Monthly Archives: अक्टूबर 2006

होम्योपैथिक साफ़्टवेएर-क्लासिक 8 (Homeopathic software-classic 8)

क्लासिक 8 और उसके उपयोग
डा प्रभात टन्डन

इसके पहले कि मैं इस साफ़्टवेएर को प्रयोग करने का तरीका और बाद में इससे मिल रहे परिंणामों की जानकारी यहां रखूं , कुछ विशेष बातें। इस समय अधिकतर युवा होम्योपैथिक चिकित्सक repertorisation के लिये साफ़्टवेएर का प्रयोग कर रहे हैं। कुछ जो प्रमुख प्रयोग होने वाले साफ़्टवेएर हैं उनमे मर्क्यूरियस, रडार, क्लासिक, आदि प्रमुख हैं। अन्य होम्योपैथिक साफ़्टवेएर की जानकारियाँ आप यहाँ भी देख सकते हैं। इनमें से क्लासिक 8 अधिकतर चिकित्सक प्रयोग कर रहे है, शायद इसका कारण इसका प्रयोग सरल और वयवाहारिक है। टेक्नोलोजी के बढते हुये दौर मे अधिकतर चिकित्सक साफ़्टवेएर तो ले आये लेकिन उसका सही उपयोग न कर पाये उसका परिणाम यह निकला कि यह सिर्फ़ एक शो-पीस बन कर रह गया। उत्तर प्रदेश की सरकारी होम्योपैथी डिस्पेन्सरियों के तो हाल और भी बुरे हैं। इसी साल “रडार” ( एक और साफ़्टवेएर) और कम्पयूटर की खरीद पर लाखों रूपये खर्च किये गये लेकिन सब ढाक के तीन पात ही निकला, कम्पयूटर है तो लाइट नही और अगर लाइट है तो चिकित्सको मे कोई उत्साह नहीं।
जो छात्र और छात्रायें अपना पहला प्रोफ़ेशनल समाप्त कर चुके हैं वह एक बात अच्छी तरह से समझ लें कि spot prescribing हर बार काम नहीं करती, विशेष कर पुराने और जटिल रोगों मे ,जहाँ लक्षण उलझे हुये होते हैं । आपको अपने केस पर मेहनत करनी ही होगी और यहाँ कोई शार्ट कट नही चलता। case taking और repertorisation एक महत्वपूर्ण स्तंभ है जिसको आज आपने न सीखा तो बाद के clinical practice के साल आपको रुलायेगें और होम्योपैथी को डुबोयेगें। तो क्या करे आप- कालेज की राजनीति मे पडने की बजाये अपने प्रोफ़ेसर की जान खायें और उनको clinically केस को समझाने के लिये जोर दें। इसके अलावा कुछ फ़ोरम भी आप की सहायता कर सकते हैं। आरकुट मे चल रहे डा प्रवीन गोस्वामी के फ़ोरम Revolutionized Homoeopathy का मै विशेष उल्लेख करना चाहूगाँ जो रोगी के लक्षणों को rubrics मे बदलने का सही तरीका आपको बखूबी समझा सकते हैं और डा नवीन बिदानी की Homoeopathy….Beyond Horizons जो पग-2 आपकी clinical समस्यायों को सुलझाने मे आपकी सहायता कर सकते हैं।

चलिये चलते है क्लासिक 8 की विशेषतायें की ओर:-

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अगर मै शुरु मे हुये पंगों को छोड दूँ तो मै दावे के साथ कह सकता हूँ कि यह एक बेहतरीन साफ़्टवेएर है। तकरीबन 6 महीनो से इसका मै प्रयोग कर रहा हूँ , इसके पहले भी इसका दूसरा वर्जन 7 प्रयोग कर चुका हूँ जो कि वर्जन 8 के मुकबले कई मामले मे कमजोर था।

साफ़्टवेएर ही क्यों:-

यह एक ऐसा प्रशन है जो अक्सर पुराने अनुभवी होम्योपैथिक चिकित्सक पूछा करते है कि जब उनका काम बगैर इससे चल सकता है तो इतने तीम झाम मे क्यों पडा जाय्। नीचे एक उदाहरण के तौर मे एक रोगी के लक्षण रख रहा हूँ, जिसको कि साफ़्टवेएर मे डाला गया है।

श्री नरेन्द्र ने अपने लक्षणों को कुछ इस प्रकार रखा, उन्ही की जुबानी:

मुझे सांस फ़ूलने की शिकायत करीब 5 सालों से है। अक्सर मुझे जुकाम य्र छीकें लगी रहती है। साँस ज्यादा लेटने से फ़ूलती है, बैठने से और झुक कर बैठने से आराम मिल जाता है, हाँ , बलगम निकलने से भी आराम मिल जाता है। बन्द कमरे मे बहुत घुटन महसूस होती है। इतना कह कर रोगी चुप हो गया।

और पूछने पर उसने कहा कि

मेरे पैरो के तलवों मे जलन बहुत होती है, पैर की बिवाइयाँ अकसर फ़ट जाती है,और पैर के तलुवे मे कई घोखरू भी निकल आये है। खाने मे मीठा अधिक पसन्द है, और सर्दी मे भी गर्म बहुत लगती है।”

जो लक्ष्ण रोगी ने दिये उनके आधार पर उनके रुबिर्क्स बनाये गये, जो इस प्रकार थे-यह सब लक्षण कम्पलीट रिपर्टरी की मदद से क्लासिक 8 मे डाले गये।

[Complete ] [Nose]Coryza:Asthma, with:
[Complete ] [Generalities]Warmth:Agg.:
[Complete ] [Extremities]Heat:Foot:Sole:
[Complete ] [Extremities]Cracked skin:Feet:Soles:
[Complete ] [Extremities]Callosities, horny:Soles, on:
[Complete ] [Extremities]Callosities, horny:Soles, on:Tenderness:
[Complete ] [Respiration]Difficult:Lying, while:Agg.:
[Complete ] [Respiration]Difficult:Sitting:Amel.:Half sitting amel.:
[Complete ] [Respiration]Difficult:Expectoration:Amel.:
[Complete ] [Respiration]Difficult:Inspiration:Agg.:
[Complete ] [Generalities]Food and drinks:Sweets:Desires:

अब इन रुबरिक्स को साफ़्टवेएर मे डाला गया:जिसके परिणाम कुछ इस तरह रहे:
pk10

गौरतलब है कि लक्षणों को साफ़्टवेएर मे डलने के बाद 336 औषधियाँ लिस्ट मे आई, औषधियों को ग्रेडिग के हिसाब से देखे तो ars,sulp,lyco,calc क्रमश: 15,14,13,12 अंक लेकर क्रमश; 8,7,6,7 लक्षणों को कवर कर रहे हैं। नीचे देखें कि एक ही समय मे चिकित्सक कई विकल्पों पर अपना भ्रम दूर कर सकता है। उदाहरण के लिये, अगर उसको लग रहा है कि ars पूरी तरह से उपयुक्त औषधि नही है , तो वह माउस के पाइन्टर को ars पर रखें और दायें दबाये, नीचे देखें कि कितने विकल्प उसके सामने आरहे हैं-
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चित्र मे दिख रहे विकल्प कुछ इस तरह से हैं-

Symptom covered/not covered
Keynotes
Open materia medica
Conv rep to mm
Drug properties
Drug relation
Drug list

सबसे पहले इसी रोगी मे Symptom covered/not covered को देखते हैं-
pk5
दूसरे विकल्प मे Keynotes है, जो औषधि के लक्षणों को संक्षेप मे याद दिलाते है, जैसे-

pk6इसी तरह Open materia medica से अपनी चुनी हुयी औषधि के संबध मे पूरी
जानकारी ले सकते है, नीचे देखें-

pk7

अपनी पिछली दी हुयी औषधि की तुलना अगर नयी औषधि से करना चाहें तो विकल्प के रुप मे Drug relation को किल्क करे, देखे नीचे-

pk9
यह एक repertorisation की सामान्य प्रक्रिया है, कई बार चिकित्सक को सही सीमिलीमम को ढूढनेके लिये काफ़ी दुशवारी होती है, नीचे चित्र मे देखें कुछ और विकल्प मौजूद हैं-

pk11
Hand cursors पर नजर दौडायें।
बायें से पहला करसर सामान्य repertorisation दिखा रहा है।
बायें से दूसरा करसर Drug Filter के विकल्प दे रहा है।
बायें से तीसरा करसर Combine Repertorisation का विकल्प दे रहा है।
बायें से चौथा करसर cross repertorisation का विकल्प दे रहा है।
बायें से पाचँवा करसर Elimination repertorisation का विकल्प दिखा रहा है।
pk10
सामान्य repertorisation
drug filter
Drug Filter
combine
Combine Repertorisation
cross
cross repertorisation
elimination
Elimination repertorisation

यह सब झमेले पुराने और जटिल रोगों के लिये अधिक रहते हैं, नये रोगों मे quick repertorisation का तरीका अधिक कारगर होता है।
आज बस इतना ही। आगे और भी चर्चा करगें-क्लासिक 8 के बारे मे विस्तार से।

प्राचीन भारतीय औषधियाँ और उनके होम्योपैथी उपयोग-5

साराका इंडिका
asoka

सामान्य नाम : अशोक
संस्कृत : अशोक, ककली
हिन्दी : अशोक
परिवार : सिसलपीनियोसि

विवरण :अशोक के वृक्ष का उल्लेख हमारे धार्मिक ग्रंथों मे काफ़ी व्यापक रूप से हुआ है। प्राचीन ॠषियों ने मासिक धर्म सबधित रोगों मे इसकी प्रभावकारिता के लिये गुणगान किया है। इस वृक्ष के छिलके एव फ़ल से यह औषधि बनाई जती है।

होम्योपैथिक उपयोग:
कोलकाता के डा डी एन राय को इसका आशिक प्रमाणन का श्रेय दिया जाता है।

स्त्री रोग-
शवेत प्रदर- Sacrum मे दर्द के साथ गाढा, सफ़ेद एव खून मिश्रित स्त्राव
मासिक -(menstrual cycle)-
अनियमित मासिक , अधिकतर मासिक रूक जाना या कम होना, पेट के निचले हिस्से मे असहनीय दर्द जो मासिक धर्म के बहुत पहले शुरू हो जाता है।

बवासीर-
खूनी बवासीर मे इसका प्रयोग प्रमाणित है। मल्त्याग के बाद कष्ट एव खुजली। सख्त एव दुस्धाय कब्ज

पोटेन्सी-
Q,30

शुभ दीपावली

आप सभी को दीपावली की बहुत-२ बधाइयाँ!!!

डेंगूं या डेंगूं फ़ोबिया

कम से कम लखनऊ के बारे मे अवशय कह सकता हूँ कि यहाँ डेंगूं का प्रकोप कम है और डेंगूं फ़ोबिया अधिक । यह मेरा निष्कर्ष अचानक नहीं है परन्तु मेरे और भी साथी चिकित्सकों का भी जो दूसरी पद्दतियों से हैं। गत 10 दिनों मे प्लेटलेटस की गणना मैने करीब 120 रोगियों मे करायी उनमे अधिकाश मे प्लेटलेटस की संख्या सामान्य निकली और जिन रोगियों मे प्लेटलेटस बहुत कम निकले , वह भी दोबारा जाँच कराने मे सामान्य निकले । यह एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य है और इस बात को भी इंगित करता है कि कहीं कुछ गडबड है. इसलिये अगर आप के घर मे या फ़िर किसी परिचित मे डेगू की जाँच मे प्लेटलेटस कम निकल रहे हैं उनकी जाँच दोबारा किसी और पैथोलोजी लैब मे अवशय करवायें। कुछ साल पहले तक हर पैथोलोजी लैब प्लेटलेटस की जाँच स्लाइड से कराते थे लेकिन अब यह ऐनालाइजर से करते हैं , जिन रिपोर्टों मे यह कम पाया गया और बाद मे 24 घटें के अन्दर यह सही पाया गया , वह लखनऊ की कोई ऐसी-वैसी लैब नही हैं बल्कि अत्यंत नामी लैब हैं।

चिकनगुनिया

चिकनगुनिया
चिकनगुनिया भी एडीज एजेप्टाई मच्छर से फ़ैलता है। इसके लक्षण भी डेंगू से मिलते हैं लेकिन इसमे मृत्यु की संभावना नहीं होती है।

लक्षण:-
अचानक तेज बुखार के साथ सिरदर्द, जी मिचलाना,उल्टी,सर्दी लगना,जोडों मे दर्द और सूजन, त्वचा मे लाल चकत्ते इसके प्रमुख लक्षण हैं।

औषधियाँ:
चिकनगुनिया की प्रतिरोधक औषधि भी eupatorium perfolatum ही है, देखें यहाँ। चिकनगुनिया और होम्योपैथी पर वृहद शोध पत्र कुछ दिन पहले डा सुनीला ने एक साइन्टिफ़िक सेमिनार मे पेश किया था, जिसको मैने इस पोस्ट के साथ संलग्न किया है।

Source:CHIKUNGUNYA
A Homoeopathic Prospective.
Dr.Sunila BHMS, MD(Hom) Scholar
Govt. Homoeopathic Medical College. Calicut. Kerala
Email : babuabu@gmail.com

(Article presented by the author in the scientific seminar conducted by Govt. Homoeopathic Medical College. Calicut on 18.09.06 )

The Chikungunya epidemic currently attacked millions of people in Maharashtra, Karnataka, Tamilnadu, Andhrapradesh and Kerala. Chikungunya is not considered to be fatal. However, in 2005-2006, 200 deaths have been associated with chikungunya on Réunion Island and a widespread outbreak in Southern India (especially in Karnataka, Andhra Pradesh & Kerala). Chikungunya virus is highly infective and disabling but is not transmissible between people.( recent researches reported tramission from mother to foetus)

Chikungunya (also known as Chicken Guinea) is a relatively rare form of viral fever resembling dengue fever; caused by an alphavirus that is spread by mosquito bites from the Aedes aegypti mosquito, though recent research by the Pasteur Institute in Paris claims the virus has suffered a mutation that enables it to be transmitted by Aedes Albopictus (Tiger mosquito). The name is derived from the Makonde word meaning “that which bends up” in reference to the stooped posture developed as a result of the arthritic symptoms of the disease.

Epidemiology
Chikungunya was first described in Tanzania, Africa in 1952 following an outbreak on the Makonde plateau. The disease was first described by Marion Robinson and W.H.R. Lumsden. An outbreak of chikungunya was discovered in Port Klang in Malaysia in 1999 affecting 27 people. In February 2005, an outbreak was recorded on the French island of Réunion in the Indian Ocean. In Mauritius, 3,500 islanders have been hit in 2005. There have also been cases in Madagascar, Mayotte and the Seychelles.

In 2006, there was a big outbreak in the Andhra Pradesh state in India. Nearly 200,000 people were affected by this disease. Some deaths have been reported but it was thought to be due mainly to the inappropriate use of antibiotics and anti inflammatory tablets. As this virus can cause thrombocytopenia, injudicious use of these drugs can cause erosions in the gastric epithelium leading to upper GI bleeding (due to thrombocytopenia). According to the National Institute of Virology, Pune out of362 samples from Kadappa district in Andhrapradesh state 139 were found positive for chikungunya.

Over 2000 cases of chikungunya fever were reported from Maharashtra state, in March 2006. In Orissa state 5000 cases of were reported in February 2006. In Bangalore, there was an outbreak of Chikungunya in May 2006. In Tamilnadu, 20,000 cases were reported in June 2006. Earlier it was found spreading mostly in outskirts of Bangalore, but now it has started spreading in the city also.Over 800000lakh cvases were reported from Karnataka state. Over 20000 cases were reported from Thiruvananthapuram, Aleppey, Kottayam, Ernakulam, Palakkad, Malappuram and Kozhikkode district in Kerala state. 10 deaths have been reported from Aleppy district. 800 cases were reported from Cherthala of Aleppy district.300 cases were reported from Kollam district.

More seropositivity is found among the age group between 51- 55 years.

Chikungunya fever is caused by Chikugunya virus. They are spherical enveloped virions, 60 nm diameters and have single stranded positive sense RNA genome.

Characteristics of CHIKUNGUNYA virus
Virus classification
Group: Group IV ((+)ssRNA)
Family: Togaviridae
Genus: Alphavirus
Species: Chikungunya virus

Chikungunya virus is closely related to O’nyong’nyong virus. O’nyong’nyong virus caused a major epidemic of arthritis and rash involving at least 2 million people in Eastern and Central Africa in 1960s. After its mysterious emergence the virus virtually disappeared leaving only occasional evidence of its presence in Kenya.

The chikungunya virus is spread by mosquito bites from the Aedes aegypti mosquito. Mosquitoes become infected when they feed on a person infected with the chikungunya virus. Monkeys, and possibly other wild animals, may also serve as reservoirs of the virus. Infected mosquitoes can then spread the virus to other humans when they bite.

chikmungiya

Aedes aegypti (the yellow fever mosquito), a household container breeder and aggressive daytime bitter which is attracted to humans, is the primary vector of chikungunya virus to humans. Aedes albopictus (the Asian tiger mosquito) may also play a role in human transmission is Asia, and various forest-dwelling mosquito species in Africa have been found to be infected with the virus.

Aedes breeds in artificial accumulations of water. It needs only 2ml of water for breeding. It lays eggs singly. They do not fly over long distance, usually less than 100 metres. Eggs can resist desiccation for upto 1year. The eggs will hatch when flooded by deoxygenated water.

Aedes is the first proved vector of a virus disease- Yellow fever. Human blood is preferred over other animals with ankles as a favourite bite area.

Symptoms
After an incubation period of 3-12 days there is a sudden onset of flu-like symptoms including a severe headache, chills, fever (>40°C, 104°F), joint pain, backache, nausea, vomiting, petechial or maculopapular rash usually involving the limbs and trunks. Migratory polyarthritis mainly affects the small joints of the hands, wrists, ankles and feet with lesser involvement of the larger joints. Joints of the extremities in particular become swollen and painful to the touch. Haemorrhage is rare. There can also be headache, conjunctival infection and slight photophobia.

In the present epidemic in the state of Andhra Pradesh in India, high fever and crippling joint pain is the prevalent complaint. Fever typically lasts for two days and abruptly comes down. However joint pain, intense headache, insomnia and an extreme degree of prostration lasts for a variable period, usually for about 5 to 7 days.

Dermatological manifestations observed in a recent outbreak of Chikungunya fever are as follows:

• Maculopapular rash like ulcers over scrotum, crural areas and axilla.
• Nasal blotchy erythema
• Freckle-like pigmentation over centro-facial area
• Flagellate pigmentation on face and extremities
• Lichenoid eruption and hyperpigmentation in photodistributed areas
• Multiple aphthous ulcers
• Lympoedema
• Multiple ecchymotic spots (Children)
• Vesiculobullous lesions (infants)
• Subungual haemorrhage.

Investigations
• A few patients develop Leucopenia.
• Elevated levels of aspartate aminotransferace (AST) and C-reactive protein
• Mildly decreased platelet counts.

Diagnosis
Sudden severe headache, chills, fever, joint and muscle pain are the commonest symptoms. The diagnostic tests include detection of antigens or antibodies in the blood, using ELISA (or EIA – enzyme immunoassay) or molecular techniques like polymerase chain reaction (PCR). The antibodies detected by serological assays like ELISA require an IgM capture assay to distinguish it from dengue fever

Differential Diagnosis
1. Dengue Fever
Of all the arthropod- borne viral diseases, Dengue fever is the most common. This infection may be asymptomatic or may lead to
1. Classical Dengue Fever
2 .Dengue Haemorrhagic fever without shock
3. Dengue Haemorrhagic fever with shock

The main vector is Aedes aegypti mosquito. The illness is characterised by a incubation period of 3 to 10 days. The onset is sudden with chills and high fever, intense headache, muscle and joint pains which prevent all movement. Within 24 hrs retro-orbital pain and photophobia develops. Other symptoms include extreme weakness, anorexia, constipation, colicky pain and abdominal tenderness. Fever is typically but not inevitably followed by a remission of a few hrs to2 days. The rash may be diffuse flushing, mottling, or fleeting pin point eruptions on face, neck and chest during the first half of the febrile period and a conspicuous rash that may be maculopapular or scarlatiform on 3rd or 4th day. Fever lasts for about 5 days.

Dengue haemorrhagic fever is confined exclusively to children less than 15 yrs of age. There may be plasma leakage and abnormal haemostasis, as manifested by a rising haematocrit value and moderate to marked thrombocytopenia.

In dengue shock syndrome shock is present along with all the above criteria.

2. Yellow fever
It is a zoonotic disease affecting principally monkeys and other vertebrates. It shares clinical features of dengue fever but is characterised by more severe hepatic and renal involvement

3. Other viral fevers
Many of the viruses produce encephalitis, haemorrhagic fever or arthritis in various combinations. There may be high fever with backache and joint pain. Clinical features depend upon the type of virus causing infection.

a. SINDBIS virus infection: Transmitted among birds by mosquitoes. The disease begins with rash and arthralgia. Constitutional symptoms are not marked and fever is modest or lacking altogether.

b. MAYARO fever: Transmitted by Haemagogus mosquitoes. It causes a frequently endemic or epidemic infection of humans and appears to produce a syndrome resembling Chikungunya.

c. Epidemic Polyarthritis (ROSS RIVER virus infection): Constitutional symptoms are absent in many cases. Many patients are incapacitated by joint involvement.

d. Influenza: It is an acute respiratory illness caused by infection with influenza virus. Respiratory tract infection is accompanied by systemic signs and symptoms such as fever, headache and myalgia

4. Eruptive fevers like measles and German measles

Complications
• Super added infection with bacteria
• Meningo encephalitis
• Death occurs in immunocomprised patients.
• Myocarditis
• Pneumonias
Complications were observed due to injudicious application of certain anti-inflammatory drugs (as reported by http://www.chikungunya.co.uk)

Prevention
The best way to avoid CHIKV infection is to prevent mosquito bites.

There is no vaccine or preventive drug except homoeopathic medicines.. Preventive tips are similar to those for dengue or West Nile virus:

• Use insect repellent.
• Wear long sleeves and pants.
• Have secure screens on windows and doors to keep mosquitoes out.
• Get rid of mosquito breeding sites by emptying standing water from flower pots, buckets and barrels. Change the water in pet dishes. Drill holes in tire swings so water drains out. Keep children’s wading pools empty and on their sides when they aren’t being used.
• Additionally, a person with chikungunya fever or dengue should limit their exposure to mosquito bites in order to avoid further spreading the infection. The person should stay indoors or under a mosquito net.

Immunity
One attack confers life long immunity.

Homoeopathic Prophylaxis
As per the guidelines laid down by Dr. Samuel Hahnemann in the Organon a Genus epidemics has to be found out in the specific area and it could be the best to be found out in the specific area and it could be the best prophylactic remedy.

Many homeopaths consider Eupatorium perfoliatum as a preventive medicine for Chikungunya. The most commonly suggested potency as prophylaxis is 200C of Eupatorium perfoliatum. As per the reports the homoeopathic remedies useful for propylaxis are – Eupatorium Perfoliatum, Gelsemium, Rhustox, Bryonia Alba, Ars alb and Aconite.

The Karnataka Board of Homoeopathic System of medicine announced Rhustox 200 & Pyrogen 200 as the Genus Epidemicus for Chikungunya cases. In Tamil Nadu Homoeopathic physicians distributed Rhustox and Eupatorium for more than 4000 persons as a preventive prescription.in Andhrapradesh Government distributed medicine to 2 Lakh people.

Treatment
Chikungunya fever is usually self-limiting and will resolve with time. Symptomatic treatment is recommended after excluding other more dangerous diseases. There is no vaccine currently available for Chikungunya. Supportive care with rest is indicated during the acute joint symptoms. Movement and mild exercise tend to improve stiffness and morning arthralgia, but heavy exercise may exacerbate rheumatic symptoms.

Homoeopathic Treatment
Aphorism 100-102 is dealing with the treatment of epidemic diseases. According to Dr.Hahnemann, a carefully observing physician can arrive so nearly at knowledge of the true state of the epidemic from the examination of even the first and second patients and can even find a suitable homoeopathic remedy for it. Dr. Hahnemann recommends investigating each epidemic disease as a new and unknown case and selecting medicine according to its symptom similarity.

Homoeopathy has a very good scope in the treatment of chikungunya. Initially indicated acute remedies may give relief which may be followed by constitutional remedy in order to get rid of post fever arthralgia

Homeopathy offers many medicines which may help in Chikungunya. These include medicines like Eupatorium-perf, Pyroginum, Rhus-tox, Cedron, Influenzinum, China, Arnica, Belladona, Bryonia, Nux vomica, Sulphur etc. Eupatorium Perfoliatum Q (tincture, 3 to 5 drop dose) will remove the debilitating joint pains and cut short the intensity and duration of the disease. Other potencies may be used according to the intensity of the case. In Andhrapradesh medicines such as Eupatorium200 & Belladonna has cured number of cases.

Important rubrics that can be selected based on symptom totality (Synthesis Repertory)

1. EXTREMITIES PAIN fever during
2. FEVER CHILLINESS with
3. HEAD PAIN heat during
4. STOMACH VOMITING heat during
5. GENERALS WEAKNESS fever during
6. Fever : Exanthemic

Medicines:
Ars alb- 11/5
Puls- 11/5
Acon-10/4
Bell-10/4
Bry-9/4
Eup-per-9/4

Predominant Miasm: Psora

Indications of some important Homoeopathic remedies:

1. Eupatorium perfoliatium: – Pain in the limbs and muscles with fever. There may be severe bone pain. Swelling of ankles and feet. Aching pain in bones of extremities with soreness of flesh.great thirst, perspiration relieves all symptoms except head ache.200 potency is found to be more effective. This medicine is highly effective in post fever arthralgia (Mother tincture 5 drops tds for 3-5 days)

2. Gelsemium: – associated with severe headache and coryza. Thirstlessness, slow pulse, muscular pains. There may be drowsiness, dullness and dizziness. Hard pressure. Swollen joints. Debilitating night sweats.

8. Belladona: High fever with burning heat. No thirst with fever. Joints swollen, red, shining with red streaks radiating. Heat, redness, throbbing and burning.

9. Pyrogen: Septic fevers, temperature rises rapidly. Great heat with profuse hot sweat. But sweating does not cause a fall in temperature, aching in limb and bones.

10. Nux vomica: fever with chilliness, nausea vomiting, ineffectual urging for stool.

11. Sulphur: used as an intercurrent.

REFERENCES:
1. Harrison’s Principles of Internal Medicine.
2. Homoeo Times – International Journal on clinical evidence
3. Vital Informer – Monthly Medical News Letter
4. Homoeopathic Materia Medica and Repertory by W.Boericke.

Internet:
1. http://www.wikipedia.org/wiki/Chikungunya
2. http://www.cbwinfo.com/Biological/Pathogens/CHIK.html
3. http://www.phacaspc.gc.ca/msdsftss/msds172e.html
4. http://www.hpathy.com
5. http://www.chikungunya.co.uk

डेगूं (Dengue) और होम्योपैथी

डेंगू बुखार पर पहले भी लिख चुका हूँ, देखे यहाँ लेकिन अब चूँकि यह व्यापक रूप से फ़ैल चुका है, अबकि बार अधिक जानकारी विस्तार से डेंगू का होम्योपैथिक उपचार एवं प्रतिरोधक औषधियों की ( prophylactics )। करीब तीन साल पहले भी यह व्यापक रूप से फ़ैला था और उस समय होम्योपैथिक औषधियों के परिणाम काफ़ी सन्तोषजनक मिले थे। लेकिन अब कि बार के आँकडे सरकारी आँकडों से मेल खाते नही दिख रहे। पिछले 8 दिनों में करीब 76 रोगियों के खून के नमूने मैने जो लिये और उनकी पैथोलोजिकल जाँच करायी उनमे सिर्फ़ 4 रोगी डेगूं के निकले । यह तुलना गत 3 साल पहले डेगूं के epidemic से बिल्कुल फ़र्क थी। सामान्तया डेंगूं की जाँच के लिये दो प्रकार के टेस्ट कराते हैं- platelets count और Elisa/Antibody test (IgG and IgM)। Elisa Dengue , platelets count की तुलना मे थोडा सा महगाँ टेस्ट है और रोगी के परिवारजन इसको करवाने से कतराते हैं। एक स्वस्थ मनुष्य मे platelets count की संख्या 1,50,000-2,50,000 तक होती है।
तो क्या कारण रहा कि इस बार अधिकतर रोगियो में यह जाँच मे नही पाया गया । शायद इसका कारण इस बार रोग का संक्रमण महामारी (Epidemic-रोग का सक्रमण जो कई व्यक्तियों को एक साथ सक्रमित करे) के रूप मे न होकर endemic (स्थानिक) रहा है। लेकिन जिस तरह से रोगियों की संख्या पिछले कुछ दिनों मे बढी है, इसको स्थानीय संक्रमण से महामारी बनने मे भी देर नही लगेगी।

होम्योपैथिक उपचार एव प्रतिरोधक औषिधियाँ

Epidemic diseases का उपचार होम्योपैथिक मे अन्य रोगों की अपेक्षा आसान हो जाता है, इसका कारण एक ही समय मे एक ही रोग से पीडित रोगी लगभग एक ही तरह के लक्षण देते हैं। एक बार जो औषिधि इन रोगों मे चुन ली जाती है वह लगभग सभी रोगियों मे काम कर जाती है। पिछले डेगूं के Epidemic मे ब्रायोनिया का प्रयोग काफ़ी सन्तोषजनक था, लेकिन यह कोई आवशयक नही कि एक समय मे चुनी गयी औषिधि इस बार भी अपना वही असर दिखाये। आर्गेनान आफ़ होम्योपैथी मे हैनिमैन ने epidemic diseases और sporadic diseaes मे अपना दृषिटकोण बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है ।

होम्योपैथिक दृषिटकोण (Hahnemannian view)

Source: ORGANON OF MEDICINE Aphorism 100-102

§ 100

In investigating the totality of the symptoms of epidemic and sporadic diseases it is quite immaterial whether or not something similar has ever appeared in the world before under the same or any other name. The novelty or peculiarity of a disease of that kind makes no difference either in the mode of examining or of treating it, as the physician must any way regard to pure picture of every prevailing disease as if it were something new and unknown, and investigate it thoroughly for itself, if he desire to practice medicine in a real and radical manner, never substituting conjecture for actual observation, never taking for granted that the case of disease before him is already wholly or partially known, but always carefully examining it in all its phases; and this mode of procedure is all the more requisite in such cases, as a careful examination will show that every prevailing disease is in many respects a phenomenon of a unique character, differing vastly from all previous epidemics, to which certain names have been falsely applied – with the exception of those epidemics resulting from a contagious principle that always remains the same, such as smallpox, measles, etc.

§ 101

It may easily happen that in the first case of an epidemic disease that presents itself to the physician’s notice he does not at once obtain a knowledge of its complete picture, as it is only by a close observation of several cases of every such collective disease that he can become conversant with the totality of its signs and symptoms. The carefully observing physician can, however, from the examination of even the first and second patients, often arrive so nearly at a knowledge of the true state as to have in his mind a characteristic portrait of it, and even to succeed in finding a suitable, homœopathically adapted remedy for it.

§ 102

In the course of writing down the symptoms of several cases of this kind the sketch of the disease picture becomes ever more and more complete, not more spun out and verbose, but more significant (more characteristic), and including more of the peculiarities of this collective disease; on the one hand, the general symptoms (e.g., loss of appetite, sleeplessness, etc.) become precisely defined as to their peculiarities; and on the other, the more marked and special symptoms which are peculiar to but few diseases and of rarer occurrence, at least in the same combination, become prominent and constitute what is characteristic of this malady.1 All those affected with the disease prevailing at a given time have certainly contracted it from one and the same source and hence are suffering from the same disease; but the whole extent of such an epidemic disease and the totality of its symptoms (the knowledge whereof, which is essential for enabling us to choose the most suitable homœopathic remedy for this array of symptoms, is obtained by a complete survey of the morbid picture) cannot be learned from one single patient, but is only to be perfectly deduced (abstracted) and ascertained from the sufferings of several patients of different constitutions.

1 The physician who has already, in the first cases, been able to choose a remedy approximating to the homœopathic specific, will, from the subsequence cases, be enabled either to verify the suitableness of the medicine chosen, or to discover a more appropriate, the most appropriate homœopathic remedy.

अगर हम डेगूं की टेबल पर नजर दौडाते हैं तो Eupatorium perfolatum का स्थान सबसे ऊपर पाते हैं। और यही कारण है कि Eupatorium perf डेगूं की सबसे प्रधान औषधि है। लेकिन अगर रोगी के लक्षण औषधि से मेल न खा रहे हों तो फ़िर अन्य औषधि का चुनाव करने मे ही समझदारी है।
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प्रतिरोधक औषधियों :-

Eupatorium perfolatum डेगूं की खास प्रतिरोधक औषधि है, Eupatorium का काम करने का समयकाल अल्प है और 1-7 दिन तक रहता है। इसलिये इसको हर तीसरे दिन 200 पोटेन्सी मे 10 बूँद रात मे सोते समय लें। लेकिन कब तक ? यह निर्भर करता है कि आप के शहर मे डेगूं कितना prevalent है। और अगर सक्र्मित रोगों के समयकाल को मान कर चलें तो लगभग यह एक महीने के आस-पास रहता है।
इसके अलावा Influenzinium 200 को हफ़्ते मे एक बार ले, Influenzinium क्यों ?, क्योकि इस बात का भी धयान रखें कि डेगूं अकेला वाइरस नहीं है जो इस समय संक्रमण फ़ैला रहा है, डेगूं के अलावा भी कई और वाइरस की प्रजातियाँ आफ़त मचाये हैं।

प्राचीन भारतीय औषधियाँ और उनके होम्योपैथी उपयोग- 4

4: साइनोडोन डैक्टाइओन (Cyanodon D )

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सामान्य नाम-दुर्बा
संस्कृत– ग्रंथि,दूबा
हिन्दी- दूब, हरियाली
अंग्रेजी-Bahama grass
परिवार-ग्रैमिनिया

विवरण-यह 2400 मीटर की ऊचांई तक पूरे भारत मे पायी जाने वाली एक बारह मासी घास है। यह दो प्रकार की होती है-हरा और सफ़ेद्। पशिचमी पंजाब के बलुयी
क्षेत्र को छोड कर यह पूरे भारत वर्ष मे पायी जाती है। यह ठंडे मौसम मे कम होती है तथा सडक के किनारे देखी जा सकती है।
पर्परागत रूप से आर्युवेद मे नासारक्त्स्त्राव, रक्तस्त्राव, दस्त और पेचिश मे इसका उपयोग होता रहा है।
एलोपैथिक चिकित्सा प्रणाली मे भी इसके व्यापक प्रमाण मिलते हैं। मूलत: इसका प्रयोग के प्रमाण खुजली,सिफ़लिस और डाइयूरिटिक( मूत्र बढाने के लिये) के लिये मिलते हैं।

होम्योपैथिक प्रयोग:-
डा शरत चन्द्र घोष की ‘ Drugs of Hindustan ‘ मे इस औषधि का उल्लेख है तथा डा जुगल किशोर ने कुछ रोगियों पर प्रमाणित भी किया है। C.C.R.H. द्ववारा पाँच विभिन्न केन्द्रों मे विस्तार से इसका प्रमाणन किया गया है।
नासारक्त्स्त्राव, चोट से खून बहना आदि मे रक्त्स्त्रावरोधी के रूप मे इस औषधि को सत्यापित किया गया है।

नासारक्त्स्त्राव (Epistaxis)- सुर्ख लाल रक्त ।

दस्त-आरभिक अवस्था मे। पेचिश के साथ, रक्त मिश्रित पतला और जलीय मल , भूख मे कमी तथा पित्ग्रस्त मितली। कोलाइटिस मे प्रभावी। इसके अलावा खूनी पेचिश मे भी प्रभावी है.

पोटेन्सी- :- Q,6x