Monthly Archives: मार्च 2012

मेरी डायरी से -“बैच फ़्लावर औषधि–पाइन”

pine

वनस्पति शास्त्र में चीड़ या पाइन को कोनीफरेलीज़ (Coniferales) आर्डर में रखा गया है। चीड़ दो प्रकार के होते हैं : (1) कोमल या सफेद, जिसे हैप्लोज़ाइलॉन (Haploxylon) और (2) कठोर या पीला चीड़, जिसे डिप्लोज़ाइलॉन (Diploxylon) कहते हैं। कोमल चीड़ की पत्तियों में एक वाहिनी बंडल होता है, और एक गुच्छे में पाँच, या  कम पत्तियाँ होती हैं। वसंत और सूखे मौसम की बनी लकड़ियों में विशेष अंतर नहीं होता। कठोर या पीले चीड़ में एक गुच्छे में दो अथवा तीन पत्तियाँ होती हैं। इनकी वसंत और सूखे ऋतु की लकड़ियों में काफी अंतर होता है।

चीड की लकडी का आर्थिक महत्व भी है, विशव की लकडी की काफ़ी माँग चीड द्वारा पूरी की जाती है । चीड़ की बहुत सी जातियों के बीज खाने के काम आते हैं, जिनमें पश्चिमोत्तर हिमालय का चिलगोजा चीड़ अपने सूखे फल के लिये प्रसिद्ध और मूल्यवान् है। जैसे भारत और पाकिस्तान में – पा. जिरार्डियाना (P. gerardiana) अर्थात् चिलगोजा, यूरोप में – पा. पिनिया (P. pinea) तथा पा. सेंब्रा (P. cembra),  उत्तरी अमरीका में – पा. सेंब्रायडिस (P. cembroides) की कई किस्में, अमरीका के पा. लेंबरर्टिना (P. lambertina) की छाल से खरोंचकर रेजिन की तरह एक पदार्थ निकालते हैं, जो चीनी की तरह मीठा होता है। इसे चीड़ की चीनी कहते हैं।

औषधि के रुप में बैच फ़्लावर मे पाइन एक विशेष प्रजाति Pinus sylvestris  से बनायी जाती है ।

self reproach personality of Pine

 

बैच फ़्ल्लावर औषधि “पाइन” का विशेष लक्षण है , ’ Self-reproach‘ यानि प्रत्येक गलती के लिये अपने को दोषी ठहराना ,यह ” guilt complex ” या उनमें व्याप्त दोष भाव इतना अधिक प्रबल होता है कि वे किसी भी  घटना के लिये भी अपने को दोषी मानते हैं ।

लेकिन  इस  एक्मात्र लक्षण से एक रोगी मे व्याप्त उसकी कई मानसिक  समस्यायें इतनी जल्दी  दूर होगीं , यह मैने सोचा भी न था । श्री मु.अ. मुस्लिम धर्म के अनुयायी है । पिछ्ले साल रमजान के दिनों मे वह मुझसे मिले । समस्या अनिद्रा की थी । पिछ्ले कई महीनों से उनकी दिन और रात दोनों की ही नीद गायब थी । और गत तीन सप्ताह से किसी   मानसिक रोग विशेषज्ञ से वह इलाज करा रहे थे लेकिन कई anti depressants और नींद की दवा चलने के बावजूद वह सन्तुष्ट नही थे । नीद न आने का कारण  बताने में वह असमर्थ थे  लेकिन कुछ तो था …. जो उनको इतना अधिक व्याकुल और व्यथित किये जा रहा था । लेकिन रोगी खुल कर बताने  को तैयार नही हुआ और इस हाल में जिसका डर था वही हुआ , पहला  प्रिसक्रपशन  coffea 200 देने से कुछ भी लाभ  न हुआ ।

दो दिन बाद उनके घर से उनकी पत्नी और बेटे को बुलाना पडा । इस बार केस हिस्ट्री  पूरी तरह से ली गई । ज्ञात हुआ कि वह सनू २०१० मे वे एक उच्च  सरकारी पद से रिटायर हुये थे , जो ग्रैच्चुयिटी आदि उनको मिली वह ब्याज समेत  थी । और शायद यही उनके मन की उलझन भी थी । दोष भाव या guilt complex से वह इतना अधिक ग्रस्त थे कि बात –२ पर वह रो पडते । ज्ञात हो कि मुस्लिम धर्म में उनके शास्त्रों के अनुसार  ब्याज की रकम का उपयोग वर्जित है । और यही उनके मन की उलझन  का कारण भी था ।

मेरे सामने दो विकल्प थे ;होम्योपैथी या बैच फ़्लावर । लेकिन बैच फ़्लावर को अधिक सुगमता और सरलता की वजह से प्राथमिकता दी । पाइन की कुछ खुराखॊ मे वह पूर्णतया स्वस्थ हुये । दो दिन बाद वह जब मुझसे मिले तो प्रसन्नचित थे , नीद तो भरपूर आथी थी और साथ ही मन की उलझनें तो बिल्कुल नही दिखीं । मैने हँसते हुये उनसे पूछा कि ब्याज की रकम की समस्या का निपटारा कैसे करेगें जनाब , बिल्कुल हलके मन से वह बोले इसका भी उचित समाधान निकाल लूगाँ ।

बैच फ़्लावर औषधियों की यह  एक प्रमुख विशेषता है जो मुझे इस पद्दति में आकृष्ट करती है , रोगी के ऋण पक्ष (negative thoughts) को धन्न पक्ष ( positive thoughts ) में बदलना ।

पाइन स्वभाव वाले व्यक्तित्व के कुछ और ऋण पक्ष : 

  • हीन भावना (guilty complex )
  • स्वदोषी ( self reproach )
  • अन्तर्मुखी ( introvert )
  • बात-२ में क्षमा करने का उपयोग करना ।
  • दूसरों के दोषों के लिये भी अपने को दोषी ठहराना ।
  • संकोची व्यक्तित्व

KEYNOTES OF PINE :-

  Self-reproach, guilt feelings, despondency.
-Tired and worn out feeling.
-Never really satisfied with themselves.
-Blame themselves, asks more of himself than of others, and if the high standards applied to himself cannot be lived up to, he feels guilty and desperately blames himself in his heart.
-Will tend to be the scapegoat in the class and will uncomplainingly take the punishments for crimes they have not even committed.
-Always apologizing and using apologetic phrases in conversation.
-Feels guilty when need arises to speak firmly to others.
-Childish nervousness.
-Feels unworthy, inferior. Considers self a coward.
-Masochistic desire to sacrifice themselves and may punish themselves for life by choosing an inconsiderate partner.
-Religious beliefs strong, sees sexuality as sin.
-Negative narcissism.
-Personality shuts itself off from love, feels undeserving of love.
-Feeling he does not deserve anything.
-Introverted, little joy in life.

इसको भी देखें :

चेस्टनट–होम्योपैथिक और बैचफ़्लावर पद्दतियों मे उपयोग ( Chestnut–Homeopathic & Bach flower uses )

एक पुरानी पोस्ट की याद आ गयी जो वाइरल संक्रमण विशेषकर खसरा , छॊटी माता और कर्ण मूल पर कई साल पहले लिखी थी । होली के बाद लखनऊ मे जिस तरह से खसरा , चेचक और कर्णमूल के केस बढॆ हैं , एक बार फ़िर होम्योपैथिक थेरापिटिकस को स्मरण करने की आवशयकता पड गयी है ।

होम्योपैथी-नई सोच/नई दिशायें

बदलता हुआ मौसम , बारिश के पानी मे भीगना, रिमझिम फ़ुआरों का आनन्द किसे नही डोल देता, लेकिन उसके साथ लेकर आता है तमाम तरह के वाइरल संक्रमण । फ़िर उसके साथ हमारे नगर निगमों की मेहरबानी जो नल के पानी के साथ प्रदूषित पानी देना अपना फ़र्ज समझते है, वह भी् विभन्न तरह के वाइरल और बैक्टीरियल संक्रमणों के जिम्मेदार होते है। वाइरल संक्रमण कोई आवशयक नही कि बारिश के मौसम की ही मार हो, होली के आसपास और अन्य महीनो मे खसरा[measles], छोटी माता[chicken pox], कर्णमूल[mumps], इनफ़लूनजा[influenza], डेंगू बुखार[dengue fever] का हो जोर या फ़िर प्रदूषित पानी की वजह से पीलिया [hepatitis-jaundice], मियादी बुखार[typhoid] जो कि मूलभूत बैक्टीरियल संक्रमण है आम इन्सान की जिन्दगी को तंग करते रहते हैं।
सबसे पहले लेते हैं वाइरल संक्रमण और देखते हैं कि होम्योपैथी इसमे कितनी मदद कर सकती है। जहां तक तुलनात्मक प्रशन है,एलोपैथी जहां वाइरल में अपने को असहाय पाती…

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होम्योपैथी-नई सोच/नई दिशायें

Hay fever रोग की वह अवस्था है जब मार्च से अगस्त तक पराग कण के वातावरण मे अत्याधिक संख्या मे होने की  वजह से रोगी लगातार जुकाम , छीकॊं , आँख और नाक मे खुजली से परेशान रहता है । कभी कुछ रोगियों मे लगातार जुकाम की वजह से अस्थमा या साँस फ़ूलने की परिस्थति भी  आ सकती है । शहरी क्षत्रों मे बढते प्रदूषण की वजह से एलेर्जिक राइनिट्सस  (allergic rhinitis ) के रुप मे इनके लक्षण  हर  सीजन मे मिल जाते हैं । एक पुराने और जटिल hay fever  और एलेर्जिक राइनिट्सस  (allergic rhinitis )  के रोगी मे प्रेसक्राबिंग का सही तरीका क्या हो ? सिर्फ़ ऊपर से दिखने वाले लक्षण , या मियाज्म दोष या  सभी लक्षणॊं को एक साथ लेकर चलना या सिर्फ़ रोगी मे व्यक्त्तिपूरक लक्षणॊं को खोजना जो खास दिखे या सिर्फ़ रोगी के मानसिक लक्षणॊं के आधार पर दवा का चयन करना जो…

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Different routes of prescribing in Homeopathy

यूटा मॆटिल की पोस्ट , ’ To swallow or not to swallow…that is the question!’ कई अर्थों मे महत्वपूर्ण है । अधिकतर होम्योपैथ दवाओं को oral route यानि मुँह द्वारा ही लेने की सलाह देते हैं जैसा कि यूटा के एक सर्वे से स्पष्ट है । स्वंय हैनिमैन ने भी आर्गेनान सेक्शन २७२ में इस तथ्य को रखा है :

In Aphorism 272 he describes to the homeopath that a “granule placed dry on the tongue, is one of the smallest administrations for the less severe, only recently developed cases of disease” [10] (p.158). He goes on to point out that as such, only few nerves are touched by the medication. Further he describes that if the granule is dissolved in water and is prior to repeated ingestion succussed; a much stronger medication is created of which even the tiniest dose comes into instant contact with many nerves [10]. Yet, this also does not deliver indications for a definite necessity of transmucosal absorption.

लेकिन इसके बावजूद हैनिमैन ने चिकित्सकों को अन्य routes को भी अपनाने की सलाह भी दी  है जिनमें olfaction method प्रमुख है । पिछ्ले वर्ष से अब तक स्वंय मैने भी इस तथ्य को क्लीनकल प्रैक्टिस मे अनुभव किया कि कई होम्योपैथिक दवायें olfaction method से बेहतर कार्य करती हैं जैसे कि acute respiratory infections विशेषकर acute asthma ( दमा ) मे Ipecac 0/3 से 0/10 . arsenic 0/5, और sambucus 0/3 मुँह द्वारा प्रयोग करने की अपेक्षा nebulizer route से अधिक प्रभावी साबित होती है । इसका कारण क्या हो सकता है , इसके बारे मे तो अगर और अधिक रिसर्च हों तो शायद कहना मुमकिन हो ।
फ़िलहाल यूटा मॆटिल की पोस्ट , ’ To swallow or not to swallow…that is the question!’ का आंकलन करें उनके ब्लाग http://cleverhomeopathy.wordpress.com
पर ।

Clever Homeopathy

Abstract

A high degree of satisfaction is reported by patients of the homeopathic approach to health care [11]. Hahnemanns [10] postulations in Aphorism 2 of the Organon insist on a treatment that acts “in the shortest, most reliable and least detrimental of ways” (p.35). The routes by which remedies are administered can influence patient satisfaction with a regimen.

Central to this essay lies the question of the efficacy of the oral transmucosal remedy delivery over the oral swallow method. It is a common belief that, in homeopathic practice, an administered remedy needs to be dissolved on or under the tongue, such that absorption of the active properties via the oral mucosa is established. A survey has been conducted amongst practicing homeopaths evaluating their beliefs and experiences. The alternative routes of remedy delivery and the prevalence of the oral route have been identified via a second survey undertaken amongst suppliers of…

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