Category Archives: होम्योपैथिक फ़िलोसफ़ी

होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा और एवोगेड्रो ( Avogadro’s ) की संख्या – क्या एवोगेड्रो की संख्या से होम्योपैथी का मूल्याकंन करना उचित है ?

homeopathy explained

होम्योपैथिक औषधियों के विरोध के प्रमुख कारणॊं मे एक प्रमुख कारण होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा   है । होम्योपैथिक औषधियों की न्यून मात्रा को विस्तार मे समझने के लिये औषधि निर्माण की प्रक्रिया को समझना पडेगा । होम्योपैथिक औषधियों मे प्राय: दो प्रकार के स्केल प्रयोग किये जाते हैं ।

क) डेसीमल स्केल ( Decimal Scale )

ख) सेन्टीसमल स्केल ( Centesimal Scale )

क) डेसीमल स्केल मे दवा के एक भाग को vehicle ( शुगर आग मिल्क ) के नौ भाग से एक घंटॆ तक कई चरणॊं मे विचूर्णन ( triturate ) किया जाता है । इनसे बनने वाली औषधियों को X शब्द से जाना जाता है जैसे काली फ़ास 6x इत्यादि । 1X  बनाने के लिये दवा का एक भाग और दुग्ध-शर्करा का ९ भाग लेते हैं , 2X के लिये 1X का एक भाग और ९ भाग दिग्ध शर्करा का लेते हैं ; ऐसे ही आगे कई पोटेन्सी बनाने के लिये पिछली पोटेन्सी का एक भाग लेते हुये आगे की पावर को बढाते हैं । डेसीमल स्केल का प्रयोग ठॊस पदार्थॊं के लिये किया जाता है ।

ख) सेन्टीसमल स्केल मे दवा के एक भाग को vehicle ( एलकोहल) के ९९ भाग से सक्शन किया जाता है । इनकी इनसे बनने वाली औषधियों को दवा की शक्ति या पावर से जाना जाता है । जैसे ३०, २०० १००० आदि ।

सक्शन सिर्फ़ दवा के मूल अर्क को एल्कोहल मे मिलाना भर नही है बल्कि उसे सक्शन ( एक निशचित विधि से स्ट्रोक देना )  करना है । आजकल सक्शन के लिये स्वचालित मशीन का प्रयोग किया जाता है जब कि पुराने समय मे यह स्वंय ही बना सकते थे । पहली पोटेन्सी बनाने के लिये दवा के मूल अर्क का एक हिस्सा और ९९ भाग अल्कोहल लिया जाता है , इसको १० बार सक्शन कर के पहली पोटेन्सी तैयार होती है ; इसी तरह दूसरी पोटेन्सी के लिये पिछली पोटेन्सी का एक भाग और ९९ भाग अल्कोहल ; इसी तरह आगे की पोटेन्सी तैयार की जाती हैं ।

विरोध का मूल कारण और एवोगेड्रो ( Avogadro’s  ) की परिकल्पना

रसायन विज्ञान के नियम के अनुसार किसी भी वस्तु को तनु करने की एक परिसीमा है और इस परिसीमा मे रहते हुये यह आवशयक है कि उस तत्व का मूल स्वरुप बरकरार रहे । यह परिसीमा आवोग्राद्रो की संख्या ( 6.022 141 99 X 1023 ) से संबधित है जो होम्योपैथिक पोटेन्सी 12 C से या 24 x से मेल खाता है । यानि आम भाषा मे समझें तो होम्योपैथिक दवाओं की १२ वीं पोटेन्सी और 24 X पोटेन्सी मे दवा के तत्व विधमान रहते हैं उसके बाद नही । होम्योपैथिक के विरोधियों के हाथ यह एक तुरुप का पत्ता था और जाहिर है उन्होने इसको खूब भुनाया भी ।

यह बिल्कुल सत्य है कि रसायन शास्त्र के अनुसार होम्योपैथी समझ से बिल्कुल परे है । लेकिन पिछले २४ वर्षों  मे १८० नियंत्रित ( controlled ) और ११८  यादृच्छिक ( randomized )  परीक्षणों को अलग -२ ४ मेटा तरीकों  से होम्योपैथी का विश्लेषण करने के उपरांत प्रत्येक मामले में  शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि होम्योपैथी दवाओं से मिलने वाले परिणाम प्लीसीबो से बढ कर हैं ।

होम्योपैथी के संबध मे प्राथमिक प्रशन उभरता है कि क्या सक्शन ( succession ) किये गये SAD ( serially agitated dilutes )  को तरल वाहनों जैसे एल्कोहल या जल  ( liquid vehicles e.g. alcohol , water etc )  से अलग कर के पहचान की जा सकती है जो होम्योपैथिक औषधि के रुप मे उपचार के लिये प्रयोग किये जाते हैं । हाँलाकि इससे प्लीसीबो के आरोपों से मुक्ति नही पा जा सकती लेकिन इससे पता अवशय चलता है कि हर औषधि की अपनी विशेषता क्या है ।

एक सदी से  मेडिकल साहित्य की समीक्षा करने से पता चलता है कि ऐसे कई रिपोर्ट उपलब्ध हैं जिससे यह पहचान की जा सकती है कि इन उच्च  potentised  dilutes का प्रभाव जीवाणु , प्राणि विषयों , वनस्पति और यहाँ तक कि जन्तुओं पर भी असरदारक है । इनके लिये भौतिकी और बायोकेमिस्ट्री दोनों का ही समय-२ पर प्रमाण स्वरुप सहायता ली गई । हाँलाकि इन रिपोर्टों से SAD की आणविक संरचना समझ मे नही आती लेकिन यह बिल्कुल तय है कि यह SAD  तरल वाहनों ( liquid vehicles ) से हटकर हैं ।

इस विषय पर पहल्रे भी चर्चा हो चुकी है । देखें होम्योपैथी -तथ्य एवं भ्रान्तियाँ ” प्रमाणित विज्ञान या केवल मीठी गोलियाँ “( Is Homeopathy a trusted science or a placebo )  लेकिन नवीनतम शोघॊं मे  रसायन शास्त्री श्री बिपलब चक्र्वर्ती और डा. मो. रुहल अमीन के शोध होम्योपैथी औषधियों और एवोगेड्रो  संख्या पर प्रकाश डालने वाले हैं । उनके ब्लाग http://www.aminchakraborty.blogspot.in/  नवीन संभवनाओं को जन्म देता है । बिपलब चक्र्वती एक समय होम्योपैथिक के बडे आलोचक रहे हैं  लेकिन पिछ्ले १० सालॊ से बिपलब और डा. अमीन होम्योपिथिक दवाओं के सांइनटैफ़िक पहलू पर कार्य कर रहे हैं । आपके कई शोध पत्र विभिन्न शोध संस्थानों द्वारा सराहे गये है ।

आवाग्रादो की परिकल्पना और होम्योपैथी के विवाद मे अमीन लिखते है :

How and Why Avogadro’s Number does not Limit efficacy of the Homeopathic Remedies.
#       Homeopathic dilutions have been used since 1800 and remained unchallenged until determination of Avogadro’s number.
#       Homeopathic remedies were challenged only after the determination of Avogadro’s number by Millikan in 1910, a number of years after homeopathy came into use.
#       A mathematical calculation based on Avogadro’s Number led to the conclusion that homeopathic dilution must be nothing but placebo after homeopathy had already been used for 109 years !!
#       It is not proper to discount homeopathy simply on the basis of Avogadro’s number without clarifying the existing fundamental contradictions in science as detailed above.
#       In conventional medicines the molecules are believed to convey the medicinal power in the living body but in homeopathic dilutions it is not the molecules of medicine but the  electrical strain induced in the vehicle, by the  substance, that conveys the medicinal power of a substance in the living body.
#       When preparing serial homeopathic dilutions the electrical strain of the latter differs from the former dilution in regards to difference in molecular orientations of water  but cannot be determined due to non-availability of any such scientific instruments and for which the homeopathic dilution cannot be held responsible.
Source : How and why Homeopathy is Scientific

डा. रुहल अमीन और श्री बिपलब चक्रवर्ती के अन्य शोध लेखों को देखने के लिये निम्म लिंक पर जायें:

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Different routes of prescribing in Homeopathy

यूटा मॆटिल की पोस्ट , ’ To swallow or not to swallow…that is the question!’ कई अर्थों मे महत्वपूर्ण है । अधिकतर होम्योपैथ दवाओं को oral route यानि मुँह द्वारा ही लेने की सलाह देते हैं जैसा कि यूटा के एक सर्वे से स्पष्ट है । स्वंय हैनिमैन ने भी आर्गेनान सेक्शन २७२ में इस तथ्य को रखा है :

In Aphorism 272 he describes to the homeopath that a “granule placed dry on the tongue, is one of the smallest administrations for the less severe, only recently developed cases of disease” [10] (p.158). He goes on to point out that as such, only few nerves are touched by the medication. Further he describes that if the granule is dissolved in water and is prior to repeated ingestion succussed; a much stronger medication is created of which even the tiniest dose comes into instant contact with many nerves [10]. Yet, this also does not deliver indications for a definite necessity of transmucosal absorption.

लेकिन इसके बावजूद हैनिमैन ने चिकित्सकों को अन्य routes को भी अपनाने की सलाह भी दी  है जिनमें olfaction method प्रमुख है । पिछ्ले वर्ष से अब तक स्वंय मैने भी इस तथ्य को क्लीनकल प्रैक्टिस मे अनुभव किया कि कई होम्योपैथिक दवायें olfaction method से बेहतर कार्य करती हैं जैसे कि acute respiratory infections विशेषकर acute asthma ( दमा ) मे Ipecac 0/3 से 0/10 . arsenic 0/5, और sambucus 0/3 मुँह द्वारा प्रयोग करने की अपेक्षा nebulizer route से अधिक प्रभावी साबित होती है । इसका कारण क्या हो सकता है , इसके बारे मे तो अगर और अधिक रिसर्च हों तो शायद कहना मुमकिन हो ।
फ़िलहाल यूटा मॆटिल की पोस्ट , ’ To swallow or not to swallow…that is the question!’ का आंकलन करें उनके ब्लाग http://cleverhomeopathy.wordpress.com
पर ।

Clever Homeopathy

Abstract

A high degree of satisfaction is reported by patients of the homeopathic approach to health care [11]. Hahnemanns [10] postulations in Aphorism 2 of the Organon insist on a treatment that acts “in the shortest, most reliable and least detrimental of ways” (p.35). The routes by which remedies are administered can influence patient satisfaction with a regimen.

Central to this essay lies the question of the efficacy of the oral transmucosal remedy delivery over the oral swallow method. It is a common belief that, in homeopathic practice, an administered remedy needs to be dissolved on or under the tongue, such that absorption of the active properties via the oral mucosa is established. A survey has been conducted amongst practicing homeopaths evaluating their beliefs and experiences. The alternative routes of remedy delivery and the prevalence of the oral route have been identified via a second survey undertaken amongst suppliers of…

View original post 3,379 और  शब्द

Treating Acute infections in Homeopathy – एक्यूट संक्रमणॊं का होम्योपैथी मे उपचार

जुलाई से लेकर सितम्बर तक के ज्वरों मे लगभग एक तरह की  समानता देखी जाती है । ज्वर की प्रवृति मे तेज बुखार, ठंड लगने के साथ, तेज सरदर्द ,वमन , बदन का टूटना आदि प्रमुख्ता से रहते हैं . लेकिन कुछ विशेष अन्तर भी रहते हैं जिनके आधार पर इनकी पहचान की जा सकती है , विशेषकर उन इलाकों मे जहाँ महँगे जाँच करवाना संभव नही होता .

क्रं. मलेरिया डेगूं चिकिनगुनिया
1. ठँड से काँपना, जिसकी पहचान डाइगोनिस्टिक किट और ब्लड स्मीर से की जाती है . डॆगूं मे अधिकतर रक्त से संबधित समस्यायें होती हैं जैसे त्वचा पर छॊटॆ लाल दाग जो WBC और platelet की कमी से होते हैं . चिकिनगुनिया में जोडॊं ( संधिस्थलों ) मे दर्द और सूजन अधिक रहती है .
2.   डॆगूं का बढना जो WBC और PLatelet ( < 100000/L ) की संख्या मे कमी से लगाया जाता है . चिकनगुनिया में WBC और platelet की संख्या मे विशेष फ़र्क नही पडता.
3.   Positive Torniquet Test : Blood pressure cuff को पांच मिनटॊं तक systolic और diastolic blood pressure के बीच के अंक पर फ़ुलाये रखें . यदि प्रति स्कैवेर इंच मे दस से अधिक छॊटॆ लाल चकत्ते दिखाई दें तो जाँच का परिणाम निशिचित रुप से positive है .  

लेकिन अगर इस बार देखें तो ज्वर की प्रकृति अलग सी देखी गई है । गत वर्ष जहाँ  डॆगूं और चिकिनगुनिया का संक्रमण अधिक था वहीं इस बार मलेरिया के केस बहुतायात मे पाये गये । आम तौर से यह समझा जाता है कि होम्योपैथी चिकित्सा पद्दति सिर्फ़ लक्ष्णॊं पर आधारित चिकित्सा पद्द्ति है और उसमे डाइगोनिसस का विशेष स्थान नही है । लेकिन यह सच नही है , विशेषकर एक्यूट रोगों मे डाइगोसिस आधारित चिकित्सा दवा के सेलेकशन मे मदद करती है और व्यर्थ  का कनफ़्यूजन  नही खडा करती । एक्यूट रोगों मे सेलेक्शन के विकल्प कई हैं ( नीचे देखें ) , इनमें क्लासिकल होम्योपैथी भी है , काम्बीनेशन  भी , मदर टिन्चर भी , क्या सही या या क्या गलत यह पूर्ण्तया चिकित्सक के विवेक पर निर्भर है , लेकिन अगर लक्षण स्पष्ट हों तो क्लासिकल को पहली पंसद बनायें नही तो और तरीके तो हैं ही 🙂

एक्यूट रोगों में सेलेकशन के विकल्प :

१. disease specific औषधियाँ:

specifics का रोल न होते हुये भी इस सच को नजरांदाज करना असंभव है कि कई एक्यूट रोगों मे इलाज disease specific ही होता है जैसे टाइफ़ायड मे baptisia , Echinacea , infective hepatitis में chelidonium , kalmegh  , Dengue  मे eup perf  , acute diarrhoea मे alstonia , cyanodon , आम वाइरल बुखार में Euclayptus  ,Canchalgua ,  मलेरिया के लिये  विभिन्न एर्टेमिसिआ (कोम्पोसिटी) प्रजातियां जैसे कि एर्टेमिसिआ एब्रोटनुम (एब्रोटनुम), एक मारिटिमा (सिना), एक एब्सिनठिअम (एब्सिनठिअम) , chinum sulph, china , china ars आदि ।

२. सम्पूर्ण लक्षण के आधार पर: (Totality of symptoms )

अक्सर होमियोपैथी चिकित्सा नीचे लिखे गए लक्षणो को ध्यान में रखकर दी जाती है –

  • ठंड और बुखार के प्रकट होने का समय
  • शरीर का वह भाग, जहां से ठंड की शुरूआत हुई और बढी।
  • ठंड या बुखार की अवधि
  • ठंड, गर्म और पसीना आने के चरणों की क्रमानुसार वृद्धि
  • प्यास/ प्यास लगना/ प्यास की मात्रा/ अधिकतम परेशानी का समय
  • सिरदर्द का प्रकार और उसका स्थान
  • यह जानना कि लक्षणों के साथ साथ जी मतलाना/ उल्टी आना/ या दस्त जुडा हुआ है या नहीं।

३. NWS ( Never well since ) :

अगर रोग का कारण specific हो जैसे रोगी का बारिश के पानी मे भीगना ( Rhus tox ) , दिन गर्म लेकिन रातें ठंडी ( Dulcamara ), ठंडी हवा लगने से (aconite ), अपच खाना खाने से ( antim crud , pulsatilla आदि )

४. रोगी की गतिविधि ( Activity ) , ठंडक और गर्मी से सहिषुण्ता/असहिषुणता ( Thermal  ), प्यास (Thirst )और मानसिक लक्षण में  बदलाव ( changes in mental attitude of the patient ) ;

डां प्रफ़ुल्ल विजयरकर का यह वर्गीकरण एक्यूट रोगों में संभवत: दवा सेलेकशन का सबसे अधिक कारगर तरीका है । लेकिन यह सिर्फ़ एक्यूट इन्फ़ेशन के लिये ही है , जैसा नीचे दिये चार्ट १ से स्पष्ट है कि यह indispositions और Acute Exacerbations of Chronic diseases  मे इसका कोई रोल नही है । प्रफ़ुल्ल के सूत्र आसान है , गणित की गणनाओं की तरह , रोग के दौरान रोगी की गतिविधि ( decreased , increased or no change ) , ठंडक और गर्मी से सहिषुण्ता/असहिषुणता ( Thermal : chilly / hot ) ,  प्यास (Thirst ( increased or decreased )  और मानसिक लक्षण में  बदलाव ( changes in mental attitude of the patient : diligent or non diligent ) पर गौर करें , और यह तब संभव है जब मैटेरिया मैडिका पर पकद मजबूत हो । उदाहारणत: एक रोगी जो तेज बुखार की हालत में सुस्त और ठंडक को सहन नही कर पा रहा है , प्यास बिल्कुल भी नही है और आस पास के वातावरण मे उसका intrest बिल्कुल् भी  नही है , उसका सूत्र  DCTL   (Axis : Dull +Chilly+thirstless ) होगा । इस ग्रुप में Sepia ,Gels ,Ac. Phos ,Ignatia ,Staph ,Ipecac ,Nat-Carb ,China  प्रमुख औषधियाँ हैं , चूँकि स्वभावत: वह किसी भी कार्य को करने मे अरुचि दिखा रहा है इस ग्रेड मे सीपिया प्रमुख औषधि होगी । जो चिकित्सक प्रफ़ुल्ल का अनुकरण करते हैं वह अच्छी तरह से जानते हैं कि उनके सूत्र कितने प्रभावी हैं ।

DCTL   (Axis : Dull +Chilly+thirstless )
4)Sepia 5)Gels 6)Ac. Phos 7)Ignatia 8)Staph 9)Ipecac 10)Nat-Carb 11)China

DCT (Axis : Dull+chilly+thirsty)
12)Nux-vom 13)Eup-per 14)Phos 15)Calc-c 16)Bell 17)China 18)Silicea 19)Hyos

DHTL (Axis : Dull+hot+thirstless)
20)Puls 21)Bry 22)Apis 23)Lach 24)Sulph 25)Lyc 26)Thuja 27)Opium 28)Carbo-v

DHT ( Axis : Dull+hot+thirsty)
29)Bry 30)Nat. Mur 31)Sulph 32)Lyc 33)    Merc. S. 34)Apis   

विस्तार से यहाँ बताना संभव नही है लेकिन अधिक जानकारी के लिये यहाँ और यहाँ देखें ।

vjayakar-expert1

                           चित्र १ : Dr Praful Vijayakar’s Acute system :

            साभार : http://www.hompath.com/VFeatures.html

 

 

S. No Acute Infection  Indisposition Acute Exacerbations of Chronic disease
1 Viral  fevers, Influenza, tonsilitis ,Sore Throat, Typhoid,  Pneumonia, Pneumonitis, Lung Abscess , Septicaemia, Food poisoning,Infective diarrhoea, Dysentry,Urinary tract colics,  Pleurisy. Treatment not required

constitutional
required

 

 

                 ्चित्र २

flow chart of acute cases

                                                  चित्र३ ( Flow chart of Acutes by Dr Praful Vijarkar )

vijayakar-expert2  

                                      चित्र ४ साभार : http://www.hompath.com/VFeatures.html

     

किसी भी एक्यूट केस और विशेषकर संक्रमण रोगों मे हैनिमैन द्वारा प्रतिपादित आर्गेनान के तीन सूत्र  १०० -१०२ को पढने  से हैनिमैन की विचारधारा का स्पष्ट मूलाकंन किया जा सकता है । यह भी अजीब इत्फ़ाक है कि जिस आर्गेनान को डिग्री लेने के लिये सिर्फ़ पढा जाता हो उसका सही मूल्याकंन प्रैक्टिस के दौरान अधिक बेहतर तरीके से किया जा सकता है । 🙂

हैनिमैन लिखते है :

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सूत्र १०० – महामारी और संक्रामक रोगों का उपचार

महामारी और बडे पैमाने पर फ़ैलने वाले संक्रामक रोगों की चिकित्सा करने के सिलसिले मे चिकित्सक को इस जाँच पडताल के चक्कर मे नहीं पडना चाहिये कि उस नाम की या उस प्रकार की बीमारी का प्रकोप पहले हो चुका है या नही । इस प्रकार की जिज्ञासा व्यर्थ है क्योंकि उस जानकारी को आधार बना कर वर्तमान महामारी या रोग की चिकित्सा करना जरुरी नही । चिकित्सक को तो उसे एक नया रोग मान लेना चाहिये और यही मानकर उसे रोग का सम्पूर्ण चित्र अपने मस्तिष्क मे बैठाने का प्रयास करना चाहिये । इसी प्रकार किसी भी औषधि  का  वैज्ञानिक आधार करने के लिये यह जरुरी है कि वह उस औषधि को जाने और भली भाँति परीक्षण कर ले । चिकित्सक को अपने मन मे यह धारण कभी भी न बन्ननी चाहिये कि रोग बहुत कुछ पिछ्ले रोग से मिलता हुआ है तथा रोगी मे लगभग वही लक्षण विधमान है जो पहले किसी रोग मे हो चुके हों । यदि चिकित्सक सावधानी से रोगी का परीक्षण करेगे तो यह पायेगे कि कि यह नई माहमारी पिछली माहमारी से सर्वथा भिन्न्न है और लोगों ने भ्रम वश उसे एक ही नाम दिया है । यह भिन्नता संक्रामक रोगों के अतिरिक्त बडे पैमाने पर होने वाले अन्य रोगों मे भी पायी जाती है । परन्तु खसरा , चेचक आदि संक्रामक रोगों पर यह नियम नही लागू होता ।

§ 100

In investigating the totality of the symptoms of epidemic and sporadic diseases it is quite immaterial whether or not something similar has ever appeared in the world before under the same or any other name. The novelty or peculiarity of a disease of that kind makes no difference either in the mode of examining or of treating it, as the physician must any way regard to pure picture of every prevailing disease as if it were something new and unknown, and investigate it thoroughly for itself, if he desire to practice medicine in a real and radical manner, never substituting conjecture for actual observation, never taking for granted that the case of disease before him is already wholly or partially known, but always carefully examining it in all its phases; and this mode of procedure is all the more requisite in such cases, as a careful examination will show that every prevailing disease is in many respects a phenomenon of a unique character, differing vastly from all previous epidemics, to which certain names have been falsely applied – with the exception of those epidemics resulting from a contagious principle that always remains the same, such as smallpox, measles, etc.

सूत्र १०१- महामारी का निदान

बहुधा ऐसा होता है कि चिकित्सक किसी संक्रामक रोग से पीडित व्यक्ति  को पहली बार देखने पर समझ न पाये । लेकिन उसी प्रकार के कई रोगियों को देखने के बाद चिकित्सक को रोग के सभी लक्षण और चिन्ह याद हो जायेगें । यदि चिकित्सक  तीक्ष्ण निरीक्षण वाला है तो एक या दो रोगी को देखने के बाद ही रोग के लक्षण उसके मन मे अंकित हो जायेगें और अपनी इस  जानकारी के आधार पर वह सामान लक्षण वाली दवा का चुनाव कर सकेगा ।

§ 101

It may easily happen that in the first case of an epidemic disease that presents itself to the physician’s notice he does not at once obtain a knowledge of its complete picture, as it is only by a close observation of several cases of every such collective disease that he can become conversant with the totality of its signs and symptoms. The carefully observing physician can, however, from the examination of even the first and second patients, often arrive so nearly at a knowledge of the true state as to have in his mind a characteristic portrait of it, and even to succeed in finding a suitable, homoeopathically adapted remedy for it.

सूत्र १०२ – माहामारियों के ल्क्षण

महामारियों से पीडित रोगियों के लक्षण  लिखते-२ चिकित्सकों के मस्तिष्क मे रोग का चित्र और भी अधिक स्पष्टता से उभर आता है । इस प्रकार लिखे गये विवरण से रोग की और ही विशेषतायें उभर कर आ जाती हैं परन्तु इसके साथ ही कुछ लक्षण ऐसे भी प्रकाश मे आते हैं जो केवल कुछ रोगियों मे प्रकट होते हैं और सभी रोगियों मे नही पाये जाते । अत: विभिन्न प्रकृति के अनेक रोगियों को देख कर रोग की यथार्थ जानकरी प्राप्त की जा सकती है ।

§ 102

In the course of writing down the symptoms of several cases of this kind the sketch of the disease picture becomes ever more and more complete, not more spun out and verbose, but more significant (more characteristic), and including more of the peculiarities of this collective disease; on the one hand, the general symptoms (e.g., loss of appetite, sleeplessness, etc.) become precisely defined as to their peculiarities; and on the other, the more marked and special symptoms which are peculiar to but few diseases and of rarer occurrence, at least in the same combination, become prominent and constitute what is characteristic of this malady.1 All those affected with the disease prevailing at a given time have certainly contracted it from one and the same source and hence are suffering from the same disease; but the whole extent of such an epidemic disease and the totality of its symptoms (the knowledge whereof, which is essential for enabling us to choose the most suitable homoeopathic remedy for this array of symptoms, is obtained by a complete survey of the morbid picture) cannot be learned from one single patient, but is only to be perfectly deduced (abstracted) and ascertained from the sufferings of several patients of different constitutions.

आर्गेनान के इन तीन सूत्रॊं को पढने के बाद हैनिमैन के “Genus Epidemics ‘ की परीभाषा को आसानी से समझा जा सकता है । संक्रामक रोगों मे एक ही सत्र मे चुनी गई औषधि जो कई रोगियों मे व्याप्त लक्षणॊं को कवर करती है  , जीनस इपीडिमिकस कहलाती है । यही कारण था कि पिछ्ले कई महामरियों मे होम्योपैथिक दवाओं ने अपना सर्वष्रेष्ठ असर दिखलाया ।

होम्योपैथिक दवाओं की गुणवत्ता और औषधि की मारक कार्यक्षमता पर विभिन्न घटकों का प्रभाव

आस्ट्रिया की एक होम्योपैथिक कम्पनी रेमीडिया होम्योपैथिका की साइट पर मुझे  एक वीडियो देखकर बहुत अचरज हुआ । आरम मेटेलीकम (Aurum Metallicum )/ आरम फ़ोलोवेटेम (Aurum Foliatum )पर इस वीडियो मे कम्पनी  के नुमाइन्दे का कहना है कि गोल्ड के इस होम्यो औषधि मे वह गोल्ड लीफ़ का प्रयोग कर रहे हैं , जहाँ अन्य कम्पनियाँ गोल्ड  को chemically extract कर के दवा बनाने मे प्रयोग करते हैं । तो इसका क्या मतलब हुआ कि अन्य कम्पनिया गोल्ड के इस दवा को गलत ढंग से बना रही हैं । इस संदर्भ में मैटेरिया मेडिका प्यूरा मे हैनिमैन के दृष्टिकोण को भी जानने की इच्छा हुयी  । हैनिमैन लिखते हैं ,

"In this place I will speak only of gold, and not of this metal altered by the ordinary chemical processes, consequently not of it dissolved by the action of acids nor percipitated from its solution (fulminating gold), both of which have been declared to be, if not useless, then absolutely noxious, apparently because they cannot be taken without dangerous consequences when given in what is called a justa dosis, or, in other words, in excessive quantity.

No! I speak of pure gold not altered by chemical manipulations." 

तो जाहिर है कि हैनिमैन गोल्ड को chemically extract के रुप मे लेकर चलने के पक्ष मे नही थे ।

हैनिमैन के समय मे गोल्ड को शुद्ध रुप मे करने के लिये मरकरी का अधिकतर प्रयोग किया जाता रहा था । लेकिन १८८३ के अमेरिकन होम्योपैथिक फ़ारमाकोपिया मे गोल्ड को विचूर्ण बनाने के पहले अम्लीय तरीको से शुद्ध करने की भी बात कही गयी है । देखें यहाँ ।

http://books.google.com/books?id=80WV1tHAEA4C

सन्‌ १८८७ मे बरनेट ने आरम फ़ोलियम की प्रूविगं की , एक शोध पत्र  के जरिये ("Gold as a Remedy in Diseases") बरनेट ने गोल्ड की इस प्रूविगं मे उत्पन्न लक्षणॊं को हैनिमैन द्वारा की गयॊ प्रूविगं के समतुल्य पाया ।

लेकिन कुछ भी हो औषधि की मारक कार्यक्षमता पर विभिन्न घटकों का प्रभाव अवशय पडता है । जडी बूटी किस क्षेत्र से ली गई है , उसकी भौगोलिक परिस्थितियाँ आदि भी कार्य क्षमता को प्रभावित करते हैं । मुझे स्मरण है कि लखनऊ मे आज से लगभग २० वर्ष पूर्व कैसरबाग मे जयहिन्द सिनेमा (  वर्तमान मे जयहिन्द काम्पेल्क्स ) के सामने डा. ऐ.पी.अरोडा जी की हैनिमैन लैब हुआ करती थी । उनका  बनाया गया यूकलेप्ट्स ( Eucalyptus) मदर टिन्चर की  कार्य क्षमता सामान्य ज्वर मे अन्य कम्पनियों के बनाये गये यूकलेप्ट्स टिन्चर से कई अधिक प्रभावशाली थी। यहाँ तक आज बोरोन और बैकसन का यूकलेप्ट्स भी उतना प्रभावशाली नही है। डा. अरोडा इसकी जडी बूटी के लिये पहाडी क्षेत्र के यूकलेप्ट्स  का प्रयोग करते थे जबकि सामान्तया दवा निर्माता मैदानी इलाकों से ही ले  लेते हैं ।

इसी तरह दमे मे प्रयोग होने वाली ब्लाटा का रोल अपने देश के काकरोच से बनाई हुई दवा ( Blataa Orientalis ) मे नही मिलता । ब्लाटा की प्रूविगं अमेरिकन काकारोच ( Blataa Americana )पर हुई थी ।

Anshutz की New, old & forgotten remedies मे gaultheria Q का जो वर्णन मिलता है वैसी gaultheria तेज गंध लिये नही मिलती , मुझे सिर्फ़ एक बार ऐसा gaultheria Q किसी स्टॊर से मिला था और उसके जैसा बढिया दर्द निवारक मैने अन्य कही नही देखा । लेकिन इधर कई सालों से लिये इस दवा का प्रयोग क्वालिटी के अभाव के कारण बंद सा कर दिया है ।

सिमिलीमम -एक या अनेक ( Can it be possible to select more than one similimum )

नवम्बर 2007 के Hpathy .com पर जरमी शैएर का एक साक्षत्कार छपा है , विषय मनीष भाटिया ने उठाया है कि क्या जटिल रोगों ( chronic cases ) एक ही सिमिलीमम काफ़ी है या इससे भी अधिक सिमिलीमम हो सकते हैं . मुझे याद है कि कुछ दिन पहले डां प्रतीश पटेल ने भी यह प्रशन आरकुट मे एक कम्यूनिटी मे एक पोल के जरिये से उठाया था । होम्योपैथी मे औषधियों के स्त्रोत कई जगह से आते हैं जैसे वनस्पति ( plant kingdon) , जन्तु ( animal kingdon ), रसायनिक स्त्रोत ( minerals & chemicals), सारकोडस (sarcodes) और नोसोडस (nosodes) | इसके अलावा impondrebalia  ग्रुप जैसे x-ray इत्यादि। इतने व्यापक समूह से आने वाली औषधियों मे से अगर यह कहें कि इतने बडे ग्रुप मे सिर्फ़ एक ही सिमिलीमम हो सकता है तो यह अन्य होम्योपैथिक औषधियों के साथ नाइन्साफ़ी होगी । लेकिन स्वयं हैनिमैन ऐसा नही मानते , उनके अनुसार सही रुप से चयनित की गई  औषधि का दूसरा कोई विकल्प नही है । आपके अनुसार :

§ 119

HAHNEMANNAs certainly as every species of plant differs in its external form, mode of life and growth, in its taste and smell from every other species and genus of plant, as certainly as every mineral and salt differs from all others, in its external as well as its internal physical and chemical properties (which alone should have sufficed to prevent any confounding of one with another), so certainly do they all differ and diverge among themselves in their pathogenetic – consequently also in their therapeutic – effects.1 Each of these substances produces alterations in the health of human beings in a peculiar, different, yet determinate manner, so as to preclude the possibility of confounding one with another.2

1 Anyone who has a thorough knowledge of, and can appreciate the remarkable difference of, effects on the health of man of every single substance from those of every other, will readily perceive that among them there can be, in a medical point of view, no equivalent remedies whatever, no surrogates. Only those who do not know the pure, positive effects of the different medicines can be so foolish as to try to persuade us that one can serve in the stead of the other, and can in the same disease prove just as serviceable as the other. Thus do ignorant children confound the most essential different things, because they scarcely know their external appearances, far less their real value, their true importance and their very dissimilar inherent properties.

लेकिन जरमी शेऐर कुछ और ही सोचते हैं । जरमी पिछले २५ सालों से होम्योपैथिक के अध्यापन से जुडे हैं ।

jeremy_sherr.jpgI have a lot to say about this. Your observation is very correct. If homeopathy worked only by one simillimum, there would be no homeopathy. We would all be out of business. Even if it worked with only five remedies for a patient, we would still be out of business. After 25 years of teaching and presenting cases, I know that in a class of twenty students you can get fifteen different suggestions for a case. Then the teacher says that I gave this particular remedy and the whole class thinks, �Oh! I am wrong because the remedy mentioned worked and the teacher must be right�. And therefore it propagates this thing about the simillimum. I think that quite a big range of remedies can work for each patient. I have traveled across the world and have seen how different homeopaths give different remedies and get results. Like you said, everybody is successful to some degree. This is so important. For instance, if in a class, your suggestion is different from the teachers, you should not lose confidence and think that he was right and you were wrong. It could be that your suggestion is right as well. That is one ramification of it.

The next ramification of it is that building up materia medica from cases is very secondary, of much less importance than provings. Because you can say that you saw three or four cases of a certain remedy, but in those cases the remedy could really be just a similar or partially similar. Then you are including all the data from these partial cases into the essence of the remedy, but I don�t think that all the data necessarily belongs to that remedy. Even if you give a partially similar remedy it has the power to sweep away many symptoms in the case that do not belong to the remedy. To know whether a remedy is the simillimum or not, there is a very strict criterion. For instance Kent gave the definition that if you give the simillimum, then there should be an aggravation of the existing symptoms, then the symptoms should get better and then there should be a relapse of the original symptoms.

So now let�s look back at what Hahnemann has said. Hahnemann definitely said that there is no such thing as the simillimum. He said that the simillimum is a theoretical concept. In Paragraph 156, he says you can not fit a remedy to a case like two triangles with equal angles and equal sides. This will not happen. There can not be �a� simillimum. Because by definition if you say �this simillimum�, there could be only one remedy that will work for the case. But if you give Pulsatilla nigricans, maybe Pulsatilla nutalliana could be more similar, or maybe Pulsatilla from some other continent would be better, or perhaps a spider remedy we don�t know.� All these remedies could help to different degrees, but logically you can never tell if there is a better remedy round the corner.

Remedies are like poems. Some touch you more and some less, but you can never say that there is one ultimate poem to touch a person, there might always be a better one.

 

सेंकेंड प्रिसक्पशन और सही पोटेन्सी का चुनाव (Second Prescription & selection of potency)

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सेंकेंड प्रिसक्पशन और सही पोटेन्सी का चुनाव एक होम्योपैथिक चिकित्सक के लिये हमेशा से सरदर्द रहा है । आज के दौर मे मे वह हैनिमेन या हेरिग के बताये रास्ते पर चले या अपना स्वयं का विवेक लगाये , यह भी एक प्रशन है । संम्पूर्ण होम्योपैथिक फ़िलोसफ़ी मे और पूरे होम्योपैथिक जगत मे कोई भी पोटेन्सी और औषधि के रिपीटीशन पर एकमत नही है। कम से कम मै तो स्वयं कई बार इस परेशानी से दो-चार हो चुका हूँ । अभी दो महीने पहले की ही बात लें , जिस chronic allergic rhinitis के रोगी मे रिपर्टारैज करके मैने सलफ़र 1000 का चुनाव किया था उसने दो दिन बाद से ही अपना असर दिखाना शुरू कर दिया ,लगातार छीकों का दौर जो पिछ्ले 15 सालों से रोगी को परेशान कर रहा था और शायद ही कोई दिन ऐसा रहा हो जब उसको antiallergic जैसे cetrizine लेनी न पडी हो , इस एक हफ़्ते के दौरान कोई भी लेनी न पडी, लेकिन ठीक सातवें दिन लक्षण सब दोबारा आ गये। एक ही हफ़्ते मे सल्फ़र का काम समाप्त ! आशचर्य ! क्या करें दोबारा सल्फ़र दें कि इसको complementary medicine से follow करें। वैसे मेरे पास follow करने के पर्याप्त कारण थे जैसे जिस दिन लक्षण रिपीट हुये उस दिन लखनऊ मे पानी और ओले गिरे थे , एक बार सोचा कि rhus tox , rhodo या dulcamara मे से चयन करें लेकिन अगले दिन तक दूसरी राय ( 2nd opinion ) लेने की सोच ली थी, इन्टरनेट के माध्यम से बने मेरे अभिन्न मित्र डा प्रवीन गोस्वामी जो गया से हैं मुझे आन्लाइन मिल गये और बाद मे प्रवीन की राय से इतफ़ाक रखते हुये सल्फ़र 1000 को दोबारा 7 दिन के अन्दर ही रिपीट किया । दो दिन बाद रोगी की प्रतिक्रिया मे संन्तुष्टि थी लेकिन अब की बार सल्फ़र का काम मात्र मात्र 4 दिन मे ही समाप्त हो गया, पोटेन्सी को बढाया और अब की बार सल्फ़र की 10000 क्रम की पोटेन्सी का चुनाव किया । इस बार सल्फ़र का काम स्थायी रहा और फ़िलहाल इधर एक महीने से लक्षणों मे पुनरावृति नही हुयी हैं लेकिन हकीकत मे पोटेन्सी के चुनाव और सेकन्ड प्रिसक्पशन मे सर्वसम्मति नही दिखती , नीचे कुछ पुराने और नये चिकित्सकों के नजरिये हैं , आइये अवलोकन करें।
हैनिमैन की नजरिये से

HAHNEMANN हैनिमैन

जब तक एक सही चुनी दवा का काम चल रहा हो तब तक चिकित्सक जल्दबाजी मे औषधि के बीच मे न तो किसी और औषधि के रुप मे अडंगा लगायें और न तो औषधि को बीच मे रीपीट करें।

आर्गेनान आफ़ मेडिसिन (Organon of medicine) मे हैनिमैन ने पृष्ठ संख्या 209-213 मे इस बात को साफ़ तौर पर लिख दिया है। बतौर उनके जब तक एक सही चुनी दवा का काम चल रहा हो तब तक चिकित्सक जल्दबाजी मे औषधि के बीच मे न तो किसी और औषधि के रुप मे अडंगा लगायें और न तो औषधि को बीच मे रीपीट करें। आगे देखें:


Organon of medicine पृष्ठ संख्या 209-213
“The third leading mistake that the Homoeopathic physician cannot too carefully or steadfastly avoid is in hastily and thoughtlessly giving some other medicine … but if once a medicine … is acting well and usefully, which is seen by the eight or tenth day, then an hour or even half a day may come when a modern homoeopathic aggravation again takes place. The good results may not appear in their best light before the twenty-fourth or thirtieth day. The dose will probably have then exhausted its favorable action about the fortieth or fiftieth day, and before that time it would be injudicious and an obstruction to the progress of the cure to give any other medicine. Experience teaches that a cure cannot be accomplished more quickly and surely than by allowing the suitable antipsoric to continue its action so long as improvement continues … Whoever can restrain his impatience as to this point will reach his object the more surely and the more certainly … periods of aggravation will occur, but so long as only the original ailments are renewed and no new, severe symptoms present themselves, they show a continuing improvement, being homoeopathic aggravations which do not hinder but advance the cure. The physician must; therefore, in chronic diseases, allow all antipsoric remedies to act thirty, forty or even fifty and more days by themselves, so long as they continue to improve the diseased state perceptibly to the acute observer, even though gradually; for so long the good effects continue with the indicated doses and these must not be disturbed and checked by any new remedy.”

और आगे पृष्ठ संख्या 212 मे चिकित्सकों को सावधान करते हुये कहा कि जो ऐसा नहीं करगें वह उन जटिल रोगों को मंझदार मे ही छोड कर जायेगें।

In footnote, page 212, we find: “But he who will not allow himself to be convinced of this and imitate what I now teach, he who is not willing to imitate it exactly, can leave the most important chronic diseases uncured.”

केन्ट का नजरिया:
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केन्ट ने हैनिमैन की अवधारणा को बढाते हुये एक चयन की गई औषधि के देने के बाद 12 अवलोकनो (observations)उ को संज्ञान मे लेने के निर्देश दिये, जो बाद मे Kent’s Lectures on Homoeopathic Philosophy मे संग्रहित किये गये। आज के दौर मे अधिकतर होम्योपैथिक चिकित्सक केन्ट के इन अवलोकनो (observations) को पालन करने की कोशिश करते दिख जाते हैं।

संक्षेप में-
1-रोग के लक्षण बढें और साथ ही मे रोगी की स्वास्थ क्षीण होता जाये।
2-रोग के लक्षण बहुत अधिक बढ जाये और रोगी को धीरे-2 लाभ दिखना शुरू हो।
3-किसी भी औषधि को देने के बाद अगर रोग के लक्षण तुरन्त अल्प काल के लिये बढ जायें और उसके कुछ ही दिन के बाद रोगी को लाभ दिखने लगे।
4- किसी भी औषधि को देने के बाद अगर रोग के लक्षण मे बढोतरी न दिखे और रोगी को तुरन्त लाभ पहुंचे ।
5-रोगी को लाभ पहले दिखे और कुछ ही समय के बाद लक्षण बढ जायें।
6-बहुत ही कम समय के लिये लक्षणों मे कमी दिखे।
7-रोग के लक्षणों मे तो कमी दिखे लेकिन रोगी का स्वास्थ क्षीण होता जाये।
8- औषधि के स्वयं के लक्षण रोगी मे दिखने लगे।
10-औषधि देने के बाद नये लक्षण दिखने लगे।
11-रोगी के ऐसे रोग जो पहले हो चुके हों , दोबारा दिखने लगें।
12 -रोग आरोग्य होते समय लक्षण हेरिगं नियम के विपरीत चले।


केन्ट के अनुसार:
1- a prolonged aggravation and final decline of the patient
2- long aggravation, but final and slow improvement.
3- the aggravation is quick, short and strong with rapid improvement of the patient.
4- no aggravation, with recovery of patient.
5- The amelioration comes first and the aggravation comes after .
6- too short relief of symptoms.
7- full time amelioration of the symptoms, yet no special relief of the patient
8- Some patients prove every remedy they get
9- action of the medicine upon provers (
Similar agg after every dose, no matter
which potency)
10- new symptoms appearing after the remedy
11- old symptoms are observed to reappear
12- symptoms take the wrong direction

इन 12 अवलोकनों के निष्कर्षों को पूर्णतया जानने और समझने के लिये यहाँ और यहाँ देखें।

लुक डी शेफ़र ( Luc De Schepper’s)

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लुक डी फ़िशर ने अपनी पुस्तक “Achieving and Maintaining the Similimum” मे हैनिमैन की अवधारणा को आसान शब्दों मे रखा और उसके बाद का काम बेल्जियम के मार्क वान विजिक (Marc Van Wijk) ने एक power point presentation के जरिये किया । यह एक interactive power point prsentation है और विशेष कर B.H.M.S. के छात्रों के लिये तो अमूल्य ही है । इसको डाऊनलोड करने के लिये नीचे दिये चित्र पर किल्क करें।
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हाल ही मे लुक डी फ़ेशर ने अपने चिट्ठे के जरिये पोटेन्सी और repetition पर अपने विचार रखे। वह क्या कहते हैं , इसको देखने के लिये यहाँ किल्क करें।

The Potency of the Remedy (How Strong?) and the Repetition of the Dose (How often?)

Part One: The Potency Selection (how strong?), the greatest confusion among homeopaths
When it comes to potency selection of the remedy, the homeopathic society never agreed much about this issue, not in the past and certainly not now! There always has been a division between two camps: the high and low potency prescribers. Both parties indeed can demonstrate success but there has to be some kind of middle path, a clear guideline for homeopath and patient alike to bring harmony in this world of madness. I intend to bring enough clarity to unite homeopaths and at the same time to give enough clarity to the patient who deserves the right information……………..
Treatment for Acute diseases
The potency choice for acute diseases (less than 3-4 months old) is simple: use at least a potency from 30C upwards to 200C and 1,000C. Always use the watery method by putting two pellets of your chosen remedy and potency in an 8 oz bottle (Remedy Solution Bottle or RSB), stir well and take one tsp directly from the RSB. Do not repeat earlier than two hours after first dose. When you see a similar aggravation in the first hour (in other words an aggravation of your symptoms during the first hour) this first dose will cure and no further dose will be needed (A157-A158). If symptoms are not entirely gone after two hours, you can repeat the same procedure every two hours after succussing each successive dose (hitting RSB against your palm) 8 times. ……

Chronic Disease treatment
The treatment of chronic diseases (>than 3-4 months existing) is very different. The potency selection (how strong?) will depend on the reactivity of the patient (the reactivity of the Vital Force, Qi in Chinese medicine and to some extent the immune system in allopathy). If the reactivity is good, a stronger potency can be applied. Here are some general guidelines.

ALWAYS Low potencies (starting with 6C and not higher than 30C) are indicated and a must in the following conditions (these three conditions supersede any other indications following further!):
· The patient is a hypersensitive patient: such patient reacts to perfumes, environmental factors like carpets, bleach, newspaper, etc.) or people who react strongly to regular doses of medication and vitamins as well as those that reacted strongly to anesthesia
· The patient has strong pathology: this usually means, he already has received a medical diagnosis and there is extensive pathology involved like destruction of tissues (Multiple sclerosis, Parkinson,etc.) , formation of tumors, deficiency of factors like in diabetes, hyperthyroidy or Basedow disease, autoimmune disorders with destruction, asthma, etc. Also in chronic diseases affecting the heart, brain, eyes, pancreas, lungs
· The patient has a chronic skin disease, especially when treated in past with cortisone: chronic eczema from young age on and psoriasis, just to name two common diseases. Often the symptoms were controlled by cortisone intake/creams and in this case the dose should be minimal (drops instead of tsp) and definitely not higher than 6C potency to start
· Elderly patients: rather start with low potency

Higher Potencies (starting with 30C, then 200C, 1000C, etc.) are indicated in the following conditions:
· In young children (babies included) as long as the three previous conditions are not present; the choice of high potency includes ASD, ADHD, ADD, OCD, etc.
· Adults with functional diseases (no pathology has been shown) like vertigo, gastrointestinal problems, hypertension with no pathology yet, inflammatory processes like Bell’s palsy, etc. or adults with only mental/emotional problems such as depression, grief, lack of self confidence, lack of motivation in life, timidity, loss of meaning of life, etc.
· Patients under stress (worries at work, home, in relationships, etc.)

Part Two: the repetition of the Dose (How often), in chronic diseases

The most important thing to remember is that the repetition of a dose is determined on an individual basis. This is quite different than when we take allopathic drugs where your physician tells you to take the drug at a certain time (3 times a day, every evening, etc.), usually based on weight and age of patient……….

……आगे देखने के लिये लुक डी फ़िशर के ब्लाग पर जायें।

मै समझता हूँ कि हमारे देश मे अधिकतर होम्योपैथिक चिकित्सक लुक के तथ्यों से अलग हट के चलते हैं।
लेकिन फ़िशर अपने चिट्ठे मे जाते- 2 एक बहुत महत्वपूर्ण बात कह गये ।

जो रोगी ऐलोपैथिक चिकित्सा करा के होम्योपैथिक चिकित्सा के लिये आ रहे हैं उनके साथ चिकित्सा का रुख क्या हो। त्वचा के रोग, साँस संबधी रोगों आदि मे हम अक्सर देखते हैं कि cortisone के अंधाधुध प्रयोग से रोगी प्राय: इन औषधियों पर निर्भर हो जाता है , यही स्थिति लगभग मानसिक रोगों मे भी देखी जा सकती है जहाँ antidepressants और tranqulisers के चलते रोगी को इन औषधियों को चाहते हुये भी छोडना संभव नहीं होता ।

जो रोगी ऐलोपैथिक चिकित्सा करा के होम्योपैथिक चिकित्सा के लिये आ रहे हैं उनके साथ चिकित्सा का रुख क्या हो। त्वचा के रोग, साँस संबधी रोगों आदि मे हम अक्सर देखते हैं कि cortisone के अंधाधुध प्रयोग से रोगी प्राय: इन औषधियों पर निर्भर हो जाता है , यही स्थिति लगभग मानसिक रोगों मे भी देखी जा सकती है जहाँ antidepressants और tranqulisers के चलते रोगी को इन औषधियों को चाहते हुये भी छोडना संभव नहीं होता । यह स्थिति कमोबक्श उन pseudo mental cases की भी है जहाँ मानसिक रोग न होते भी sedatives जैसे alprozalam आदि का का सहारा लिया गया। वहाँ क्या करें। लुक कहते हैं:

NEVER stop your allopathic medication when starting homeopathic treatment with your chronic patient. Cooperation with your allopathic physician is a must!

दोनों चिकित्सा पद्दति भले ही सिद्दातों मे अलग दिखें लेकिन clinically एक दूसरे की पूरक हैं , अकसर बहुत से रोगों मे जहाँ चिकित्सा की सीमा जटिल परिस्थितियों (chronic stage )पर जा कर ऐलोपैथिक मे फ़ँसती है वहाँ होम्योपैथी उन परिस्थितियों मे बखूबी काम करती है और यही बात होम्योपैथी मे भी है कि पुराने रोगों की acute stage से उबरने मे ऐलोपैथिक चिकित्सा की आवशयकता पड सकती है।

100% खरी बात ! अगर cortisone या antidepressants को आप एकदम से हटा रहे हैं तो इसके परिणाम भी भुगतने को तैयार रहें। जाहिर है कि इन ऐलोपैथिक औषधियों को हटाने की प्रकिया धीरे -2 करनी चाहिये । और इसके लिये आप को अपने ऐलोपैथिक चिकित्सकों से सहयोग लेने मे हिचकना नही चाहिये। इस बात को हमेशा ध्यान रखें कि दोनों चिकित्सा पद्दति भले ही सिद्दातों मे अलग दिखें लेकिन clinically एक दूसरे की पूरक हैं , अकसर बहुत से रोगों मे जहाँ चिकित्सा की सीमा chronic stage पर जा कर ऐलोपैथिक मे फ़ँसती है वहाँ होम्योपैथी उन परिस्थितियों मे बखूबी काम करती है और यही बात होम्योपैथी मे भी है कि पुराने रोगों की acute stage से उबरने मे ऐलोपैथिक चिकित्सा की आवशयकता पड सकती है।

डा राजन शंकरन का नजरिया:
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डा राजन शंकरन का नजरिया एकदम हट कर है जहां अन्य होम्योपैथिक चिकित्सक पुराने ढर्रे पर चलना पंसद करते हैं , वहीं राजन नई सोच को चिकित्सकों के समक्ष रखते हैं।

लेकिन डा राजब शंकरन बिल्कुल ही हट के बात करते हैं और बात भी बहुत वजनी !
कुछ वर्ष पूर्व होमयोपैथिक लिंक्स मे एक पत्र डा गेर्हर्डस लैंग का डा राजन शंकरन के नाम छपा था । डा राजन के विचार आज की परिस्थितयों को देखते हुये बहुत ही महत्वपूर्ण हैं।
मुझे ध्यान पडता है कि ऊ प्र मे गोरखपुर से दिवगंत वयोवृद्द चिकित्सक डा हेमन्त बैनर्जी का औषधि देने का तरीका भी कुछ ऐसा ही था । repetition की परिभाषा को डा शंकरन ने बडे आसान से शब्दों मे रख दिया, ” Repetition is giving a reminder (an awareness) and is needed as fast as the person forgets the previous lesson. ”
संक्षेप मे डा राजन शंकरन का नजरिया:
क- जटिल और पुराने रोग जैसे hypertension ( उच्च रक्त्चाप),vitiligo(सफ़ेद दाग),osteoarthritis ( गठिया) आदि , जहाँ रोग की चाल धीमी हो वहाँ औषधि का repetition औषधि के कार्यकाल को पूरा हुये बगैर भी कर देना चाहिये।
ख- पुराने और जटिल रोगों में जहाँ कारक ( excitng factor ) मौजूद हो वहाँ भी औषधि का repetition जल्दी होना चाहिये। कारक या excitng factor वह हैं जो आम स्वस्थ मनुष्य में प्रभाव नहीं छोडते लेकिन एक रोगी मनुष्य में समस्या पैदा करते हैं।

बाकी आगे आप स्वयं देखें:

डा लैंग ने डा राजन से जो सवाल पूछे वह कुछ इस तरह से थे:


Gerhardus Lang, M.D., Klinge 10,
D- 7325 Boll

Dear Rajan Sankaran, How often can we repeat a dose? You wrote in your book The Spirit of Homoeopathy that we have to repeat when the dose is exhausted. In chapt. 25 you describe a case of Aurum met. and you gave him Aur.m.200 and 1 M over a period of a year in weekly doses. I should like to know if Aurum was always exhausted after a week and if you did really observe the patient to be sure if the dose was exhausted.

डा राजन शंकरन का उत्तर:

Rajan Sankaran,Mumbai
I have, in the past ten years of practice, in some chronic cases of definite structural pathology, repeated the dose of the indicated remedy despite amelioration. I did this because I found that sometimes by not repeating the dose of the medicine progress comes to a standstill and despite the patient feeling better the pathology remains the same. Further, I found that such repetition did not seem to create any kind of trouble. I must also state that in some cases I found even chronic structural pathology reversing with a single dose. I therefore started thinking in which case a repetition is needed and in which case it is not needed. My conclusions are as follows:
One of the cases I would definitely repeat regularly would be osteoarthritis that requires a remedy like Calc.fluor. A similar example would be a case like hypertension which is chronic and persistent. A third example would be a case of vitiligo. These kind of cases which share a common feature, namely they are chronic and slow in progression. I found in such cases that even though a single dose acts, its action seems to stop after some days or weeks and another dose takes it one step forward, its action lasting for another few weeks and so forth. Gradually I started experimenting with repeating doses even when the person was improving as if anticipating that the dose would exhaust its action. I found this kept the progress uninterrupted. It seemed to depend upon the onset of pathology. If the onset was slow and gradual, repetition was needed in days or weeks. If the onset was sudden and the exciting factor was not there, then repetition was not needed, e.g. sprain or an injury or a fright etc. If the exciting factor was present e.g. certain severe infective pathology as in severe tonsillitis, severe pneumonia, typhoid etc. then repetition would be called for every few hours. The same happens in chronic cases especially in cases where the exciting factor is found in the life of a person, these cases require definite repetition. One must remember that an exciting factor is one that excites a sick person – the same factor may not excite healthy people.
Another factor that influences repetition is excitability of the root within. If the root is strong, the dose exhausts its action quite soon. The excitability of the root can be judged by how sensitive the person is to the exciting factor. Taking all these above factors into consideration, when we look at the case of Aur. given in my book we find
1) Very excitable Aurum root as shown in the fact that increased responsibility excited in him a intense state of Aurum.
2) Such a responsibility was still present (felt by him) as a continuous exciting factor.
3) The pathology was slow and gradual showing the need of repetition. Pathology in the form of IHD (Ischaemic Heart Disease) HT (Hypertension) and diabetes and also peripheral vascular disease – all slow progressive pathology which I feel cannot be reversed by a single dose.
In such cases I can anticipate that the dose will be exhausted very soon. I judge how long to wait by seeing how long the first dose lasts. When its action is over I repeat the dose at the same interval each time, even before the improvement stops. If I know that the first dose lasted two weeks I would repeat the remedy once in 12 days in anticipation.
From experience I found that if other things are constant, i.e. there is no new addition or subtraction of exciting factors, the dose acts for almost the same amount of time. There comes a point, after a few days, months or years, where the dose stops acting or acts for a much shorter time. This is the time to raise the potency. Each time the potency is raised it is advisable to again wait and watch for how long the dose of the new potency works and to repeat at this interval.
The logic of repetition.
What I have stated is from clinical experience of innumerable cases. I have thought about this phenomenon and explain it thus:
1) What is repetition?
Repetition is giving a reminder (an awareness) and is needed as fast as the person forgets the previous lesson. Who is likely to forget and need a reminder? The one who has fallen into such a pattern that just telling him once doesn’t make enough impression. There is a tendency to fall into the same pattern again and again and we see this in a chronic or acute case which has a strong exciting factor.
For example, a person coming for an interview is nervous for 3 days before. You give an awareness and his nervousness recedes until he is faced with the interview. His nervousness returns and he needs to be reminded again. As the period of interview comes closer and closer he needs repeated doses of awareness. So, in such a case you might have to repeat Gelsemium again and again.
Where is repetition not required?
An acute where the exciting factor which is not repeated, can easily be dealt with in one dose. Even a chronic case which began with one exciting factor which is no longer there needs very little repetition, I have seen this with Carcinosin. E.g. Carc. is a situation of a child where the parents are asking for perfection and the child fits into this pattern, but if in adulthood this exciting factors no longer exists a single awareness is enough. Here the exciting factor doesn’t exist in the present, and little or no repetition is necessary. If you see a case of Calc.fluor where the fellow is struggling about money, with an excitable root from the past plus exciting factors from present, it is impossible to cure with a single dose and the dose will exhaust its action very soon. Even when there is no pathology, but there is only a prominent state, repetition may be needed if the state has come from a very excitable root and there are continual exciting factors around e.g. we see a very strong Bar- carb child coming from a very strong Bar-carb mother. This child is slow dull, laughed at, criticised which makes him even more vulnerable to criticism. People start laughing at him, his family itself considers him an idiot, this child surely requires repetition of Bar-carb very often to get out of this state. The same child in the family which is encouraging and doesn’t laugh at him will require less repetition of Bar-carb. Similarly if the child’s state has resulted from a strong state of the mother during pregnancy this child is likely to require repetition. If the child’s present state resulted from some incident in the child’s own past, one isolated incident like fright, this child is not likely to require repetition.
“It is impractical to repeat the same unchanged dose of a remedy once, not to mention its frequent repetition (and at short intervals in order not to delay the cure). The vital principle does not accept such unchanged doses without resistance, that is, without other symptoms of the medicine to manifest themselves than those similar to the disease to be cured, because the former dose has already accomplished the expected change in the vital principle and a second dynamically wholly similar, unchanged dose of the same medicine no longer finds, therefore, the same conditions of the vital force. The patient may indeed be made sick in another way by receiving other such unchanged doses, even sicker than he was, for now only those symptoms of the given remedy remain active which were not homoeopathic to the original disease, hence no step towards cure can follow, only a true aggravation of the condition of the patient. But if the succeeding dose is changed slightly every time, namely potentised somewhat higher then the vital principle may be altered without difficulty by the same medicine (the sensation of the natural disease diminishing) and thus the cure brought nearer” – said Hahnemann in the Organon. This goes against not only my experience, but that of many homoeopaths. As far as I know no homoeopath has refrained from repeating the same dose and so not only Hahnemann’s explanation goes beyond logic but goes beyond experience also.

प्रो. जार्ज विथेलीकोस ( Prof. George Vithoulkas)
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अप्रैल 2007 की hpathy e magazine मे जार्ज विथेलीकोस का फ़ास्फ़ोरस पर एक केस प्रकाशित हुआ था । यह एक लाइव डिसक्शन है जिसमे कई होम्योपैथिक चिकित्सकों ने जार्ज के साथ वार्ता-विमर्श किया था। कुछ सवाल अत्यन्त ही महत्वपूर्ण थे जो उस कान्फ़्रेन्स मे उठाये गये । पूरा लेख पढने के लिये यहाँ जायें
संक्षेप मे :

………..The danger comes from the kind of homoeopathy which is
given, say, in the morning Mag-C. 200; at noon, Calc-c.1m; and in the evening, Graph.1m. And in the morning we have another course where Ant-c. 200m. is given, then Gels. 10m; and then Phos. 200m. On the third day we have another scheme and then we repeat it again. We start from the first day. Who knows what is happening? If that person continues to take all these remedies for six months or a year, you have a person who is proving. God knows what!

जार्ज कहते हैं कि जिस तरह कि होम्योपैथी आज हो रही है जहाँ कई सारी औषधियों का समावेश या पर्याक्रम से एक दूसरे को देने का चलन बढा है वह रोगी के लिये बहुत ही घातक है। आगे आप स्वयं ही अन्दजा लगा सकते हैं कि जब यह औषधियाँ मानव शरीर पर अपनी proving करेगीं ।

………..You have to remember that the more clear the case is, the higher you can go, and the more immediate will be the effects. Even in organisms which are exhausted and which are weak.
If you read all the literature, you will see that all the good homoeopaths who were living around the 19th century and the beginning of the 20th were very good and they gave very high potencies. If we had given in that case 200, before we reached 50m, where the child needed action, it would have taken us 3,4 or 5 days. If we give that with little effect, then you have to wait for the return of the symptoms, repeat 200, then 1m, then 10m and then 20m.

आपका यह भी मानना कि जितने लक्षण साफ़ दिखें उतना ही पोटेन्सी को उच्च क्रमांक मे दें ताकि औषधि की क्रिया तुरन्त दिखे। जार्ज इस संदर्भ मे उन पुराने होम्योपैथिक चिकित्सकों की उच्च क्रम की पोटेन्सी के चुनाव की याद दिलाते हैं ।

……..This is a general rule. When a remedy has acted. Do not give up the potency immediately. Try it once. If there is a relapse, go one step higher.
……..When you have started with one remedy and it has an effect, do not discontinue it immediately and jump to another. When you have given a remedy and it has acted beautifully in one potency, try it again in the same potency before you jump to the higher potency. This is a general rule for acute and chronic cases.
……..
Anyhow, you cannot avoid losing sometimes, especially with chronic cases. Because there are no clear indications which will tell you to repeat the same remedy, the same potency, or go one step higher. There are no such indications which I can give you to work with where you will avoid repeating the first potency. A good strategy is to go up. You have given one remedy in a chronic case in a potency. Then he comes in after six months and says, ” I have relapsed.” You may go to 50m. If that does not work, then go back to 10m. Usually that 50m will cover the case and will work. So you can avoid the one step. You have 10m here. Then there is a relapse and you give 10m. Then there is another relapse and you use 50m.
If you go from 10m to 50m immediately, you have nothing to lose. Sometimes, but seldom, you will have to come back to 10m. But there are other old master homoeopaths who would say, “Never change your potency as long as it is working even a little.” They say, “Even if it works for one month or twenty days, do not give it up. Then you can go higher.”

जार्ज का मानना है कि पुराने और जटिल रोगों मे अगर रोगी कुछ महीने या दिन के बाद लक्षणों की पुनरावर्ती की बात कह रहा है तो आप बिना औषधि को बदले इसी औषधि को एक क्रम ऊपर दे अगर लग रहा है कि वह औषधि उन परिस्थिति मे काम नही कर रही है तो आप नीचे भी आ सकते हैं।

जार्ज का मानना है कि पुराने और जटिल रोगों मे अगर रोगी कुछ महीने या दिन के बाद लक्षणों की पुनरावर्ती की बात कह रहा है तो आप बिना औषधि को बदले इसी औषधि को एक क्रम ऊपर दे अगर लग रहा है कि वह औषधि उन परिस्थिति मे काम नही कर रही है तो आप नीचे भी आ सकते हैं। लेकिन सबसे विशेष बात याद रखें कि कि एक चयनित औषधि अगर अपना कार्य सुचारू रूप से कर रही हो तो उसको बदले नही।
और चलते -2 जार्ज केन्ट की भी बात को याद दिला देते हैं :

Kent was talking about that same thing, about doctors who would prescribe high potencies haphazardly, and too many at the same time. There can be real trouble! There can be no trouble in giving one remedy and waiting for one month to see in a chronic case.

उच्च क्रम की पोटेन्सी के साथ अंधाधुध खिलवाड कदापि न करें , यही आपके और रोगी दोनों के लिये ही बेहतर रहेगा।

होम्योपैथी पोसोलोजी प्रो (Homeopathy posology pro ) -आनलाइन साफ़्टवेएर
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होम्योपैथिक औषधि की पोटेन्सी और रिपीटिशन की समस्या को सुलझाने हेतु कुछ नये आनलाइन साफ़्टवेएर भी हैं । इनमे हाल ही मे जारी किया गया होम्योपैथी पोसोलोजी प्रो (Homeopathy posology pro ) नाम का साफ़्टवेर भी चर्चा मे है। इससे संबधित पूरी जानकारी के लिये यहाँ , यहाँ , और यहाँ देखें। होम्योपैथी पोसोलोजी प्रो (Homeopathy posology pro ) साफ़्टवेएर के तीन प्रमुख खंड हैं :
1- Case Management Module
2- Potency Selection Module
3- Sensitivity Meter

फ़िलहाल इसका प्रयोग मैने अभी नहीं किया है , आगे कभी बाद मे इस पर चर्चा करेगें।