Category Archives: फ़ालतू की बड-बड

खूबूसूरत दिखने की कीमत …….

 

 

cosmetics

पिछले हफ़्ते क्लीनिक मे दो केस गोदेरेज हेऐर डाई से उत्पन्न allergic reactions के आये । एक तो श्रीमान यूसफ़ जो इस साल पाँचवी बार इसी समस्या को लेकर आये और एक और जो मुझे बाराबंकी से किसी चिकित्सक ने refer किया था । यूसफ़ का केस सरल था , हाँलाकि लाख समझाने के बावजूद उनको अबकी ईद पर जवान दिखने के मोह ने मुसीबत मे डाल दिया था । लेकिन जो केस बाराबंकी से आया था , उस जैसा तगडा डाई से उत्पन्न reaction मैने पहले कभी न देखा । मैने भी वही किया जो आम चिकित्सक इन परिस्थितयों मे करते हैं , पहले मेडिकल कालेज रिफ़र किया और जब वहाँ से भी कन्ट्रोल न हुआ तो उसे लखनऊ मे प्रसिद्द्ध त्वचा रोग विशेषज्ञ डा सुरेश तलवार के पास रिफ़र कर दिया । रोग की तीब्रता इतनी अधिक थी कि डां तलवार ने भी उसे संजय गाँधीं पी.जी.आई रिफ़र कर दिया ।

पुरषों मे डाई और महिलाओं मे कास्मेटिक का मोह आम देखा जा सकता है । डेली टेलीग्राफ़ की इस रिपोर्ट की सत्यता पर विशवास करें तो औसतन एक महिला दो किलो कास्मेटिक हर वर्ष प्रयोग करती है और इनमे से अधिकतर कास्मेटिक क्रीम और eyeshadow में कैन्सर उत्पन्न करने वाले तत्व पाये गये हैं । यही नही एक औसत महिला एक साल मे लगभग पाँच लिपस्टिक हजम कर जाती है । जरा नजर दौडायें इन कास्मेटिक  मे पाये जाने वाले रसायनों की तरफ़ :

parabens : पैराबैन औरतों मे हार्मोन मे असंतुलन पैदा करते हैं और breast cancer के लिये उत्तरदायी होते हैं ।

triclosan : यह मूलत: ऐटींबैक्टिरियल और कीटनशक दोनों ही है और प्रमुख प्रयोग होने वाली वस्तुऐं जैसे दाँत सफ़ करने के पेस्ट , body washes, साबुन मे पाया जाता है ।

Sodium laureth sulphate : अधिकतर soap gel  और शैम्पू मे पाया जाता है ।

Arsenic : eye shadows मे पाया जाने वाला प्रमुख हानिकारक तत्व ।

डां बैली हैमिलटन का मानना है कि जो तत्व हम oral route यानि मुँह से लेते हैं वह सीधे त्वचा मे मिलने वाले तत्वों की अपेक्षा कम हानिकारक होते हैं । क्योंकि ऐसे तत्व वमन के रुप मे हमारा शरीर बाहर फ़ेंक देता है लेकिन सीधे रक्त मे घुलने वाले तत्व बरसों तक संबधित organs जैसे किडनी और लीवर मे पडे रहते हैं और धीरे-२ अपना घातक असर दिखाते हैं ।

डाई  प्रयोग करने से सबसे अधिक खतरा पेशाब की थैली  (urinary bladder) के कैन्सर होने का है जो डाई न प्रयोग करने वालों मे कम पाया जाता है ।

THE average woman absorbs two kilograms of chemicals from cosmetics every year – from cancer-causing compounds in face cream to arsenic in eyeshadow.

A  typical woman’s daily beauty regime may involve applying as many as 175 chemical compounds to their skin and hair.
Of course, the manufacturers would say these chemicals and resulting products are safe, but a growing school of thought begs to differ.

Cosmetics contain many different kinds of chemicals, but of particular concern are a group of preservatives called parabens, which by some estimates are found in 99 per cent of all ‘leave on’ cosmetics, and 77per cent of ‘rinse off’ cosmetics.
These are known hormone disruptors: evidence suggests they can mimic the female hormone oestrogen, and a lifetime of increased exposure to oestrogen is linked to a heightened risk of breast cancer.
One study found parabens present in 18 out of 20 breast cancer tissue samples (though it is important to note that the study did not prove they’d actually caused the breast cancer).
Parabens are also thought to adversely affect male reproductive functions.
Another troubling chemical is the antibacterial agent and pesticide triclosan, which is used in toothpastes, soaps, household cleaning products and body washes.
It belongs to the chlorophenol class of chemicals, which are suspected of causing cancer in humans and taken internally, even in small amounts, can cause cold sweats, circulatory problems and – in extreme cases – coma.
Also of concern are phthalates, a substance that gives our lotions that silky, creamy, texture, but which are also a ‘plasticiser’ used to make plastics flexible.
Certain phthalates are known carcinogens, and studies have suggested they damage the liver, kidneys, lungs and the reproductive system, as well as affecting the development of unborn baby boys.
The list goes on. Sodium laureth sulphate, a frequent ingredient in shower gels and shampoos, is a skin irritant; Propylene glycol, found in soap, blushers and make-up remover, has been shown in large quantities to depress the central nervous system to make it function less effectively, and aluminum in deodorants is linked to breast cancer by medical research.
And did you know that certain eye shadows contain arsenic?
One thing is for sure: few of us would want to rub any of these chemicals into our eyes, far less ingest them in liquids by drinking them.
Yet, every day, we rub them into our skin, and allow them to enter our bodies.
Given the facts, it’s hardly surprising that a growing number of experts believe these substances have a cumulative effect on our bodies.
They think the ‘chemical ########’ inside us is contributing to the increased frequency of a host of illnesses ranging from eczema to cancers as well as developmental problems such as autism and dyslexia.
“It’s difficult to see the link between chemicals in cosmetics and damage to health unless you stand back and look at the wider picture,” Dr Paula Baillie-Hamilton, author of Toxic Overload, told The Daily Mail.
“Man-made chemicals first emerged 100 years ago, and every decade since, the overall production of these synthetic chemicals has doubled.
“We are surrounded by chemicals: in the air, in our food, in our water and especially in our cosmetics, and the fact is that our bodies can’t break many of these substances down.”
Dr Baillie-Hamilton also thinks that absorbing chemicals through our skin is more dangerous than swallowing them.
“At least if you ingest chemicals through your mouth, your digestive system can do something towards dealing with them,” she says.
“If they go through your skin they hit your blood stream immediately and are then transported to vital organs such as kidney and liver, where they may be stored for many years.”
For instance, the average woman eats, albeit unwittingly, five lipsticks a year, which in her lifetime is the equivalent volume of 1.5 blocks of lard.
People who use permanent hair dye are more than twice as likely to develop bladder cancer as those that don’t.
Both ammonia and paraphenylenediamine (PPD) – chemical substances used in dyes – can cause allergic reactions, too.

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बत्तीसी मे भी रोमांच

बत्तीसी संभाल गोरी , उडी चली जाये रे । ” यह बत्तीसी भी कमाल की हैं , कभी यह खो जाती हैं और कभी-२ इनको लगाने वाले इसको निगल तक जाते हैं । अब इन दादी अम्मा को देखिये , उत्साह मे कोई कमी नहीं , चली आसामान की सैर करने लेकिन कमबख्त यह बत्तीसी रास्ते मे टपक गयी । बत्तीसी निगलने और पाकाशय (oesophagus) की नली मे फ़ँसने के पहले भी कई केस सामने आ चुके हैं , देखें यहाँ ,  और  यहाँ

कैडबैरीज की चौकलेट मे सालमोनेला संक्रमण ( cadbury’s chocolate linked to salmonella infection)

cadbury chocalate

अगर आप वाकई मे जंक फ़ूड के खतरे को समझ रहे हैं और घर मे अपने बच्चों इसके खतरे को देखते हुये  नियत्रणं रखना चाहते हैं तो यह खबर शायद एक बार फ़िर से सचेत करने वाली हो । हरफ़र्ड्शायर मे कैडबैरीज की चौकलेट बनाने वाली ईकाई मे सीवेज के पानी के रिसाव होने से यह समस्या आई । करीब ५० से अधिक बच्चों मे इसका संक्रमण हुआ । इसके पहले भी कैडबरीज की यूनिट मे इस तरह की घटना प्रकाश मे आई थी ।

सालमोनेला  संक्रमण सालमोनेला  बैकटेरिया द्वारा  जानवरों के मल द्वारा संक्रमित खाद्य पद्धार्थों के खाने से   फ़ैलता है , इसके द्वारा उत्पन्न प्रमुख लक्षण १२-७२ घंटों के अन्दर दिखने लगते हैं जिनमें  आंत्रशोध , उल्टी , बुखार और पेट मे मरोड आदि प्रमुख हैं ।

They are microscopic living creatures that pass from the feces of people or animals, to other people or other animals. There are many different kinds of Salmonella bacteria. They were discovered by a American scientist named Salmon, for whom they are named.

And how do you know if you have been infected?

Most persons infected with Salmonella develop diarrhea, fever, and abdominal cramps 12 to 72 hours after infection. The illness usually lasts 4 to 7 days, and most persons recover without treatment. However, in some persons the diarrhea may be so severe that the patient needs to be hospitalized. In these patients, the Salmonella infection may spread from the intestines to the blood stream, and then to other body sites and can cause death unless the person is treated promptly with antibiotics. The elderly, infants, and those with impaired immune systems are more likely to have a severe illness.

 

 

कान्टेक्ट लेन्स प्रयोग करने वालों के लिये खतरे की घंटी

renu contact lens

एक खबर ऐसी जो है तो करीब दो महीने पुरानी लेकिन कान्टेक्ट लेन्स प्रयोग करने वालों के लिये अब अपने देश में भी चिन्ता का विषय बन सकती है । वाशिटंन में नेत्र चिकित्सकॊं ने पाया कि बौश और लौम्ब ( Bausch & Lomb ) का रेनू नाम से कान्टेक्ट लेन्स का तरल घोल ( contact lens solution ) कुछ कान्टेक्ट लेन्स धारकों मे पैरासिटिक संक्रमण पैदा कर रहा है ; ऐसा ही संक्रमण पिछले साल भी इसी घोल के द्वारा देखा गया था लेकिन तब यह फ़ंगस की शक्ल मे था । यह अमीबिक संक्रमण अधिकतर पानी मे पाये जाते हैं और आँखों को धोने के बावजूद  नुकसान नही पहुँचाते लेकिन अगर ऐसा ही संक्रमण कान्टेक्ट लेन्स के घोल के जरिये आँखों में प्रवेश कर जाता है तो नेत्र चिकित्सकों की राय मे यह कार्निया को नुकसान पहुँचा के अन्धापन भी पैदा कर सकता है । गौरतलब है कि अपने देश मे भी बौश और लौम्ब के ही तरल घोल का ही चलन है , यहाँ सब चलता है कर के इस पर झाडू न फ़िर जाये तो कोई आशचर्य नहीं होगा 🙂

एक अदद डिजिटल कैमेरे की तलाश—- जारी है…..

वैसे तो एक अदद  कैमेरे को खरीदने के लिये मै कई महीनों से मन बना रहा हूँ लेकिन मन बनाने से क्या होता है , महँगा , सस्ता , कितने जूम वाला , कितने पिक्सल , भई मेरे समझ मे यह सारे तकनीकी शब्द अधिक नहीं आते । रेट को अगर देखें तो लखनऊ की मार्केट और नेट पर जे. जे. मेहता की साईट में सर्च करने पर कोडक के कैमेरों में रेट का काफ़ी भारी अन्तर साफ़ दिख जाता है । तो क्या करें , लखनऊ  से खरीदें या बाहर से ?

लेकिन चन्द दिन पहले अमित ने कैमेरे लेने के पहले कुछ विचारणीय बातों को ध्यान मे लेने की सलाह दी ,

लेकिन, कैमरा लेने से पहले यह निश्चय करें कि क्या आपको वाकई कैमरा चाहिए? यदि हाँ तो क्या कारण हैं जिनकी वजह से आपको डिजिटल कैमरा चाहिए? इन कारणों की एक सूचि बना लें(आगे भी काम आएगी, कैमरा मॉडल निर्धारित करने में)।

यह मुझे जँची । अपनी लिस्ट बनायी तो समझ मे आया कि मुझे खासकर त्वचा संबधित रोंगों में जैसे लियोकोडर्मा , फ़ंगल संक्रमण आदि मे पेपर तैयार करने के लिये फ़ोटोग्राफ़ की आवशयकता अक्सर पडती है । जो कैमरा अभी मै प्रयोग कर रहा हूँ उसमे फ़ॊटो तो खिचं जाती है लेकिन इन की बारीकियाँ नजर नही आती । और इसके अलावा बाकी मौकों पर तो उसका काम है ही ।

आजकल मेरा भान्जा अनन्त जो इन्फ़ोसीस से अगले महीने जुडने वाला है , लखनऊ भ्रमण के लिये आया हुआ है और साथ मे है उसके कैनन का  S2IS कैमरा। अब इतने बढिया कैमेरे को देखकर तो मेरी उनीदीं आँखों मे ताजगी आ गयी । सोचा कि चलो इससे ही फ़िलहाल हाथ आजमायें । घर की फ़ुलावारी तो आजकल सूनी पडी है , गुलदाउदी के पौधों का रोपण इस सप्ताह बारिश के आरम्भ होते ही कर दिया । गुलमेहंदी के पौधे अभी तो बहुत ही छोटे हैं , हाँ , लेकिन नरगिस मे अबकी बार कुछ जल्द ही फ़ूल आ गये । तो फ़िर किसका फ़ोटो सेशन करें ; हाँ , पक्षियों का यहाँ कोई अकाल नहीं है । पैराकीट ( बजरी ) अपने पूरे शबाब में है यानि प्रजनन के लिये तैयार और इतने रोंमान्टिक मौसम मे कबूतरों मे भी जोडे बनाने की होड सी लगी है । इसी फ़ोटो सेशन की तो  मुझे तलाश थी , जो कल मिल गयी । आप भी देखो और लुत्फ़ उठाओ । हाँ, अधिकतर फ़ोटो अनन्त के ही खीचे हुये हैं ।

 एक वीडियो भी जो कैमरे को फ़िन्च के पिंजरे के अन्दर रखकर रिकार्ड किया

 

 

जनसंख्या विस्फ़ोट और धार्मिक रूढियों मे फ़ँसा इन्सान

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बात बहुत पुरानी नहीं है मै जहाँ प्रैक्टिस करता हूँ उसके आधा कि. मी. के फ़ासले पर भारत का सबसे विख्यात इस्लामिक स्कूल “नदुआ” स्थित है। इसमे इस्लाम धर्म की शिक्षा ग्रहण करने देश-विदेश के काफ़ी मुस्लिम लडके आते हैं। करीब 20 सालों से अधिकतर लडके मेरे काफ़ी करीब रहे और लखनऊ यूनिर्वसिटी के बिल्कुल बगल मे होने के बावजूद यहां के लडकों में मैने और लडकों की अपेक्षा उच्छृन्खल प्रवृति का अभाव देखा। समस्तीपुर, बिहार का रहने वाला मो. फ़रीद नामक युवक जो यहाँ से आलमियत हाँसिल कर चुका था , घर जाने के पूर्व मुझसे मिलने आया । थोडा सकुचाते हुये बोला , “डा साहब, पिछले दिनों जब मै घर गया था तो मेरे घर वालों ने मेरा निकाह कर दिया , अब मेरी आलमियत पूरी हो चुकी है और मै अपने वतन लौट रहा हूँ, मै आप से कुछ सलाह चाहता हूं।” मैने पहले सोचा कि सेक्स से संबन्धित कुछ सलाह माँगने आया होगा। वह बोला , “ मै अभी परिवार को बढाना नहीं चाहता और आगे भी परिवार को छोटा रखना चाहता हूँ,, मुझे बच्चों पर नियन्त्रण रखने के उपाय बतायें।“ मै बहुत हैरान हुआ क्योंकि वह जिस वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहा था , उसकी पहुँच मुस्लिम समाज मे बहुत है और वह ऐसी सोच बिल्कुल नहीं रखते। गर्भ निरोधक उपाय बताने के बाद मैने उससे कहा, “ फ़रीद , तुम अपनी इस सोच को अपने तक ही सीमित मत रखना और अगर यही सोच अपने समाज मे दे सको तब शायद अपने समाज मे एक नई पहल कर सकोगे।” मुझे नहीं मालूम कि उसने आगे अपनी इस सोच को कितना बढाया लेकिन बाद के कई सालों मे मुझे कई नये मौलाना मिले जो मुझसे अक्सर गर्भ निरोधक उपायों की जानकारी माँगने आते रहते। क्या मुस्लिम समाज में यह एक नई सोच है या समय का बदलाव, यह तो समय ही बतायेगा।

क्या परिवार नियोजन सिर्फ़ आर्थिक मामला है या धार्मिक मामला। इस लेख में कुछ ऐसे ही विचारणीय प्रश्नों को उठायेगें और उनका सही हल भी ढूँढने की कोशिश करेगें।

आज अगर आप संगरहालयों में रखे हुये कई विलुप्त जानवरों के अस्थि- पजरों को देखकर सोच रहे हों कि यह वक्त के साथ विलुप्त हो गये तो यह शायद आप की भूळ होगी। वे सामप्त हुये तो अपनी संतति के बढने के कारण्। वे इतना बढे कि उनके जीने के लिये जगह , भोजन और पानी की किल्लत हो गयी। डारविन का नियम है , “struggle for exixtence” लेकिन जीने के लिये संघर्ष भी एक दूसरे से कब तक करेगें । प्रकृति के साथ यह खेल लम्बे समय तक चल न पाया, इसलिये उनको सामूल नष्ट होना पडा।

क्या मनुष्य जाति के साथ भी ऐसी ही परिस्थिति आ सकती है? अभी तक नहीं आयी वह इसलिये कि प्रकृति ने जन्म और मृत्यु मे एक संतुलन बना रखा था। अगर पहले के दिनों को याद करे जब एक घर मे दस बच्चे होते थे , उनमे से 8 मरते थे और 2 ही बचते थे । आज स्थिति बिल्कुल विपरीत है। मेडिकल सांइस ने जन्म और मृत्यु के बीच का अंतर बहुत कम कर दिया है। अब 1 मरता है और 9 बचते हैं। लेकिन वक्त के साथ हमने मृत्यु के बहुत से दरवाजे तो बन्द कर दिये लेकिन जन्म के सारे दरवाजे खुले रखे। उसका परिणाम सब के सामने है, बेताहाशा बढती हुयी जनसंख्या, सारा संतुलन ही बिगड गया।

क्या इन्सानों के लिये परिवार नियोजन केवल आर्थिक मामला है, शायद नहीं। ‘ सम्भोग से सम्माधि की ओर’ मे ओशो ने इस पक्ष की व्याख्या कुछ इस तरह की:

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भोजन तो जुटाया जा सकेगा क्योंकि अभी भोजन के स्त्रोत बहुत हैं और आगे भी रहेगें लेकिन आदमी की भीड बढने के साथ क्या आदमी की आत्मा खो तो नहीं जायेगी। पहली बात ध्यान मे रखें कि जीवन एक अवकाश चाहता है। जंगल मे जानवर मुक्त है, मीलों के दायरे में घूमता है, अगर पचास बन्दरों को एक कमरे में बन्द कर दें तो उनका पागल होना शुरु हो जायेगा। प्रत्येक बन्दर को एक लिविग स्पेस चाहिये,खुली जगह चाहिये , जहां वह जी सके। …………………….बढती हुई भीड एक-एक व्यक्ति पर चारों तरफ़ से अनजाना दबाब डाल रही है, भले ही हम उन दबाबों को देख न पायें। अगर यह भीड बढती चली जाती है तो मनुष्य के विक्षिप्त (neurotic) हो जाने का डर है।” ओशो

हाँ, अलबत्ता , परिवार नियोजन का मामला धार्मिक अवश्य बन गया है। किसी एक पक्ष पर दोषारोपण करने से काम नहीं चलेगा। अलग-2 पक्ष हैं और अलग-2 तर्क वितर्क हैं। एक नजरिया लेते हैं उन पक्षों का-

1-एक पक्ष कहता है कि परिवार नियोजन द्वारा अपने बच्चों की संख्या कम करना धर्म के खिलाफ़ है क्योंकि बच्चे तो ऊपर वाले की देन हैं और खिलाने वाला भी खुदा है। देने वाला वह, करने वाला वह, कराने वाला वह, फ़िर हम क्यों रोक डालें?

2-दूसरा पक्ष यह कहता है कि परिवार नियोजन जैसा अभी चल रहा है उसमें हम देखते हैं कि हिन्दू ही उसका प्रयोग कर रहे हैं, और बाकी धर्म के लोग ईसाई, मुसलिम इसका उपयोग कम कर रहे हैं। तो हो सकता है कि आने वाले कल में इनकी संख्या इतनी बढ जाये कि दूसरा पाकिस्तान मांग लें या पाकिस्तान या चीन जिनकी जनसंख्या अधिक है, वे ताकतवर हो जायें और हम पर हमला करने की चेष्टा करे।

धार्मिक पक्ष के पहले खंड को देखते हैं।

1- सब धर्मों के धर्म गुरूओ ने सब बातें ईश्वर ? पर थोप दीं कि यह सब उसकी मर्जी है और ईश्वर कभी यह जानने नहीं आता कि उसकी मर्जी क्या है। ईश्वर की इच्छा पर हम अपनी इच्छा थोपते हैं । यह तो इन्सान की बुद्दिमता पर निर्भर है कि वह सुख से रहे या दुख से रहे। जब एक बाप अपने 2-3 बच्चों के बाद भी बच्चे पैदा कर रहा है तो वह उन्हें ऐसी दुनिया मे धक्का दे रहा है जहाँ वह सिर्फ़ गरीबी ही बांट सकेगा। आज हमको यह सोचना ही होगा कि जो हम कर रहे हैं , उससे हर आदमी को जीवन की सुविधा कभी नहीं मिल सकती। हमारे धर्म गुरु समझाते हैं कि यह ईश्वर का विरोध है। तो क्या इसका यह मतलब निकाला जाय कि ईश्वर चाहता है कि लोग दीन और फ़टेहाल रहें। लेकिन अगर यही ईश्वर की चाह है तो ऐसे ईश्वर को भी इंकार करना पडेगा।

एक बात और अगर खुदा बच्चे पैदा कर रहा है तो बच्चों को रोकने की कल्पना कौन पैदा कर रहा है? अगर एक चिकित्सक के भीतर से ईश्वर बच्चे की जान को बचा रहा है तो चिकित्सक के भीतर से उन बच्चों को आने से रोक भी रहा है। अगर सभी कुछ उस खुदा का है तो यह परिवार नियोजन का ख्याल भी उस खुदा का ही है। परिवार नियोजन का सीधा सा अर्थ है कि पृथ्वी कितने लोगों को सुख दे सकती है। उससे ज्यादा लोगों को पृथ्वी पर खडे करना , अपने हाथो से नरक बनाना है। दूसरी बात कि ईश्वर कोई स्पाईवेएर नहीं है जो इन्सान की रतिक्रियाओं पर नजर रखे कि वह किसी साधनों का प्रयोग तो नही कर रहा ।

यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि जो समाज जितना समृद्द है , उसकी जनसंख्या उतनी ही कम है। अपने देश, मुस्लिम देशों और पश्चिम देशों मे यह अन्तर साफ़ दिख सकता है। बढती हुई जनसंख्या मे सबसे बुरी मार बेचारे गरीब आदमी की हुई, वह इसलिये गरीब नहीं है क्योंकि उसकी आय के साधन कम है, बलिक इसलिये कि उसकी बुद्दि को भ्रष्ट करने मे उसके तथाकथित धर्मगुरुओं का साथ मिला । एक समृद्द इनसान अपने सेक्स की उर्जा को दूसरे कामों मे लगा देता है -मसलन संगीत, साहित्य, खेल, लेखन आदि। लेकिन एक गरीब के पास सेक्स ही उसके मनोरजंन का साधन मात्र रह जाता है। भारत में अगर अधिक बच्चों का अनुपात देखें तो इस वर्ग मे अधिक मिलता है, और फ़िर वह हिन्दू हो या मुस्लिम , इससे फ़र्क नही पडता। मुस्लिमों में अधिक इसलिये भी है वह अपनी बुद्दि पर कम और अपने धर्मगुरुओं की बुद्दि पर ज्यादा निर्भर रहते हैं। हिन्दू समाज मे वक्त के साथ उनके धर्मगुरुओं का प्रभाव कम होता गया जिसकी वजह से इन लोगों की पकड अब इतनी मजबूत नहीं दिखती।

2-जब हम दूसरे पक्ष के बारे मे बात करें कि क्या परिवार नियोजन को किसी की स्वेच्छा पर छोडा जाना उचित है? यह तो ऐसा ही सवाल है जैसे कि हम हत्या को या डाके को स्वेच्छा पर छोड दें कि जिसे करनी हो करे। अत: परिवार नियोजन को अनिवार्य, कम्पलसरी कर देना ही उचित है। और जब हम इस जीवंत सवाल को अनिवार्य कर देगें तो यह हिन्दू, मुसलमान, ईसाई का सवाल नहीं रह जायेगा। आज के हालातों पर जरा नजर दौडायें तो इन सबके धर्मगुरु समझा रहे हैं कि तुम कम हो जाओगे या फ़लाने जयादा हो जायेगें। और हकीकत यह है कि ये सब जो सोच रहे हैं , इनके सोचने की वजह से भी अनिवार्य परिवार नियोजन का विचार समाप्त हो रहा है।.

एक और सवाल कि ऐसा हो सकता है कि अगर मुस्लिमों की आबादी इतनी बढ जाय कि वह दूसरे पाकिस्तान की माँग करने लगें। आज के वैज्ञानिक युग में जनसंख्या का कम होना, शक्ति का कम होना नहीं है। बल्कि जिन मुल्कों की जनसंख्या जितनी अधिक है वह टैकनोलोजी दृष्टिकोण से उतने ही कमजोर है। क्योंकि इतनी बडी जनसंख्या के पालन पोषण मे इनकी अतिरिक्त सम्पति बचने वाली नही है। वह जमाना गया ,जब आदमी ताकतवर था, अब युग दिमाग और मशीन का है। और मशीन उसी देश के पास हो सकेगी, जिस देश के पास संपन्नता होगी और संपन्नता उसी देश के अधिक पास होगी जिस देश के पास प्राकृतिक साधन ज्यादा और जनसंख्या कम होगी।

दूसरी बात यह बात समझने जैसी है कि संख्या कम होने से उतना बडा दुर्माग्य नहीं टूटेगा, जितना बडा दुर्भाग्य संख्या के बढ जाने से बिना किसी हमले के टूट जायेगा। आज के दौर में युद्द इतना बडा खतरा नहीं है जितना कि जनसंख्या विस्फ़ोट का है।

आज हर धर्मावलंबी को यह निर्णय लेना है कि सवाल उनकी गिनती का है या देश का। और अगर गिनती का है तो मुल्क का मर जाना निशचित है। और अगर यह साहसिक निर्णय देश का है तो किसी को तो लेना ही है। जो समाज इस निर्णय को लेगा , वह संपन्न हो जायेगा। मुसलमानों मे उनके बच्चे ज्यादा स्वस्थ ,अधिक शिक्षित होगें, ज्यादा अच्छी तरह जीवन निर्वाह करेगें। वे दूसरे समाजों और खासकर अपने ही समाज मे जिनकी संख्या कीडे-मकोडों की तरह है, उनको छोडकर आगे बढ जायेगें। और, इसका परिणाम यह भी होगा कि दूसरे समाजों और उनके ही समुदायों मे भी स्पर्धा पैदा होगी इस ख्याल से कि वे गलती कर रहे हैं।

यह सब तब ही संभव है जब हमारी सरकारें वोट-बैंक की राजनीति से परे हट कर परिवार नियोजन को स्वेच्छित नहीं , बल्कि अनिवार्य बनायेंगी ।

(इस लेख की मूल भावना ओशो रजनीश की पुस्तक ” सम्भोग से सम्माधि तक ” से ली गई है। विवादों मे घिरी ऐसी पुस्तक जिसको आम लोगों ने हेय दृष्टि से ही देखा, लेकिन पढकर परखा नहीं , ज़ीवन के फ़लसफ़े को एक नया आयाम देती हुई यह पुस्तक , अगर न पढी हो तो पढें अवशय ।)