Monthly Archives: अगस्त 2009

भूजल मे आर्सेनिक विषाक्तता– क्या होम्योपैथिक औषधि “ आर्सेनिक ऐलब्म “ आर्सेनिक प्रदूषित जल से उत्पन्न हुये रोगों की विकल्प औषधि होगी (Can Homeopathic Arsenic Remedy Combat Arsenic Poisoning in Humans Exposed to Groundwater Arsenic Contamination?: A Preliminary Report on First Human Trial )

साभार : आक्सफ़ोर्ड जर्नल (oxford journal )

 

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भूजल मे आर्सेनिक विषाक्तता – भारत जैसे करीब  बीस  देशों की एक त्रासदी ही है । पशिचम बंगाल और उससे सटे बाँगला देश के कई गाँवों के लोगों का जीवन आर्सेनिक संकर्मित जल ने भयकर रुप से रोगग्रसत कर दिया है । पूरे विशव मे करीब बीस मिलियन लोग इससे प्रभावित है , कई तरीकों से इससे उत्पन्न हुये रोगों से निजात पाने की चेष्टा की गयी लेकिन अभी तक कोई ठॊस परिणाम सामने नही आये हैं । आरेसेनिक संक्रमण से  त्वचा का कैन्सर , केरोटोसिस [keratoses] जैसी समस्यायें उत्पन्न हो सकती  हैं । आर्सेनिक विषाक्तता के अन्य लक्षणॊ  मे गर्दन में कडापन और जकड़न की भावना, प्यास, स्वर बैठना और बोलने  मे कठिनाई,  उल्टी हरे या पीले रंग के, कभी कभी खून से धारीवाले, मरोड के साथ दस्त, मूत्र अंगों मे कभी कभी तेज जलन और दर्द, और अंत मे मौत का कारण भी आरेसेनिक बन सकती है ।

  कल्याणी विशवविधालय और बिधन चन्द्र कृषि विशव्विधालय के शोधकर्ताओं जिनमे अनीसुर खुदाबक्श , सुजीत गुहा , नन्दिनी भट्टाचार्य आदि ने आरेसिन्क प्रदूषित जल से प्रभावित रोगियों पर होम्योपैथिक आरेसिन्क ३० का प्रयोग करके उससे उत्पन्न निष्कर्षो  को जानने की चेष्टा की और परिणाम बेहद उत्साहजनक निकले । उत्पन्न निष्कर्षो को जानने के लिये रोगियों को तीन माह तक आर्सेनिक ३० पर रख कर ईन्जाइम और रक्त के कई परीक्षण जैसे amino transferase, alanine amino transferase, acid phosphatase, alkaline phosphatase, lipid peroxidation और  reduced glutathione द्वारा  मानीटर किया गया ।

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Can Homeopathic Arsenic Remedy Combat Arsenic Poisoning
in Humans Exposed to Groundwater Arsenic Contamination?:
A Preliminary Report on First Human Trial
Anisur Rahman Khuda-Bukhsh1, Surajit Pathak1, Bibhas Guha1, Susanta Roy KarmakarJayanta Kumar Das1, Pathikrit Banerjee1, Surjyo Jyoti Biswas1, Partha Mukherjee,Nandini Bhattacharjee1, Sandipan Chaki Choudhury1, Antara Banerjee1, Suman Bhadra,Palash Mallick, Jayati Chakrabarti and Biswapati Mandal
Department of Zoology, University of Kalyani and
Directorate of Research, Bidhan Chandra Krishi Viswavidyalaya,
Kalyani-741235, West Bengal, India

Groundwater arsenic (As) has affected millions of people globally distributed over 20 countries. In parts of West Bengal (India) and Bangladesh alone, over 100 million people are at risk, but supply of As-free water is grossly inadequate. Attempts to remove As by using orthodox medicines have mostly been
unsuccessful. A potentized homeopathic remedy, Arsenicum Album-30, was administered to a group of As affected people and thereafter the As contents in their urine and blood were periodically determined. The activities of various toxicity marker enzymes and compounds in the blood, namely aspartate
amino transferase, alanine amino transferase, acid phosphatase, alkaline phosphatase, lipid peroxidation and reduced glutathione, were also periodically monitored up to 3 months. The results are highly encouraging and suggest that the drug can alleviate As poisoning in humans.

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Keywords: arsenic toxicity – Arsenicum Album-30 – enzyme biomarkers – homeopathy –
human trial – remedy

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स्वाइन फ़्लू , इन्फ़्लून्जियम और अन्य होम्योपैथिक औषधियाँ

मिनेटेस डाट काम पर शेरी ने इन्फ़्लून्जियम पर कुछ रोचक आँकडॆ दिये ।  1918 से 1957 तक इस औषधि के स्त्रोत फ़्लू से ग्रस्त रोगियों के नासिक स्त्राव और  रक्त के सैम्पल से लिये गये । और  इनमे से अधिकतर उन रोगियों से जो 1918 के फ़्लू की महामारी से ग्रस्त थे ।

1957 के बाद से दवा बनाने के  ढंग  मे बदलाव आया और दवा का स्त्रोत फ़्लू वैक्सीन से लिया गया । इग्लैंड की नेलसन होम्यो लैब इसकी मुख्य निर्माता और विक्रेता हैं और 1918 से 1957  अब तक लगभग 13 अलग –2 सैम्पल ला चुके हैं । इनमे से अधिकतर सैम्पल इसके पूर्व वर्ष मे हुये फ़्लू के वैक्सीन  से लिये गये हैं । 1918 का फ़्लू वाइरस मुख्यत: H1N1 वाइरस था और यह अब तक के सबसे अधिक खतरनाक वाइरस की श्रेणी मे आता है । होम्योपैथिक दृष्टिकोण से मुख्य है इसकी प्रूविग जिससे उत्पन्न लक्षण लगभग वही थे जो फ़्लू के लक्षण से मेल खाते थे । नेलसन द्वारा  उत्पादित इन्फ़्लून्जियम के अन्य उत्पाद निम्म हैं :

1. *Influenzinum (the 1918 epidemic) *
1. 2. Influenza virus A Asia /57
1. 3. Influenza virus A England 42/72
1. 4. Influenza virus B Hong Kong 5/72
1. 5. Influenza virus A/Port Chalmers 1/73
1. 6. Influenza virus A (Asian) 1954
1. 7. Influenza virus B (Asian) 1954
1. 8. Bacillus influenza 1918
1. 9. Influenza virus Az Hong Kong 1968
1. 10. Influenza virus Ar 1967
1. 11. Influenza virus B
1. 12. Influenza Co. (Combination of Az to 1918)
1. 13. Influenza virus a1.

नेलसन लैब के एम्सवर्थ ने इन उत्पादन पर अपनी कुछ इस तरह टिप्पणी की ,

"Our ‘Influenzinum’ is a nosode but it is old. pre 1985.
All the others are made from vaccines except 1989 and triple nosode.
As the flu strains vary from year to year we make up fresh potencies
from the years ‘most lightly flu’s’ vaccine each year in October".

लेकिन अपने देश मे कौन सा उत्पाद प्रयोग हो रहा है , इसके बारे मे दो प्रमुख कम्पनियाँ , बोइरोन इन्डिया और  श्वाबे इन्डिया ने भी अब तक कुछ खास जानकारी नही दी है ।

फ़्लू /स्वाइन /बर्ड /या आम फ़्लू से बचने के लिये इन्फ़्लूनिजियम प्रयोग करने का सही तरीका क्या है :

होम्योपैथिक दृष्टिकोण से  कोई फ़र्क नही पडता कि वह कौन सा फ़्लू है , स्वाइन / बर्ड / या आम फ़्लू , मुख्य है फ़्लू के लक्षणॊ का औषधि से मेल खाना  ।

इन्फ़्लूनिजियम नोसोड श्रेणी मे आता है और इसका व्यवहार भी  सावधानीपूर्वक करना चाहिये । इन्फ़्लूनिजियम 200 सपताह मे एक बार चार सप्ताह तक लगातार और इसके बाद महीने मे एक बार लें।

Influenzinum 200 c – take one dose every week for four weeks, and then, take the last dose one month later. This is intended as a strengthening/preventative measure

फ़्लू के लक्षण प्रकट होते ही किन औषधियों का प्रयोग करें :

  • ओसिलोकोकिनम या ऐनस बार्ब 200c : फ़्लू की शुरुआत होते ही इसका प्रयोग करें । फ़िलहाल अपने देश मे उपलब्धता  नही के बराबर है ।

Oscillococcinum aka Anas Barb 200c. There are two names for this remedy. It’s Anas Barb in Nelsons. This is to be taken on the first onset of ‘flu symptoms. It should catch the early onset of the ‘flu. Though it’s not availbale in India .

  • चुनी हुई सही चयनित औषधि : होम्योपैथिक औषधि प्रयोग करने का यह तरीका सबसे कारगर और सही है । फ़्लू हो जाने पर सही चयनित औषधि का चयन किसी कुशल होम्योपैथिक चिकित्सक से करवायें और प्रयोग करें । इससे संबधित इस लेख को भी देखें ।

The Indicated Remedy if you actually get the full blown ‘flu, then give the indicated ‘flu remedy according to the symptoms. Here’s a good guide: http://www.hpathy.com/diseases/Swine-flu-symptoms-treatment.asp

 आम प्रयोग होने वाली होम्योपैथिक औषधियाँ : लक्षण के अनुसार : [ मार्गेट टायेलेर की Pointers to the common Remedies देखें । ]

Aconite

Belladona

arsenic

Baptisia

Gelsemium

Eup Perf

Pyrogen

Bryonia

Rhus Tox

Mercurious

Camphor

Nux vom

AFTER INFLUENZA BADLY RECOVERED FROM

sulphur

china

arsenic

Cyprepedium pubescens

cyprepedin

Scutellaria lat

  • "genus epidemicus

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साभार : www.moleculardyne.com

माहामारियों मे दवा का चुनाव अन्य चुनाव की अपेक्षा आसान हो जाता है क्योंकि रोग के लक्षण लगभग एक से ही रह्ते हैं । और दवा का चुनाव  मुख्यत: एक या दो दवाओं पर आ टिकता  है ।  ऐसी अवस्था मे चयनित दवा को "genus epidemicus” कहते हैं । यही वजह थी कि 1918  के फ़्लू माहामारी मे होम्योपैथिक दवाओं से लाभ होने की संख्या अन्य पद्दतियों  की अपेक्षा कही अधिक थी ।

The indicated remedy in pandemics is usually very consistent and called the "genus epidemicus". This is narrowed down to a shortlist of three or less.

लेकिन क्या इन्फ़्लूजिनियम को "genus epidemicus” की श्रेणी मे डालना उचित है । हैनिमैन मुख्यत: इस तरह के चुनाव के पक्ष मे नही थे , कारण भले ही रोग का कारक एक ही हो लेकिन हर रोगी अपनी चारित्रिक विशेषताओं के होते हुये हर से भिन्न ही रहता है । "genus epidemicus” को लेकर हैनिमैन ने आर्गेनान मे कुछ विशेष निर्देश दिये हैं :

As per the guidelines laid down by Dr. Samuel Hahnemann in the Organon a Genus epidemics has to be found out in the specific area and it could be the best to be found out in the specific area and it could be the best prophylactic remedy.

    Source: ORGANON OF MEDICINE Aphorism 100-102

    § 100

    In investigating the totality of the symptoms of epidemic and sporadic diseases it is quite immaterial whether or not something similar has ever appeared in the world before under the same or any other name. The novelty or peculiarity of a disease of that kind makes no difference either in the mode of examining or of treating it, as the physician must any way regard to pure picture of every prevailing disease as if it were something new and unknown, and investigate it thoroughly for itself, if he desire to practice medicine in a real and radical manner, never substituting conjecture for actual observation, never taking for granted that the case of disease before him is already wholly or partially known, but always carefully examining it in all its phases; and this mode of procedure is all the more requisite in such cases, as a careful examination will show that every prevailing disease is in many respects a phenomenon of a unique character, differing vastly from all previous epidemics, to which certain names have been falsely applied – with the exception of those epidemics resulting from a contagious principle that always remains the same, such as smallpox, measles, etc.

    § 101

    It may easily happen that in the first case of an epidemic disease that presents itself to the physician’s notice he does not at once obtain a knowledge of its complete picture, as it is only by a close observation of several cases of every such collective disease that he can become conversant with the totality of its signs and symptoms. The carefully observing physician can, however, from the examination of even the first and second patients, often arrive so nearly at a knowledge of the true state as to have in his mind a characteristic portrait of it, and even to succeed in finding a suitable, homœopathically adapted remedy for it.

    § 102

    In the course of writing down the symptoms of several cases of this kind the sketch of the disease picture becomes ever more and more complete, not more spun out and verbose, but more significant (more characteristic), and including more of the peculiarities of this collective disease; on the one hand, the general symptoms (e.g., loss of appetite, sleeplessness, etc.) become precisely defined as to their peculiarities; and on the other, the more marked and special symptoms which are peculiar to but few diseases and of rarer occurrence, at least in the same combination, become prominent and constitute what is characteristic of this malady.1 All those affected with the disease prevailing at a given time have certainly contracted it from one and the same source and hence are suffering from the same disease; but the whole extent of such an epidemic disease and the totality of its symptoms (the knowledge whereof, which is essential for enabling us to choose the most suitable homœopathic remedy for this array of symptoms, is obtained by a complete survey of the morbid picture) cannot be learned from one single patient, but is only to be perfectly deduced (abstracted) and ascertained from the sufferings of several patients of different constitutions.

    1 The physician who has already, in the first cases, been able to choose a remedy approximating to the homœopathic specific, will, from the subsequence cases, be enabled either to verify the suitableness of the medicine chosen, or to discover a more appropriate, the most appropriate homœopathic remedy.

Homeopathic Individualized Q-potencies versus Fluoxetine for Moderate to Severe Depression: Double-blind, Randomized Non-inferiority Trial

Homeopathic Individualized Q-potencies versus Fluoxetine for
Moderate to Severe Depression: Double-blind, Randomized
Non-inferiority Trial

U. C. Adler, N. M. P. Paiva, A. T. Cesar, M. S. Adler, A. Molina, A. E. Padula
and H. M. Calil
Faculdade de Medicina de Jundiaı ´, Homeopathy Graduation Programme, Department of Psychobiology,
Universidade Federal de Sa ˜ o Paulo, Sa ˜ o Paulo, Brazi

Homeopathy is a complementary and integrative medicine used in depression, The aim of this study is to investigate the non-inferiority and tolerability of individualized homeopathic medicines [Quinquagintamillesmial (Q-potencies)] in acute depression, using fluoxetine as active control. Ninety-one outpatients with moderate to severe depression were assigned to receive an individualized homeopathic medicine or fluoxetine 20mg day–1(up to 40mg day–1) in a pro-
spective, randomized, double-blind double-dummy 8-week, single-center trial. Primary efficacy measure was the analysis of the mean change in the Montgomery & Asberg Depression Rating  Scale (MADRS) depression scores, using a non-inferiority test with margin of 1.45. Secondary  efficacy outcomes were response and remission rates. Tolerability was assessed with the side
effect rating scale of the Scandinavian Society of Psychopharmacology. Mean MADRS scores  differences were not significant at the 4th (P¼0.654) and 8th weeks (P¼0.965) of treatment.  Non-inferiority of homeopathy was indicated because the upper limit of the confidence interval (CI) for mean difference in MADRS change was less than the non-inferiority margin: mean differences (homeopathy–fluoxetine) were 3.04 (95% CI 6.95, 0.86) and 2.4 (95% CI 6.05, 0.77) at 4th and 8th week, respectively. There were no significant differences between the percentages of response or remission rates in both groups. Tolerability: there were no significant differences between the side effects rates, although a higher percentage of patients treated with fluoxetine reported troublesome side effects and there was a trend toward greater
treatment interruption for adverse effects in the fluoxetine group. This study illustrates the feasibility of randomized controlled double-blind trials of homeopathy in depression and indicates the non-inferiority of individualized homeopathic Q-potencies as compared to fluoxetine in acute treatment of outpatients with moderate to severe depression.

Keywords: depression – drug therapy – fluoxetine – homeopathy – integrative and
alternative medicine – non-inferiority – Q-potencies – randomized controlled trial – remission –
response

Source :

               http://ecam.oxfordjournals.org/ 

               www.drptandon.blogspot.com 

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स्वाइन फ़्लू या शूकर इन्फ़्लूएंजा

शूकर इन्फ्लूएंजा, जिसे एच1एन1 या स्वाइन फ्लू भी कहते हैं, विभिन्न शूकर इन्फ्लूएंजा विषाणुओं मे से किसी एक के द्वारा फैलाया गया संक्रमण है। शूकर इन्फ्लूएंजा विषाणु (SIV-एस.आई.वी), इन्फ्लूएंजा कुल के विषाणुओं का वह कोई भी उपभेद है, जो कि सूअरों की महामारी के लिए उत्तरदायी है। 2009 तक ज्ञात एस.आई.वी उपभेदों में इन्फ्लूएंजा सी और इन्फ्लूएंजा ए के उपप्रकार एच1एन1 (H1N1), एच1एन2 (H1N2), एच3एन1 (H3N1), एच3एन2 (H3N2) और एच2एन3 (H2N3) शामिल हैं। इस प्रकार का इंफ्लुएंजा मनुष्यों और पक्षियों पर भी प्रभाव डालता है। शूकर इन्फ्लूएंजा विषाणु का दुनिया भर के सुअरो मे पाया जाना आम है। इस विषाणु का सूअरों से मनुष्य मे संचरण आम नहीं है और हमेशा ही यह विषाणु मानव इन्फ्लूएंजा का कारण नहीं बनता, अक्सर रक्त में इसके विरुद्ध सिर्फ प्रतिपिंडों (एंटीबॉडी) का उत्पादन ही होता है। यदि इसका संचरण, मानव इन्फ्लूएंजा का कारण बनता है, तब इसे ज़ूनोटिक शूकर इन्फ्लूएंजा कहा जाता है। जो व्यक्ति नियमित रूप से सूअरों के सम्पर्क में रहते है उन्हें इस फ्लू के संक्रमण का जोखिम अधिक होता है। यदि एक संक्रमित सुअर का मांस ठीक से पकाया जाये तो इसके सेवन से संक्रमण का कोई खतरा नहीं होता। 20 वीं शताब्दी के मध्य मे, इन्फ्लूएंजा के उपप्रकारों की पहचान संभव हो गयी जिसके कारण, मानव मे इसके संचरण का सही निदान संभव हो पाया। तब से ऐसे केवल 50 संचरणों की पुष्टि की गई है। शूकर इन्फ्लूएंजा के यह उपभेद बिरले ही एक मानव से दूसरे मानव मे संचारित होते हैं। मानव में ज़ूनोटिक शूकर इन्फ्लूएंजा के लक्षण आम इन्फ्लूएंजा के लक्षणों के समान ही होते हैं, जैसे ठंड लगना, बुखार, गले में ख़राश, खाँसी, मांसपेशियों में दर्द, तेज सिर दर्द, कमजोरी और सामान्य बेचैनी।

लक्षण

इस के लक्षण आम मानवीय फ़्लू से मिलते जुलते ही हैं – बुखार, सिर दर्द, सुस्ती, भूख न लगना और खांसी. कुछ लोगों को इससे उल्टी और दस्त भी हो सकते हैं. गंभीर मामलों में इसके चलते शरीर के कई अंग काम करना बंद कर सकते हैं, जिसके चलते इंसान की मौत भी हो सकती है.

मनुष्यों मे शूकर इंफ्लुएंजा के मुख्य लक्षण

 

 

बचाव

  • मुँह और अपनी नाक को ढक कर रखें , खासकर तब जब कोई छींक रहा हो ।
  • बार-बार हाथ धोना जरूरी है;
  • अगर किसी को ऐसा लगता है कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है तो उन्हें घर पर रहना चाहिये। ऐसी स्थिति में काम या स्कूल पर जाना उचित नहीं होगा और जहां तक हो सके भीड़ से दूर रहना फायदेमंद साबित होगा।
  • अगर सांस लेने में तकलीफ होती है, या फिर अचानक चक्कर आने लगते हैं, या उल्टी होने लगती है तो ऐसे हालात में फ़ौरन डॉक्टर के पास जाना जरूरी है.

साभार : विकीपीडिया ( हिन्दी )

स्वाइन फ़्लू पर दो पावर पाइन्ट प्रेसन्टेन्शन को अवशय देखें , इसमे से एक डा. टी.वी. राव , प्रोफ़सर माइक्रोबाइलोजी , श्री देव राज मेडिकल यूनिवरसिटी , कोलार का , “ Swine flue outbreak 2009 “ है और दूसरा Homeopathy 4 everyone 2007 मे “ Homeopathy & the treatment of epidemic diseases “ नाम से प्रकाशित हुआ था ।

Swine flue outbreak 2009

डाउनलॊड लिंक : http://www.box.net/shared/uz79k46p0y

Homeopathy & the treatment of epidemic diseases

डाउनलॊड लिंक : http://www.box.net/shared/y28k0rx1o5

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www.homeopathytorrents.blogspot.com – एक बेहतर माध्यम

Torrents शब्द पर भले ही कईयों को आपत्ति हो लेकिन बहुतों के लिये torrent sharing का उत्कृष्ट माध्यम है । www.homeopathytorrents.blogspot.com  होम्योपैथी चिकित्सकों और B.H.M.S. के छात्रों के लिये एक बेहतर शुरुआत है । यहाँ B.H.M.S. प्रथम वर्ष से लेकर अन्तिम वर्ष तक के छात्रों के लिये सब कुछ है जिसकी उनको आवशकता है , होम्योपैथी  मैटेरिया मेडिका , थेरापियूटिकस और   होम्योपैथी विषयों से जुडॆ पावर पाइन्ट प्रेसन्टेशन और शोध-पत्र और इसके अलावा होम्योपैथी से जुडॆ allied विषयों जैसे ऐनाटोमी , फ़िजोलोजी , प्रैकिटिस आफ़ मेडिसन , सर्जरी आदि के pdf और pdb फ़ार्मेट मे उपलब्ध पुस्तकें ।

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