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दोहरी मार झेलती होम्योपैथिक दवायें

गत एक साल से होम्योपैथिक औषधियों पर दोहरी मार देखने  को मिली है । पहले शुगर आफ़ मिल्क मे अप्रत्याशित वृद्दि से बायोकेमिक और ट्राईट्यूरेशन औषधियों के दाम आसमान छूने लगे और अब माननीय उच्चतम न्यायालय ने पौंडं पैंकिंग ( ४५० मि.ली. ) की बिक्री पर रोक लगाकर रही सही कसर पूरी कर दी ।

लेकिन सबसे पहले शुगर आफ़ मिल्क के खेल को समझते हैं । सन २००७ की शुरुआत मे शुगर आफ़ मिल्क के रेट १८००/ बैग था अगले तीन महीने मे यह रेट ३०००-३५००/ बैग तक जा पहुँचा , दो महीने बीते ही नही थे कि इसकी कीमते ६०००-९००० / तक आसमान छूने लगी और दिसम्बर २००७ तक यह १२०००/ बैग तक जा पहुँचा । समझा जाता है कि  चीन की एक कम्पनी ने हालैंड की शुगर आफ़ मिल्क बनाने वाली कमपनी से अनुबंध करके शुगर आफ़ मिल्क को अपने कब्जे मे ले लिया , शायद इससे ही कीमतों मे वृद्दि दिखी । लेकिन कारण चाहे जो भी हो दवा बनाने वाली प्रमुख होम्योपैथिक कम्पनियों ने अपने स्वार्थ को साधते हुये बायोकैमिक दवाओं की कीमत  ३२/ से ६५/ तक और triturations की कीमत ५० से ८५/ तक पहुँचा दी  । लेकिन मजे की बात की मार्च २००८ के बाद रेट मे कमी आने के बावजूद २५ से ४५० ग्राम की पैकिंग मे रेट कम होने नही दिख रहे हैं ।

दिसम्बर २००७ मे माननीय उच्चतम न्यायालय ने पौंडं पैंकिंग ( ४५० मि.ली. ) की बिक्री पर रोक लगा कर रही सही कमर और तोड दी । केंद्र सरकार ने अल्कोहल की मात्रा वाली होम्योपैथिक दवाओं को रिटॆल मे ३० मि.ली. और अस्पताल सप्लाई हेतु १०० मि.ली. करने के निर्देश दिये । इसके विरुद्द प्रमुख कम्पनियों ने उच्च न्यायालय से स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया लेकिन इस स्थगन आदेश को दिसम्बर २००७ मे उच्चतम न्यायालय ने   निरस्त कर दिया । पूरी रिपोर्ट नीचे देखें ।

केंद्र सरकार के ३० मि.ली. और  १०० मि.ली. करने के निर्देश पर प्रमुख होम्योपैथिक कम्पनियों की चुप्पी संशय मे डालने वाली रही । आज से करीब २० साल पहले कलकत्ता की अधिकांश कम्पनियों का होम्योपैथिक दवाओं मे होल्ड हुआ करता था । शारदा बोएरन ( SBL INDIA ) के आने के बाद से समीकरण बदले और कलकत्ता का होल्ड टूटता दिखाई दिया । इन २० सालों मे दिल्ली की अधिकाशं कम्पनियों ने मार्केट पर कब्जा जमा लिया लेकिन सबसे बडी हिस्सेदारी SBL  की रही जो प्रमुखत: फ़्रांस की कम्पनी थी । जरमनी की विल्मर शवाबे (  Willmar Scwabe India ) के आगमन से SBL और BAKSON जैसी कम्पनियों की मोनोपोली मे कोई कमी नही दिखाई दी और शवाबे को अपनी पहचान बनाने मे काफ़ी दिक्कत का सामना करना पडा । मजे की बात है कि शवाबे शुरु से ही ३० मिली और १०० मिली का निर्माण कर रहा था और ४५० मिली को उसने नही छुआ । Willmar Scwabe India के रेट शुरु से ही अन्य कम्पनियों के रेट से तिगुने ही थे ; जाहिर है कि सेल का प्रभाव सबसे अधिक इसी कम्पनी को झेलना पडा । केंद्र सरकार के निर्देश पर इन कम्पनी की चुप्पी कही मलाई खाने मे न लगी हो तो कोई ताज्जुब नही ।

आने वाले दिनो मे लगता है कई ऐलोपैथिक कम्पनियों का प्रवेश होम्योपैथिक दवा निर्माण मे होने वाला है । एक प्रमुख ऐलोपैथिक कम्पनी बूटस ( BOOTS) का  होम्योपैथिक दवा निर्माण मे प्रवेश इस शंका को बल देता है । जाहिर है कि इन मल्टीनेशनल कम्पनियों को लाभ ४५० मि.ली. मे नही बल्कि ३० मि.ली. और १०० मि.ली. मे ही दिखेगा ।

चार गुना महंगी हो गई होम्योपैथिक दवाएं

स्त्रोत : दैनिक जागरण -दिनांक २५-५-२००८
लखनऊ, 25 मई : सस्ते इलाज का दावा करने वाली होम्योपैथिक पद्धति अब कम से कम गरीबों की पहुंच से बाहर होने वाली है। कुछ माह पहले तक जुकाम-बुखार में काम आने वाली आर्सेनिक टिंचर नामक होम्योपैथिक दवा की 30 एमएल की फुटकर शीशी 10 से 12 रुपये में मिल जाती थी अब इसके लिए 40 रुपये से अधिक खर्च करना पड़ेगा। केंद्र सरकार ने अल्कोहल की मात्रा वाली होम्योपैथिक दवाओं को केवल 30 एमएल की पैकिंग वाली शीशी में ही बेचने का आदेश दिया है। इस आदेश की आड़ में कम्पनियों ने 30 एमएल दवा की सीलबंद शीशी का दाम फुटकर की तुलना में चार गुना से ज्यादा कर दिया है। गौरतलब है कि सभी होम्योपैथिक दवाओं में कम से कम 70 फीसदी अल्कोहल होता है। कम्पनियां इन दवाओं को एक पौंड (450 एमएल) की सीलबंद शीशी में बाजार में उपलब्ध कराती हैं। होम्योपैथिक दवा विक्रेता एक पौंड की शीशी से ही दवा निकाल कर मरीजों को फुटकर बेचते हैं। अल्कोहल की मात्रा वाली दवाओं पर नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार ने दो वर्ष पूर्व औषधि एवं प्रसाधन अधिनियम-1945 में एक नियम 106(बी) जोड़ा था। इसके तहत कोई भी होम्योपैथिक दवा जिसमें 12 प्रतिशत या इससे अधिक अल्कोहल (या इथाईल अल्कोहल) हो, वह 30 मिलीलीटर (एमएल) से अधिक की पैकिंग में नहीं बेची जायेगी। अस्पतालों में सप्लाई के लिए 100 एमएल की शीशी में दवा बेची जा सकती है। यह नियम लागू हो पाता कि निर्माता कम्पनियों ने सभी बड़े राज्यों के उच्च न्यायालय से उक्त नियम के विरुद्ध स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया। दिसम्बर 2007 में उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालयों के स्थगन आदेशों को निरस्त कर दिया। इसी आदेश के क्रम में ड्रग कन्ट्रोलर आफ इंडिया कार्यालय ने जनवरी माह में होम्योपैथिक दवा निर्माता कम्पनियों को अप्रैल माह से केवल 30 एमएल की पैकिंग में ही दवा बेचने के निर्देश जारी किये। ऐसे में कम्पनियों ने जब 30 एमएल की पैकिंग वाली दवाओं को बाजार में उतारा को उनका दाम फुटकर की तुलना में कई गुना अधिक था। एक दवा निर्माता कम्पनी के अधिकारी डा.नरेश अरोड़ा के मुताबिक दो वजहों से दवाओं के दाम बढ़ाये गये हैं, पहला 30 एमएल शीशी की पैकिंग में खर्चा बढ़ा है और दूसरा केंद्र सरकार ने निर्माता कम्पनियों को सब्सिडी में दिये जाने वाले अल्कोहल की मात्रा में कटौती की है। कारण कुछ भी हो इसका खमियाजा गरीब मरीजों को भुगतना पड़ेगा। होम्योपैथिक दवाओं के दाम में नियंत्रण कर पाने में औषधि नियंत्रक एके पांडेय अपनी लाचारी व्यक्त करते हैं। उनके अनुसार होम्योपैथिक दवाओं के मूल्य नियंत्रण सम्बन्धी कानून न होने से इसे रोक पाना फिलहाल संभव नहीं है। केंद्रीय होम्योपैथिक परिषद के सदस्य डा.अनुरुद्ध वर्मा कहते हैं कि अभी तक अल्कोहल युक्त होम्योपैथिक दवाओं के दुरुपयोग का कोई मामला सामने नहीं आया है ऐसे में उक्त नियम को लागू करना तर्कसंगत नहीं है। मरीजों के हित में इसे वापस लेना चाहिये।

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ब्लाग वार्ता – मर्ज और मरीज की बातें – (दैनिक हिन्दुस्तान दिनांक -7-5-2008 )

गत सप्ताह ७-५-२००८ के दैनिक हिन्दुस्तान में रवीश जी का लेख स्वास्थ संबधित विषयों और हिन्दी चिठ्ठाकारी पर छ्पा ।  ५-५-०८ को मुझे रवीश जी का मेल मिला औए उसके बाद शाम को एक फ़ोन काल , सवालों की दनादन बौछार , मुझे दो दिन बाद मे मालूम पडा कि यह तो समाचार पत्र के लिये एक लेख बन चुका था , स्टिगं आप्रेशन नहीं समझें  🙂

स्वास्थ विषयों पर हिन्दी मे चिकित्सकों के ब्लाग अभी कम ही हैं , लेकिन शुरुआत तो हो चुकी है । बाल रोग  विशेषज्ञ डां  बेजी जी  का ज्ञान की गंगा बिखेरता स्पंदन ,  त्वचा विशेषज्ञ डां मिहिरभोज का स्वास्थ चर्चा , दन्त विशेषज्ञ  डां प्रवीन चोपडा जी का मीडिया डाक्टर , आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक से संबधित डां रुपेश का आयुषवेद और डां देश बन्धु वाजपेयी जी का इलेक्ट्रो त्रिदोष ग्राफ़  आदि प्रमुख हैं । आगे अलग-२ क्षेत्र से और भी चिकित्सक जुडेगें और हिन्दी को गरिमामयी स्थान दिलाने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगें । गूगल का भी योगदान कम नही है , गूगल के  भाषा अनुवाद की मदद से आगे  चिटठों को भाषा परिवर्तित करके आसानी से पढा जा सकेगा , हिन्दी को जनसाधारण और विशव मे लोकप्रिय करने का ही काम करेगा ।

शैशव काल से तरुण होती हिन्दी को जिन्होने  आरम्भ से देखा और लिखने के क्रम को जारी रखा तब जब  इन्टर्नेट में  पढने वालों की संख्या नगण्य ही थी , असली बधाई के पात्र हैं ।

समाचार पत्र ” दैनिक हिन्दुस्तान ” की इस कटिगं को साफ़ देखने के लिये नीचे दिये चित्र पर चटका लगायें  ।

दायाँ मस्तिष्क या बायाँ मस्तिष्क – जरा सी माथा-पच्ची करे ।

आपको इस नाचती हुई लडकी को देखकर क्या लगता है – यह किस दिशा मे नाच रही है – घड़ी की सुई की दिशा ( clockwise ) या घड़ी की सुई की विपरीत दिशा ( anticlockwise) में । अगर आप घड़ी की सुई की दिशा ( clockwise ) मे अपना अनुमान लगा रहे है तो आप अपने मस्तिष्क के दायें हिस्से का प्रयोग कर रहे हैं और अगर विपरीत दिशा मे तो बायें  🙂 । तो इससे क्या अर्थ निकला , नीचे डेली टेलीग्राफ़ की रिपोर्ट देखें और परिणामों से अवगत हो लें । हाँ , Daily telegraph की इस रिपोर्ट पर आ रहे कमेन्ट को देखना न भूलें ।

The Right Brain vs Left Brain test … do you see the dancer turning clockwise or anti-clockwise?

Source : Daily telegraph

If clockwise, then you use more of the right side of the brain and vice versa.
Most of us would see the dancer turning anti-clockwise though you can try to focus and change the direction; see if you can do it.

LEFT BRAIN FUNCTIONS
uses logic
detail oriented
facts rule
words and language
present and past
math and science
can comprehend
knowing
acknowledges
order/pattern perception
knows object name
reality based
forms strategies
practical
safe
RIGHT BRAIN FUNCTIONS
uses feeling
“big picture” oriented
imagination rules
symbols and images
present and future
philosophy & religion
can “get it” (i.e. meaning)
believes
appreciates
spatial perception
knows object function
fantasy based
presents possibilities
impetuous
risk taking

अजीबोगरीब समानतायें -क्या है इनमे सच ?

यह भी अजीब संयोग है कि प्रकृति द्वारा प्रद्दत नाना प्रकार के फ़ल और सब्जी की संरचानाये हमारे शरीर के कई अंगों और कोशिकाओं से मिलती जुलती प्रतीत होती हैं ।  चीनियों ने प्रकृति के इस निराले खेल को ५००० वर्ष पहले ही से जाना और समझा ।

कुछ अंदाज लगायें कि क्या समानता हो सकती है १. एक कटी हुई गाजर और आँख मे या २. कटॆ हुये टमाटर और ह्रदय मे  या ३. अखरोट और मस्तिषक के बीच या ४. शकरकन्दी और पैन्क्रियाज के मध्य । और भी है बहुत से ऐसे सम्बन्ध ; प्रकृति की इस निराले अंदाज को जानने के लिये नीचे इस वीडियो किल्प को देखें  ।

" Food Patterns of our Body Proof for Intelligent Design"