Monthly Archives: नवम्बर 2006

वह कौन थी

डा किशोर शाह गायनकालोजिसट हैं और पूना मे प्रकैटिस करते हैं , चिकित्सक होने के साथ ही वह बहुत अच्छे लेखक भी है।, यह उनका एक व्यक्तिगत संस्मरण है। डा नन्दना पई ने कुछ दिन पहले यह रोचक कहानी भेजी थी, जिसका हिन्दी रुपांतरण यहाँ लिख रहा हूँ।
वह कौन थी
मेरी पत्नी एक नाक, कान विशेषज्ञ हैं जब कि मै एक गायनाकोलिजिस्ट हूँ। और निकट भविष्य मे मेरा पुत्र जो एक प्रोकटोलोजिस्ट है एक यूरोलोजिस्ट डा से विवाह करने वाला है। इन सब वजह से कभी-2 अजीब सी समस्यायें खडी हो जाती है। अभी कुछ दिन पहले कि ही बात ले मेरे जानने वाले एक चिकित्सक ने गर्भ की सफ़ाई के लिये
एक मरीज और एक कान साफ़ करवाने के लिये एक और मरीज मेरी पत्नी के पास भेजा।
मैने अपने रिसपेन्शिट से यह कह दिया था कि जैसे ही आये उसको सीधे मेरे पास भेज दूँ। अब इसको क्या कहा जाये कि वह रोगी जिसका कान साफ़ होना था वह मेरी पत्नी के बजाय मेरे पास आ गई, जब कि मै समझ रहा था कि वह गर्भ गिरवाने आयी है।
अब आगे के वार्तालाप आप के सामने है-

” आइये बैठिये” मैने मुस्कराते हुये कहा, वैसे मै तभी मुस्कराता हूँ जब मुझे कोई मोटी रकम हाथ लगने वाली होती है। मरीज थोडी सकुचायी , ” आराम से बैठें “ मैने कहा।
” डा, क्या इसमे बहुत दर्द होगा।?”

“नही, बिल्कुल नही”
रोगी थोडे अब आराम से दिख रही थी और बोली, “डा , हमने घर मे सब तरह से कोशिश की, लेकिन कामयाब न हो पाये।”

मै कुछ हैरान हुआ, “क्या आप को मालूम है कि घर मे यह सब करने से बहुत गडबड हो सकती थी।”
“मैने इसको हटाने के लिये पहले ऊपर -नीचे किया लेकिन यह हटा ही नही।”
मै मुस्कराया और बोला, ” अगर यह इतना आसान होता तो हम डाक्टरों की जरुरत क्यूँ पडती ?”

उसने मुस्कराते हुये कहा , “मेरे पडौसी ने इसको ऊँगली से निकालने की कोशिश की लेकिन छेद इतना संकरा था कि उसे पिन डालनी पडी ।”
“हे भगवान” मैने कहा।

” और तो सुनिये! मेरी मां ने माचिस की तीली से भी कोशिश की लेकिन सफ़लता नही मिली।
मेरे स्वयं का रक्तचाप अब बढने लगा था और गुस्से से मेरे मुँह से बोल निकल नही पा रहे थे।
“डा मै आइंदा से क्या करुं कि यह गन्दगी दोबारा न आये।”

मै जानता था कि यह एक अंवछानीय गर्भ है, लेकिन उसे गन्दगी कहना मुझसे सहन न हुआ। मैने उससे कहा ,“आप को रात मे सावधानी रखनी चाहिये या फ़िर आप गोलियों का सहारा भी ले सकती हैं।
“तो आप का कहना है कि यह सिर्फ़ रात मे ही होता है।”
मैने उसकी बात को पकडा , ” नही-2! मेरे कहने का मतलब है किसी भी समय आप कर सकती है , जब भी आप का मूड करे, लेकिन पूरी सुरक्षा के साथ।”
अब कि बार वह कुछ परेशान सी दिखी, “इसमे मूड से क्या मतलब।”
मै उस का मतलब शायद कुछ-2 समझ रहा था , “यह हो जाता है, इसमे मूड की कोई बात नही है।”

“मेरे बाजू वाले ने राय दी कि रोड किनारे एक आदमी बैठता है ,उसको दिखा लूँ।”

“तो तुम्हारा मतलब है कि वह पिन वाला आदमी।”

“हाँ”

“तुम्हें उस पडोसी की राय नही माननी चाहिये थी।

“नही , लेकिन मैने उसकी दूसरी राय मानी। उसने मुझसे कहा कि इसमे गर्म तेल डालूँ और इन्तजार करुँ, लेकिन इस प्रयोग ने भी काम न किया।”

“लेकिन आपको अपने पति की इजाजत ले लेनी चाहिये थी।”
मुझे वह असमंजस मे दिखी , “क्या मुझे अपने पति की इजाजत लेनी पडेगी? लेकिन वह तो दुबई मे हैं। और हम पिछले एक साल से नही मिले।”

मेरी तो हवा अब सरकने लगी थी। मैने उसे फ़िर भी समझाया,“नही-2 इसमे पति की इजाजत लेने की क्या आवशयकता।”

“लेकिन क्या मै उनको फ़ोन से बता दूँ।”
मुझे समझ मे नही आ रहा था कि उसके पति को मुबारक बाद दूँ या सांतवना दूँ”

चलिये यह अच्छा हुआ कि आप जल्दी आ गयी।”
” मै तो सुबह ही आना चाहती थी लेकिन कुछ दूसरे काम आडे आ गये।”
” नही मेरा यह कहना नही था , अगर आप देर कर देती तो वह घूमने सा लगता और उसके दिल की धडकन भी सुनाई पडती।”
वह मेरी तरफ़ बडी-2 आँखे कर के देखने लगी जैसे कि वह रामसे ब्रदर्स की पिक्चर देख रही हो।”

उसके चेहरे को देखते हुये मैने कहा, “आपको थोडा सा रक्त स्त्राव होगा जो कुछ दिन चलेगा।”

वह बुरी तरह काँपने लगी, ” कितना रक्त स्त्राव होगा।”
” यह एक सिर्फ़ सामान्य मासिक धर्म से कुछ अधिक ही होगा और अधिक से अधिक एक हफ़्ते तक चलेगा।”
उसकी मन:स्थिति मुझे बहुत खराब दिखी, वह बार-2 अपने बालों को ऊँगली से लपेट रही थी , मैने बहुत नरमी से कहा, ” अब आप पलंग पर लेट जायें और कपडे ढीले कर लें।”

बस इसके बाद यह हमारे बीच आखिरी वार्तालाप था , वह बहुत तेजी से मुडी और फ़र्राटे से क्लीनिक का दरवाजा खोल कर निकल गयी।

के जी एम यू के मानसिक विभाग के विभागाध्यक्ष डा प्रभात सिठोले पर हमला और बढती हुयी मानसिक समस्यायें

लखनऊ की आबोहवा मे धीरे-2 जहर घुलता जा रहा है। अपहरण , डकैती, चोरी एक आम बात सी हो गयी है।
के जी एम यू के मानसिक विभाग के विभागाध्यक्ष डा प्रभात सिठोले के घर मे बदमाशों ने घुसकर लूटपाट की और डा सिठोले और उनकी पत्नी को मारा पीटा। देखें बदमाशों ने डाक्टर परिवार को बंधक बना लूटा । दो दिन पहले जब मै उनसे मिलने पहुचाँ तो ज्ञात हुआ कि उनकी पत्नी को दिल का दौरा पडा है और वह लारी कार्डिलोजी मे भरती हैं। इस पूरे प्रकरण मे मुझे सब से अधिक दु:ख आई एम ए , पुलिस विभाग और राज्य सरकार के रवैये से हुआ । आई एम ए और चिकित्सकीय महासंघ वैसे तो बात-2 मे छोटी -2 बातों मे बवाल मचाते दिखते हैं लेकिन इस बार पता नही क्यों उन्होने बिल्कुल ही उदासीन रवैया अपनाया। विपत्तियॉ मे ही शायद एक इन्सान को दूसरे की आवश्यकता अधिक अनुभव होती है नही तो हम अपनी जिन्दगी मे मस्त ही रहते हैं। मेरी अपनी किस्मत अच्छी थी कि जब कुछ दिन पहले मेरी क्लीनिक मे बवाल( छात्रनेता बनकर डाक्टर से रुपये की मांग करने वाला गिरफ्तार)हुआ और यहाँ के क्षेत्रीय लोगों की बदौलत समस्या का समाधान भी निकल आया।
प्रो सिठोले जी से मेरा परिचय करीब दो सालों से अधिक रहा । और चिकित्सकों की तरह मै भी अधिकतर मानसिक रोगियों को संबन्धित मानसिक विशेषज्ञों के पास टरका देता था। वर्ष 2004 के आरभिक महीने मे के जी एम यू के मानसिक विभाग से जब “GENERAL PRACTITIONERS TRAINING PROGRAMME IN NEUROPSYCHIATRY” की कक्षायें ज्वाइन करने का निमत्रंण मिला तो समय की माँग को देखते हुये मै हाँ कर बैठा। यह एक वृहद प्रोग्राम था जो कि 3 महीने चला और इसमे 20 सेशन थे जिनमे एक सेशन मे 17 मानसिक रोगों को कवर किया गया । के जी एम यू के मानसिक विभाग के उच्च कोटि के चिकित्सकों के इन सेशन मे लेक्चर हुये । मेरा कौतूहल अन्य पद्दति के चिकित्सकों को बुलाने मे भी अधिक था। “रोज देखने वाले मरीजों मे मानसिक मरीजों की सख्या कितनी होगी?” “काफ़ी” पीछे बेन्च से आवाज आयी। “और आपका रवैया इन मरीजों से कैसा है” टालू “मैने मन ही मन सोचा। “अगर उत्तर प्रदेश को ही ले तो बढते हुये मानसिक मरीजो पर चिकित्सक और रोगी का अनुपात असमान्य दिखता है। और इनमे से अधिकांश रोगी behaviour therapy से ही ठीक हो सकते हैं । M.B.B.S. करने के बाद भी चिकित्सक अपना रुझान दूसरे क्षेत्र मे तो रखते हैं लेकिन मानसिक क्षेत्र को कोई छूना नही चाहता । “फ़ोरम के कन्वेनर प्रो.एस बी तिवारी ने कहा।” और सच ही तो है संक्रमण रोगों से भी बढती तादाद इन मानसिक रोगियों की अब है।
एक होम्योपैथिक चिकित्सक के लिये इस सेशन का महत्व औषधियों मे कतई नही था । होम्योपैथिक मेटैरिया मेडिका मे कई औषधि बहुत से मानसिक लक्षणों से भरी हुयी हैं। जरुरत है उसको सही तरीके से apply करने की । रोग का समुचित ज्ञान और औषधि के लक्षण का रोगी के लक्षणों से समुचित मिलान ही रोग का निदान कर सकता है। हाँ , behaviour therapy को सीखना हर चिकित्सक के लिये नितांत आवश्यक है, तभी वह अपने मरीजों के साथ न्याय कर सकता है। मेरे साथ उन दिनों मेरे सीनियर डा आर्य मर्दन सिह जी थे , वह तो इस सेशन से इतना प्रभावित हुये कि उन्होने PSYCHIATRIC DISORDERS AND HOMEOPATHY पर एक पुस्तक लिख डाली जिसका विमोचन जी एम यू के जिरायिटिक मानसिक विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो.एस बी तिवारी ने किया।
।नीचे महत्वपूर्ण लेक्चरों की लिस्ट है जो होम्योपैथिक चिकित्सक इन सेशन मे हुये लेक्चर से लाभान्वित होना चाहते हैं , वह मुझे बता दें, इनको स्कैन करके मेल के साथ भेज दूगाँ। मेरी तरफ़ से पूरी कोशिश रहेगी कि आप भी इसका लाभ उठा सकें ।
1- Anxiety neurosis प्रो एस सी तिवारी
2- psycho sexual problems प्रो हरजीत सिह
3- Tobacoo & other drug abuse प्रो एस दलाल
4- Alcohol related problems प्रो एस सी तिवारी
5- Emotional and behavioural problems in children & adolescents प्रो प्रभात सिठोले
6- Depression and other affective disorders
7- Stroke डा अतुल अग्रवाल
8- Psychiatric problems of elderly प्रो एस सी तिवारी
9- Psychological aspects of physical illnesses
10- Epilepsy
11- Headache
12- Psychological intervention in psychiatric problems in general practice प्रो एस सी तिवारी
13- Psychoses
14- schizophrenia
15- Persistent delusinal disorder
16- Depression

चिट्ठों के चक्कर में

इधर इन चिट्ठों के चक्कर मे मेरे घर की बगिया और मेरे नन्हें -मुन्ने पक्षियों का सीमित लेकिन प्यारा सा परिवार बरबादी के कगार पर आ गया । यहाँ क्लीनिक मे इन्टरनेट तो है नहीं और घर मे बडी मुशिकिल से दो घटें से अधिक समय निकालना संभव नहीं होता और जब से यह दो घटे भी इन्टरनेट के हवाले हो गये तो उसका नतीजा यह निकला कि मेरे परिवार से पाँच कबूतर , दो फ़िन्च और 4 पैराकीट गायब हो गये। बाद मे जब खोज खबर की तो मालूम पडा कि फ़िन्च और पैराकीट तो शिकरे के शिकार बन गये और कबूतरों मे दो सैटिन , एक लक्खा, एक गिरह्बाज, और एक नकाबपोश ( कबूतरों की विभिन्न प्रजातियाँ) आंतकवादी गतिविधियों के शिकार बने। अब बचे दो तोते- मिटठू और टूइयाँ, 20 लाल मुनिया, 2 फ़िन्च, 2 पैराकीट और 15 जोडी कबूतर, जो फ़िलहाल सही सलामत हैं। सबसे बडी मुसीबत तो लक्खा कबूतर के जोडे के साथ हुयी क्योकि वह जोडा अंडे से बच्चे निकाल चुका था और उसका नर आतंकवाद का शिकार बना था। अब क्या करें ,तो मरता क्या न करता, जब इनको पाला है तो झेलो। सुबह-2 भीगे हुये चने खिलाने से यह नन्हे-मुन्हे बच्चे अब बिल्कुल ह्ष्ट-पुष्ट हो गये हैं । अफ़सोस मुझे यह है कि मेरे पास कैमरा बहुत अच्छे किस्म का नही है , इसलिये फ़ोटो लाख चाहने के बावजूद डाल नही पा रहा हूँ ।
पेड-पौधों के हाल तो और भी बहुत बुरे निकले। पिछले महीने गुलदाउदी और इस महीने दहेलिया, गेदां, कैलेन्डुला, पौपी , फ़्लाक्स, पिटियूनिया और कारनेशन के छोटे पौध लगाये थे , गुलदाउदी के पौधों का समुचित विकास ठीक से हुआ नहीं और उसकी पत्तियों मे कोई रोग लग गया। रोग के नाम पर याद आया कि पिछले दो सालों से मेरी बगिया के गुडहल पर इन मनहूस कीटों की नजर लग गयी , कई औषधियाँ प्रयोग की जिनमे मैलेथीयान, इनडोसलफ़ान,बावैस्टीन आदि प्रमुख थीं , गुलिस्ताँ साल तो रोग थोडा कन्ट्रोल मे दिखा लेकिन इस साल इनमे से किसी भी औषधि ने कोई काम नही किया लेकिन जब इस बार जब गुडहल की 6 प्रजातियों को नष्ट होते देखा तो सोचा कि क्यों नहीं होम्योपैथिक औषधि भी दी जाय लेकिन क्या दें यह समझ मे नहीं आया, अब यहाँ कौन से लक्षण यह पौधे दे रहे हैं, लेकिन आशा की एक किरण दिखी,शायद कुछ काम कर जाय यह सोच कर डा गिरीश गुप्ता जो मेरे एक समय सीनियर रह चुके थे उनका टोबेको मोजेक वाइरस पर थूजा का शोध याद आ गया, यही सोचकर थूजा गुडहल के रोगी पौधों पर प्रयोग करने की सोची । 5 मि ली थूजा 30 को 20 लीटर पानी मे मिलाया और नियमित रुप से एक हफ़्ते तक गुडहल के रोगी पौधों पर छिडकाव किया, एक हफ़्ते के बाद कुछ परिवर्तन दिखने आरम्भ हो गये और और अब 6 गुडहल की प्रजातियों मे से फ़िलहाल 5 को तो बचाने मे सफ़लता मिल ही गई। अगर आप बाग-वानी के शौकीन हैं और इन मनहूस कीटों से परेशान है तो थूजा को उपरोक्त विधि से प्रयोग कर के देखें , और हाँ, परिणाम क्या रहे मुझे बताना न भूलें।