Category Archives: Homeopathy News

विश्व होम्योपैथी दिवस–एक पहल यह भी ..

 

hah day

फोटो हैनीमैन चौराहे,  लखनऊ  की है। वर्ल्ड होम्योपैथी-डे पर शुक्रवार सुबह नेशनल होम्योपैथी मेडिकल कालेज के छात्रों का ग्रुप यहां पहुंचा और होम्योपैथी के जनक डा. हैनीमैन की मूर्ति पर लगे बैन-पोस्टर हटाकर चौराहे को साफ-सुथरा कर दिया। युवाओं ने करीब एक घंटे मेहनत की। यह देखकर अच्छा लगा कि युवा दूसरों को दोष देने के बजाय खुद कुछ कर दिखाने के लिए आगे आए हैं। लोगों को भी सबक लेना चाहिए कि वे इनकी मेहनत पर दोबारा गंदगी न फैलाएं, बल्कि उनकी इस मुहिम में उनका साथ दें।

यह भी देखें :

1. डॉ. क्रिश्चियन फ्राइडरिक सैमुअल हैनिमेन- जन्म दिवस पर विशेष ( A Tribute to Dr  Samuel Hahnemann )                                                                                                                       2.  World Homeopathy Awareness Week  
3. A bouquet of Homeopathic books in pdb format ( special 257th Hahnemann Birthday edition )

सर्दियों में सीजनल एफेक्टिव डिसॉर्डर (सैड) – Seasonal Affective Disorder or Winter depression

Portrait of the beautiful thoughtful girl. Autumn, grief, dreams and tenderness.

सर्दियों के दिनों अवसाद या डिप्रेशन की एक आम समस्या है ।  अवसाद कॆ  कारणॊ के पीछे कई वजह  हो सकते हैं लेकिन अगर आप सर्दियों मे दूसरे मौसम की अपेक्षा आलस, थकान और उदासीन महसूस करते हैं तो हो सकता है कि आपको सीजनल एफेक्टिव डिसॉर्डर (सैड) की समस्या हो। सर्दियों में अक्सर दिन के समय सूर्य का प्रकाश हमें कम मिलता है जिससे कई बार हमारी दिनचर्या और सोने व उठने का चक्र प्रभावित होता है। ऐसे में हमारे मस्तिष्क में ‘सेरोटोनिन’ नामक केमिकल प्रभावित होता है जिससे हमारा मूड बिना वजह खराब ही रहता है। कई बार यह स्थिति हमें अवसाद का शिकार बना सकती है ।
सीजनल एफेक्टिव डिसॉर्डर (सैड)  का वर्णन   मेडिकल सांइस मे सबसे पहले १९८० के दशक से दिखता है हाँलाकि इसके पहले कई चिकित्सक और रोगी भी इस बात से वाकिफ़ थे कि सर्दी का मौसम शुरु होते ही स्वभाव मे बदलाव दिखना आरम्भ हो जाता है । इस तथ्य का वर्णन पांचवी सदी ईसा पूर्व हिप्पोक्रेट्स  के कुछ आलेखों मे भी देखा जा सकता है । कई देशॊ मे जहाँ दिन काफ़ी छॊटे होते है और धूप का सर्वथा अभाव रहता है वहाँ अवसाद के रोगियों का मिलना एक आम समस्या है । जैसे स्वीडेन के उत्तर  भाग मे जहाँ छ्ह महीने रात और छ्ह महीने दिन रहता है वहाँ आत्मह्त्या की दर सबसे अधिक है ।

SAD के बारे मे कुछ तथ्य

  • कोई आवशयक नही कि ठंड मे रहने वाले लोगों को ही यह समस्या हो , जो लोग उन जगहों पर रहते हैं जहां ठंड कम पड़ती हो और बहुत अधिक ठंड वाले इलाके में आ जाएं।
  • महिलाओं में इस बीमारी की आशंका अधिक रहती है।
  • 15 से 55 वर्ष की आयु वाले लोगों में इसकी आशंका अधिक रहती है।
    सीजनल एफेक्टिव डिसॉर्डर से पीड़ित व्यक्ति के बहुत अधिक संपर्क में रहने वाले व्यक्ति को भी यह बीमारी हो सकती है।

SAD के लक्षण

  • लगातार थकान महसूस हो और रोजमर्रा के कामो मे मन न लगे ।
  • मन मे नकारात्मक विचारों का बार बार आना ।
  • सही प्रकार नींद न आना या बहुत अधिक नींद आना ।
  • कार्बोहाइड्रेट युक्त चीजों जैसे रोटी, ब्रेड या पास्ता आदि खाने का हमेशा मन करना ।
  • वजन का तेजी से बढना ।

SAD से बचने के उपाय :

  • अपनी दिनचर्या निर्धारित करे ।
  • रोजाना योग , ध्यान , मार्निग वाक और एक्सर्साइज करें ।
  • थोडा खायें और बार –२ खायें लेकिन खाने मे हरी सब्जियों और फ़लों का सेवन अधिक करें ।
  • सुबह देर तक न सोयें ।
  • सर्दियों मे संभव हो तो दोपह्र का खाना धूप मे खायॆ ।
  • इतवार को और अधिक खुशगवार बनायें ,  धूप का आंनद लेने के किसी पार्क मे जायें ।
  • अगर घर मे ही काम करना पडे तो कोशिश करे कि ऐसी खिडकी के पास अपनी टॆबल रखें जहाँ प्रचुर मात्रा मे धूप उपलब्ध हो ।

मेडिकल उपचार
आमतौर पर डॉक्टर सैड के मरीजों का उपचार दो तरह की लाइट थेरेपी से करते हैं- ब्राइट लाइट ट्रीटमेंट और डॉन सिमुलेशन। ब्राइट लाइट ट्रीटमेंट के तहत रोगी को लाइटबॉक्स के सामने रोज सुबह आधे घंटे तक बैठाया जाता है।
दूसरी विधि में सुबह सोते वक्त रोगी के पास धीमी लाइट जलाई जाती है जो धीरे-धीरे तेज होती जाती है। सूर्योदय जैसा वातावरण तैयार किया जाता है। इसके अलावा योग, अवसाद हटाने वाली दवाओं और कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी से भी इस बीमारी का उपचार किया जाता है।

होम्योपैथिक उपचार

SAD के रोगियों को देखने के दौरान निम्म रुब्रिक्स  जो बहुतायात रोगियों मे पाये जाते है  :

  • *Sadness, melancholy
  • *Feelings of worthlessness
  • *Hopeless
  • *Despair
  • *Sleepiness
  • *Lethargy
  • *Craving for sweets
  • *Craving for carbohydrates
  • *Company aggravates
  • *Desire to be alone
  • *Music ameliorates
  • *Difficulty concentrating/focusing
  • *Thoughts of death or suicide.

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औरम मेट , फ़ास्फ़ोरस , सीपिया , रस टाक्स . इगनेशिया सर्दियों मे होने वाले अवसाद की मुख्य औषधियाँ है । हाँलाकि लक्षणॊ की सम्पूर्ण्ता ( Totallity of symptoms ) ही औषधि चुनाव का आधार है ।

लेकिन मुख्य औषधियों पर एक नजर :

Aurum metallicum is for those who sink into terrible depression in the dark of the winter feeling like the cloud is sitting over them. At their worst they feel that life isn’t worth living. They take solace in work and/or religion and hide themselves away listening to sad music until the sun returns the following spring.
Phosphorus has a really close relationship with the weather, loving the sun and sparkling with it – actually feeling invigorated by being out in the sunshine. They are deeply affected by cloudy weather – becoming miserable and gloomy the longer the sun stays away. In the deepest, darkest time of the winter they can slow right down, not wanting to do anything. Chocolate (especially chocolate ice cream) is their great source of comfort at those times – as are their friends. Even brief outbursts of sunshine on a winter’s day will lift their spirits, as can getting out with friends and going to a party or going dancing!
Rhus toxicodendron is useful for those who are particularly vulnerable to cloudy weather, who find that the cold, damp, wet and cloudy weather makes them feel just plain miserable. Their body reacts to the cloudy weather by stiffening up – especially the back and the joints – which makes them feel even worse. Getting up after sitting or lying down for a while is hard, and then continued movement eases the stiffness – unfortunately those joints start to hurt again if they are using them for a while so they have to rest – after which the whole maddening cycle starts again, thereby causing the restlessness that is a keynote for this remedy.
Sepia is for extremely chilly types who hate everything about winter: the damp, the rain, the frost, the snow, the clouds – everything. Their moods start to lift when they begin to get warm again in the late spring and early summer when they can get out in the fresh air and do some vigorous exercise. These people love to run much more than jog, and it is this kind of exercise – vigorous exercise in the fresh air – that makes them feel really well overall. If they can’t do it they sink into a depressed, irritable state where they want to be alone (and eventually, so does everyone else – want them to be alone that is!)

IHMA Fever guidelines Version1 released

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Indian Homoeopathic Research Centre (IHRC) the research wing of Indian Homoeopathy Medical Association (IHMA) published the “Fever Guidelines” before the homeopathic community.

This is an attempt to standardize the treatment protocol for fever among Homoeopaths.The cases managed on the basis of these guide lines shall be documented for future studies.

Thus the efficacy of Homoeopathic remedies could be established in a much more scientific and systemic way.

Major Contents

General approach in feverWhen and how to investigateCase definitionSupportive managementCase taking format and protocolFirst consultation at critical levelWhen to referRubric analysis of important fever remedies – a really useful sectionPreventive medicine and Genus epidemicus- RAECH guidelines

If you would like to get a copy of this book, Contact

Dr Vinod Joseph
Director IHRC
Ph: 09995403674

Web : www.ihma.in

courtesy : Indian Homoeopathic Research Centre (IHRC)

Homoeopathy Doctor Manoj Rajoria elected to Indian Parliament

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Homoeopathy Doctor Manoj Rajoria BHMS, MD (Hom) has been elected to Indian Parliament

Whole Homoeopathic Fraternity in India  is proud of  Dr.Manoj Rajoria from Rajasthan.

We congratulate you on your success and becoming MP, You will be the voice of thousands of Homoeopaths in the Parliament. You are a dedicated Homoeopath and we know you will work for Homoeopathy too.

Dr Manoj Rajoria, Candidate of 15th Lok Sabha, Affiliated to Bharatiya Janata Party (BJP) serving Karauli Dholpur (RJ) Lok Sabha Constituency.

He took his BHMS from Dr. M.P.K. Homoeopathic Medical College Jaipur

Post Graduate Homoeopathy from  Rajasthan University in 2006

Mobile Phone :  096 67 211234

Website : http://www.drmanojrajoria.com

Source : homeobook.com

होम्योपैथिक क्लीनिकल प्रतिष्ठानों के लिए क्लीनिकल प्रतिष्ठान अधिनियम के तहत न्यूनतम मानकों का ड्राफ्ट समीक्षा के लिये उपलब्ध

clinical establishment actस्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने क्लीनिकल प्रतिष्ठानों के लिए  क्लीनिकल प्रतिष्ठान अधिनियम के तहत न्यूनतम मानकों का ड्राफ्ट  समीक्षा के लिये तैयार  किया है । यह अधिनियम व्यक्तिगत होम्योपैथिक क्लीनिक ( एकल चिकित्सको द्वारा संचालित ) और होम्योपैथिक चिकित्सको द्वारा संचालित नर्सिंग होम दोनो पर लागू होगा। ड्राफ़्ट अभी समीक्षा के लिये है और इसके लिये चिकित्सकों और आम पब्लिक से भी सुझाव  माँगे गये है ।

Download Homeopathy Draft

होम्योपैथिक चिकित्सकों से अनुरोध है कि इन मानकों  को ध्यान पूर्वक पढें और 20/04/2014 से पहले अपने  सुझाव / टिप्पणी / संशोधन डा अनिल कुमार ( सी.एम.ओ. ) कक्ष नं. 506 ‘डी’ विंग , 5 वीं मंजिल , निर्माण भवन , नई दिल्ली 110018 पर या उनके ई मेल आई डी dr.anilkumar@nic.in पर भेज दें । इन सुझावों की दूसरी कापी nsdharmshaktu@yahoo.com को भी प्रेषित अवशय करें ।

ज्ञात हो  हाल मे ही उत्तर प्रदेश मे २८ फ़रवरी २०१३ से लागू भारत सरकार के क्लीनिकल प्रतिष्ठान (पंजीकरण और नियमन) अधिनियम, 2010 ने कम पूँजी वाले चिकित्सकों की नींद उडा दी है । हाँलाकि  यह सरदर्द मात्र होम्योपैथों के लिये नही बल्कि मेडिकल सेवा मे आने वाले हर उस प्रतिषठान की है जिसमॆ एलोपैथिक चिकित्सक , डेन्टल चिकित्सक, डाइगनोस्टिक सेन्टर और आयुष पद्दतियों के सभी चिकित्सक शामिल हैं । एक बार राज्यों द्वारा अपनाने पर इस अधिनियम के अनुसार, राज्य सरकारें क्लीनिकल प्रतिष्ठानों के पंजीकरण के लिए प्रत्येक जिले में पंजीकरण प्राधिकरण की स्थापना करेंगी। किसी भी चिकित्सक को क्लीनिकल प्रतिष्ठान चलाने के लिए इस अधिनियम के प्रावधानों का पालन करना होगा। अधिक जानकारी के लिये http://clinicalestablishments.nic.in/ पर जायें ।

संक्षिप्त में इस एक्ट के अनुसार अब सरकार यह तय करेगी कि क्लीनिक चलाने के लिये आपके पास पर्याप्त जगह हो , प्रक्षिक्षत स्टाफ़ हो , क्लीनिक में शौचालय की व्यवस्था हो , आपातकालीन परिस्थितियों में अगर रोगी का इलाज क्लीनिक मे नही हो सकता है तो उसे पास के अस्पताल तक पहुँचाने के लिये एम्बुलेसं हो , आदि-२ । C.M.O. के पास यह अधिकार होगा कि अगर चिकित्सक एक्ट का पालन नही करता है तो उस पर पहली बार १०००० रु. , दूसरी बार ५०००० रु और तीसरी और अन्तिम बार ५ लाख रु तक का जुर्माना लगाया जाय । एक्ट के अनुसार यदि चिकित्सक मेडिकल सेवा के अलावा और किसी कार्य /कारोबार मे लिप्त पाया जायेगा तो उसे दुराचार ( misconduct ) की संज्ञा दी जायेगी 🙂 विस्तृत जानकारी के लिये यहाँ देखें

 यह सिस्टम आयुष पद्दति के चिकित्सकों के लिये आघात से कम नही है । अगर देखा जाये तो ऐलोपैथिक के  प्रावाधानों को होम्योपैथिक व अन्य आयुष पदद्तियों मे डालने का यह जबरन प्रयास है ।

  • इस एक्ट को समीक्षा के लिये डालने की आवशयकता भी इसलिये पडी क्योकि यदि होम्योपैथी क्लीनिक पर एलोपैथी के मानक तय किये जायेगें तो क्लीनिक खोलना और चलाना कठिन हो जायेगा।
  • इस एक्ट मे होम्योपैथिक के अधिकारियों एवं संस्थाओं तथा प्रतिनिधियों को समुचित स्थान नही दिया गया है तथा जिला स्तर पर भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व नही है जिससे होम्योपैथिक चिकित्सकों के हितों की अनदेखी हो सकती है ।
  • एक्ट के अंतर्गत गठित होने वाली नेशनल कांउनसिल एवं जिला कमेटियों में एलोपैथी की प्रोफ़ेशनल संन्स्थाओं , अधिकारियों एवं प्रतिनिधियों को अधिक प्रतिनिधित्व दिया गया है परतुं नेशनल कांउनसिल मे भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के तीन सदस्यों को स्थान दिया गया है जबकि केन्द्रीय होम्योपैथिक परिषद के मात्र एक प्रतिनिधि को स्थान मिला है ।
  • होम्योपैथिक चिकित्सक के लिये प्रशिक्षित स्टाफ़ उपब्ध हो पाना भी संभव नही है क्योंकि होम्योपैथी मे फ़ार्मासिस्ट का कोई अधिकृत प्रशिक्षण नही है ।

एक्ट नये प्रावधानों के साथ समीक्षा के लिये तैयार है । अब समय है होम्योपैथिक से जुडॆ चिकित्सकों का कि वह अपने सुझावों / टिप्पणियों से  इन प्रावधानों को समयनूकूल और उपयुक्त बनायें ।

Ministry of Health and Family welfare has asked for review of Draft of Minimum standards for Clinical Establishments under Clinical Establishments Act.

Remember
This is everything on Homeopathy individual clinics and hospitals

Kindly go through the minimum standards in Homeopathy carefully and give your suggestions/comments/amendments before 20/04/2014

National Council for Clinical Establishments under the Chairmanship of Director General of Health Services, Government of India in consultation with various stakeholders has prepared draft minimum standards for various categories of Clinical Establishments for implementation of the Clinical Establishments Act.

The comments, suggestions, objections, including deletions /additions if required in the draft documents are invited from public at large, including the stakeholders like hospitals and other clinical establishments, consumer groups etc.

The comments may kindly be sent to Dr. Anil Kumar, CMO(AK) Room No.506 ‘D’ Wing, 5th Floor, Nirman Bhawan, New Delhi-110018 at his email- id dr.anilkumar@nic.in  with in one month of publication of this Notice on the website.

A copy of the same may also be endorsed to nsdharmshaktu@yahoo.com

Note : The Indian Public Health Standards(IPHS) four Sub-centre, PHC, CHC, Sub-district/Sub-divisional hospital and District hospital are already approved documents. The comments are being invited only on the draft minimum standards and not on the IPHS.

Mother Theresa Institute in Pondicherry to start 2-year D pharm courses in Ayurveda, Siddha, Homoeopathy

The Mother Theresa Post Graduate and Research
Institute of Health Sciences in Pondicherry will
start two-year diploma courses in Ayurveda
Pharmacy, Siddha Pharmacy and Homoeopathy
Pharmacy from this academic year onwards, said
Dr R Murali, dean of the Institute.
This is the first time a health educational
institution in Pondicherry is starting D Pharm
course in Ayush subjects. Gujarat Ayurveda
University in Ahmedabad and Aringar Anna
Hospital of ISM in Chennai are the other two
institutes in India conducting D Pharm course in
Ayurveda and in Siddha.
The dean said the department of ISM in the
college is conducting the course in collaboration
with the Ayush department of Pondicherry
government. Message about the commencement
of the course has been sent to the Ayush
department in New Delhi. On completion of the
course, the students will have one month
internship in the ISM PHCs and private clinics in
Pondicherry.
“We got the approval from the government for
starting the course. Now we are waiting for
affiliation from Board of Medical Education,
government of Pondicherry. The course will be
started from this academic year,” he added.
The syllabus of the course will include basic
anatomy, physiology, properties of medicine,
manufacturing process, pharmacology,
pharmacognozy and dispensing practice. Besides,
there will be special papers on drugs store
management, computer application in pharmacy
and health education, the dean said.
Dr K Gopal, principal of the College of Pharmacy
at the Institute said the first three batches will be
absorbed by the Pondicherry government as there
are a lot of vacancies for Ayush pharmacists in
the hospitals and PHCs in the union territory at
present. He said three of the twelve laboratories
in the college are set aside for practical purpose
of the students joining the course. The basic
qualification of the applicant is 10+2.
Dr T Thirunarayanan, secretary of the Centre for
Traditional Medicines and Research said,
previously there was a proposal to start the
diploma course in Siddha in Pondicherry,
subsequently discussion was held with Ayush
secretary. But later it was found that the job
opportunity for the course was very less there,
and the same situation is continuing still now. He
said after three years all the Siddha D Pharm
certificate holders will become jobless.
However, he suggested that the Pondicherry
government could send a minimum of ten
students each to the government Siddha colleges
at Palayamkottai in Thirunelveli and at
Arumbakom in Chennai for the same course and
on completion of the course they could be
appointed as ISM Pharmacists at the PHCs in
Pondicherry. Else, after five years, Pondicherry will
become a state of jobless Siddha pharmacists, he
added.
source : similima

वर्ष 2013-14 सहित बारहवीं पंच वर्षीय योजना के दौरान आयुष विभाग की प्राथमिकताएं

वर्ष 2013-14 सहित बारहवीं पंच वर्षीय योजना के दौरान आयुष विभाग की प्राथमिकताएं

देश के कोने-कोने में प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण स्वास्थ्य के दायरे में लाना बाहरवीं पंच वर्षीय योजना की एक प्राथमिकता है। इस दौरान आयुष चिकित्सा प्रणाली की विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए उसे आधुनिक चिकित्सा प्रणालियों के साथ-साथ प्रयोग में लाया जाएगा। रोगों से बचाव, विशेष रूप से महिलाओं, बच्चों, वरिष्ठ व्यक्तियों को ध्यान में रखते हुए नॉन कम्यूनिकेबल बीमारियों में, तनाव के प्रबंधन में, मानसिक रोगों की चिकित्सा में, बीमारियों से जूझते व्यक्तियों की देखभाल में और स्वस्थ्य लाभ में आयुष का प्रयोग किया जाएगा।

बारहवीं पंच वर्षीय योजना के महत्वपूर्ण उद्देश्य : –

बाहरवीं पंच वर्षीय योजनाओं में आयुष के लिए 10,044 करोड़ रूपये का प्रावधान रखा गया है। जबकी ग्यारहवीं पंच वर्षीय योजना में केवल 2994 करोड़ रूपये ही जिन उद्देश्यों के लिए खर्च किए गए वे हैः

1. स्वास्थ्य सेवाओं में आयुष के प्रयोग को बढ़ाया गया।

2. आयुष विभाग ने आयुष की विशेषताओं को चिकित्सा, विशेषतौर पर महिलाओं बच्चों और बुजुर्गों के लिए, मानसिक बीमारियों के चिकित्सा में, तनाव के प्रबन्धन में, बीमार व्यक्तियों की देखभाल में और पुनर्वास में किया।

बारहवीं पंच वर्षीय योजना के अंतर्गत जो सुझाव दिए गए हैं उनमें इन संस्थाओं को शुरू करने की सिफारिश की गई है : –

1. होमियोपैथी मेडिसिन फार्मास्यूटिकल कंपनी लिमिटेड

2. अखिल भारतीय योग संस्थान

3. अखिल भारतीय होमियोपैथी संस्थान

4. अखिल भारतीय यूनानी चिकित्सा संस्थान

5. राष्ट्रीय सोवा रिग्पा संस्थान

6. राष्ट्रीय औषधीय पौध संस्थान

7. राष्ट्रीय आयुष पुस्तकालय और अभिलेखागार

8. केंद्रीय सोवा रिग्पा अनुसंधान परिषद

9. आयुष संबंधित राष्ट्रीय मानव संसाधन आयोग

10. आयुष के लिए केंद्रीय दवा नियंत्रक

11. आयुष औषध प्रणाली का भारतीय संस्थान

12. राष्ट्रीय जराचिकित्सा संस्थान

13. मेटाबॉलिक तथा लाइफ-स्टाइल बीमारियों का राष्ट्रीय संस्थान

14. राष्ट्रीय ड्रग तंबाकू निवारण संस्थान

नए कार्यक्रम : आयुष के राष्ट्रीय मिशन के अंतर्गत कुछ और नए कार्यक्रमों की सिफारिश की गई है जो कि इस प्रकार हैः

1. आयुष ग्राम

2. फार्मेको विजिलेंश इनिशियेटिव फोर ए.एस.यू. ड्रग्स

3. शोध परिषद की इकाइयों को प्रभावी बनाना

4. राष्ट्रीय आयुष हैल्थ प्रोग्राम

5. अस्पताल और डिस्पेंसरी (आयुष के साथ-साथ राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन-एक फ्लेक्सिपूल)

source : http://www.pib.nic.in/newsite/hindirelease.aspx?relid=21511