चिट्ठों के चक्कर में

इधर इन चिट्ठों के चक्कर मे मेरे घर की बगिया और मेरे नन्हें -मुन्ने पक्षियों का सीमित लेकिन प्यारा सा परिवार बरबादी के कगार पर आ गया । यहाँ क्लीनिक मे इन्टरनेट तो है नहीं और घर मे बडी मुशिकिल से दो घटें से अधिक समय निकालना संभव नहीं होता और जब से यह दो घटे भी इन्टरनेट के हवाले हो गये तो उसका नतीजा यह निकला कि मेरे परिवार से पाँच कबूतर , दो फ़िन्च और 4 पैराकीट गायब हो गये। बाद मे जब खोज खबर की तो मालूम पडा कि फ़िन्च और पैराकीट तो शिकरे के शिकार बन गये और कबूतरों मे दो सैटिन , एक लक्खा, एक गिरह्बाज, और एक नकाबपोश ( कबूतरों की विभिन्न प्रजातियाँ) आंतकवादी गतिविधियों के शिकार बने। अब बचे दो तोते- मिटठू और टूइयाँ, 20 लाल मुनिया, 2 फ़िन्च, 2 पैराकीट और 15 जोडी कबूतर, जो फ़िलहाल सही सलामत हैं। सबसे बडी मुसीबत तो लक्खा कबूतर के जोडे के साथ हुयी क्योकि वह जोडा अंडे से बच्चे निकाल चुका था और उसका नर आतंकवाद का शिकार बना था। अब क्या करें ,तो मरता क्या न करता, जब इनको पाला है तो झेलो। सुबह-2 भीगे हुये चने खिलाने से यह नन्हे-मुन्हे बच्चे अब बिल्कुल ह्ष्ट-पुष्ट हो गये हैं । अफ़सोस मुझे यह है कि मेरे पास कैमरा बहुत अच्छे किस्म का नही है , इसलिये फ़ोटो लाख चाहने के बावजूद डाल नही पा रहा हूँ ।
पेड-पौधों के हाल तो और भी बहुत बुरे निकले। पिछले महीने गुलदाउदी और इस महीने दहेलिया, गेदां, कैलेन्डुला, पौपी , फ़्लाक्स, पिटियूनिया और कारनेशन के छोटे पौध लगाये थे , गुलदाउदी के पौधों का समुचित विकास ठीक से हुआ नहीं और उसकी पत्तियों मे कोई रोग लग गया। रोग के नाम पर याद आया कि पिछले दो सालों से मेरी बगिया के गुडहल पर इन मनहूस कीटों की नजर लग गयी , कई औषधियाँ प्रयोग की जिनमे मैलेथीयान, इनडोसलफ़ान,बावैस्टीन आदि प्रमुख थीं , गुलिस्ताँ साल तो रोग थोडा कन्ट्रोल मे दिखा लेकिन इस साल इनमे से किसी भी औषधि ने कोई काम नही किया लेकिन जब इस बार जब गुडहल की 6 प्रजातियों को नष्ट होते देखा तो सोचा कि क्यों नहीं होम्योपैथिक औषधि भी दी जाय लेकिन क्या दें यह समझ मे नहीं आया, अब यहाँ कौन से लक्षण यह पौधे दे रहे हैं, लेकिन आशा की एक किरण दिखी,शायद कुछ काम कर जाय यह सोच कर डा गिरीश गुप्ता जो मेरे एक समय सीनियर रह चुके थे उनका टोबेको मोजेक वाइरस पर थूजा का शोध याद आ गया, यही सोचकर थूजा गुडहल के रोगी पौधों पर प्रयोग करने की सोची । 5 मि ली थूजा 30 को 20 लीटर पानी मे मिलाया और नियमित रुप से एक हफ़्ते तक गुडहल के रोगी पौधों पर छिडकाव किया, एक हफ़्ते के बाद कुछ परिवर्तन दिखने आरम्भ हो गये और और अब 6 गुडहल की प्रजातियों मे से फ़िलहाल 5 को तो बचाने मे सफ़लता मिल ही गई। अगर आप बाग-वानी के शौकीन हैं और इन मनहूस कीटों से परेशान है तो थूजा को उपरोक्त विधि से प्रयोग कर के देखें , और हाँ, परिणाम क्या रहे मुझे बताना न भूलें।

7 responses to “चिट्ठों के चक्कर में

  1. वाह, आप भी हमारी तरह पक्षी शौकिन दिखते हैं, मेरे पास भी दो बज्जी हैं, एना और बोलू…..बोलू फिमेल और बदमाश है, एना बड़ा और सहनशील प्राणी है हमारी तरह….कभी कथा लिखूँगा उनकी!!!🙂

  2. Agar aapke pas Dr Girish Guptaji ka shodh patra ho to use mail attachment se bhez denge. Mai bhi dekhna chahta hun.

  3. उम्मीद है कि बाकि बचे कुशल मंगल होंगे । थूज़ा क्या अन्य पेड पौधों पर भी कारगर होगा ?

  4. ओह! ये तो बहुत गलत हो गया यार!
    उम्मीद है आप अब इस सदमे से उबर चुके होगे।

    मेरे को पक्षी पालने का शौंक है लेकिन मैडम राजी नही होती। देखभाल करने का लफ़ड़ा है यार!

    लेकिन आप ब्लॉग लिखते/पढते रहो।

  5. प्रत्यक्षा जी,
    थूजा का प्रयोग कितना सार्थक है , इसके बारे मे मुझे अधिक नही मालूम , सिर्फ़ यह एक सयोग वश काम कर गयी और गुडहल के साथ गुलदाउदी के रोगी पौधों को भी बचा डाला। आप प्रयोग करके देखें, यह सुरिक्षित है और कोई नुकसान नही पहुचाएगी।

    समीर लाल जी,
    बजरी कथा का इंतजार रहेगा।

    डा प्रवीण जी,
    मुझे नही लगता कि मेरे पास यह शोध कार्य अब होगा , लेकिन अगर मुझे मिला तो मै अवशय मेल कर दूगाँ।
    Jitu भाई,
    अगर आप भाभी जी का मेल आई डी दे तो मै कुछ सिफ़ारिश कर दूँ पक्षी पालने के लिये।

  6. पक्षी पालना भी एक कला और शौक है। बहुत पहले मेरी अम्मी को भी ये शौक था, इनकी देख भाल बहुत ज़रूरी है मगर ये सब एक एक करके मर गए। एक बात है डाक्टर साहब, मैं जहां हूं यहां कव्वा तक नही है😦

  7. par kya sabhi prakar ke kaatakon ka liye thuja use kar sakte hain?individualisation hota he ki nahi?

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