Monthly Archives: जनवरी 2015

केन्द्रीय होम्योपैथिक अनुसन्धान परिषद द्वारा प्रकाशित जर्नल नि: शुल्क आनलाइन उपल्ब्ध ( Free Subscription to Indian Journal of Research in Homoeopathy by CCRH )

CCRH WEB SITE

एक समय था जब होम्योपैथिक अनुसंधान द्वारा प्रकाशित शोधपत्रों को मै CCRH से खरीदा करता था । उन्ही दिनो यह मन मे विचार आया कि एक साइट के रुप मे होम्योपैथिक अनुसंधानों को चिकित्सक और आम लोगॊ के सामने रखना चाहिये । एक छोटा सा प्रयास था http://homeopathyresearches.blogspot.in/ के रुप मे । हाँलाकि मै जानता था कि यह काम नियम के अनुसार नही है लेकिन फ़िर भी उन रिसर्च पेपर को स्कैन कर के उनको पोस्ट के रुप मे समय –२ पर डालने का प्रयास किया गया  ।

लेकिन अब जब CCRH ने स्वयं ही इस बात का निर्णय ले लिया है कि वह होम्योपैथिक अनुसंधान के  शोधपत्रों को आनलाइन निशुल्क उपल्ब्ध करेगी तब इन साइट का कोई अर्थ नही रह जाता । http://www.journalonweb.com/ijrh CCRH का वेब पेज है जहाँ आप होम्योपैथिक अनुसंधानों को निशुल्क देख सकते हैं । विशेषकर छात्र- छात्राओं के लिये यह साइट बहुत उपयोगी सिद्ध होगी ।

Indian Journal of Research in Homoeopathy, a publication of Central Council For Research In Homoeopathy, is a peer-reviewed online journal with Quarterly print on demand compilation of issues published.

The journal’s full text is available online at http://www.journalonweb.com/ijrh

The journal allows free access (Open Access) to its contents and permits authors to self-archive final accepted version of the articles on any OAI-compliant institutional / subject-based repository.

The journal does not charge for submission, processing or publication of manuscripts and even for color reproduction of photographs.

Features of Manuscript Management System
  • Online submission
  • Wider visibility though open access
  • Higher impact with wider visibility
  • Prompt review

Visit : http://www.ijrh.org/

Courtesy : Homoeo Book

एक पैर पर संतुलन बनाकर न खड़े हो पाना दिमाग की सेहत का संकेत (Balance on One Leg & Stroke Risk Linked)

standing on one leg

हाल में हुए शोध में एक छोटी सी कसरत के आधार पर यह पता लगाया गया है कि स्ट्रोक हो सकता है या नहीं।

Science Daily  पर प्रकाशित शोध   की मानें तो अगर कोई व्यक्ति लगातार 20 सेकंड तक एक पैर पर खड़ा नहीं हो पाता है तो उसे आगे चलकर स्ट्रोक का खतरा हो सकता है।

जापान की क्योटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का मानना है कि एक पैर पर संतुलन बनाकर न खड़े हो पाना दिमाग की सेहत का भी संकेत है।

शोधकर्ता याशुहारू तबारा के अनुसार, ”एक पैर पर 20 सेकंड तक न खड़े रह पाने का संबंध दिमाग से संबंधित हो सकता है।”

शोध के जौरान औसतन 64 साल के 841 महिलाओं और 546 पुरुषों पर परीक्षण किया है। यह शोध अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के स्ट्रोक जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

स्त्रोत : अमर उजाला

Balance on One Leg &  Stroke Risk Linked

Difficulty standing on one leg may indicate that small strokes or tiny bleeds have already occurred, which means the risk for more serious strokes is high, the investigators reported online Dec. 18 in the journalStroke.

“Individuals showing instability while standing on one leg, as well as problems walking, should receive increased attention, as this physical frailty may signal potential brain abnormalities and mental decline,” said lead author Yasuharu Tabara, an associate professor in the Center for Genomic Medicine at the Kyoto University Graduate School of Medicine.

Stroke, a leading cause of disability and death, occurs when blood flow to a part of the brain is interrupted because of a clot or bleeding.

For the study, Tabara’s team had nearly 1,400 men and women, average age 67, try to balance on one leg for a minute. The researchers also took MRI scans to assess disease in the small blood vessels of participants’ brains, in the form of “silent” strokes — or microbleeds.

Source : http://www.sciencedaily.com/releases/2014/12/141218210013.htm

सर्दियों में सीजनल एफेक्टिव डिसॉर्डर (सैड) – Seasonal Affective Disorder or Winter depression

Portrait of the beautiful thoughtful girl. Autumn, grief, dreams and tenderness.

सर्दियों के दिनों अवसाद या डिप्रेशन की एक आम समस्या है ।  अवसाद कॆ  कारणॊ के पीछे कई वजह  हो सकते हैं लेकिन अगर आप सर्दियों मे दूसरे मौसम की अपेक्षा आलस, थकान और उदासीन महसूस करते हैं तो हो सकता है कि आपको सीजनल एफेक्टिव डिसॉर्डर (सैड) की समस्या हो। सर्दियों में अक्सर दिन के समय सूर्य का प्रकाश हमें कम मिलता है जिससे कई बार हमारी दिनचर्या और सोने व उठने का चक्र प्रभावित होता है। ऐसे में हमारे मस्तिष्क में ‘सेरोटोनिन’ नामक केमिकल प्रभावित होता है जिससे हमारा मूड बिना वजह खराब ही रहता है। कई बार यह स्थिति हमें अवसाद का शिकार बना सकती है ।
सीजनल एफेक्टिव डिसॉर्डर (सैड)  का वर्णन   मेडिकल सांइस मे सबसे पहले १९८० के दशक से दिखता है हाँलाकि इसके पहले कई चिकित्सक और रोगी भी इस बात से वाकिफ़ थे कि सर्दी का मौसम शुरु होते ही स्वभाव मे बदलाव दिखना आरम्भ हो जाता है । इस तथ्य का वर्णन पांचवी सदी ईसा पूर्व हिप्पोक्रेट्स  के कुछ आलेखों मे भी देखा जा सकता है । कई देशॊ मे जहाँ दिन काफ़ी छॊटे होते है और धूप का सर्वथा अभाव रहता है वहाँ अवसाद के रोगियों का मिलना एक आम समस्या है । जैसे स्वीडेन के उत्तर  भाग मे जहाँ छ्ह महीने रात और छ्ह महीने दिन रहता है वहाँ आत्मह्त्या की दर सबसे अधिक है ।

SAD के बारे मे कुछ तथ्य

  • कोई आवशयक नही कि ठंड मे रहने वाले लोगों को ही यह समस्या हो , जो लोग उन जगहों पर रहते हैं जहां ठंड कम पड़ती हो और बहुत अधिक ठंड वाले इलाके में आ जाएं।
  • महिलाओं में इस बीमारी की आशंका अधिक रहती है।
  • 15 से 55 वर्ष की आयु वाले लोगों में इसकी आशंका अधिक रहती है।
    सीजनल एफेक्टिव डिसॉर्डर से पीड़ित व्यक्ति के बहुत अधिक संपर्क में रहने वाले व्यक्ति को भी यह बीमारी हो सकती है।

SAD के लक्षण

  • लगातार थकान महसूस हो और रोजमर्रा के कामो मे मन न लगे ।
  • मन मे नकारात्मक विचारों का बार बार आना ।
  • सही प्रकार नींद न आना या बहुत अधिक नींद आना ।
  • कार्बोहाइड्रेट युक्त चीजों जैसे रोटी, ब्रेड या पास्ता आदि खाने का हमेशा मन करना ।
  • वजन का तेजी से बढना ।

SAD से बचने के उपाय :

  • अपनी दिनचर्या निर्धारित करे ।
  • रोजाना योग , ध्यान , मार्निग वाक और एक्सर्साइज करें ।
  • थोडा खायें और बार –२ खायें लेकिन खाने मे हरी सब्जियों और फ़लों का सेवन अधिक करें ।
  • सुबह देर तक न सोयें ।
  • सर्दियों मे संभव हो तो दोपह्र का खाना धूप मे खायॆ ।
  • इतवार को और अधिक खुशगवार बनायें ,  धूप का आंनद लेने के किसी पार्क मे जायें ।
  • अगर घर मे ही काम करना पडे तो कोशिश करे कि ऐसी खिडकी के पास अपनी टॆबल रखें जहाँ प्रचुर मात्रा मे धूप उपलब्ध हो ।

मेडिकल उपचार
आमतौर पर डॉक्टर सैड के मरीजों का उपचार दो तरह की लाइट थेरेपी से करते हैं- ब्राइट लाइट ट्रीटमेंट और डॉन सिमुलेशन। ब्राइट लाइट ट्रीटमेंट के तहत रोगी को लाइटबॉक्स के सामने रोज सुबह आधे घंटे तक बैठाया जाता है।
दूसरी विधि में सुबह सोते वक्त रोगी के पास धीमी लाइट जलाई जाती है जो धीरे-धीरे तेज होती जाती है। सूर्योदय जैसा वातावरण तैयार किया जाता है। इसके अलावा योग, अवसाद हटाने वाली दवाओं और कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी से भी इस बीमारी का उपचार किया जाता है।

होम्योपैथिक उपचार

SAD के रोगियों को देखने के दौरान निम्म रुब्रिक्स  जो बहुतायात रोगियों मे पाये जाते है  :

  • *Sadness, melancholy
  • *Feelings of worthlessness
  • *Hopeless
  • *Despair
  • *Sleepiness
  • *Lethargy
  • *Craving for sweets
  • *Craving for carbohydrates
  • *Company aggravates
  • *Desire to be alone
  • *Music ameliorates
  • *Difficulty concentrating/focusing
  • *Thoughts of death or suicide.

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औरम मेट , फ़ास्फ़ोरस , सीपिया , रस टाक्स . इगनेशिया सर्दियों मे होने वाले अवसाद की मुख्य औषधियाँ है । हाँलाकि लक्षणॊ की सम्पूर्ण्ता ( Totallity of symptoms ) ही औषधि चुनाव का आधार है ।

लेकिन मुख्य औषधियों पर एक नजर :

Aurum metallicum is for those who sink into terrible depression in the dark of the winter feeling like the cloud is sitting over them. At their worst they feel that life isn’t worth living. They take solace in work and/or religion and hide themselves away listening to sad music until the sun returns the following spring.
Phosphorus has a really close relationship with the weather, loving the sun and sparkling with it – actually feeling invigorated by being out in the sunshine. They are deeply affected by cloudy weather – becoming miserable and gloomy the longer the sun stays away. In the deepest, darkest time of the winter they can slow right down, not wanting to do anything. Chocolate (especially chocolate ice cream) is their great source of comfort at those times – as are their friends. Even brief outbursts of sunshine on a winter’s day will lift their spirits, as can getting out with friends and going to a party or going dancing!
Rhus toxicodendron is useful for those who are particularly vulnerable to cloudy weather, who find that the cold, damp, wet and cloudy weather makes them feel just plain miserable. Their body reacts to the cloudy weather by stiffening up – especially the back and the joints – which makes them feel even worse. Getting up after sitting or lying down for a while is hard, and then continued movement eases the stiffness – unfortunately those joints start to hurt again if they are using them for a while so they have to rest – after which the whole maddening cycle starts again, thereby causing the restlessness that is a keynote for this remedy.
Sepia is for extremely chilly types who hate everything about winter: the damp, the rain, the frost, the snow, the clouds – everything. Their moods start to lift when they begin to get warm again in the late spring and early summer when they can get out in the fresh air and do some vigorous exercise. These people love to run much more than jog, and it is this kind of exercise – vigorous exercise in the fresh air – that makes them feel really well overall. If they can’t do it they sink into a depressed, irritable state where they want to be alone (and eventually, so does everyone else – want them to be alone that is!)