giovanni Scolaro’, University of Verona, Piazza L.A. Scuro,
37134 Verona, Italy
Homeopathy was born as an experimental discipline, as can be seen from the enormous amount of
homeopathic data collected over more than two centuries. However, the medical tradition of homeo-
pathy has been separated from that of conventional science for a long time. Conventional scientific wis-
dom dictates that homeopathy should have no effect above placebo but experiments on ultra-high
dilutions of solutes together with some clinical data suggest the intriguing possibility that it might do
in some circumstances. Today, an osmotic process between disciplines, previously seen as in conflict,
is facilitated because over the last few decades homeopathy has initiated the methods of current medical
science and a substantial number of experimental studies—at molecular, cellular and clinical levels—are
available. One area of dialogue and of common progress is that of inflammation and immunity, probably
because these are closely related to the traditional ‘vital force’ of the body’s self-healing power. In a
series of papers we review the historical origins of homeopathy, the laboratory and animal models
related to the field of immunopharmacology, the clinical evidence in favor and against the use of homeo-
pathy in the inflammatory diseases and the hypotheses regarding its action mechanism(s). Finally, we
will enlighten the specific characteristics of the homeopathic approach, which places great emphasis
on identifying a cure for the whole organism.
Keywords: Hahnemann – Hippocrates – history of medicine – homeopathy – immunotherapy –
isotherapy – nosodes – Paracelsus – similia principle

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Immunology and Homeopathy. 2. Cells of the Immune System
and Inflammation
Paolo Bellavite1
, Anita Conforti
, Francesco Pontarollo1
and Riccardo Ortolani
Department of Scienze Morfologico-Biomediche,
Department of Medicina e Sanita ` Pubblica and 3
for Integrative Medicine ‘Giovanni Scolaro’, University of Verona, Piazza L.A. Scuro, 37134 Verona, Italy
Here we describe the results of some experimental laboratory studies aimed at verifying the efficacy of
high dilutions of substances and of homeopathic medicines in models of inflammation and immunity.
Studies carried out on basophils, lymphocytes, granulocytes and fibroblasts are reviewed. This approach
may help to test under controlled conditions the main principles of homeopathy such as ‘similarity’ of
drug action at the cellular level and the effects of dilution/dynamization on the drug activity. The current
situation is that few and rather small groups are working on laboratory models for homeopathy. Regard-
ing the interpretation of data in view of the simile principle, we observe that there are different levels of
similarity and that the laboratory data give support to this principle, but have not yet yielded the ultimate
answer to the action mechanism of homeopathy. Evidence of the biological activity in vitro of highly
diluted-dynamized solutions is slowly accumulating, with some conflicting reports. It is our hope that
this review of literature unknown to most people will give an original and useful insight into the
‘state-of-the-art’ of homeopathy, without final conclusions ‘for’ or ‘against’ this modality. This kind
of uncertainty may be difficult to accept, but is conceivably the most open-minded position now.
Keywords: in vitro test – laboratory models – homeopathy – high-dilution – immune system –
basophils – granulocytes – lymphocytes – similia principle

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Immunology and Homeopathy. 3. Experimental Studies on
Animal Models
Paolo Bellavite1
, Riccardo Ortolani
and Anita Conforti
Department of Scienze Morfologico-Biomediche,
Association for Integrative Medicine ‘‘Giovanni Scolaro’’ and
Department of Medicina e Sanita ` Pubblica, University of Verona, Piazza L.A. Scuro, 37134 Verona, Italy
A search of the literature and the experiments carried out by the authors of this review show that there are
a number of animal models where the effect of homeopathic dilutions or the principles of homeopathic
medicine have been tested. The results relate to the immunostimulation by ultralow doses of antigens,
the immunological models of the ‘simile’, the regulation of acute or chronic inflammatory processes
and the use of homeopathic medicines in farming. The models utilized by different research groups
are extremely etherogeneous and differ as the test medicines, the dilutions and the outcomes are
concerned. Some experimental lines, particularly those utilizing mice models of immunomodulation
and anti-inflammatory effects of homeopathic complex formulations, give support to a real effect of
homeopathic high dilutions in animals, but often these data are of preliminary nature and have not
been independently replicated. The evidence emerging from animal models is supporting the traditional
‘simile’ rule, according to which ultralow doses of compounds, that in high doses are pathogenic, may
have paradoxically a protective or curative effect. Despite a few encouraging observational studies,
the effectiveness of the homeopathic prevention or therapy of infections in veterinary medicine is not
sufficiently supported by randomized and controlled trials.
Keywords: homeopathy – immunology – animal models – veterinary homeopathy – similia principle –
ultra-high dilutions – isopathy – homeopathic complexes – paradoxical pharmacology

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Immunology and Homeopathy. 4. Clinical Studies—Part 1
Paolo Bellavite1
, Riccardo Ortolani
, Francesco Pontarollo1
, Valeria Piasere1
Giovanni Benato2
and Anita Conforti
Department of Scienze Morfologico-Biomediche,
Association for Integrative Medicine ‘Giovanni Scolaro’ and
Department of Medicina e Sanita ` Pubblica, University of Verona, Piazza L.A. Scuro, 37134 Verona, Italy
The evidence-based research of the effectiveness of homeopathic medicines in common immunologic
disorders is reviewed. In part 1, we introduce methodological issues of clinical research in homeopathy,
and criteria utilized to evaluate the literature. Then 24 studies (12 randomized and 12 non-randomized)
on common upper respiratory tract infections and otorhinolaryngologic complaints are described. In part
2, the focus will be on allergic diseases and the effectiveness of homeopathy will be globally evaluated
and discussed using the criteria of evidence-based medicine.
Keywords: evidence-based homeopathy – homeopathy – homeopatic medications – immunology –
otitis – sinusitis – stomatitis – upper respiratory tract infections

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Immunology and Homeopathy. 4. Clinical Studies—Part 2

Paolo Bellavite1
, Riccardo Ortolani
, Francesco Pontarollo1
, Valeria Piasere1
Giovanni Benato2
and Anita Conforti
Department of Scienze Morfologico-Biomediche,
Association for Integrative Medicine ‘Giovanni Scolaro’ and
Department of Medicina e Sanita ` Pubblica, University of Verona, Piazza L.A. Scuro, 37134 Verona, Italy
The clinical studies on the effectiveness of homeopathy in respiratory allergy (18 randomized trials
and 9 observational studies) are described. The literature of common immunologic disorders including
also upper respiratory tract infections (URTI) and otorhinolaryngology (reported in part 1), is evaluated
and discussed. Most of initial evidence-based research was addressed to the question of whether
homeopathic high dilutions are placebos or possess specific effects, but this question has been often
equivocal and is still a matter of debate. The evidence demonstrates that in some conditions homeopathy
shows significant promise, e.g. Galphimia glauca (low dilutions/potencies) in allergic oculorhinitis,
classical individualized homeopathy in otitis and possibly in asthma and allergic complaints, and a few
low-potency homeopathic complexes in sinusitis and rhinoconjunctivitis. A general weakness of
evidence derives from lack of independent confirmation of reported trials and from presence of
conflicting results, as in case of homeopathic immunotherapy and of classical homeopathy for URTI.
The suitable methods to evaluate homeopathy effectiveness, without altering the setting of cure, are also
Keywords: allergy – asthma – evidence-based homeopathy – homeopathic immunotherapy –
homeopathic medications – homeopathy – immunology – isopathy – rhinoconjunctivitis

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Immunology and Homeopathy. 5. The Rationale of the ‘Simile’

Paolo Bellavite1
, Riccardo Ortolani
, Francesco Pontarollo1
, Giuseppina Pitari
and Anita Conforti
Department of Scienze Morfologico-Biomediche, University of Verona, Piazza L. A. Scuro, 37134 Verona,
Association for Integrative Medicine ‘Giovanni Scolaro’,
Department of Basic and Applied Biology,
University of L’Aquila and 4
Department of Medicina e Sanita ` Pubblica, University of Verona, Italy
The foundation of homeopathic medicine is the ‘Similia Principle’, also known as the ‘Principle
of Similarity’ or also as the ‘Simile’, which reflects the inversion of pharmacological effects in
healthy subjects as compared with sick ones. This article describes the inversion of effects, a
widespread medical phenomenon, through three possible mechanisms: non-linearity of dose–
response relationship, different initial pathophysiological states of the organism, and
pharmacodynamics of body response to the medicine. Based on the systemic networks which
play an important role in response to stress, a unitary and general model is designed:
homeopathic medicines could interact with sensitive (primed) regulation systems through
complex information, which simulate the disorders of natural disease. Reorganization of
regulation systems, through a coherent response to the medicine, could pave the way to the
healing of the cellular, tissue and neuro-immuno-endocrine homeodynamics. Preliminary
evidence is suggesting that even ultra-low doses and high-dilutions of drugs may incorporate
structural or frequency information and interact with chaotic dynamics and physical-
electromagnetic levels of regulation. From the clinical standpoint, the ‘simile’ can be regarded
as a heuristic principle, according to which the detailed knowledge of pathogenic effects of
drugs, associated with careful analysis of signs and symptoms of the ill subject, could assist
in identifying homeopathic remedies with high grade of specificity for the individual case.

Keywords: action–reaction principle – biologic networks – homeopathic medicine – hormesis –
inverse effects – paradoxical pharmacology – response to stress – self-organization – Similia
principle –Wilder’s rule

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