Category Archives: होम्योपैथी रिसर्च

Short term studentship in Homoeopathy program by CCRH–apply now

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On behalf of Dr. R. K. Manchanda, Director General, Central Council for Research in Homoeopathy (CCRH), applications are invited from interested undergraduate homoeopathic students to participate in theShort Term Studentship in Homoeopathy Program (STSH 2014).

The Council has initiated the Short Term Studentship in homoeopathy Program in order to promote interest and aptitude for research among homoeopathic undergraduates.

The main objective of this program is to provide an opportunity to undergraduate homoeopathic students to familiarize themselves with research methodology and techniques by being associated for a short duration with their seniors on ongoing research program or by undertaking independent projects. This may serve as an incentive for them to take up research as a career in the future. The Institution must provide the student with all facilities for carrying out research.

The Council has decided to initiate the Short Term Studentship in homoeopathy (STSH) Program for homoeopathic undergraduate students of various medical colleges in the country by awarding limited number of studentships to deserving undergraduate students in March, 2014.

The student is required to register on CCRH website ONLINE from 20th June 2014 to 20th July 2014 and submit the application form and proposal from 21st July 2014 to 5th August 2014.

The received applications and proposals will be evaluated by the Council. Results will be announced in October 2014 and list of selected students displayed on the website. If selected, the student is expected to complete the project between October 2014 and March 2015 and submit the report before the last date of submission i.e. 20th April 2015.

The student will be awarded stipend and certificate only if his/her report is approved.

The value of the studentship will be Rs. 10,000/- only and is meant to be a stipend for the student. Cost of research must be borne by Medical College/ Institution where research is carried out.

For any queries please contact preferably through email:

Dr. Praveen Oberai, Scientist ’4′ / Dr. Chetana Lamba, Scientist-1,
Central Council for Research in Homoeopathy
61-65, Institutional Area, D-Block, Janakpuri, New Delhi – 110058, India

Telephone No.: 91-11-28525523, 28521162
Fax: 91-11-28521060, 28521162
E-mail: sts.ccrh@gmail.com

More at : http://ccrhscholarship.in/
courtesy  : http://homeobook.com/short-term-studentship-in-homoeopathy-program-by-ccrh-apply-now

होम्योपैथी दवाओं के लिए नोएडा में पौधों का संरक्षण

Homeopathic medication

होम्योपैथी पद्दति में  करीब 1400 प्रकार की दवाएं पौधों से बनती हैं। इनमें 50 से ज्यादा पौधे ऐसे हैं, जिनका इस्तेमाल सिर से लेकर पैर तक के रोगों की कारगर दवा बनाने के लिए किया जाता है। ऐसे ही चार दर्जन से अधिक पौधों का सेक्टर-24 स्थित केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान केंद्र संरक्षण कर रहा है। इसके लिए अनुसंधान केंद्र में ग्रीन हाउस बनाने की भी तैयारी है। इस केंद्र में नई दवाओं को इजाद करने के लिए कई शोध भी किए जा रहे हैं।
अनुसंधान केंद्र के वनस्पति वैज्ञानिक अरुण कुमार तिवारी ने बताया कि हर छोटे और बड़े औषधीय पौधे की अपनी खासियत होती है। यह पौधे गंभीर बीमारियों के इलाज की क्षमता रखते हैं। यही वजह है कि यहां पौधों से दवाएं बनाने के अलावा उनकी अन्य गुणवत्ताओं की खोजों पर भी काम किया जाता है। समय-समय पर किए जाने वाले शोधों से बेहतरीन दवा इजाद की जाती है। एक दवा को बनाने के लिए एक ही प्रजाति के तीन से चार पौधों का रस निकाला जाता है। जिस पौधे से ज्यादा रस निकालता है, उसी से ज्यादा कारगर दवा बनती है। रस को सुखाया जाता है और एल्कोहल मिलाकर दवा बनाई जाती है। अरुण कुमार ने बताया कि अनुसंधान केंद्र की छत पर एक छोटा सा ग्रीन हाउस बनाया जाएगा, जिसमें पौधे और भी सुरक्षित रहेंगे।
कुछ प्रमुख पौधे
 वसाका
इस्तेमाल में आने वाला भाग- पत्तियां
उपयोग- सर्दी-जुकाम, खांसी
——
आंवला
इस्तेमाल में आने वाला भाग- फल
उपयोग- रक्त शोधक
——-
 इमली
इस्तेमाल में आने वाला भाग- फल
उपयोग- सर्दी-जुकाम, बदजहमी
——-
सलपर्णी
इस्तेमाल में आने वाला भाग- जड़
उपयोग- बुखार, सिरदर्द, मेनेनजाइटिस
—–
 लाेंग
इस्तेमाल में आने वाला भाग- फल
उपयोग- बुखार, कफ निस्सारक
——
अश्वगंधा
इस्तेमाल में आने वाला भाग- जड़ें
उपयोग- फेरेंजाइटिस, बवासीर और बुखार
——
सतावर
इस्तेमाल में आने वाला भाग- अंकुरित हिस्सा
उपयोग- मधुमेह
——
 जामुन
इस्तेमाल में आने वाला भाग- बीज
उपयोग- मधुमेह और मुहांसे
——
एलोवेरा
इस्तेमाल में आने वाला भाग- पत्तियां
उपयोग- बवासीर और डायरिया
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पौधा- गिलोय
इस्तेमाल में आने वाला भाग- तना और जड़
उपयोग- पीलिया और कमजोरी
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पौधा- पत्थर चूर
इस्तेमाल में आने वाला भाग- पत्तियां
उपयोग- पेशाब संबंधी दिक्कतों का इलाज
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पौधा- कालमेध
इस्तेमाल में आने वाला भाग- पूरा पौधा
उपयोग-सर्दी- जुकाम, खांसी और पीलिया
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पौधा- जटरोफा
इस्तेमाल में आने वाला भाग- बीज
उपयोग- हैजा, डायरिया, बदहजमी
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पौधे- कुंदरू
इस्तेमाल में आने वाला भाग- पत्तियां
उपयोग- मधुमेह
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पौधे- सर्पगंधा
इस्तेमाल में आने वाला भाग- जड़े
उपयोग- हाइपरटेंशन
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पौधा- सतावर
इस्तेमाल में आने वाला भाग- जड़
उपयोग- महिलाओं के लिए शक्तिवर्धक
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(इनको मिलाकर करीब 50 किस्मों के पौधे अनुसंधान केंद्र में मौजूद हैं)

2013 के मध्य में शुरू होगा म्यूजियम
अनुसंधान केंद्र की सबसे ऊपरी मंजिल पर बन रहा म्यूजियम 2013 के मध्य में शुरू होगा। अनुसंधान केंद्र के उपनिदेशक डॉ. सुनील कुमार ने बताया कि इस म्यूजियम में होम्योपैथी की शुरुआत, दवाओं और भविष्य में होने वाले शोध की जानकारी थ्री-डी और फोर-डी के जरिए दी जाएगी। म्यूजियम में 50 सीटों का एक छोटा सा हॉल भी होगा, जिसमें होम्योपैथी पर डॉक्यूमेंट्री मूवी दिखाई जाएगी।

साभार : अमर उजाला दिनांक १०-४-२०१२

Extreme Homeopathic Dilutions retain starting materials- A nanoparticulate perspective : research Paper by IIT researchers Prashant , A.K.Suresh, Jayesh Bellare & Shantaram Govind

 

छह महीने पहले ब्रिटिश मेडिकल असोसिएशन द्वारा होम्योपैथी के वैज्ञानिक आधार को लेकर लगाए गए सवालिया निशान का भारत के वैज्ञानिकों ने करारा जवाब दिया है। आईआईटी बॉम्बे के वैज्ञानिकों ने अपने एक शोध में साबित किया है कि होम्योपैथी की छोटी, उजली और मीठी गोलियां नैनोटैक्नॉलजी के सिद्धांत पर काम करती हैं।

आईआईटी बॉम्बे ने हाल ही में ‘अलसेवियर’ मैगजीन में ‘ होम्योपैथी ‘ पर एक रिसर्च प्रकाशित किया है। इसमें कहा गया है कि होम्योपैथी पिल्स में सोना, तांबा और लोहा जैसे नैचरल मेटल्स होते हैं। इनके घुलने की क्षमता मीटर के एक अरबवें हिस्से तक की होती है।

गौरतलब है कि आईआईटी बॉम्बे के केमिकल इंजिनियरिंग के वैज्ञानिकों ने होम्योपैथिक पिल्स के घुलने की क्षमता का अध्ययन किया। वैज्ञानिकों ने गोलियों के घुलने के बाद शक्तिशाली इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से इस घोल का अध्ययन किया और उनमें मौजूद मेटल्स के नैनो पार्टिकल्स का पता लगाया।

वैज्ञानिकों की टीम में शामिल डॉक्टर जयेश बेल्लारी ने बताया, ‘निश्चित रूप से अतिघुलनशील होने के बावजूद होम्योपैथी पिल्स में मापने योग्य मेटल्स मौजूद होते हैं।’ सीधी भाषा में समझें तो 4 लाख कणों में से एक कण के कंसन्ट्रेशन के बावजूद यह गोलियां असरकारक होती हैं।

डॉक्टर जयेश ने बताया कि उनके छात्र प्रशांत चिक्रमाने ने ‘ एक्सट्रीम होम्योपैथिक डायल्यूशन्स रिटेन स्टार्टिंग मटीरियल्स : अ नैनोपार्टिकुलेट पर्सपेक्टिव ‘ पर थीसिस लिखा है। होम्योपैथी मॉर्डन मेडिसिन के लिए पहेली बना हुआ है। इसके डॉक्टरों ने इसकी घुलनशीलता और मेटल्स की मौजूदगी पर काफी अध्ययन किया है। इसे हर तरह से जांचा परखा है, लेकिन इसके मैकेनिज्म पर अब भी काफी काम किया जाना बाकी है।

Scientists from the Indian Institute of Technology-Bombay (IIT-B) have established that the sweet white pills work on the principle of nanotechnology.
    Homeopathic pills—made of naturally occurring metals such as gold and copper-—retain their potency even when diluted to a nanometre or one-billionth of a metre, states the IIT-B research published in the latest issue of Homoeopathy, a peer-reviewed journal published by the reputed Elsevier. IIT-B’s chemical engineering department bought commonly available homoeopathic pills from neigbourhood shops, prepared highly diluted solutions and checked under powerful electron microscopes to find nanoparticles of the original metal.
    “Our paper showed that certain highly diluted homoeopathic remedies made from metals still contain measurable amounts of the starting material, even at extreme dilutions of 1 part in 10 raised to 400 (200C),’’ said Dr Jayesh Bellare. His student, Prashant Chikramane, presented the paper ‘Extreme homoeopathic dilutions retain starting materials: A nanoparticulate perspective’, as part of his doctoral thesis. IIT theory proves what some homoeopaths have always known
    Homoeopathy was established in the late 18th century by German physician Samuel Hahnemann. While it is widely popular in certain countries, especially India, the British Medical Association and the British parliament have in recent times questioned homoeopathy’s potency. Around four years ago, British research papers rubbished homoeopathy as a mere “placebo’’.
    “Homoeopathy has been a conundrum for modern medicine. Its practitioners maintained that homeopathic pills got more potent on dilution, but they could never explain the mechanism scientifically enough for the modern scientists,’’ said Bellare. For instance, if an ink-filler loaded with red ink is introduced into the Powai lake, Bellare said, there would be no chance of ever tracing it. “But the fact is that homoeopathic pills have worked in extreme dilutions and its practitioners have been able to cure tough medical conditions,” he added.
    “We had analyzed ayurvedic bhasmas a few years ago and found nanoparticles to be the powering agent ,” the team members said. For the first time, scientists used equipment like transmission electron microscope, electron diffraction and emission spectroscopy to map physical entities in extremely dilution. They could measure nanoparticles of gold and copper (the original metal used in the medicines).
    American homoeopaths—Dr Joh Ives from Samueli Institute in Virginia and Joyce C Fryce from the Centre of Integrative Medicine, University of Maryland—said, “We are all familiar with the simple calculations showing that a series of 1:99 dilutions done sequentially will produce a significant dilution of the starting material in very short order,” they wrote in a special editorial in the journal. But as dilution increases, this theory goes awry. “(But) Chikramane et al found that, contrary to our arithmetic, there are nanogram quantities of the starting material still present in these ‘high potency’ remedies.’’
    The hypothesis is that nanobubbles form on the surface of the highly diluted mixtures and float to the surface, retaining the original potency. “We believe we have cracked the homoeopathy conundrum,’’ said Bellare. According to homoeopath Dr Farokh J Master, the IIT theory has proven something what practitioners have always known. “My instruction to my patients has always been to dilute the pills in water and stir it 10 times with a spoon. Then remove the spoon , dip it in another cup of water and stir 10 times. I advise my patients to do this in five cups before discarding the first four cups and then drinking the fifth cup in two equal doses,’’ said Master.
MEDICAL FACTS
FOR…
Homeopathy works on the principles of nano-particles, say IIT-B’s department of chemical engineering team
    Using state-of-the art techniques, they could find particles of the original element as small as one-billionth of a metre
    The hypothesis is that a nanoparticle-nanobubble rises to the surface of the diluted solution; it is this 1% of the top layer that is collected and further diluted. So, the concentration remains
AGAINST…
Homeopathy is merely a placebo, said a meta-analyses published in the Lancet in 2005.
    The British Medical Association said that homeopathy had no scientific basis; dub it witchcraft
    Many National Health Services in the UK excluded homeopathy from their purview

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Treating Acute infections in Homeopathy – एक्यूट संक्रमणॊं का होम्योपैथी मे उपचार

जुलाई से लेकर सितम्बर तक के ज्वरों मे लगभग एक तरह की  समानता देखी जाती है । ज्वर की प्रवृति मे तेज बुखार, ठंड लगने के साथ, तेज सरदर्द ,वमन , बदन का टूटना आदि प्रमुख्ता से रहते हैं . लेकिन कुछ विशेष अन्तर भी रहते हैं जिनके आधार पर इनकी पहचान की जा सकती है , विशेषकर उन इलाकों मे जहाँ महँगे जाँच करवाना संभव नही होता .

क्रं. मलेरिया डेगूं चिकिनगुनिया
1. ठँड से काँपना, जिसकी पहचान डाइगोनिस्टिक किट और ब्लड स्मीर से की जाती है . डॆगूं मे अधिकतर रक्त से संबधित समस्यायें होती हैं जैसे त्वचा पर छॊटॆ लाल दाग जो WBC और platelet की कमी से होते हैं . चिकिनगुनिया में जोडॊं ( संधिस्थलों ) मे दर्द और सूजन अधिक रहती है .
2.   डॆगूं का बढना जो WBC और PLatelet ( < 100000/L ) की संख्या मे कमी से लगाया जाता है . चिकनगुनिया में WBC और platelet की संख्या मे विशेष फ़र्क नही पडता.
3.   Positive Torniquet Test : Blood pressure cuff को पांच मिनटॊं तक systolic और diastolic blood pressure के बीच के अंक पर फ़ुलाये रखें . यदि प्रति स्कैवेर इंच मे दस से अधिक छॊटॆ लाल चकत्ते दिखाई दें तो जाँच का परिणाम निशिचित रुप से positive है .  

लेकिन अगर इस बार देखें तो ज्वर की प्रकृति अलग सी देखी गई है । गत वर्ष जहाँ  डॆगूं और चिकिनगुनिया का संक्रमण अधिक था वहीं इस बार मलेरिया के केस बहुतायात मे पाये गये । आम तौर से यह समझा जाता है कि होम्योपैथी चिकित्सा पद्दति सिर्फ़ लक्ष्णॊं पर आधारित चिकित्सा पद्द्ति है और उसमे डाइगोनिसस का विशेष स्थान नही है । लेकिन यह सच नही है , विशेषकर एक्यूट रोगों मे डाइगोसिस आधारित चिकित्सा दवा के सेलेकशन मे मदद करती है और व्यर्थ  का कनफ़्यूजन  नही खडा करती । एक्यूट रोगों मे सेलेक्शन के विकल्प कई हैं ( नीचे देखें ) , इनमें क्लासिकल होम्योपैथी भी है , काम्बीनेशन  भी , मदर टिन्चर भी , क्या सही या या क्या गलत यह पूर्ण्तया चिकित्सक के विवेक पर निर्भर है , लेकिन अगर लक्षण स्पष्ट हों तो क्लासिकल को पहली पंसद बनायें नही तो और तरीके तो हैं ही 🙂

एक्यूट रोगों में सेलेकशन के विकल्प :

१. disease specific औषधियाँ:

specifics का रोल न होते हुये भी इस सच को नजरांदाज करना असंभव है कि कई एक्यूट रोगों मे इलाज disease specific ही होता है जैसे टाइफ़ायड मे baptisia , Echinacea , infective hepatitis में chelidonium , kalmegh  , Dengue  मे eup perf  , acute diarrhoea मे alstonia , cyanodon , आम वाइरल बुखार में Euclayptus  ,Canchalgua ,  मलेरिया के लिये  विभिन्न एर्टेमिसिआ (कोम्पोसिटी) प्रजातियां जैसे कि एर्टेमिसिआ एब्रोटनुम (एब्रोटनुम), एक मारिटिमा (सिना), एक एब्सिनठिअम (एब्सिनठिअम) , chinum sulph, china , china ars आदि ।

२. सम्पूर्ण लक्षण के आधार पर: (Totality of symptoms )

अक्सर होमियोपैथी चिकित्सा नीचे लिखे गए लक्षणो को ध्यान में रखकर दी जाती है –

  • ठंड और बुखार के प्रकट होने का समय
  • शरीर का वह भाग, जहां से ठंड की शुरूआत हुई और बढी।
  • ठंड या बुखार की अवधि
  • ठंड, गर्म और पसीना आने के चरणों की क्रमानुसार वृद्धि
  • प्यास/ प्यास लगना/ प्यास की मात्रा/ अधिकतम परेशानी का समय
  • सिरदर्द का प्रकार और उसका स्थान
  • यह जानना कि लक्षणों के साथ साथ जी मतलाना/ उल्टी आना/ या दस्त जुडा हुआ है या नहीं।

३. NWS ( Never well since ) :

अगर रोग का कारण specific हो जैसे रोगी का बारिश के पानी मे भीगना ( Rhus tox ) , दिन गर्म लेकिन रातें ठंडी ( Dulcamara ), ठंडी हवा लगने से (aconite ), अपच खाना खाने से ( antim crud , pulsatilla आदि )

४. रोगी की गतिविधि ( Activity ) , ठंडक और गर्मी से सहिषुण्ता/असहिषुणता ( Thermal  ), प्यास (Thirst )और मानसिक लक्षण में  बदलाव ( changes in mental attitude of the patient ) ;

डां प्रफ़ुल्ल विजयरकर का यह वर्गीकरण एक्यूट रोगों में संभवत: दवा सेलेकशन का सबसे अधिक कारगर तरीका है । लेकिन यह सिर्फ़ एक्यूट इन्फ़ेशन के लिये ही है , जैसा नीचे दिये चार्ट १ से स्पष्ट है कि यह indispositions और Acute Exacerbations of Chronic diseases  मे इसका कोई रोल नही है । प्रफ़ुल्ल के सूत्र आसान है , गणित की गणनाओं की तरह , रोग के दौरान रोगी की गतिविधि ( decreased , increased or no change ) , ठंडक और गर्मी से सहिषुण्ता/असहिषुणता ( Thermal : chilly / hot ) ,  प्यास (Thirst ( increased or decreased )  और मानसिक लक्षण में  बदलाव ( changes in mental attitude of the patient : diligent or non diligent ) पर गौर करें , और यह तब संभव है जब मैटेरिया मैडिका पर पकद मजबूत हो । उदाहारणत: एक रोगी जो तेज बुखार की हालत में सुस्त और ठंडक को सहन नही कर पा रहा है , प्यास बिल्कुल भी नही है और आस पास के वातावरण मे उसका intrest बिल्कुल् भी  नही है , उसका सूत्र  DCTL   (Axis : Dull +Chilly+thirstless ) होगा । इस ग्रुप में Sepia ,Gels ,Ac. Phos ,Ignatia ,Staph ,Ipecac ,Nat-Carb ,China  प्रमुख औषधियाँ हैं , चूँकि स्वभावत: वह किसी भी कार्य को करने मे अरुचि दिखा रहा है इस ग्रेड मे सीपिया प्रमुख औषधि होगी । जो चिकित्सक प्रफ़ुल्ल का अनुकरण करते हैं वह अच्छी तरह से जानते हैं कि उनके सूत्र कितने प्रभावी हैं ।

DCTL   (Axis : Dull +Chilly+thirstless )
4)Sepia 5)Gels 6)Ac. Phos 7)Ignatia 8)Staph 9)Ipecac 10)Nat-Carb 11)China

DCT (Axis : Dull+chilly+thirsty)
12)Nux-vom 13)Eup-per 14)Phos 15)Calc-c 16)Bell 17)China 18)Silicea 19)Hyos

DHTL (Axis : Dull+hot+thirstless)
20)Puls 21)Bry 22)Apis 23)Lach 24)Sulph 25)Lyc 26)Thuja 27)Opium 28)Carbo-v

DHT ( Axis : Dull+hot+thirsty)
29)Bry 30)Nat. Mur 31)Sulph 32)Lyc 33)    Merc. S. 34)Apis   

विस्तार से यहाँ बताना संभव नही है लेकिन अधिक जानकारी के लिये यहाँ और यहाँ देखें ।

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                           चित्र १ : Dr Praful Vijayakar’s Acute system :

            साभार : http://www.hompath.com/VFeatures.html

 

 

S. No Acute Infection  Indisposition Acute Exacerbations of Chronic disease
1 Viral  fevers, Influenza, tonsilitis ,Sore Throat, Typhoid,  Pneumonia, Pneumonitis, Lung Abscess , Septicaemia, Food poisoning,Infective diarrhoea, Dysentry,Urinary tract colics,  Pleurisy. Treatment not required

constitutional
required

 

 

                 ्चित्र २

flow chart of acute cases

                                                  चित्र३ ( Flow chart of Acutes by Dr Praful Vijarkar )

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                                      चित्र ४ साभार : http://www.hompath.com/VFeatures.html

     

किसी भी एक्यूट केस और विशेषकर संक्रमण रोगों मे हैनिमैन द्वारा प्रतिपादित आर्गेनान के तीन सूत्र  १०० -१०२ को पढने  से हैनिमैन की विचारधारा का स्पष्ट मूलाकंन किया जा सकता है । यह भी अजीब इत्फ़ाक है कि जिस आर्गेनान को डिग्री लेने के लिये सिर्फ़ पढा जाता हो उसका सही मूल्याकंन प्रैक्टिस के दौरान अधिक बेहतर तरीके से किया जा सकता है । 🙂

हैनिमैन लिखते है :

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सूत्र १०० – महामारी और संक्रामक रोगों का उपचार

महामारी और बडे पैमाने पर फ़ैलने वाले संक्रामक रोगों की चिकित्सा करने के सिलसिले मे चिकित्सक को इस जाँच पडताल के चक्कर मे नहीं पडना चाहिये कि उस नाम की या उस प्रकार की बीमारी का प्रकोप पहले हो चुका है या नही । इस प्रकार की जिज्ञासा व्यर्थ है क्योंकि उस जानकारी को आधार बना कर वर्तमान महामारी या रोग की चिकित्सा करना जरुरी नही । चिकित्सक को तो उसे एक नया रोग मान लेना चाहिये और यही मानकर उसे रोग का सम्पूर्ण चित्र अपने मस्तिष्क मे बैठाने का प्रयास करना चाहिये । इसी प्रकार किसी भी औषधि  का  वैज्ञानिक आधार करने के लिये यह जरुरी है कि वह उस औषधि को जाने और भली भाँति परीक्षण कर ले । चिकित्सक को अपने मन मे यह धारण कभी भी न बन्ननी चाहिये कि रोग बहुत कुछ पिछ्ले रोग से मिलता हुआ है तथा रोगी मे लगभग वही लक्षण विधमान है जो पहले किसी रोग मे हो चुके हों । यदि चिकित्सक सावधानी से रोगी का परीक्षण करेगे तो यह पायेगे कि कि यह नई माहमारी पिछली माहमारी से सर्वथा भिन्न्न है और लोगों ने भ्रम वश उसे एक ही नाम दिया है । यह भिन्नता संक्रामक रोगों के अतिरिक्त बडे पैमाने पर होने वाले अन्य रोगों मे भी पायी जाती है । परन्तु खसरा , चेचक आदि संक्रामक रोगों पर यह नियम नही लागू होता ।

§ 100

In investigating the totality of the symptoms of epidemic and sporadic diseases it is quite immaterial whether or not something similar has ever appeared in the world before under the same or any other name. The novelty or peculiarity of a disease of that kind makes no difference either in the mode of examining or of treating it, as the physician must any way regard to pure picture of every prevailing disease as if it were something new and unknown, and investigate it thoroughly for itself, if he desire to practice medicine in a real and radical manner, never substituting conjecture for actual observation, never taking for granted that the case of disease before him is already wholly or partially known, but always carefully examining it in all its phases; and this mode of procedure is all the more requisite in such cases, as a careful examination will show that every prevailing disease is in many respects a phenomenon of a unique character, differing vastly from all previous epidemics, to which certain names have been falsely applied – with the exception of those epidemics resulting from a contagious principle that always remains the same, such as smallpox, measles, etc.

सूत्र १०१- महामारी का निदान

बहुधा ऐसा होता है कि चिकित्सक किसी संक्रामक रोग से पीडित व्यक्ति  को पहली बार देखने पर समझ न पाये । लेकिन उसी प्रकार के कई रोगियों को देखने के बाद चिकित्सक को रोग के सभी लक्षण और चिन्ह याद हो जायेगें । यदि चिकित्सक  तीक्ष्ण निरीक्षण वाला है तो एक या दो रोगी को देखने के बाद ही रोग के लक्षण उसके मन मे अंकित हो जायेगें और अपनी इस  जानकारी के आधार पर वह सामान लक्षण वाली दवा का चुनाव कर सकेगा ।

§ 101

It may easily happen that in the first case of an epidemic disease that presents itself to the physician’s notice he does not at once obtain a knowledge of its complete picture, as it is only by a close observation of several cases of every such collective disease that he can become conversant with the totality of its signs and symptoms. The carefully observing physician can, however, from the examination of even the first and second patients, often arrive so nearly at a knowledge of the true state as to have in his mind a characteristic portrait of it, and even to succeed in finding a suitable, homoeopathically adapted remedy for it.

सूत्र १०२ – माहामारियों के ल्क्षण

महामारियों से पीडित रोगियों के लक्षण  लिखते-२ चिकित्सकों के मस्तिष्क मे रोग का चित्र और भी अधिक स्पष्टता से उभर आता है । इस प्रकार लिखे गये विवरण से रोग की और ही विशेषतायें उभर कर आ जाती हैं परन्तु इसके साथ ही कुछ लक्षण ऐसे भी प्रकाश मे आते हैं जो केवल कुछ रोगियों मे प्रकट होते हैं और सभी रोगियों मे नही पाये जाते । अत: विभिन्न प्रकृति के अनेक रोगियों को देख कर रोग की यथार्थ जानकरी प्राप्त की जा सकती है ।

§ 102

In the course of writing down the symptoms of several cases of this kind the sketch of the disease picture becomes ever more and more complete, not more spun out and verbose, but more significant (more characteristic), and including more of the peculiarities of this collective disease; on the one hand, the general symptoms (e.g., loss of appetite, sleeplessness, etc.) become precisely defined as to their peculiarities; and on the other, the more marked and special symptoms which are peculiar to but few diseases and of rarer occurrence, at least in the same combination, become prominent and constitute what is characteristic of this malady.1 All those affected with the disease prevailing at a given time have certainly contracted it from one and the same source and hence are suffering from the same disease; but the whole extent of such an epidemic disease and the totality of its symptoms (the knowledge whereof, which is essential for enabling us to choose the most suitable homoeopathic remedy for this array of symptoms, is obtained by a complete survey of the morbid picture) cannot be learned from one single patient, but is only to be perfectly deduced (abstracted) and ascertained from the sufferings of several patients of different constitutions.

आर्गेनान के इन तीन सूत्रॊं को पढने के बाद हैनिमैन के “Genus Epidemics ‘ की परीभाषा को आसानी से समझा जा सकता है । संक्रामक रोगों मे एक ही सत्र मे चुनी गई औषधि जो कई रोगियों मे व्याप्त लक्षणॊं को कवर करती है  , जीनस इपीडिमिकस कहलाती है । यही कारण था कि पिछ्ले कई महामरियों मे होम्योपैथिक दवाओं ने अपना सर्वष्रेष्ठ असर दिखलाया ।

Complete Freund’s Adjuvant (CFA) द्वारा गठिया से पीडित किये गये चूहों पर होम्योपैथिक औषधि रस टाक्स के परीक्षण ( Modulation of arthritis in rats by Toxicodendron pubescens and its homeopathic dilutions.)

rats

Source : pubmed & Indian Journal of Research in Homeopathy

पशुऒं पर होम्योपैथिक दवाओं के परीक्षण अधिक देखे नही जाते हैं लेकिन इधर हाल के दिनों मे इन परीक्षणॊं की संख्या बढी है , हाँलाकि यह होम्योपैथिक सिद्दातों का पूर्ण रुप से पालन नही करते इसके बावजूद इनकी महत्ता से इन्कार नही किया जा सकता है । होम्योपैथिक पद्दति मे निशिचित सिद्दांत हैं और उनके लिये लक्षणॊं का लेना और उनके ऊपर प्रेसक्राब करना एक अनिवार्य शर्त है ।

हाँलाकि हाल ही मे The Faculty of Homeopathy २०११जर्नल मे प्रकाशित एक लेख जो पबमेड पर प्रकाशित हुआ कम चर्चा का विषय रहा । पटेल इन्सटिटुयूट आफ़ फ़ारमासियुटिकल रिसर्च के सी.आर. पाटिल , आर.बी.जाधव आदि का लेख रस टाक्स की anti inflammatory property पर था ।

सर्वप्रथम Complete Freund’s Adjuvant (CFA) द्वारा चूहों को गठिया से पीडित किया गया और उसके बाद सिलसिलेवार शुरु हुये  प्रयोगशाला परीक्षण । रस टाक्स के 3cH, 6cH, 30cH, 200cH पोटेन्सी को सफ़लतापूर्वक प्रयोग  कर के उनके परिणामों को होम्योपैथिक मैटैरिया मेडिका आदि मे वर्णित लेखों  के आधार को  सही पाया गया । यह रिसर्च अभी जारी है ।

Modulation of arthritis in rats by Toxicodendron pubescens and its homeopathic dilutions.

Patil CR, Rambhade AD, Jadhav RB, Patil KR, Dubey VK, Sonara BM, Toshniwal SS.

Source

R. C. Patel Institute of Pharmaceutical Education and Research, Karvand Naka, Shirpur 425 405, Dhule, Maharashtra, India.

Abstract
BACKGROUND:

Toxicodendron pubescens P. Mill (Anacardiaceae) known in homeopathy as Rhus toxicodendron (Rhus tox) is used as an anti-inflammatory medicine in homeopathic practice. In this study, Rhus tox in its crude form and homeopathic dilutions (3cH, 6cH, 30cH, 200cH) was evaluated for effects on Complete Freund’s Adjuvant (CFA) induced arthritis in rats.

METHOD:

We assessed the severity of arthritis through observations including inflammatory lesions, body and organ weight and hematological parameters including C-reactive protein (CRP). Blinded radiological analysis of the affected joints and pain intensity determination was also carried out.

RESULTS:

Rhus tox protected rats from CFA-induced inflammatory lesions, body weight changes and hematological alterations. Rhus tox protected against radiological joint alterations due to arthritis. Arthritic pain scores were also favorably affected by Rhus tox. All the dilutions of Rhus tox including crude form showed anti-arthritic activity. The maximum protective effect was evident in the crude form at 10mg/kg/day, by mouth.

CONCLUSION:

This study supports claims in the homeopathic literature on the role of Rhus tox and its ultra dilutions in the treatment of arthritis and associated pain. Further study is needed to explain this anti-arthritic effect of Rhus tox.

pkt 2

Blog Author ( ब्लाग रचयिता ) : डा. प्रभात टन्डन
जन्म भूंमि और कर्म भूमि लखनऊ !! वर्ष १९८६ में नेशनल होम्योपैथिक कालेज , लखनऊ से G.H.M.S. किया , और सन १९८६ से ही इन्टर्नशिप के दौरान से ही प्रैक्टिस मे संलग्न .. वर्ष १९९४ मे P.H.M.S. join करते-२ मन बदला और तब से प्राइवेट प्रैक्टिस मे ………. आगे देखें

पूरक और वैकल्पिक चिकित्सा पद्दतियों और पशु होम्योपैथिक चिकित्सा के पहले डॆटाबेस का शुभारंभ (Launch of CAM Quest Database & Homeopathic Veterinary Database (VetCR))

जर्मनी में हाल ही में Carstens फाउंडेशन ने सीएएम में एक उत्कृष्ट क्लीकिल रिसर्च का ऑनलाइन डेटाबेस शुरू किया है. एक्यूपंक्चर, anthroposophic चिकित्सा, आयुर्वेद, bioenergetics, हर्बल चिकित्सा, होम्योपैथी, मैनुअल चिकित्सा, मन शरीर चिकित्सा और TCM: नौ विभिन्न उपचारोंको को इस अध्ययन मे शामिल किया गया है.
इस डेटाबेस मे जर्मनी  मे होम्योपैथिक केसों की रिपोर्ट की एक बड़ी संख्या शामिल है .वर्तमान में  यह डेटाबेस अंग्रेजी और फ्रेंच में उपलब्ध है,  लेकिन आगे  अन्य यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद करने की योजना है.  इस साइट पर जाने के लिये  http://www.cam-quest.org&nbsp; पर किल्क करें .
पहला होम्योपैथिक पशु चिकित्सा डेटाबेस (VetCR)
पशु चिकित्सा होम्योपैथी के मामले में नैदानिक ​​अनुसंधान के पहले डेटाबेस अब ऑनलाइन उपलब्ध है. मूल पशु चिकित्सा के अध्ययन पर सभी उपलब्ध साहित्य , यादृच्छिक चिकित्सीय परीक्षण, गैर यादृच्छिक चिकित्सीय परीक्षण, पर्यवेक्षणीय अध्ययन, औषधि की प्रूविगं इस साईट पर सुलभता से उपलब्ध है . इस साईट पर जाने के लिये http://www.carstens-stiftung.de/clinresvet/index.php प्रर किल्क करें .

Launch of CAM-QuestDatabase
The Carstens Foundation in Germany has recently launched an excellent online database of clinica lresearch in CAM. Studies in nine different therapies have been included: acupuncture, anthroposophic medicine, ayurveda, bioenergetics, herbal medicine, homeopathy, manual medicine, mind-body medicine and TCM.
The database includes a large number of German homeopathic case reports and provides the facility to perform searches by disease, therapy and study design. The ‘quick search’ function provides a synopsis of studies using the most common therapies for the most common diseases whilst the ‘expert search’ function enables a detailed, comprehensive search across the CAM therapies and full range of diseases within the database.
At present the database is available in English, French, Dutch and German, but there are plans to translate it into all European languages. It is accessible free of charge at  http://www.cam-quest.org
First Homeopathic Veterinary Database (VetCR)
The first database of clinical research in veterinary homeopathy is now accessible online. Containing all available literature on original veterinary studies it provides access to approximately 200 entries of randomised clinical trials, non-randomised clinical trials, observational studies, drug provings, case reports and case series.
Produced by the Carstens Foundation, the database is freely available at [ http://www.carstens-stiftung.de/clinresvet/index.php

होम्योपैथी चिकित्सा पद्दति – IIT वैज्ञानिकों की नजर मे

होम्योपैथी चिकित्सा पद्दति के साथ सबसे बडी दिक्कत उ्सको प्रयोगशाला मे विशवसनीयता को साबित करना है । एक सदी से होम्योपैथी विभिन्न चिकित्सा कर्मियों और विशेषकर वैज्ञानिकों के दृष्टिकोण मे एक अनबूझी पहेली सी लगती रही है । तमाम क्लीनिकल  परिणामॊ  को दरकिनार रखते हुये बात उसके वैज्ञानिक प्रमाणिकता पर ही टिक जाती है । हाल ही मे IIT मुम्बई के वैज्ञानिकों ने होम्योपैथी दवाओं  की कार्य प्रणाली को समझने की कोशिश की है । IIT मुम्बई की इस टीम के अनुसार होम्योपैथी की  मीठी गोलियों नैनोटेकोनोलोजी के सिद्दांत पर काम करती हैं । देखें पूरी रिपोर्ट   http://homeopathyresearches.blogspot.com/2010/12/iit-b-team-shows-how-homoeopathy-works.html

लेकिन मूल प्रशन कि होम्योपैथी के विरोध का  कारण क्या है ?

  • होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा
  • होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा और आवोग्राद्रो ( Avogadro’s  ) की परिकल्पना

होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा

होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा को विस्तार मे समझने के लिये औषधि निर्माण की प्रक्रिया को समझना पडेगा । होम्योपैथिक औषधियों मे प्राय: दो प्रकार के स्केल प्रयोग किये जाते हैं ।

क) डेसीमल स्केल ( Decimal Scale )

ख) सेन्टीसमल स्केल ( Centesimal Scale )

क) डेसीमल स्केल मे दवा के एक भाग को vehicle ( शुगर आग मिल्क ) के नौ भाग से एक घंटॆ तक कई चरणॊं मे विचूर्णन ( triturate ) किया जाता है । इनसे बनने वाली औषधियों को X शब्द से जाना जाता है जैसे काली फ़ास 6x इत्यादि । 1X  बनाने के लिये दवा का एक भाग और दुग्ध-शर्करा का ९ भाग लेते हैं , 2X के लिये 1X का एक भाग और ९ भाग दिग्ध शर्करा का लेते हैं ; ऐसे ही आगे कई पोटेन्सी बनाने के लिये पिछली पोटेन्सी का एक भाग लेते हुये आगे की पावर को बढाते हैं । डेसीमल स्केल का प्रयोग ठॊस पदार्थॊं के लिये किया जाता है ।

ख) सेन्टीसमल स्केल मे दवा के एक भाग को vehicle ( एलकोहल) के ९९ भाग से सक्शन किया जाता है । इनकी इनसे बनने वाली औषधियों को दवा की शक्ति या पावर से जाना जाता है । जैसे ३०, २०० १००० आदि । सक्शन सिर्फ़ दवा के मूल अर्क को एल्कोहल मे मिलाना भर नही है बल्कि उसे सक्शन ( एक निशचित विधि से स्ट्रोक देना )  करना है । आजकल सक्शन के लिये स्वचालित मशीन का प्रयोग किया जाता है जब कि पुराने समय मे यह स्वंय ही बना सकते थे । पहली पोटेन्सी बनाने के लिये दवा के मूल अर्क का एक हिस्सा और ९९ भाग अल्कोहल लिया जाता है , इसको १० बार सक्शन कर के पहली पोटेन्सी तैयार होती है ; इसी तरह दूसरी पोटेन्सी के लिये पिछली पोटेन्सी का एक भाग और ९९ भाग अल्कोहल ; इसी तरह आगे की पोटेन्सी तैयार की जाती हैं ।

होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा और आवोग्राद्रो ( Avogadro’s  ) की परिकल्पना

रसायन विज्ञान के नियम के अनुसार किसी भी वस्तु को तनु करने की एक परिसीमा है और इस परिसीमा मे रहते हुये यह आवशयक है कि उस तत्व का मूल स्वरुप बरकरार रहे । यह परिसीमा आवोग्राद्रो की संख्या ( 6.022 141 99 X 1023 ) से संबधित है जो होम्योपैथिक पोटेन्सी 12 C से या 24 x से मेल खाता है । यानि आम भाषा मे समझें तो होम्योपैथिक दवाओं की १२ वीं पोटेन्सी और 24 X पोटेन्सी मे दवा के तत्व विधमान रहते हैं उसके बाद नही । होम्योपैथिक के विरोधियों के हाथ यह एक तुरुप का पत्ता है  और जाहिर है उन्होने इसको खूब भुनाया भी ।

यह बिल्कुल सत्य है कि रसायन शास्त्र के अनुसार होम्योपैथी समझ से बिल्कुल परे है । लेकिन पिछले २४ वर्षों  मे १८० नियंत्रित ( controlled ) और ११८  यादृच्छिक ( randomized )  परीक्षणों को अलग -२ ४ मेटा तरीकों  से होम्योपैथी का विश्लेषण करने के उपरांत प्रत्येक मामले में  शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि होम्योपैथी दवाओं से मिलने वाले परिणाम प्लीसीबो से हट कर हैं ।

देखें होम्योपैथी -तथ्य एवं भ्रान्तियाँ " प्रमाणित विज्ञान या केवल मीठी गोलियाँ "( Is Homeopathy a trusted science or a placebo )

IIT-B team shows how homeopathy works

Source : The Times of India 16 dec 2010
Mumbai: Six months after the British Medical Association wrote off homoeopathy as “witchcraft’’ that had no scientific basis, we may now have an irrefutable answer to what makes this ancient form of medicine click. Scientists from the Indian Institute of Technology-Bombay (IIT-B) have established that the sweet white pills work on the principle of nanotechnology.
    Homeopathic pills—made of naturally occurring metals such as gold and copper-—retain their potency even when diluted to a nanometre or one-billionth of a metre, states the IIT-B research published in the latest issue of Homoeopathy, a peer-reviewed journal published by the reputed Elsevier. IIT-B’s chemical engineering department bought commonly available homoeopathic pills from neigbourhood shops, prepared highly diluted solutions and checked under powerful electron microscopes to find nanoparticles of the original metal.
    “Our paper showed that certain highly diluted homoeopathic remedies made from metals still contain measurable amounts of the starting material, even at extreme dilutions of 1 part in 10 raised to 400 (200C),’’ said Dr Jayesh Bellare. His student, Prashant Chikramane, presented the paper ‘Extreme homoeopathic dilutions retain starting materials: A nanoparticulate perspective’, as part of his doctoral thesis. IIT theory proves what some homoeopaths have always known
    Homoeopathy was established in the late 18th century by German physician Samuel Hahnemann. While it is widely popular in certain countries, especially India, the British Medical Association and the British parliament have in recent times questioned homoeopathy’s potency. Around four years ago, British research papers rubbished homoeopathy as a mere “placebo’’.
    “Homoeopathy has been a conundrum for modern medicine. Its practitioners maintained that homeopathic pills got more potent on dilution, but they could never explain the mechanism scientifically enough for the modern scientists,’’ said Bellare. For instance, if an ink-filler loaded with red ink is introduced into the Powai lake, Bellare said, there would be no chance of ever tracing it. “But the fact is that homoeopathic pills have worked in extreme dilutions and its practitioners have been able to cure tough medical conditions,” he added.
    “We had analyzed ayurvedic bhasmas a few years ago and found nanoparticles to be the powering agent ,” the team members said. For the first time, scientists used equipment like transmission electron microscope, electron diffraction and emission spectroscopy to map physical entities in extremely dilution. They could measure nanoparticles of gold and copper (the original metal used in the medicines).
    American homoeopaths—Dr Joh Ives from Samueli Institute in Virginia and Joyce C Fryce from the Centre of Integrative Medicine, University of Maryland—said, “We are all familiar with the simple calculations showing that a series of 1:99 dilutions done sequentially will produce a significant dilution of the starting material in very short order,” they wrote in a special editorial in the journal. But as dilution increases, this theory goes awry. “(But) Chikramane et al found that, contrary to our arithmetic, there are nanogram quantities of the starting material still present in these ‘high potency’ remedies.’’
    The hypothesis is that nanobubbles form on the surface of the highly diluted mixtures and float to the surface, retaining the original potency. “We believe we have cracked the homoeopathy conundrum,’’ said Bellare. According to homoeopath Dr Farokh J Master, the IIT theory has proven something what practitioners have always known. “My instruction to my patients has always been to dilute the pills in water and stir it 10 times with a spoon. Then remove the spoon , dip it in another cup of water and stir 10 times. I advise my patients to do this in five cups before discarding the first four cups and then drinking the fifth cup in two equal doses,’’ said Master.
MEDICAL FACTS
FOR…
Homeopathy works on the principles of nano-particles, say IIT-B’s department of chemical engineering team
    Using state-of-the art techniques, they could find particles of the original element as small as one-billionth of a metre
    The hypothesis is that a nanoparticle-nanobubble rises to the surface of the diluted solution; it is this 1% of the top layer that is collected and further diluted. So, the concentration remains
AGAINST…
Homeopathy is merely a placebo, said a meta-analyses published in the Lancet in 2005.
    The British Medical Association said that homeopathy had no scientific basis; dub it witchcraft
    Many National Health Services in the UK excluded homeopathy from their purview