Monthly Archives: अक्टूबर 2007

लियोकोडर्मा पर हुये होम्योपैथिक रिसर्च और दृष्टिकोण(clinical homeopathic researches and views in vitiligo)

लियोकोडर्मा यानि सफ़ेद दाग पर चल रही सीरीज का यह अन्तिम भाग  है , इसके पहले के भागों के लिये यहाँ और यहाँ देखें । हाँलाकि यह पोस्ट यहाँ समाप्त अवशय होती है लेकिन इसके बाद समय-२ पर रोग मुक्त हुये क्लीनिकल केसों से  अपडेट करने का प्रयास अवशय  रहेगा । एक बात और अगर आप होम्योपैथिक चिकित्सक हैं और इस ब्लाग से गुजर रहे हैं तो अपने क्लीनिकल अनुभवों को होम्योपैथिक से जुडने वाली नयी पीढी में बाँटने मे न हिचकें , कोई भी चिकित्सक पूर्ण नही है , हम अपने और दूसरों के अनुभवों को बाँट कर अपनी चिकित्सा प्रणाली को समृद्द और बचा सकते हैं और अगर हम ऐसा नही करेगें तो शायद हमारा हाल भी आर्युवेद्द और यूनानी पद्दति जैसा ही होगा जहाँ अच्छे-२ वैद्द विशारद अपने अनुभवों को लिये कालचक्र मे समा गये । कोई आवशयक नही कि आप मेरी बात से सहमत ही हों , विचारधाराओं मे अन्तर और उस पर एक स्वस्थ बहस ही किसी भी निष्कर्ष तक पहुँचने मे हमेशा सहायक होती है । और चलते-२ एक सलाह आंम जनों से – कृपया होम्योपैथिक औषधियों पर हाथ आजमाने की चेष्टा न करें , आपका होम्योपैथिक चिकित्सक आपको उचित और योग्य सलाह दे सकता है ।
लियोकडर्मा की इस अन्तिम पोस्ट मे हम लियोकडर्मा पर हुये होम्योपैथिक शोध कार्यों को तो देखेगें ही और साथ ही मे कुछ टिप्स नये B.H.M.S. छात्रों और चिकित्सकों के लिये भी रहेगी । सबसे पहले लेते हैं हमारे औषधि-कोष यानि रिपर्ट्री पर एक नजर और उसके बाद शोध कार्य और विभिन्न चिकित्सकों के क्लीनिकल अनुभव ।
होम्योपैथिक औषधि कोष यानि रिपर्ट्री पर एक नजर:

सबसे पहले होम्योपैथिक औषधि कोष यानि रिपर्ट्री पर एक नजर देखते हैं । आम तौर से प्रयोग होने वाली केन्ट रिपर्ट्री ,कम्पलीट रिपर्ट्री, सिन्थीसिस, मिलिनीनम या चाहे विथिलीकोस सिस्टम की बात करे तो vitiligo या leucoderma शब्द को सर्च करने का तरीका लगभग एक सा ही है।

केन्ट और कम्पलीट (KENT REPERTORY & COMPLETE REPERTORY):
1- जिस खंड मे जैसे skin मे vitiligo या leucoderma शब्द को सर्च कर   रहे हो वहाँ पहले discoloration white शब्द के अंतर्गत ढूंढे .  यही बात दूसरे खंडॊं   पर भी लागू होती है।

radar search vitigo  रडार

 

2-होमपैथ 8( HOMPATH CLASSIC 8 ) के प्रयोगकर्ता को साफ़्टवेएर मे दोनो विकल्प दिखेगें । Discoloration skin–white–vitiligo और quick repertorisation मे सीधे vitiligo शब्द को डालकर सर्च कर सकते हैं।

hompath leucoderma search होम्पैथ क्लासिक प्रीमियम

Hompath classic 8-quick repertorisation

 
3-सिन्थीसिस के लिये रडर के प्रयोगकर्ता ऊपर लिखे तरीके से ही सर्च कर सकते हैं, लेकिब्न रडार मे D/D के लिये भी एक विकल्प है जो होम्पैथ मे नही है। देखे नीचे आकृति ( रडार 9 से ली गयी)
DD of vitigo रडार

 

जिन खंड (chapters) पर विशेष ध्यान देना है उनकी आकृति नीचे दी है:

रडार  रडार

एक सही सिमिलीमम की तलाश के लिये सिर्फ़ common symptoms पर अपना जोर न रखें , रोगी के मानसिक लक्षणों को लेने की कोशिश करें ।

क्या एक सही सिमीलिमम की तलाश पूरी हो गई , नहीं कदापि नही , रोगी के मन:स्थिति को टटोलने की कोशिश करें। रोगॊ को जिस इलाज की आश्वशयकता है उसे आपको खोजना है । वह इलाज जो उसके लिये है -उसके शरीर और मन के लिये -विशेषकर मन के लिये । अत: जो लक्षण यांत्रिक कारणॊं पर आधारित होते हैं वे रोगी का बयान नही करते अत: होम्योपैथी चिकित्सा के लिये महत्वहीन रह जाते हैं । अत: जब आप अपनी रिपर्ट्री खोलें तो रोग से सम्बनिधत लक्षणॊ को नजरान्दाज करें । ध्यान रखें जो लक्षण आपने लिये हैं वह रोगी  की ही चारित्रिक विशेषता वाले लक्षण हों न कि रोग के साधारण लक्षण । आप देखते होगें कि आपका रोगी बेहद नफ़रत करने वाली प्रवृति का है या सन्देह करता है या रोता है और सहानभूति मिलने पर खिन्न हो जाता है । रोग होने पर ऐसे लक्षण उभरते हैं या उसका व्यक्तित्व भी कुछ ऐसा ही है ।  यदि मानसिक लक्षण प्रमुख हैं और यह रोगी के सामान्य स्थिति मे बदलाव दिखाता है तो यह बेहद महत्वपूर्ण हैं । किसी कम महत्वपूर्ण मानसिक लक्षण  या छोटे लक्षण के लिये अच्छी दवा को खोने का खतरा न मोल लें । और अगर यदि वह अधिक महत्वपूर्ण है तो आपको जानना चाहिये कि जिस दवा के चुनाव मे आप लगे हैं उसके लक्षणॊं मे यह लक्षण शामिल हो । और अगर वह बेहद महत्वपूर्ण दिखने वाला मानसिक लक्षण उन लियोकोडर्मा के सामान्य दिखने वाले लक्षणों को न भी कवर कर रहा हो , तब भी यह आप की औषधि के चुनाव की महत्वपूर्ण ईकाई होगा । सच तो यह है कि यह प्रणाली सिर्फ़   सफ़ेद दाग के रोगियों के केस लेते समय ही लागू नही होती बलिक सभी जटिल रोगों के लिये आवशयक है ।

अत: इतना महत्वपूर्ण है यह मानसिक लक्षण कि अगर आपने सही ढंग से लिया है तो उसे आप आसानी से हटा भी नही सकते । अत: आपकी औषधि  यही है । मानसिक लक्षणों की होम्योपैथिक औषधि के चयन मे क्या भूमिका है , इस पर हम विस्तार से अगली किसी पोस्ट मे देखेगें , लेकिन नीचे दिया एक स्लाइड शो इस पर थोडा प्रकाश अवशय डाल सकता है ।

इस स्लाइड शो के अधिकाशं चित्र दिल्ली होम्यो.काम द्वारा प्रस्तुत एक फ़्लैश प्रेस्नट्शेन से लिए गये हैं , जिनके कुछ चित्रों को स्लाइड शो मे डाला गया है । आभार – delhihomeo.com )

आप लक्षणों को इस तरह सजायें :

मानसिक लक्षण ( mental symptoms) —–>व्यापक लक्षण ——->विशेष लक्षण ——->रोग के उतार चढाव के साथ

लेकिन अगर रोगी मे चारित्रिक लक्षण ( constitutunal symptoms ) नही मिल रहे हों तब क्या करें । मियाज्म दोष पर भी अपनी तीखी और पैनी निगाहें रखें और अगर फ़िर भी नही तो  रोगी मे उस दुर्लभ लक्षण ( rare , striking & characteristic symptoms) को ढूँढने की कोशिश करें ।

एक बात जो अकसर मै कहता रहा हूँ और इस कडी की पहली पोस्ट मे भी कही थी कि होम्योपैथिक मैटिरिया मेडिका मे हाल के दिनों मे आयी नई औषधियों का प्रयोग कैसे हो क्योंकि इनका परीक्षण पूर्ण रुप से नही हुआ है , इनमें काफ़ी बडी संख्या भारतीय मूल की औषधियों से उतप्न्न मदर टिन्चर की है । इन औषधियों को अगर हम चारित्रिक लक्षण द्वारा चयनित औषधि के साथ प्रयोग करते हैं तो रोग की  recovery काफ़ी तेज दिखाई देती है । मै तो इसी तरीके से ही प्रयोग करता रहा हूँ और डां देश बन्धु वाजपेई जी शायद आप भी इससे सहमत होगें कि इनके परिणाम अधिक सफ़ल रहते हैं । हाँ , यह बात अलग कि हम होमयोपैथी के सिद्दातों से थोडा हटकर चलते है ।

एक नजर देखते हैं उन दुर्लभ होम्योपैथिक औषधियों की तरफ़ : 

दुर्लभ होम्योपैथिक औषधियाँ ( Rare homeopathic medicines)
1. Amni Vesenega
2. Psoralia Cor
3. Mica
4. Magneferia Indica
5. Commocladia D
6. Ozone
7. Veroninia A
8. Cuprum oxy Nigrum
9. Cobalt Nitricum
10. Radium Brom
11. Hydrocotyle
12. Piper methysticum

 

 सफ़ेद दाग पर हुये होम्योपैथिक शोध कार्य और विभिन्न होम्योपैथिक चिकित्सकों के मत :

  • डां वाडिया के लियोकडर्मा के रोगियों पर लिये सफ़ल परिणाम सबसे अधिक authentic रहे । एक ऐलोपैथिक चिकित्सक होने के बावजूद उनका योगदान होम्योपैथी के लिये अतुलनीय रहा । आपके अनुसार :

Drugs helpful in my Practice
At the outset, I may mention that the constitutional remedy works the best, if we can find matching symptoms. Later, an intercurrent remedy or a miasmatic remedy can be given.
1. Thuja-occ- I use this remedy very frequently. My reasons.
a) A number of vaccinations and modern drugs have been given especially in children. Here Thuja works as an antidote and clears the sycotic background.
b) Symptoms of Thuja are present not only children but adults too have dreams of falling, startling in sleep, have warts on the face or body, loss of appetite and dullness since those innoculations. After three doses of Thuja 200, the patients general condition improves. Now is the time to give the indicated remedy which starts working well.
c) My third reason for giving this remedy, is in cases of history of tuberculosis or respiratory diseases in the patient. According to Dr Barnett in his book on tumours on pg 315, Bacillinum will not act very well unless Thuja is given first. Vacinosis evidently comes in the way, very much the same as Hahnemann mentions for Psora and the use of Sulphur as an intercurrent remedy.
2. Sulphur- This is an important remedy and also the greatest antipsoric. It will also cure (along with psora) the suppressed sycotic and syphilitic miasmatic symptoms. If there is a history of suppressed shin diseases, diarrhoea, dysentery, jaundice, typhoid and other fevers then this remedy is of help. But the most important thing is that symptoms of Sulphur should be present like.
a) Heat of palms, soles, eyes, anus, vulva, vagina and top of head.
b) Generally patient is hot yet sometimes could be chilly.
c) Irritability and obstinacy can also be noticed.
d) Books describe Sulphur as a ragged philosopher but that is not found in all the cases. Due to poverty or lack of toilet facilities he may not take a bath and look dirty. The remedy can be given in clean patients also if other symptoms agree.
3. Bacillinum- The third most important remedy is Bacillinum or Tuberculinum. Many times we get cases, where the patient suffers from a chronic cold, with an occasional history of haemoptysis. Loss of weight, loss of appetite, flat chests of boys and girls, prominent ribs and clavicles etc may be other symptoms. We could get a family history of TB or pleurisy. We ask a patient of Sulphur repeatedly for a history of skin diseases, similarly we must ask a Bacillinum patient for a history of chest diseases. Many patients who are not clear or intelligent give a history of pleurisy more often than a history of TB. So we must try and get the symptoms in a tactful manner. Tuberculinum-bovinum and Drosera act better if there is a history of glandular or bony tuberculosis. The first case baby V G had bone TB for which she was given the drugs mentioned above. Now 19 years old, she goes to college in perfect health.
4. Nux-vomica- is required initially when the patient comes after taking a lot of the Modern drugs. It acts as an antidote to clear the background. This remedy also helps the patient to get over the problem of ineffectual urge for stool and also improves his digestion. It however has no specific action on the white spots.
5. Sepia- useful particularly in females. Besides the usual white discolouration, these patients have irregular menses-late, scanty, painful, menses in young girls, leucorrhoea, pruritis, dyspareunia and frigidity.
Most patients give H-O morning sickness, vomiting, nausea, travellers headache. Swings, merry-ground etc also affect her. The remedy removes the above symptoms and the white spots become pink in colour, but do not disappear completely. Sepia requires to be complemented with Nat-mur, to complete the cure.
6. Merc-Sol- is indicated in cases with a history of dysentery with mucus and blood, jaundice and liver enlargement. These patients are worse at night with salivation and have a syphilitic miasm. They perspire in bed and do not tolerate extremes of climate.
7. Acid-nit- I have used this remedy in cases of white spots around mucocutaneous junctions. There may also be fissures at the same site. Other indications are-craving for chalk, pencils etc mainly in children. This remedy, like Sepia removes the other symptoms but spots do not disappear completely.
8. Graphites and Calc-carb-also do come in the picture occasionally. Both are obese but their other symptoms are different. There is a history of suppressed itch in Graphites and irregular menses in a Calc-carb.
9. Ars-sulph-flav-Many doctors say that they are disappointed with the use of this remedy. The real cause is that they merely prescribe it as a specific for the disease. This is the most abused prescription. Very few books have given characteristic symptom of this drug. On the lookout for a good literature of the drug I was pleasantly surprised to find it in Kents Lesser Writings a detailed description on page 18. It states that if one find either mental, general or sexual symptoms along with the white spots the patient will definitely get well.
In addition to these I have used various other remedies like.
10. Cup-aceticum- in lower potencies. This is because copper is the chief source to produce melanin.
11. Cantharis- In our materia medica nothing is mentioned about skin discolouration. Dr R S Pareek who has given a great important to this remedy states that in burns the skin loses its pigmentation and Cantharis restores it.
12. Restinon- has also been recommended by a doctor friend of mine from Calcutta.
13. Psoralin- I have used this in potencies, as antidote in those cases where a lot of it was given by the allopathic doctors in crude form.
14. Carcinocin- must be used when there is a definite history of cancer in the patients family. Mrs E whose case has been mentioned was perfectly well after giving Carcinocin.
15. Bowel Nosodes- Morgan-bach, Morgan=gaertner, and Dyscentrico have been used by me with good success

Conclusions of Dr Wadia :

Family History percentage of cases
1. Tuberculosis
2. Leucoderma
3. Diabetes
4. Suppressed skin diseases
30%
29%
15%
15%
Past History percentage of cases
1. Past History- intestinal diseases including dysentery( Amoebic), jaundice, typhoid,and different types of worms
2.Vaccination & inoculation
3.suppressed skin diseases
4.Tuberculosis
5.Asthma
79%

25%
21%
12%
5%

Remedies that are helpful percentage of cases
1. Tuberculinum
or  Bacillinum
3. Thuja
3. Sulphur
4. Sepia
5. Merc sol
6. Acid Nitric
27%
26%
22%
14%
11%
10%

.

199 cases were studied (130 new cases(74 males & 56 females) and 69 old cases(37 male & 32 female) during the period 1st April 2004 to 31st December 2004 of these 190 cases had reported regularly. There was marked improvement in 10 patients, moderate improvement in 22 patients and mild improvement in 86 patients. The medicines found useful were Nat mur, Nux vom., Sulph., Puls., Lyco, Phos, Calc carb., Calc phos. Intercurrents on the basis of specific history and indications used were Tuberculinum, Syphilinum and Carcinosin. The Specific medicines used were Magnifera indica(prescribed to 4 patients all the 4 patients responded well) Mica (prescribed to 17 patients of which only 10 responded), Arsenic sulph flavum (prescribed to 7 patients of which 3 patients responded) and Psoralia Q (prescribed to 4 patients and all the four patients responded well). The potencies used were in 30, 200 and 1M. The 30 potency was repeated weekly, 200 potencies were repeated fortnightly and 1M potency was repeated after a month. Intercurrents were given in 200 and 1M potency.

  • प्रो सुबोध मेहता के प्रयोग अपने मे अनोखे ही थे। आपने लियोकोडर्मा के रोगियों को औषधि देने के पहले रक्त की आम जाँचे जैसे TLC, DLC,ESR के अलावा ब्लड ग्रुप, सीरम सोडियम, सीरम पोटेशियम और inorganic phosphorous के  टेस्ट करवाये और इन्ही सीरम सोडियम और सीरम पोटेशियम के अनुपात के आधार पर आपने सफ़ेद दाग के रोगियों को चार भाग मे वर्गीकृत किया:
    क- हार्मोनल
    ख-आनुवंशिक
    ग-Acquired
    घ-Idiopathic
    क- हार्मोनल- ऐसे रोगियों मे सोडियम -पोटेशियम और सोडियम – फ़ास्फ़ोरस का अनुपात कम देखा गया और इस वर्ग के लिये प्रो सुबोध ने sepia, thuja और silicea को श्रेणीबद्द किया।
    ख-आनुवंशिक-करीब 50% रोगियों मे आनुवंशिक प्रमण मिले , इस वर्ग के लिये syphilinum, thuja , silicea को तरजीह दी गयी। ऐसे रोगियों मे सोडियम पोटेशियम का अनुपात कम और सोडियम -फ़ासफ़ोरस का अनुपात अधिक पाया गया।
    ग-Acquired-ऐसे रोगियों की संख्या काफ़ी अधिक निकली और इन रोगियों मे पेट के रोग जैसे amoebic or bacillary dysentery (पेचिश), antibiotics के दुष्प्रभाव के चलते संभवत: आँत की श्लेषमा ( intestinal mucosa) प्रभावित हुयी और शायद इसी वजह से tyrosine की कमी के चलते melanin मे भी कमी आ गयी । ऐसे रोगियों मे bacillinum, phosphorous,chelidonium,nux vom, का प्रभाव देखा गया।
    घ-Idiopathic-ऐसे रोगी जो ऊपर दी गयी किसी श्रेणी मे नही आते। प्रो सुबोध के अनुसंधान का एक रोचक पहलू यह भी था कि अधिकांश रोगी ब्लड ग्रुप O से संबधित निकले जबकि ब्लड ग्रुप A इसमे लगभग छूटा ही रहा।
    लेकिन दु:ख की बात यह रही कि प्रो सुबोध हमारे बीच अब न रहे और इनके प्रयोगों को Dr Subodh Mehta Research Centre और C.C.R.H. ( सेन्ट्रल कौन्सिल आफ़ रिसर्च इन होम्योपैथी) ने कोई महत्व न दिया। ( स्त्रोत:
    Transections of International Homeopathic Congress 1967/Leucoderma by Professor Subodh Mehta )
  • डां कमल कन्सल ने लीडम पाल ( Ledum pal ) से लिये आशचर्य चकित परिणामों की जानकारी NATIONAL JOURNAL OF HOMOEOPATHY  के Volume: 1993 Mar / Apr VOL II No 2  में रखी । आपके अनुसार :

Melanocytic Action of Ledum Palustre [Melanocytic Action Of Ledum Palustre]
NATIONAL JOURNAL HOMOEOPATHY by Vishpala Parthasarathy 
Volume: 1993 Mar / Apr VOL II No 2 
Author: Kamal Kansal
Subject: Materia Medica
Remedy: Led
Leucoderma of Vitiligo is a disease of unknown aetiology and variable course. Ledum-pal may be surprise prescription for all of us, but has proved a highly efficacious remedy tried on 76 patients during a period of 6 years.
Why Ledum-pal? Conventionally used medicines for Leucoderma or Vitiligo did not give me satisfactory results even with the support of constitutionally indicated catalytic remedy. Prolonged treatment has also made it more frustrating. It so happened that a patient came to me for two small marks, white in colour at the site of a burn injury on the forehead and on the chest. Patient was noninformative. A look in Boerickes Materia Medica under skin of this remedy- “long discolouration of skin after injuries” made me think about it and I prescribed Ledum-pal 200, three times and to my surprise the skin started repigmentation. I have given this medicine in patients even without history of injury and have found most encouraging results.

      Case report-B S, aged 20 years has spots on the face, neck, abdomen and legs for 7 years. (See photo a). He had been taking all kinds of therapies including Homoeopathy. He was given Ledum- pal 200 three times daily on 22nd Nov 92. Photograph on 1st Dec 92 and 22nd Jan 1993 show evident repigmentation. (See photo b). Conclusion-Materia Medica requires reproving of many drugs. It is not necessary that all symptoms of a drug have come out in earlier provings. The trial of Ledum-pal is an example to make reproving and reconfirmation of drugs a continuous process. The role of Ledum-pal on Melanin pathway cannot be ruled out.

  • चेन्नई के डा कोपिकर ( Dr S.P.Koppikar) ने Acid Nit और Sepia के अलावा Nylon 30 और Rastinon 30 से अच्छे परिणाम निकाले ।
  • कोटायम होम्योपैथिक मेडिकल कालेज के भूतपूर्व प्रधानाचार्य डा आर. पी. पटेल  ने उपचार की एक आसान सी राह सुझायी:
    क- Syphilinum 200-1000 – अगर रोग का कारण सिफ़िलिक्टिक मियाज्म हो और रोग के उत्त्भेद्द ओंठ,जनेन्द्रिय ( genital ) और bony areas पर दिखें।
    ख- Medorrhin 200-1000- अगर रोग का कारण साइकोटिक मियाज्म हो और रोग के उत्भेद्द माँसल हिस्सों (muscular parts)मे दिखें।
    ग- Sepia 3- अधिकतर शिशुऒं और युवतियों मे । रोग के उत्भेद्द ओंठ, सर की त्वचा और चेहरे पाये जायें।
    घ- Lyco 3, 30-उन रोगियों पर जो पुराने अतिसार ( chronic amoebic dysentry) , या यकृत ( liver) संबधी रोग जैसे पीलिया (jaundice) से पीडित रहे हों।
    ड- Ars iod 3- ऐसे रोगियों मे जहाँ टी बी (T.B.) का इतिहास रहा हो या टी बी (T.B.) परिबारिक पृष्ठभूमि ( hereditary) से आयी हो।
    च- Hydrocotyle 3, 10M- ऐसे रोगियों मे जहाँ त्वचा के रोग जैसे अकोता(Eczema), ल्यूप्स (Lupus) आदि को सिर्फ़ दबाया (suppress) गया हो।
    छ -Bacillinum 1M- जहाँ पूर्व या वर्तमान मे रोगी दमा(Asthma), यक्ष्मा (T.B.), त्वचा संबधी रोग विशेष कर दाद (Ringworm) से पीडित रहे हों।
    ज- Nat Mur- सफ़ेद दाग खारिश(itching) के साथ
    झ- Rasitonin- यकृत संबधी रोगों के साथ ।
  • आगरा के डा आर एस पारिख ने अपने अनुभवों के आधार पर Cuprum Acetium , Cobalt Nitricum और Cantharis पर जोर दिया।
  • हैदराबाद के डा पी एस कृष्णामूर्ति ने ब्रिटिश होम्योपैथिक जर्नल मे Amoebiasis पर एक लेख लिखा । आपने हैनिमैन की मियाज्म थ्योरी का पक्ष लेते हुये उष्ण प्रदेशों मे अतिसार मियाज्म (Dysentery miasm) को सफ़ेद दाग के लिये जिम्मेदार ठहराया। इस वर्ग के लिये उन्होने मर्क साल को वरीयता क्रम मे सबसे ऊपर रखा ।

निष्कर्ष ( Conclusions ):

  • सबसे बडी समस्या सफ़ेद दाग के रोगियों मे धैयरता की है , साथ ही मे चिकित्सक की तरफ़ से भी हडबडी मे लिखे नुस्खे या बार-२ औषधि को बदलने की प्रक्रिया रोगी के रोग को incurable बना देती है । जितनी उम्मीद आप एक रोगी से रखॆं कि वह टिक कर इलाज करे उतना ही अपने नुस्खों पर भी रखें ।
  • इलाज की समय अवधि कोई निशिचित नही है , फ़िर भी सामान्य केस से लेकर बिगडे केस भी लगभग एक साल से चार साल या उससे अधिक समय ले जाते हैं ।
  • बडे चकत्तों की अपेक्षा छोटॆ सफ़ेद दाग के चकत्ते जल्द ठीक होते हैं और कई -२ रोगियों मे जहाँ चकत्ते काफ़ी अधिक बडी ऐरिया  को कवर करते हैं ऐसे रोगियों का ठीक हो पाना लगभग नामुनिकन हो जाता है ।

 

देखें सम्बन्धित पोस्ट:

1. VITILIGO & HOMEOPATHY

2. Leucoderma and Homeopathy ( सफ़ेद दाग और होम्योपैथी)

3. सेंकेंड प्रिसक्पशन और सही पोटेन्सी का चुनाव (Second Prescription & selection of potency)

4. सफ़ेद दाग और होम्योपैथी- आशा की एक किरण -भाग-१ (Leucoderma & homeopathy- an ultimate hope -Part-1)

5. सफ़ेद दाग और होम्योपैथी- आशा की एक किरण भाग- २ (Leucoderma & homeopathy- an ultimate hope-part-2 )

चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: homeopathy, होम्योपैथी,

विज्ञापन कैसे-२

आज सुबह दैनिक जागरण के मुख्य पृष्ठ पर परिवार नियोजन से संबधित एक प्रायोजित विज्ञापन ने बरबस ध्यान खींच लिया । ऐसा नही कि इस विज्ञापन मे कोई अशशीलता थी लेकिन यह कुछ अलग तरह का था जिसको आप देखें तो मुस्कराये बगैर न रह सकेगें । आज से कई साल पहले जब दूरदर्शन ने अपनी दस्तक घर-२ दी थी तब ऐसे विज्ञापनों को घर के बडे-बुजर्गों के बीच मे बैठ कर देखना अजीब सा लगता था । लेकिन अब माहौल बदल गया है , बढते हुये चैनलों मे परोसी जाने वाली अशशीलता अब इन विज्ञापनों के आगे कोई मायने नही रखती ।
birth control pills

एक नटखट बच्चे पर बनाया गया यह वीडियो देखने योग्य है :

आप चिट्ठाकारी के कितने आदी है ? ( How Addicted to Blogging Are You? )

है तो यह प्रश्न अटपटा लेकिन प्रश्न तो प्रश्न ही है और जबाब भी खोजना है । मेरा जबाब तो नीचे रहा और आपका क्या है ? तो देर किस बात की, थोडा सा यहाँ घूम आयें और अपने मन मे उमडते हुये सवालों का जबाब देखें । ( वैसे जब मै अपने आप को 70% की श्रेणी मे देखता हूँ तो अन्य दिग्गज ब्लागरस पर सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ कि उनका प्रतिशत कितना होगा ?  🙂 )

 

खूबूसूरत दिखने की कीमत …….

 

 

cosmetics

पिछले हफ़्ते क्लीनिक मे दो केस गोदेरेज हेऐर डाई से उत्पन्न allergic reactions के आये । एक तो श्रीमान यूसफ़ जो इस साल पाँचवी बार इसी समस्या को लेकर आये और एक और जो मुझे बाराबंकी से किसी चिकित्सक ने refer किया था । यूसफ़ का केस सरल था , हाँलाकि लाख समझाने के बावजूद उनको अबकी ईद पर जवान दिखने के मोह ने मुसीबत मे डाल दिया था । लेकिन जो केस बाराबंकी से आया था , उस जैसा तगडा डाई से उत्पन्न reaction मैने पहले कभी न देखा । मैने भी वही किया जो आम चिकित्सक इन परिस्थितयों मे करते हैं , पहले मेडिकल कालेज रिफ़र किया और जब वहाँ से भी कन्ट्रोल न हुआ तो उसे लखनऊ मे प्रसिद्द्ध त्वचा रोग विशेषज्ञ डा सुरेश तलवार के पास रिफ़र कर दिया । रोग की तीब्रता इतनी अधिक थी कि डां तलवार ने भी उसे संजय गाँधीं पी.जी.आई रिफ़र कर दिया ।

पुरषों मे डाई और महिलाओं मे कास्मेटिक का मोह आम देखा जा सकता है । डेली टेलीग्राफ़ की इस रिपोर्ट की सत्यता पर विशवास करें तो औसतन एक महिला दो किलो कास्मेटिक हर वर्ष प्रयोग करती है और इनमे से अधिकतर कास्मेटिक क्रीम और eyeshadow में कैन्सर उत्पन्न करने वाले तत्व पाये गये हैं । यही नही एक औसत महिला एक साल मे लगभग पाँच लिपस्टिक हजम कर जाती है । जरा नजर दौडायें इन कास्मेटिक  मे पाये जाने वाले रसायनों की तरफ़ :

parabens : पैराबैन औरतों मे हार्मोन मे असंतुलन पैदा करते हैं और breast cancer के लिये उत्तरदायी होते हैं ।

triclosan : यह मूलत: ऐटींबैक्टिरियल और कीटनशक दोनों ही है और प्रमुख प्रयोग होने वाली वस्तुऐं जैसे दाँत सफ़ करने के पेस्ट , body washes, साबुन मे पाया जाता है ।

Sodium laureth sulphate : अधिकतर soap gel  और शैम्पू मे पाया जाता है ।

Arsenic : eye shadows मे पाया जाने वाला प्रमुख हानिकारक तत्व ।

डां बैली हैमिलटन का मानना है कि जो तत्व हम oral route यानि मुँह से लेते हैं वह सीधे त्वचा मे मिलने वाले तत्वों की अपेक्षा कम हानिकारक होते हैं । क्योंकि ऐसे तत्व वमन के रुप मे हमारा शरीर बाहर फ़ेंक देता है लेकिन सीधे रक्त मे घुलने वाले तत्व बरसों तक संबधित organs जैसे किडनी और लीवर मे पडे रहते हैं और धीरे-२ अपना घातक असर दिखाते हैं ।

डाई  प्रयोग करने से सबसे अधिक खतरा पेशाब की थैली  (urinary bladder) के कैन्सर होने का है जो डाई न प्रयोग करने वालों मे कम पाया जाता है ।

THE average woman absorbs two kilograms of chemicals from cosmetics every year – from cancer-causing compounds in face cream to arsenic in eyeshadow.

A  typical woman’s daily beauty regime may involve applying as many as 175 chemical compounds to their skin and hair.
Of course, the manufacturers would say these chemicals and resulting products are safe, but a growing school of thought begs to differ.

Cosmetics contain many different kinds of chemicals, but of particular concern are a group of preservatives called parabens, which by some estimates are found in 99 per cent of all ‘leave on’ cosmetics, and 77per cent of ‘rinse off’ cosmetics.
These are known hormone disruptors: evidence suggests they can mimic the female hormone oestrogen, and a lifetime of increased exposure to oestrogen is linked to a heightened risk of breast cancer.
One study found parabens present in 18 out of 20 breast cancer tissue samples (though it is important to note that the study did not prove they’d actually caused the breast cancer).
Parabens are also thought to adversely affect male reproductive functions.
Another troubling chemical is the antibacterial agent and pesticide triclosan, which is used in toothpastes, soaps, household cleaning products and body washes.
It belongs to the chlorophenol class of chemicals, which are suspected of causing cancer in humans and taken internally, even in small amounts, can cause cold sweats, circulatory problems and – in extreme cases – coma.
Also of concern are phthalates, a substance that gives our lotions that silky, creamy, texture, but which are also a ‘plasticiser’ used to make plastics flexible.
Certain phthalates are known carcinogens, and studies have suggested they damage the liver, kidneys, lungs and the reproductive system, as well as affecting the development of unborn baby boys.
The list goes on. Sodium laureth sulphate, a frequent ingredient in shower gels and shampoos, is a skin irritant; Propylene glycol, found in soap, blushers and make-up remover, has been shown in large quantities to depress the central nervous system to make it function less effectively, and aluminum in deodorants is linked to breast cancer by medical research.
And did you know that certain eye shadows contain arsenic?
One thing is for sure: few of us would want to rub any of these chemicals into our eyes, far less ingest them in liquids by drinking them.
Yet, every day, we rub them into our skin, and allow them to enter our bodies.
Given the facts, it’s hardly surprising that a growing number of experts believe these substances have a cumulative effect on our bodies.
They think the ‘chemical ########’ inside us is contributing to the increased frequency of a host of illnesses ranging from eczema to cancers as well as developmental problems such as autism and dyslexia.
“It’s difficult to see the link between chemicals in cosmetics and damage to health unless you stand back and look at the wider picture,” Dr Paula Baillie-Hamilton, author of Toxic Overload, told The Daily Mail.
“Man-made chemicals first emerged 100 years ago, and every decade since, the overall production of these synthetic chemicals has doubled.
“We are surrounded by chemicals: in the air, in our food, in our water and especially in our cosmetics, and the fact is that our bodies can’t break many of these substances down.”
Dr Baillie-Hamilton also thinks that absorbing chemicals through our skin is more dangerous than swallowing them.
“At least if you ingest chemicals through your mouth, your digestive system can do something towards dealing with them,” she says.
“If they go through your skin they hit your blood stream immediately and are then transported to vital organs such as kidney and liver, where they may be stored for many years.”
For instance, the average woman eats, albeit unwittingly, five lipsticks a year, which in her lifetime is the equivalent volume of 1.5 blocks of lard.
People who use permanent hair dye are more than twice as likely to develop bladder cancer as those that don’t.
Both ammonia and paraphenylenediamine (PPD) – chemical substances used in dyes – can cause allergic reactions, too.

डां बाबलेक्र्जि- होम्योपैथी क्यों और कैसे

आज अकस्मात    बाबलेक्र्जि के चिठ्ठे से गुजरने का मौका लगा । बाब एक  ऐलोपैथिक चिकित्सक की हैसियत से स्काट्लैंड मे 1982 से 1995 तक एक G.P. की तरह प्रैक्टिस करते रहे और बाद में जब एक ही तरह की प्रैकीटस के तरीकों से मन ऊबा तो 1983 में स्काट्लैंड के ग्लास्गो होम्योपैथिक अस्पताल ( Glasgow Homeopathic Hospital )  से होम्योपैथिक मे पी.जी. कोर्स किया और आजकल वह इसी अस्पताल से काफ़ी लम्बे समय से जुडॆ हुये हैं ।  अपने चिटठे मे ” Why homeopathy and what is it anyway? ” मे वह लिखते हैं :

 image  bobleckridge

I work at Glasgow Homeopathic Hospital. I’m a medical doctor, used to be a GP (Family Physician), but I became gradually disenchanted with prescribing only antis (anti-biotics, anti-depressants, anti-inflammatories, anti-histamines, anti-hypertensives……..you get the picture) and only having the time to focus on little bits of people instead of the people themselves (we call those little bits diseases by the way). I had perhaps strangely had a notion that being a doctor would be about being involved in healing (ever tried looking up “health” or “healing” in a medical textbook? Don’t bother. No such index items!) so just suppressing bits of people didn’t feel like what a proper doctor should be doing. On top of that there were situations every day where I just didn’t have anything good to offer (everything from infant colic, to night cramps, restless legs, sports injuries, PMT…….blah, blah, blah – believe me, there are LOTS of problems your doctor doesn’t have answers for!)

I happened upon a course in “Homeopathy” at Glasgow Homeopathic Hospital back in 1983 – didn’t know there was such a hospital and had no idea what “homeopathy” was anyway, but something about the ad caught my attention – wish I could remember what it was! – I think it was something that mentioned “healing”! Well, I signed up. I learned there about homeopathic medicines, how safe they were, and what their indications were and they gave us a wee box of 10 remedies to go and try out in our practices. Well, from the first try I was amazed at how good these treatments were. They could deliver improvements in conditions I hadn’t other answers for and that was VERY useful. Patients would stop me in the street and thank me for the prescription because it had helped so much – that NEVER happened when I prescribed an anti-something!

To cut a long story short, the patient demand for homeopathic treatment drove my learning and after I passed the Membership exam of the Faculty of Homeopathy I started working at the Glasgow Homeopathic Hospital in the Outpatient Dept every wednesday. Well, my wednesdays soon got an awful lot more satisfying than the mondays, tuesdays, thursdays and fridays, so I had a crisis. All my life I’d wanted to be a doctor, no, not just a doctor, but a GP, and here I was thinking I don’t want to be a GP anymore. So I stopped being a GP and for a few months did a weekly radio show on ScotFM, wrote a textbook of homeopathy for GPs, and did my wednesday clinics. After a few months my friend and colleague, David Reilly at the Homeopathic Hospital suggested we make a bid for the creation of full-time position for me at the hospital. I started there full-time in 1995 and I’m still there. I love it! Every single day, every single clinic, every single patient. I look forward to every day of work. How many people can say that? ……….

……..बाकी आप इनके ब्लाग मे स्वंय देखॆ ।