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होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा और एवोगेड्रो ( Avogadro’s ) की संख्या – क्या एवोगेड्रो की संख्या से होम्योपैथी का मूल्याकंन करना उचित है ?

homeopathy explained

होम्योपैथिक औषधियों के विरोध के प्रमुख कारणॊं मे एक प्रमुख कारण होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा   है । होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा को विस्तार मे समझने के लिये औषधि निर्माण की प्रक्रिया को समझना पडेगा । होम्योपैथिक औषधियों मे प्राय: दो प्रकार के स्केल प्रयोग किये जाते हैं ।

क) डेसीमल स्केल ( Decimal Scale )

ख) सेन्टीसमल स्केल ( Centesimal Scale )

क) डेसीमल स्केल मे दवा के एक भाग को vehicle ( शुगर आग मिल्क ) के नौ भाग से एक घंटॆ तक कई चरणॊं मे विचूर्णन ( triturate ) किया जाता है । इनसे बनने वाली औषधियों को X शब्द से जाना जाता है जैसे काली फ़ास 6x इत्यादि । 1X  बनाने के लिये दवा का एक भाग और दुग्ध-शर्करा का ९ भाग लेते हैं , 2X के लिये 1X का एक भाग और ९ भाग दिग्ध शर्करा का लेते हैं ; ऐसे ही आगे कई पोटेन्सी बनाने के लिये पिछली पोटेन्सी का एक भाग लेते हुये आगे की पावर को बढाते हैं । डेसीमल स्केल का प्रयोग ठॊस पदार्थॊं के लिये किया जाता है ।

ख) सेन्टीसमल स्केल मे दवा के एक भाग को vehicle ( एलकोहल) के ९९ भाग से सक्शन किया जाता है । इनकी इनसे बनने वाली औषधियों को दवा की शक्ति या पावर से जाना जाता है । जैसे ३०, २०० १००० आदि ।

सक्शन सिर्फ़ दवा के मूल अर्क को एल्कोहल मे मिलाना भर नही है बल्कि उसे सक्शन ( एक निशचित विधि से स्ट्रोक देना )  करना है । आजकल सक्शन के लिये स्वचालित मशीन का प्रयोग किया जाता है जब कि पुराने समय मे यह स्वंय ही बना सकते थे । पहली पोटेन्सी बनाने के लिये दवा के मूल अर्क का एक हिस्सा और ९९ भाग अल्कोहल लिया जाता है , इसको १० बार सक्शन कर के पहली पोटेन्सी तैयार होती है ; इसी तरह दूसरी पोटेन्सी के लिये पिछली पोटेन्सी का एक भाग और ९९ भाग अल्कोहल ; इसी तरह आगे की पोटेन्सी तैयार की जाती हैं ।

विरोध का मूल कारण और एवोगेड्रो ( Avogadro’s  ) की परिकल्पना

रसायन विज्ञान के नियम के अनुसार किसी भी वस्तु को तनु करने की एक परिसीमा है और इस परिसीमा मे रहते हुये यह आवशयक है कि उस तत्व का मूल स्वरुप बरकरार रहे । यह परिसीमा आवोग्राद्रो की संख्या ( 6.022 141 99 X 1023 ) से संबधित है जो होम्योपैथिक पोटेन्सी 12 C से या 24 x से मेल खाता है । यानि आम भाषा मे समझें तो होम्योपैथिक दवाओं की १२ वीं पोटेन्सी और 24 X पोटेन्सी मे दवा के तत्व विधमान रहते हैं उसके बाद नही । होम्योपैथिक के विरोधियों के हाथ यह एक तुरुप का पत्ता था और जाहिर है उन्होने इसको खूब भुनाया भी ।

यह बिल्कुल सत्य है कि रसायन शास्त्र के अनुसार होम्योपैथी समझ से बिल्कुल परे है । लेकिन पिछले २४ वर्षों  मे १८० नियंत्रित ( controlled ) और ११८  यादृच्छिक ( randomized )  परीक्षणों को अलग -२ ४ मेटा तरीकों  से होम्योपैथी का विश्लेषण करने के उपरांत प्रत्येक मामले में  शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि होम्योपैथी दवाओं से मिलने वाले परिणाम प्लीसीबो से बढ कर हैं ।

होम्योपैथी के संबध मे प्राथमिक प्रशन उभरता है कि क्या सक्शन ( succession ) किये गये SAD ( serially agitated dilutes )  को तरल वाहनों जैसे एल्कोहल या जल  ( liquid vehicles e.g. alcohol , water etc )  से अलग कर के पहचान की जा सकती है जो होम्योपैथिक औषधि के रुप मे उपचार के लिये प्रयोग किये जाते हैं । हाँलाकि इससे प्लीसीबो के आरोपों से मुक्ति नही पा जा सकती लेकिन इससे पता अवशय चलता है कि हर औषधि की अपनी विशेषता क्या है ।

एक सदी से  मेडिकल साहित्य की समीक्षा करने से पता चलता है कि ऐसे कई रिपोर्ट उपलब्ध हैं जिससे यह पहचान की जा सकती है कि इन उच्च  potentised  dilutes का प्रभाव जीवाणु , प्राणि विषयों , वनस्पति और यहाँ तक कि जन्तुओं पर भी असरदारक है । इनके लिये भौतिकी और बायोकेमिस्ट्री दोनों का ही समय-२ पर प्रमाण स्वरुप सहायता ली गई । हाँलाकि इन रिपोर्टों से SAD की आणविक संरचना समझ मे नही आती लेकिन यह बिल्कुल तय है कि यह SAD  तरल वाहनों ( liquid vehicles ) से हटकर हैं ।

इस विषय पर पहल्रे भी चर्चा हो चुकी है । देखें होम्योपैथी -तथ्य एवं भ्रान्तियाँ ” प्रमाणित विज्ञान या केवल मीठी गोलियाँ “( Is Homeopathy a trusted science or a placebo )  लेकिन नवीनतम शोघॊं मे  रसायन शास्त्री श्री बिपलब चक्र्वर्ती और डा. मो. रुहल अमीन के शोध होम्योपैथी औषधियों और एवोगेड्रो  संख्या पर प्रकाश डालने वाले हैं । उनके ब्लाग http://www.aminchakraborty.blogspot.in/  नवीन संभवनाओं को जन्म देता है । बिपलब चक्र्वती एक समय होम्योपैथिक के बडे आलोचक रहे हैं  लेकिन पिछ्ले १० सालॊ से बिपलब और डा. अमीन होम्योपिथिक दवाओं के सांइनटैफ़िक पहलू पर कार्य कर रहे हैं । आपके कई शोध पत्र विभिन्न शोध संस्थानों द्वारा सराहे गये है ।

आवाग्रादो की परिकल्पना और होम्योपैथी के विवाद मे अमीन लिखते है :

How and Why Avogadro’s Number does not Limit efficacy of the Homeopathic Remedies.
#       Homeopathic dilutions have been used since 1800 and remained unchallenged until determination of Avogadro’s number.
#       Homeopathic remedies were challenged only after the determination of Avogadro’s number by Millikan in 1910, a number of years after homeopathy came into use.
#       A mathematical calculation based on Avogadro’s Number led to the conclusion that homeopathic dilution must be nothing but placebo after homeopathy had already been used for 109 years !!
#       It is not proper to discount homeopathy simply on the basis of Avogadro’s number without clarifying the existing fundamental contradictions in science as detailed above.
#       In conventional medicines the molecules are believed to convey the medicinal power in the living body but in homeopathic dilutions it is not the molecules of medicine but the  electrical strain induced in the vehicle, by the  substance, that conveys the medicinal power of a substance in the living body.
#       When preparing serial homeopathic dilutions the electrical strain of the latter differs from the former dilution in regards to difference in molecular orientations of water  but cannot be determined due to non-availability of any such scientific instruments and for which the homeopathic dilution cannot be held responsible.
Source : How and why Homeopathy is Scientific

डा. रुहल अमीन और श्री बिपलब चक्रवर्ती के अन्य शोध लेखों को देखने के लिये निम्म लिंक पर जायें:

मेरी डायरी–बैच फ़्लावर रेमेडी–“ गौर्स–Gorse ”

Gorse

३८ बैच फ़्लावर औषधियों मे से मै  १२-१५  दवाओं का अकसर प्रयोग करता हूँ । अधिकतर बैच फ़्लावर औषधियों  का प्रयोग अभी किया नही है । गौर्स को प्रयोग करने का पहला अनुभव बहुत अधिक संतोषजनक रहा । १५ दिन पहले मुझे जिस रोगी को देखने जाना पडा वह मेरे  एक  साथी चिकित्सक के पिता का केस था । आयु ५६ वर्ष , पिछ्ले कई  सालो से कुवैत मे किसी अच्छी सरकारी पोस्ट पर थे । डायबीटिज थी और उच्च रक्तचाप से पीडित भी  । पहला पक्षाघात का अटैक कुवैत मे ही पडा । कुछ दिन वही अस्पताल मे रहने पर जाँचॊ द्वारा मालूम पडा कि उनकॊ Tubercular meningitis भी है । इलाज शुरु हुआ लेकिन टी.बी . पर वहाँ के चिकित्सकॊ की एक राय न बन सकी । एक पक्ष Neurocysticercosis  और दूसरा चिकित्सकों का समूह टी.बी. की डाय्गोनिसस पर विभाजित रहा । टी.बी. पर कुछ दिन इलाज चलने के बाद दूसरे पक्ष के चिकित्सकों ने टी. बी. पर इलाज बन्द कर के सीसस्टीसर्कोसिस पर इलाज शुरु किया । हाँलाकि पहले इलाज के दौरान मरीज को कुछ फ़ायदा दिख रहा था ।  इस बीच  एक राय न बनने के कारण मरीज को वापस भारत जाने के लिये कहा गया ।

रोगी की पत्नी के अनुसार लखनऊ आने पर वह बेहतर हालात मे थे । उन्होने उस समय की एयर्पोर्ट की मुझे जो फ़ोटॊ दिखाई उसमे वह काफ़ी प्रसन्नचित्त और स्वस्थ दिख रहे थे ।  लखनऊ मे भी चिकित्सकों की एक राय Tubercular meningitis  की ही बनी। फ़लस्वरुप इलाज के दौरान कुछ माह के अन्दर स्वास्थ लाभ तेज हुआ और रिकवरी पूरी तरह से दिखने लगी । लेकिन साल भर के अन्दर दूसरा अटैक फ़ालिज का पडा । और फ़िर उसके बाद वह इलाज चलने के बावजूद भी रिकवर न कर पाये । टी.बी , ब्लड शुगर और  उच्च रक्तचाप   की दवाईयाँ पहले से ही चल रही थी । और वह अब पक्षाघात ( Hemiplegia )  के लिये होम्योपैथिक राय मुझसे लेना चाहते थे ।

अधिकतर फ़ालिज ग्रस्त रोगियों मे सबसे बडी  समस्या उनके अवसादों को लेकर होती है । और यहाँ भी समस्या डिप्रेशन को लेकर ही थी । DPR ( deep plantar reflexes – Babsinki sign ) पाजीटिव दिखने के बावजूद  भी रोगी मे movements काफ़ी हद तक सामान्य थे । इन हालात को देखकर मुझे लगा कि शायद कुछ उम्मीद बन सकती है लेकिन रोगी के साथ मुख्य समस्या मानसिक अवसाद की थी । रोगी की पत्नी के अनुसार न तो वह उनको सहयोग देना चाहते थे और न ही अपने फ़िजियोथिरेपिस्ट को । रोना ,  बात –२ पर क्रोधित होना । जीबन के प्रति निराशा के भाव उनकी बातचीत से ; जो हाँलाकि पक्षाघात के कारण स्पष्ट न थी , साफ़ नजर आ रही थी ।

पहले से ही कई अति आवशयक दवायें चल रही थी और उनको बन्द करके होम्योपैथिक दवाओं को चलाने की कोई वजह नही थी । लेकिन क्या होम्योपैथिक और बैच फ़्लावर कार्य करेगी , यह अवशय संशय था । constitutional/ pathological सेलेक्शन मे से पैथोलोजिकल सेलेक्शन को अधिक मह्त्व दिया जो कि वर्तमान लक्षणॊं मे से प्रमुख थे ।

Opium LM पोटेन्सी पहली चुनाव बना  और अब बारी थी रोगी के अवसादॊ की । बैच फ़्लावर को एक बार फ़िर से अवसादों के लिये मुख्य जगह दी गई । और दवा का सेलक्शन गौर्स पर टिका | लगभग २ सप्ताह के बाद  रोगी की पत्नी और उनके घर के अन्य सद्स्यों ने रोगी की स्वास्थ की प्रगति , ( विशेषकर उनके अवसादों ) को काफ़ी अधिक संतोषजनक बताया । उनके अनुसार रोगी बेहतर हालात में है ,  प्रसन्नचित्त रहते हैं और अपने कार्यों को स्वंय करने की कोशिश करते हैं ,  जो पहले कभी न देखी गई । यह तो आगे आने वाला समय बतायेगा कि अन्य मुख्य लक्षणॊ मे कहाँ तक प्रगति आती है लेकिन Mind – Body connections मे बैच फ़्लावर के महत्व की भूमिका को  नंजर अंदाज नही किया जा सकता ।

आखिर गौर्स ने क्या कियागौर्स का मुख्य लक्षण है – पूर्ण नाउम्मीदी ( Hopelessness ) . रोगी को यह विशवास होता है कि वह अब ठीक नही हो सकता । और या तो वह चिकित्सक को बेमन से मिलता है या फ़िर मजबूरी मे । ( ऋण पक्ष ) ऐसे रोगियों को गौर्स दोबारा जिन्दगी से लडने के लिये संबल प्रदान करता है । ( धन पक्ष )

बात जब गौर्स की है तो बैच फ़्लावर दवाओं मे नाउम्मीदी ( Hopelessness ) की अन्य दवाये भी है , जैसे :

१. Gentian ( जैन्सियन) : इसमे शक और मायूसी तो होती है लेकिन नाउम्मीदी बिल्कुल नही होती ।

२. Sweet chest Nut ( स्वीट चेस्ट नट ) : इसमे पूर्ण निराशा , जैसे सब कुछ खो गया हो और बाकी कुछ रह न गया हो ।

३. Wild Rose ( वाइल्ड रोज ) : अपनी बीमारी के लिये वह अपने पिछ्ले कर्मॊ का फ़ल समझता है ।

४. गौर्स ( Gorse ) : किसी लम्बी बीमारी मे कई ईलाज कराने के बाद वह मायूस हो जाता है और अपनी उम्मीद छोड बैठता है ।

बैच फ़्लावर की कुछ विशेष खूबियाँ मुझे इस पद्द्ति की तरफ़ आकृष्ट करती हैं । जहाँ होम्योपैथिक दवाओं मे अन्य दवाओं के साथ चलाने का झमेला रहता है वही बैच को किसी भी पद्द्ति के साथ समावेशित किया जा सकता है ।

Gorse

Gorse
Scientific name: Ulex
Family Fabaceae.
Rank: Genus
Higher classification: Faboideae

Keyword – Hope | Bach Group – Uncertainty

Gorse is the remedy for those who suffer great uncertainty in the process of life, causing them to experience feelings of hopelessness and despair. This is a state sometimes found in those with a long-term illness who have lost all hope of recovery or in those whose experiences have caused them to view life ‘as a lost cause’. When this state is very deep rooted a person may have dark rings under the eyes or be prone to sigh a lot. Taken over a period of time Gorse will help to dispel these dark feelings and promote new hope and vision for the future.

Dr Bachs description of Gorse:-

“Very great hopelessness, they have given up belief that more can be
done for them. Under persuasion or to please others they may try
different treatments, at the same time assuring those around that
there is so little hope of relief”

From the Twelve Healers & Other Remedies – By Dr Edward Bach ( 1936 edition)

यह भी देखें :

सर्दियों में सीजनल एफेक्टिव डिसॉर्डर (सैड) – Seasonal Affective Disorder or Winter depression

Portrait of the beautiful thoughtful girl. Autumn, grief, dreams and tenderness.

सर्दियों के दिनों अवसाद या डिप्रेशन की एक आम समस्या है ।  अवसाद कॆ  कारणॊ के पीछे कई वजह  हो सकते हैं लेकिन अगर आप सर्दियों मे दूसरे मौसम की अपेक्षा आलस, थकान और उदासीन महसूस करते हैं तो हो सकता है कि आपको सीजनल एफेक्टिव डिसॉर्डर (सैड) की समस्या हो। सर्दियों में अक्सर दिन के समय सूर्य का प्रकाश हमें कम मिलता है जिससे कई बार हमारी दिनचर्या और सोने व उठने का चक्र प्रभावित होता है। ऐसे में हमारे मस्तिष्क में ‘सेरोटोनिन’ नामक केमिकल प्रभावित होता है जिससे हमारा मूड बिना वजह खराब ही रहता है। कई बार यह स्थिति हमें अवसाद का शिकार बना सकती है ।
सीजनल एफेक्टिव डिसॉर्डर (सैड)  का वर्णन   मेडिकल सांइस मे सबसे पहले १९८० के दशक से दिखता है हाँलाकि इसके पहले कई चिकित्सक और रोगी भी इस बात से वाकिफ़ थे कि सर्दी का मौसम शुरु होते ही स्वभाव मे बदलाव दिखना आरम्भ हो जाता है । इस तथ्य का वर्णन पांचवी सदी ईसा पूर्व हिप्पोक्रेट्स  के कुछ आलेखों मे भी देखा जा सकता है । कई देशॊ मे जहाँ दिन काफ़ी छॊटे होते है और धूप का सर्वथा अभाव रहता है वहाँ अवसाद के रोगियों का मिलना एक आम समस्या है । जैसे स्वीडेन के उत्तर  भाग मे जहाँ छ्ह महीने रात और छ्ह महीने दिन रहता है वहाँ आत्मह्त्या की दर सबसे अधिक है ।

SAD के बारे मे कुछ तथ्य

  • कोई आवशयक नही कि ठंड मे रहने वाले लोगों को ही यह समस्या हो , जो लोग उन जगहों पर रहते हैं जहां ठंड कम पड़ती हो और बहुत अधिक ठंड वाले इलाके में आ जाएं।
  • महिलाओं में इस बीमारी की आशंका अधिक रहती है।
  • 15 से 55 वर्ष की आयु वाले लोगों में इसकी आशंका अधिक रहती है।
    सीजनल एफेक्टिव डिसॉर्डर से पीड़ित व्यक्ति के बहुत अधिक संपर्क में रहने वाले व्यक्ति को भी यह बीमारी हो सकती है।

SAD के लक्षण

  • लगातार थकान महसूस हो और रोजमर्रा के कामो मे मन न लगे ।
  • मन मे नकारात्मक विचारों का बार बार आना ।
  • सही प्रकार नींद न आना या बहुत अधिक नींद आना ।
  • कार्बोहाइड्रेट युक्त चीजों जैसे रोटी, ब्रेड या पास्ता आदि खाने का हमेशा मन करना ।
  • वजन का तेजी से बढना ।

SAD से बचने के उपाय :

  • अपनी दिनचर्या निर्धारित करे ।
  • रोजाना योग , ध्यान , मार्निग वाक और एक्सर्साइज करें ।
  • थोडा खायें और बार –२ खायें लेकिन खाने मे हरी सब्जियों और फ़लों का सेवन अधिक करें ।
  • सुबह देर तक न सोयें ।
  • सर्दियों मे संभव हो तो दोपह्र का खाना धूप मे खायॆ ।
  • इतवार को और अधिक खुशगवार बनायें ,  धूप का आंनद लेने के किसी पार्क मे जायें ।
  • अगर घर मे ही काम करना पडे तो कोशिश करे कि ऐसी खिडकी के पास अपनी टॆबल रखें जहाँ प्रचुर मात्रा मे धूप उपलब्ध हो ।

मेडिकल उपचार
आमतौर पर डॉक्टर सैड के मरीजों का उपचार दो तरह की लाइट थेरेपी से करते हैं- ब्राइट लाइट ट्रीटमेंट और डॉन सिमुलेशन। ब्राइट लाइट ट्रीटमेंट के तहत रोगी को लाइटबॉक्स के सामने रोज सुबह आधे घंटे तक बैठाया जाता है।
दूसरी विधि में सुबह सोते वक्त रोगी के पास धीमी लाइट जलाई जाती है जो धीरे-धीरे तेज होती जाती है। सूर्योदय जैसा वातावरण तैयार किया जाता है। इसके अलावा योग, अवसाद हटाने वाली दवाओं और कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी से भी इस बीमारी का उपचार किया जाता है।

होम्योपैथिक उपचार

SAD के रोगियों को देखने के दौरान निम्म रुब्रिक्स  जो बहुतायात रोगियों मे पाये जाते है  :

  • *Sadness, melancholy
  • *Feelings of worthlessness
  • *Hopeless
  • *Despair
  • *Sleepiness
  • *Lethargy
  • *Craving for sweets
  • *Craving for carbohydrates
  • *Company aggravates
  • *Desire to be alone
  • *Music ameliorates
  • *Difficulty concentrating/focusing
  • *Thoughts of death or suicide.

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औरम मेट , फ़ास्फ़ोरस , सीपिया , रस टाक्स . इगनेशिया सर्दियों मे होने वाले अवसाद की मुख्य औषधियाँ है । हाँलाकि लक्षणॊ की सम्पूर्ण्ता ( Totallity of symptoms ) ही औषधि चुनाव का आधार है ।

लेकिन मुख्य औषधियों पर एक नजर :

Aurum metallicum is for those who sink into terrible depression in the dark of the winter feeling like the cloud is sitting over them. At their worst they feel that life isn’t worth living. They take solace in work and/or religion and hide themselves away listening to sad music until the sun returns the following spring.
Phosphorus has a really close relationship with the weather, loving the sun and sparkling with it – actually feeling invigorated by being out in the sunshine. They are deeply affected by cloudy weather – becoming miserable and gloomy the longer the sun stays away. In the deepest, darkest time of the winter they can slow right down, not wanting to do anything. Chocolate (especially chocolate ice cream) is their great source of comfort at those times – as are their friends. Even brief outbursts of sunshine on a winter’s day will lift their spirits, as can getting out with friends and going to a party or going dancing!
Rhus toxicodendron is useful for those who are particularly vulnerable to cloudy weather, who find that the cold, damp, wet and cloudy weather makes them feel just plain miserable. Their body reacts to the cloudy weather by stiffening up – especially the back and the joints – which makes them feel even worse. Getting up after sitting or lying down for a while is hard, and then continued movement eases the stiffness – unfortunately those joints start to hurt again if they are using them for a while so they have to rest – after which the whole maddening cycle starts again, thereby causing the restlessness that is a keynote for this remedy.
Sepia is for extremely chilly types who hate everything about winter: the damp, the rain, the frost, the snow, the clouds – everything. Their moods start to lift when they begin to get warm again in the late spring and early summer when they can get out in the fresh air and do some vigorous exercise. These people love to run much more than jog, and it is this kind of exercise – vigorous exercise in the fresh air – that makes them feel really well overall. If they can’t do it they sink into a depressed, irritable state where they want to be alone (and eventually, so does everyone else – want them to be alone that is!)

Homoeopathic therapy for lower urinary tract symptoms in men with Benign Prostastic Hyperplasia: An open randomized multicentric placebo controlled clinical trial

Benign Prostatic Hyperplasia (BPH) is the most common condition in ageing men, associated with Lower Urinary Tract Symptoms (LUTS). Being a cause of significant morbidity in ageing man, various observational studies were conducted by the Council with a positive outcome. This protocol has been prepared to further ascertain the usefulness of constitutional/organ remedies in LUTS for men with BPH in a randomized control setting.

Objectives: The primary objective is to compare the changes in IPSS (International Prostate Symptom Score) within the three groups enrolled for the study (Constitutional remedy/Constitutional + Organ remedy/Placebo). The secondary objectives are to compare the changes in Prostate volume, Post Void Residual Urine (PVRU), Uroflowmetry and in WHOQOL-BREF.

Material and Methods: It is an open randomized placebo controlled clinical trial. The prescription of the constitutional remedies/organ remedies/placebo is done as per the randomization chart and the selection of these remedies is done as per the guidelines laid in the Organon of Medicine. The outcome measures including IPSS (monthly), prostate volume, post void residual urine, uroflowmetry and the WHOQOL-BREF are assessed at baseline, three and six months interval.

Discussion:Results from this trial will help in constructing treatment strategy for BPH patients with lower urinary tract symptoms in improving their quality of life.

Trial Registration: Clinical Trial Registry – India: CTRI/2012/05/002649.

Keywords: Homoeopathy, Prostate, Post void residual urine, Prostate volume, Uroflowmetry

Download link : https://app.box.com/s/x2uj1sn304k867fo0exd

वर्ष 2013-14 सहित बारहवीं पंच वर्षीय योजना के दौरान आयुष विभाग की प्राथमिकताएं

वर्ष 2013-14 सहित बारहवीं पंच वर्षीय योजना के दौरान आयुष विभाग की प्राथमिकताएं

देश के कोने-कोने में प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण स्वास्थ्य के दायरे में लाना बाहरवीं पंच वर्षीय योजना की एक प्राथमिकता है। इस दौरान आयुष चिकित्सा प्रणाली की विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए उसे आधुनिक चिकित्सा प्रणालियों के साथ-साथ प्रयोग में लाया जाएगा। रोगों से बचाव, विशेष रूप से महिलाओं, बच्चों, वरिष्ठ व्यक्तियों को ध्यान में रखते हुए नॉन कम्यूनिकेबल बीमारियों में, तनाव के प्रबंधन में, मानसिक रोगों की चिकित्सा में, बीमारियों से जूझते व्यक्तियों की देखभाल में और स्वस्थ्य लाभ में आयुष का प्रयोग किया जाएगा।

बारहवीं पंच वर्षीय योजना के महत्वपूर्ण उद्देश्य : –

बाहरवीं पंच वर्षीय योजनाओं में आयुष के लिए 10,044 करोड़ रूपये का प्रावधान रखा गया है। जबकी ग्यारहवीं पंच वर्षीय योजना में केवल 2994 करोड़ रूपये ही जिन उद्देश्यों के लिए खर्च किए गए वे हैः

1. स्वास्थ्य सेवाओं में आयुष के प्रयोग को बढ़ाया गया।

2. आयुष विभाग ने आयुष की विशेषताओं को चिकित्सा, विशेषतौर पर महिलाओं बच्चों और बुजुर्गों के लिए, मानसिक बीमारियों के चिकित्सा में, तनाव के प्रबन्धन में, बीमार व्यक्तियों की देखभाल में और पुनर्वास में किया।

बारहवीं पंच वर्षीय योजना के अंतर्गत जो सुझाव दिए गए हैं उनमें इन संस्थाओं को शुरू करने की सिफारिश की गई है : –

1. होमियोपैथी मेडिसिन फार्मास्यूटिकल कंपनी लिमिटेड

2. अखिल भारतीय योग संस्थान

3. अखिल भारतीय होमियोपैथी संस्थान

4. अखिल भारतीय यूनानी चिकित्सा संस्थान

5. राष्ट्रीय सोवा रिग्पा संस्थान

6. राष्ट्रीय औषधीय पौध संस्थान

7. राष्ट्रीय आयुष पुस्तकालय और अभिलेखागार

8. केंद्रीय सोवा रिग्पा अनुसंधान परिषद

9. आयुष संबंधित राष्ट्रीय मानव संसाधन आयोग

10. आयुष के लिए केंद्रीय दवा नियंत्रक

11. आयुष औषध प्रणाली का भारतीय संस्थान

12. राष्ट्रीय जराचिकित्सा संस्थान

13. मेटाबॉलिक तथा लाइफ-स्टाइल बीमारियों का राष्ट्रीय संस्थान

14. राष्ट्रीय ड्रग तंबाकू निवारण संस्थान

नए कार्यक्रम : आयुष के राष्ट्रीय मिशन के अंतर्गत कुछ और नए कार्यक्रमों की सिफारिश की गई है जो कि इस प्रकार हैः

1. आयुष ग्राम

2. फार्मेको विजिलेंश इनिशियेटिव फोर ए.एस.यू. ड्रग्स

3. शोध परिषद की इकाइयों को प्रभावी बनाना

4. राष्ट्रीय आयुष हैल्थ प्रोग्राम

5. अस्पताल और डिस्पेंसरी (आयुष के साथ-साथ राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन-एक फ्लेक्सिपूल)

source : http://www.pib.nic.in/newsite/hindirelease.aspx?relid=21511

मुसीबत में है होम्योपैथी चिकित्सक …बना सर दर्द क्लीनिकल प्रतिष्ठान (पंजीकरण और नियमन) अधिनियम,2010 – The Clinical Establishments (Registration and Regulation) Act

आयुष पद्दतियों में से होम्योपैथी के लिये एक और बुरी खबर !! पिछ्ले कुछ सालों से अटपटे फ़ैसलों ने चिकित्सकों को सरदर्दी मे डल दिया है । सबसे पहली मार माननीय उच्चतम न्यायालय ने पौंडं पैंकिंग ( ४५० मि.ली. ) की बिक्री पर रोक लगाकर लगाई , छोटी पैंकिग का चलन बढा , राज्य सरकारों को अधिक रेवन्यू की प्राप्ति हुई लेकिन होम्योपैथॊम्के लिये यह सरदद बन के रह गया , उसके बाद कुछ ही सालों के अब्न्दर केन्द्र ने   G.M.P. ( Good Manufacturing Practices ) के   अन्तर्गत होम्योपैथिक दवाओं पर expiry date  को अंकित करना आवशयक कर दिया । एक और बेतुका नियम , जब expiry होती ही नही तो इस चलन को क्यूं लागू किया !!

Do you want such act ?

लेकिन हाल मे ही उत्तर प्रदेश मे २८ फ़रवरी २०१३ से लागू भारत सरकार के  क्लीनिकल प्रतिष्ठान (पंजीकरण और नियमन) अधिनियम, 2010 ने रही सही कसर पूरी कर दी । लेकिन यह सरदर्द मात्र होम्योपैथों के लिये नही बल्कि मेडिकल सेवा मे आने वाले हर उस प्रतिषठान की है जिसमॆ एलोपैथिक चिकित्सक , डेन्टल चिकित्सक, डाइगनोस्टिक सेन्टर  और आयुष पद्दतियों के सभी चिकित्सक शामिल हैं । एक बार राज्यों द्वारा अपनाने पर इस अधिनियम के अनुसार, राज्य सरकारें क्लीनिकल प्रतिष्ठानों के पंजीकरण के लिए प्रत्येक जिले में पंजीकरण प्राधिकरण की स्थापना करेंगी। किसी भी चिकित्सक  को क्लीनिकल प्रतिष्ठान चलाने के लिए इस अधिनियम के प्रावधानों का पालन करना होगा।

अधिक जानकारी के लिये http://clinicalestablishments.nic.in/ पर जायें । हिन्दी में प्रारुप को डाऊनलोड करने के लिये हाँ जायें और अंग्रेजी मे डाउनलोड करें यहाँ से ।

एक्ट की नयी व्यवस्थाओं इतनी अधिक जटिल हैं कि इस के  अनुसार चिकित्सीय स्थापनों  को चलाना अब आसान नही रहा । उत्तर प्रदेश मे दम तोडती चिकित्सा आने वाले दिनों मे किस मोड पर होगी इसका अनुमान लगाना कोई मुशिकिल नही दिखता  । पहले से ही CPMT  मे अरुचि लेते छात्रों का मनूबल नयी व्यवस्था के चलते और भी घटॆगा । कुछ साल पहले जहाँ लाखों छात्र- छात्र्यें CPMT मे शरीक होते थे कुछ सालॊ मे यह प्रतिशत चन्द हजारों तक पहुँच चुका है ।

आखिर देखते है  कि क्या है यह अधिनियम और क्यूं इस एक्ट के लागू होने से आयुष चिकित्सकॊ को कठिनाईयों का सामना करना पडेगा ।

एक्ट क्या  है :

संक्षिप्त रुप मे समझें कि अब सरकार यह तय करेगी कि क्लीनिक चलाने के लिये आपके पास पर्याप्त जगह हो , प्रक्षिक्षत स्टाफ़ हो , क्लीनिक में शौचालय की व्यवस्था हो , आपातकालीन परिस्थितियों में अगर रोगी का इलाज क्लीनिक मे नही हो सकता है तो उसे पास के अस्पताल तक पहुँचाने के लिये एम्बुलेसं हो , आदि-२ ।

C.M.O. के पास यह अधिकार होगा कि अगर चिकित्सक एक्ट का पालन नही करता है तो उस पर पहली बार १०००० रु. , दूसरी बार ५०००० रु और तीसरी और अन्तिम बार ५ लाख रु तक का जुर्माना लगाया जाय ।

एक्ट के अनुसार यदि चिकित्सक मेडिकल सेवा के अलावा और किसी कार्य /कारोबार मे लिप्त पाया जायेगा तो उसे दुराचार ( misconduct ) की संज्ञा दी जायेगी 🙂 section 68 part 1

What Is Clinical establishmentAct?

  • This bill makes it mandatory for each and every clinical establishment including every individual clinic, consulting chamber, laboratory or any other investigative or treatment place without indoor beds, nursing homes, hospital etc. by whatever name it may be called to register and follow minimum standards of infrastructure i.e. of space / equipment and qualified para medical staff.
  • It provides for mandatory registration of all clinical establishments, including diagnostic centers and  single-doctor clinics across all recognized systems of medicine both in the public and private sector  except those run by the Defense forces
  • As-is-where-is Initially, provisional registration would be granted within 10 days of application on ‘as- is-where-is basis upon receiving the application filed with supporting documents. Once standards have been notified, permanent registration would be provided to all those conforming to the notified standards.
  • To stabilize the emergencypatient (with its grammatical variations and cognate expressions) means, with respect to an emergency medical condition specified in clause (f), to provide such medical treatment of the condition as may be necessary to assure, within reasonable medical probability, that no material deterioration of the condition is likely to result from or occur during the transfer of the individual from one clinical establishment to other.
  • The registering authoritycan impose fines for non-compliance and if aclinical establishmentfails to pay the same, itwould be recovered as anarrear of land revenue.
  • Penalties for non registration :There are stringent and huge monitory penalties for non registration by any professional, which are more than many criminal penalties of IPC.For First Offence, 10,00 FOR SECOND 50,000,subsequent offenses Rs.5 Lakhs.
  • Any person serving in non registered establishment 25,000/-Disobeying any direction or obstruction to inspection Rs. 5 Lakhs.
  • Rajasthan and UttarPradesh have alreadyadopted the Act.
  • The state government is making an all out effort to crack the whip on private clinics and hospitals with an Act which would require them to declare the amount of fees they charge, the number of services they offer and get registration from the medical authorities to set up a health facility.
  • clinics and private hospitals will have to mention on a display board about the services they are providing and the fees they are charging for that.
  • The proposed Act envisages to have district level committees, which would include district collector, chief medical health officer and superintendent of police.
  • Act would also prescribe minimum quality standards of services at the private clinical establishments. A medical department official said under the Act, no one can open clinics and hospitals without applying for registration. For the first two years, the department would issue temporary registration and after two years, permanent registration would be provided.

होम्योपैथिक चिकित्सकों  के लिये एक्ट के ऋण पक्ष और कुछ सुझाव :

( केन्द्रीय होम्योपैथिक परिषद के सदस्य डां अनुरुद्ध वर्मा से बातचीत के आधार पर )

  • होम्योपैथी में अधिकतर क्लीनिक एकल चिकित्सकॊ द्वारा संचालित किये जाते हैं जिसमें से अधिकतर में चिकित्सक स्वंय ही औषधियों की डिस्पेन्सिंग करते हैं । ऐसी दशा में जब मानक तय किये जाये तब इन्हें एलोपैथी के मानकों पर न कसा जाये क्योंकि होम्योपैथी में कम स्थान , कम उपकरण , कम संसाधन आदि की जरुरत पडती है और चिकत्सक अपने क्लीनिक  से रोगी को औषधि उपलब्ध कराता है ।ऐसे मे होम्योपैथी के लिये क्लीनिक स्थापित करने के लिये अलग मानक तय करना चाहिये । यदि होम्योपैथी क्लीनिक पर एलोपैथी के मानक तय किये जायेगें तो क्लीनिक खोलना और चलाना कठिन हो जायेगा।
  • इस एक्ट मे होम्योपैथिक के अधिकारियों एवं संस्थाओं तथा प्रतिनिधियों को समुचित स्थान नही दिया गया है तथा जिला स्तर पर भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व नही है जिससे होम्योपैथिक चिकित्सकों के हितों की अनदेखी हो सकती है । एक्ट के अंतर्गत गठित होने वाली नेशनल कांउनसिल एवं जिला कमेटियों में एलोपैथी की प्रोफ़ेशनल संन्स्थाओं , अधिकारियों एवं प्रतिनिधियों को अधिक प्रतिनिधित्व दिया गया है परतुं नेशनल कांउनसिल मे भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के तीन सदस्यों को स्थान दिया गया है जबकि केन्द्रीय होम्योपैथिक परिषद के मात्र एक प्रतिनिधि को स्थान मिला है ।
  • होम्योपैथिक चिकित्सक के लिये प्रशिक्षित स्टाफ़ उपब्ध हो पाना भी संभव नही है क्योंकि होम्योपैथी मे फ़ार्मासिस्ट का कोई अधिकृत प्रशिक्षण नही है ।

मौजूदा हाल मे यह एक्ट होम्योपैथिक चिकित्सकों के लिये एक आधात से कम नही है । अधिक्तर मध्यम वर्गों से आने वाले छात्र / छात्रायें और उनके अभिवावक क्या इस बोझ को सह पायेगें ? आगे क्या होगा यह तो समय ही बतायेगा !!

केन्द्रीय होम्योपैथी परिषद ने होम्योपैथी में M.D. करने के नये विकल्प दिये …

केन्द्रीय होम्योपैथी परिषद (CCH ) ने चार नये विषयों में स्नातकोत्तर डिग्री पाठ्यक्रम के मसौदे को मंजूरी दे दी और साथ ही मे सभी राज्य /संघ राज्य क्षेत्र सरकारों और विशवविधालयों से होम्योपैथी स्नातकोत्तर विनियम में प्रस्तावित संशोधनों पर अपनी टिप्पणी भेजने का अनुरोध भी किया है ।

चार नए पाठ्यक्रम

  • Anatomy
  • Physiology
  • Pathology
  • Forensic Medicine

सीसीएच के पीजी समिति ने उपरोक्त विषयों के लिए एक विस्तृत स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम तैयार किया है जो संभावित नये सत्र से लागू किया जायेगा ।

गौरतलब है कि जो पूर्व पाठयक्रम पहले से ही चल रहे हैं उनके अलावा इन पाठक्रमों का समावेश किया गया है ।

मौजूदा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम

  • Materia Medica
  • Organon of Medicine
  • Repertory
  • Practice of Medicine
  • Pediatrics
  • Homeopathic Pharmacy
  • Psychiatry

साभार : डां मन्सूर अली : http://www.similima.com/four-new-postgraduate-courses-in-homoeopathy

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