आपको इस नाचती हुई लडकी को देखकर क्या लगता है - यह किस दिशा मे नाच रही है - घड़ी की सुई की दिशा ( clockwise ) या घड़ी की सुई की विपरीत दिशा ( anticlockwise) में । अगर आप घड़ी की सुई की दिशा ( clockwise ) मे अपना अनुमान लगा रहे है तो आप अपने मस्तिष्क के दायें हिस्से का प्रयोग कर रहे हैं और अगर विपरीत दिशा मे तो बायें । तो इससे क्या अर्थ निकला , नीचे डेली टेलीग्राफ़ की रिपोर्ट देखें और परिणामों से अवगत हो लें । हाँ , Daily telegraph की इस रिपोर्ट पर आ रहे कमेन्ट को देखना न भूलें ।
If clockwise, then you use more of the right side of the brain and vice versa. Most of us would see the dancer turning anti-clockwise though you can try to focus and change the direction; see if you can do it.
LEFT BRAIN FUNCTIONS uses logic detail oriented facts rule words and language present and past math and science can comprehend knowing acknowledges order/pattern perception knows object name reality based forms strategies practical safe RIGHT BRAIN FUNCTIONS uses feeling “big picture” oriented imagination rules symbols and images present and future philosophy & religion can “get it” (i.e. meaning) believes appreciates spatial perception knows object function fantasy based presents possibilities impetuous risk taking
यह भी अजीब संयोग है कि प्रकृति द्वारा प्रद्दत नाना प्रकार के फ़ल और सब्जी की संरचानाये हमारे शरीर के कई अंगों और कोशिकाओं से मिलती जुलती प्रतीत होती हैं । चीनियों ने प्रकृति के इस निराले खेल को ५००० वर्ष पहले ही से जाना और समझा ।
कुछ अंदाज लगायें कि क्या समानता हो सकती है १. एक कटी हुई गाजर और आँख मे या २. कटॆ हुये टमाटर और ह्रदय मे या ३. अखरोट और मस्तिषक के बीच या ४. शकरकन्दी और पैन्क्रियाज के मध्य । और भी है बहुत से ऐसे सम्बन्ध ; प्रकृति की इस निराले अंदाज को जानने के लिये नीचे इस वीडियो किल्प को देखें ।
खलील जिब्रान की साहित्यिक कृतियों को मै पहले भी पढ चुका हूँ , विद्रोह की ऐसी आँधी मैने किसी लेखक मे पहले कभी न देखी। खलील के विद्रोही तेवर इनकी कथाओं मे साफ़ दिखाई पडते हैं . खलील के समग्र साहित्य मे गहरी जीवन अनूभूति , संवेदन शीलता , भावात्मकता , व्यग्यं एवं पाखडं के प्रति गहरा विद्रोह साफ़ दिखता है । हाल ही मे डां महेन्द्र मित्तल द्वारा संपादित और संकलित खलील की श्रेष्ठ कहानियों को दोबारा पढने का मौका मिला । इसमे कोई अतिशयोक्ति नही कि खलील की लेखनी मे आग है । अपनी कथाओं के माधयम से उन्होंने समाज , व्यक्ति , धार्मिक पाखण्ड , वर्ग संघर्ष , प्रेम और कला पर अपनी सारगर्भित लेखनी चलाई है।
खलील के कहानी संग्रह ’स्पिरिटस रिबेलियस ’ ( विद्रोही आत्मायें ) मे उनके विद्रोही स्वर मुखरित हुये थे । सर्वप्रथम यह पुस्तक अरबी भाषा मे छपी थी । बाद मे विशव की अनेक भाषा मे इसका अनुवाद हुआ । उनकी अन्य रचनाओं मे अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित ’ दि मैड मैन ’ , ’ दि फ़ोर रनर’ , ’दि प्राफ़िट’ आदि प्रमुख हैं । खलील की ’स्पिरिटस रिबेलियस ’ ( विद्रोही आत्मायें ) मे जो कथायें संगृहीत थी , उसमे समाज के जीर्ण-शीर्ण और जड हुये स्वरुप पर तीखे प्रहार किये गये थे । चर्च के पुरहोतों ने इस पुस्तक को खतरनाक , क्रान्तिकारी ,और देश के युवको को जहर भरने वाला मानते हुये बेरुत के बाजारों मे सरे आम जलया था ।
डा महेन्द्र मित्तल द्वारा संग्रहीत इस पुस्तक मे ’स्पिरिटस रिबेलियस ’ ( विद्रोही आत्मायें ) से १४ कहानियाँ ली गयीं है , जैसे ’ आत्मा का उपहार ’ , नई दुलहिन , ’ दोस्त की वापसी ’ , ’ सवेरे की रोशनी ’ , ’ विद्रोही आत्मायें ’ , ’ तूफ़ान ’ , ’ पागल जान ’ , ’ शैतान ’ , ’ गुलामी ’ , कंब्रों का विलाप ’ , ’महाकवि ’ , इन्साफ़ ’ , ’ तीन चीटियाँ ’ और ’ पवित्र नगर ’ । ”
’ विद्रोही आत्मायें ’ मे कहानी रशीद बेग और गुलबदन की शादी और बाद मे गुलबदन की बेवफ़ाई पर जाकर टिकती है । रशीद बेग जो बेरुत का समृद्द और धनवान व्यक्ति था , अपने से काफ़ी कम उभ्र की लडकी गुलबदन से निकाह रचाता है , लेकिन नियति को कुछ और ही मन्जूर था , गुलबदन का प्रेम अपने हम उभ्र लडके से हो जाता है जो बहुत ही गरीब था । और तब तक उसे यह सच्चाई समझ आ जाती है कि रशीद बेग उसे सिर्फ़ अपनी भूख मिटाने के लिये इस्तेमाल कर रहा है । लेकिन धर्मशास्त्र उसके आगे राह रोके खडे थे , लेकिन इसके बावजूद भी उसने एक साहसिक निर्णय लिया । आगे एक बानगी देखें , खलील की कलम से ’,
” मै चलता जा रहा था और गुलबदन की आवाज मेरे कानो मे गूंज रही थी ।……….मैने अपने आप से कहा , ’ आजादी के स्वर्ग के सामने से पेड सुंगधित हवा का आंनद ले रहे हैं और सूरज और चांद की किरणों से आनंदित हो रहे हैं । … इस धरती पर जो चीज है , वह अपनी इच्छा के अनुसार जिंदगी बसर करती है और अपनी आजादी पर फ़ख्र करती है । लेकिन इन्सान अब वैभव से वंचित है , क्योंकि उनकी पाक रुहें दुनिया के तंग विधानों की गुलाम हैं । उनकी रुहों और जिस्मों के लिये एक ही ढाँचे मे ढला कानून बनाया गया है और उनकी इच्छाओं तथा ख्वाहिशों को एक छिपे हुये और तंग कैदखाने मे बंद कर दिया गया है । उनके दिमाग के लिये एक गहरी और अंधेरी कब्र खोदी गई है । अगर कोई उसमे से उठे और उनके समाज और कारनामो से अलग हो जाये तो कहते है कि कि यह आदमी विद्रोही और बदमाश है । यह आदमी बिरादरी से खारिज है और मार डालने लायक है ! लेकिन क्या इंसान को कयामत तक इस सडियल समाज की गुलामी मे जिंदगी बिताते रहना चाहिये या उसे अपनी आत्मा को इन बंधनॊ से मुक्त कर लेना चाहिये ? क्या आदमी को मिट्टी मे पडे रहना चाहिये या अपनी आंखों को सूर्य बना लेना चाहिये , ताकि उसके शरीर की छाया कूडे-करकट पर पडती हुई नजर न आये ? “
’पागल जाँन ’- यह कहानी जाँन नामक एक सीधे-साधे और भोले ग्रामीण युवक की है जो प्रभु ईशू से बेपनाह प्यार करता है । एक दिन जब वह अपनी बैलों को घास चराने खेतों की तरफ़ ले गया था तो उनमे से एक बैल संत एलिजा मठ के खेतों मे प्रवेश कर गया, प्रभु ईशू की भक्ति मे तल्लीन जान को जरा सा भी इस बात का बोध न हुआ । लेकिन शाम होते-२ जब वह अपनी बैलों को ढूँढने मे नाकाम रहा तो उसकी नजर संत एलिजा मठ के खेतों मे जाने वाले रास्ते पर पडी । वहाँ खडे एक पादरी से डरते-२ उसने अपनी खोये हुये बैल के बारे मे पूछा , वह पादरी उसे अपने मठ के अन्दर ले गया जहाँ अन्य छोटे बडे कई चोगा धारी पहले से मौजूद थे और बडे गुस्से और हिकारत से उसकी तरफ़ देख रहे थे ।
उनमे से लाट पादरी ने गुस्से से कहा ,
“….. तू गरीब है या अमीर , इससे मठ को कुछ लेना देना नही है । …अगर तू अपने बैलों को छुडाना चाहता है तो तुझे मठ को तीन दीनार देने होगें । “
जान ने पैसे देने से इन्कार किया और कहा कि एक गरीब चरवाहे पर रहम खाइये ।
लेकिन इस पर लाट पादरी ने कडक कर कहा ,
” तो फ़िर तुझे अपनी जायदाद का कुछ हिस्सा बेच कर तीन दीनार लाने होगें , क्योंकि संत एलिजा के गुस्से का शिकार बनकर नरक मे जाने की बनिस्बत जमीन जायदाद से महरुम होकर स्वर्ग मे जाना अच्छा है ।”
यहाँ खलील की आग को उसके लेख मे आप स्वत: महसूस कर सकते है । जान के रूप मे खलील जिब्रान तथाकथित धर्मगुरुओं पर जोरदार निशाना लगाते हैं । चर्च की जगह पर मन्दिर या मस्जिद , पादरी की जगह पर अपने-२ धर्मगुरुओं को आप रखकर देखें तो यह कहानी आप के अपने-२ समाज के तंग गलियारों मे घूमती हुयी दिखेगी ।
यह सब सुनते ही जान आपे से बाहर हो गया और ललकार कर कहा ,
” ऐ पाखंडियों ! भगवान ईसा की सिखावन को तुम लोग इसी तरह तोड मरोडते हो ; और इसी तरह अपनी बुराइयों को फ़ैलाने के लिये तुम लोग जिंदगी की पाक परंपराओं को खराब करते हो … । लानत है तुम पर ! ….धिक्कार है तुम पर , ऐ ईसा के दुशमनों ! तुम अपने ओंठ प्रार्थना के लिये हिलाते हो लेकिन उसी समय तुम्हारे दिल लालसाओं से भरे होते हैं ।…..”
” गर्दिश के मारे हमारे घरों को देखो , जहां बीमार लोग सख्त बिस्तरों पर करहाते रहते हैं …अपने गुलाम अनुयायियों के बारे मे सोचो तो सही कि उधर वह भूख से तडप रहे हैं और इधर तुम ऐशो-इशरत की जिंदगी बसर कर रहे हो … उनके बागों के फ़ल खाकर और अंगूरों की शराब पीकर तुम मौज उडा रहे हो ! …..जहरीले नाग के फ़न की तरह तुम अपने हाथ फ़ैलाते हो और नरक का डर दिखा उस बेवा का बचाया हुआ थोडा सा पैसा छीन लेते हो ।…..”
जाँन ने गहरी साँस ली और शांति से बोला ,
” तुम लोग बहुत हो और मै अकेला हूँ । जो भी चाहो , तुम मेरे साथ कर सकते हो । रत के अंधेरे मे भेडिये मेमने को फ़ाडकर खा जाते हैं , मगर उसके खून के धब्बे घाटी के पत्थरों पर दिन निकलने तक बाकी रहते हैं और सूरज सबको उस गुनाह की खबर कर देता है ।”
’शैतान ’ कहानी का सार बहुत ही सार्गर्भित और ईशवर और शैतान की परिकल्पना पर रोशनी डालने वाला है । यह कहानी उत्तरी लेबनान के एक पुरोहित ’पिता इस्मान ’ की है जो गाँव-२ मे घूमते हुये जनसाधारण को धार्मिक उपदेश देने का काम करते थे । एक दिन जब वह चर्च की तरफ़ जा रहे थे तो उन्हें जंगल मे खाई में एक आदमी पडा हुआ दिखा जिसके घावों से खून रिस रहा था । उसकी चीत्कार की आवाज को सुनकर जब पास जा कर पिता इस्मान ने गौर से देखा तो उसकी शक्ल जानी -पहचानी सी मालूम हुयी । इस्मान ने उस आदमी से कहा , ’ लगता है कि मैने कहीं तुमको देखा है ? ’
और उस मरणासन आदमी ने कहा ,
“ जरुर देखा होगा । मै शैतान हूँ और पादरियों से मेरा पुराना नाता है ।”
तब इस्मान को ख्याल आया कि वह तो शैतान है और चर्च मे उसकी तस्वीर लटकी हुई है । उसने अपने हाथ अलग कर लिये और कहा कि वह मर ही जाये ।
वह शैतान जोर से हँसा और उसने कहा ,
” क्या तुम्हें यह पता नहीं है कि अगर मेरा अन्त हो गया तो तुम भी भूखे मर जाओगे ?. … अगर मेरा नाम ही दुनिया से उठ गया तो तुम्हारी जीवका का क्या होगा ?”
“एक पुजारी होकर क्या तुम नही सोचते कि केवल शैतान के अस्तित्व ने ही उसके शत्रु ’ मंदिर ’का निर्माण किया है ? वह पुरातन विरोध ही एक ऐसा रहस्मय हाथ है , जो कि निष्कपट लोगों की जेब से सोना - चांदी निकाल कर उपदेशकों और मंहतों की तिजोरियों में संचित करता है । “
” तुम गर्व मे चूर हो लेकिन नासमझ हो । मै तुम्हें ’ विशवास ’ का इतिहास सुनाऊगाँ और तुम उसमे सत्य को पाओगे जो हम दोनो के अस्तित्व को संयुक्त करता है और मेरे अस्तित्व को तुम्हारे अन्तकरण से बाँध देता है ।”
” समय के आरम्भ के पहले प्रहर मे आदमी सूर्य के चेहरे के सामने खडा हो गया और चिल्लाया , ’ आकाश के पीछे एक महान , स्नेहमय और उदार ईशवर वास करता है ।”
” जब आदमी ने उस बडे वृत की की ओर पीठ फ़ेर ली तो उसे अपनी परछाईं पृथ्वी पर दिखाई दी । वह चिल्ला उठा , ’ पृथ्वी की गहराईयों में एक शैतान रहता है जो दृष्टता को प्यार करता है । ’
’ और वह आदमी अपने -आपसे कानाफ़ूसी करते हुये अपनी गुफ़ा की ओर चल दिया , ’ मै दो बलशाली शक्तियों के बीच मे हूँ । एक वह , जिसकी मुझे शरण लेनी चाहिये और दूसरी वह , जिसके विरुद्द मुझे युद्द करना होगा । ’
” और सदियां जुलूस बना कर निकल गयीं , लेकिन मनुष्य दो शक्तियों के बीच मे डटा रहा - एक वह जिसकी वह अर्चना करता था , क्योंकि इसमे उसकी उन्नति थी और दूसरी वह , जिसकी वह निन्दा करता था , क्योंकि वह उसे भयभीत करती थी । “………….
थोडी देर बाद शैतान चुप हो गया और फ़िर बोला ,
” पृथ्वी पर भविष्यवाणी का जन्म भी मेरे कारण हुआ । ला-विस प्रथम मनुष्य था जिसने मेरी पैशाचिकता को एक व्यवासाय बनाया । ला-विस की मृत्यु के बाद यह वृति एक पूर्ण धन्धा बन गया और उन लोगों ने अपनाया जिनके मस्तिष्क मे ज्ञान का भण्डार है तथा जिनकी आत्मायें श्रेष्ठ , ह्र्दय स्वच्छ एवं कल्पनाशक्ति अनन्त है । “
“बेबीलोन ( बाबुल ) मे लोग एक पुजारी की पूजा सात बार झुक कर करते हैं जो मेरे साथ अपने भजनों द्वारा युद्द ठाने हुये हैं ।”
” नाइनेवेह ( नेनवा ) मे वे एक मनुष्य को , जिसका कहना है कि उसने मेरे आन्तरिक रहस्यों को जान लिया है , ईशवर और मेरे बीच एक सुनहरी कडी मानते हैं । “
” तिब्बत में वे एक मनुष्य को , जो मेरे साथ एक बार अपनी श्क्ति आजमा चुका है , सूर्य और चन्द्र्मा के पुत्र के नाम से पुकारते हैं । “
” बाइबल्स में ईफ़ेसस औइर एंटियोक ने अपने बच्चों का जीवन मेरे विरोधी पर बलिदान कर दिया । “
” और यरुशलम तथा रोम मे लोगों ने अपने जीवन को उनके हाथों सौंप दिया , जो मुझसे घृणा करते हैं और अपनी सम्पूर्ण शक्ति द्वारा मुझसे युद्द मे लगे हुये हैं । “
” यदि मै न होता तो मन्दिर न बनाये जाते , मीनारों और विशाल धार्मिक भवनों का निर्माण न हुआ होता । “
” मै वह साहस हूँ , जो मनुष्य मे दृढ निष्ठा पैदा करता है “
” मै वह स्त्रोत हूँ , जो भावनाओं की अपूर्वता को उकसाता है । “
” मै शैतान हूँ , अजर-अमर ! मै शैतान हूँ , जिसके साथ लोग युद्द इसलिये करते हैं कि जीवित रह सकें । यदि वह मुझसे युद्द करना बंद कर दें तो आलस्य उनके मस्तिष्क , ह्र्दय और आत्मा के स्पन्दन को बन्द कर देगा …।”
” मै एक मूक और क्रुद्द तूफ़ान हूँ , जो पुरुष के मस्तिष्क और नारी के ह्र्दय को झकझोर डालता है । मुझसे भयभीत होकर वे मुझे दण्ड दिलाने मन्दिरों एवं धर्म-मठों को भाग जाते हैं अथवा मेरी प्रसन्नता के लिये, बुरे स्थान पर जाकर मेरी इच्छा के सम्मुख आत्म -समर्पण कर देते हैं ।”
” मै शैतान हूँ अजर-अमर ! “
” भय की नींव पर खडे धर्म - मठॊ का मै ही निर्माता हूँ । …..यदि मै न रहूँ तो विशव मे भय और आनन्द का अन्त हो जायेगा और इनके लोप हो जाने से मनुष्य के ह्र्दय मे आशाएं एंव आकाक्षाएं भी न रहेगीं । “
” मै अमर शैतान हूँ ! “
” झूठ , अपयश , विशवासघात , एवं विडम्बना के लिये मै प्रोत्साहन हूँ और यदि इन तत्वों का बहिष्कार कर दिया जाए तो मानव- समाज एक निर्जन क्षेत्र-मात्र रह जायेगा , जिसमें धर्म के कांटॊं के अतिरिक्त कुछ भी न पनप पायेगा । “
” मै अमर शैतान हूँ ! “
” मैं पाप का ह्र्दय हूँ । क्या तुम यह इच्छा कर सकोगे कि मेरे ह्र्दय के स्पन्दन को थामकर तुम मनुष्य गति को रोक दो ?”
” क्या तुम मूल को नष्ट करके उसके परिणाम को स्वीकार कर पाओगे ? मै ही तो मूल हूँ ।”
” क्या तुम अब भी मुझे इस निर्जन वन मे इसी तरह मरता छोडकर चले जाओगे?”
” क्या तुम आज उसी बन्धन को तोड फ़ेंकना चाहते हो , जो मेरे और तुम्हारे बीच दृढ है ? जबाब दो , ऐ पुजारी ! “
पिता इसमान व्याकुल हो उठे और कांपते हुये बोले ,
” मुझे विशवास हो गया है कि यदि तुम्हारी मृत्यु हो गयी तो प्रलोभन का भी अन्त हो जायेगा और इसके अन्त से मृत्यु उस आदर्श शक्ति को नष्ट कर देगी , जो मनुष्य को उन्नत और चौकस बनाती है ! “
“तुम्हें जीवित रहना होगा । यदि तुम मर गये तो लोगों के मन से भय का अन्त हो जायेगा और वे पूजा - अर्चना करना छोड देगें , क्योंकि पाप का अस्तित्व न रहेगा ! “
और अन्त मे पिता इस्मान ने अपने कुरते की बाहें चढाते हुये शैतान को अपने कंधें पर लादा और अपने घर को चल दिये ।
’खलील जिब्रान ’ से संबधित साहित्य को आप यहाँ , यहाँ, और यहाँ से आन लाइन पढ सकते हैं।
शनिवार को दोपहर मे अचानक क्लीनिक मे जब मोबाइल ने ध्यान भंग किया तो उधर से आवाज आई , “मै बोल रहा हूँ , पहचाने ? ” और फ़टाक से बिजली की तरह आवाज को आखिर पहचान ही लिया , यह आवाज अनूप शुक्ल जी यानि फ़ुरसतिया जी की थी . हाँ , कुछ दिन पहले होली पर ही तो इसी अन्दाज मे बात हुई थी . कहने लगे , ” अरे मै कल सुबह लखनऊ आऊगाँ और आपसे और पानी के बताशे “अनुराग भाई “ से भी मिलने आऊगाँ.” मैने सुबह अनूप जी से कहा कि आप पहले मेरे यहाँ आ जायें , फ़िर उसके बाद हम दोनो अनुराग जी के यहाँ चलेगें. लेकिन दोपहर को अनुराग ने फ़ोन पर कहा कि समय बरबाद करने से क्या फ़ायदा , हम लोग एक ही जगह यानि मेरे निवास पर मिलते हैं.
तो इस तरह शुरु हुई यह छोटी सी ब्लागारिया मुलाकात . मेर्री पत्नी ’अनिका ’से दोनो का परिचय हुआ और यह जानकर कि अनिका कानपुर से ही हैं ,अनूप भाई तो कुछ अधिक ही खुश दिखे , इन कानपुरियों के साथ बस यही दिक्कत है , जहाँ कानपुरिये देखे बत्तीसी दिखा दी
लेकिन अनूप भाई की खुशी अधिक देर तक कायम न रह पायी क्योंकि अनुराग ने अनूप जी को कानपुर का होने के नाते भाई का दर्जा दे दिया और अपने को देवर का . अब अनूप जी के सामने परेशानी कि बहन के आयें हैं तो खायें कैसे ? सबसे नीचे देखिये कि बेचारे कितने दुखी दिख रहे हैं .
खैर मान मनौवत के बाद उनको खाने को राजी कर ही लिया . नारद , जीतूभाई , समीर जी , अफ़लातून जी , पंकज और संजय बेगाणी , प्रमेन्द्र , शुएब और हमारे सम्मानित मास्साब के बारे मे खुल कर चर्चा हुई. शाम कैसे आ गयी , मालूम नही पडा , लेकिन मुझे तो क्लीनिक के लिये खिसकना था और इसके बाद यह दोनो अगले दो घटॆं तक सुना है किसी पेड के नीचे बिल्लागिरी करते पाये गये .
अनूप भाई , मै और अनुराग जी अनूप जी और अनुराग अनूप जी और मेरी पत्नी ’अनिका’
आम तौर से प्रयोग होने वाले टेफ़लोन की पर्त चढे नान स्टिक तवे आजकल गृणियों की पंसद बन चुके हैं. लेकिन अब सावधान हो जायें , क्या यह टेफ़लोन आप के जीवन मे समस्या पैदा कर सकता है ? हाँ , शायद , शोध तो कुछ ऐसा ही इशारा कर रहे हैं.
वैसे तो टेफ़लोन उच्च तपमान को बर्दाशात कर सकता है लेकिन अधिक तापमान पर इसकी पर्त टूट भी सकती है और फ़ल्स्वरुप परफ़्लूरो-औकटोनैक नाम का अम्ल खाने मे मिल सकता है. परफ़्लूरो-औकटोनैक अम्ल के चूहों पर किये गये प्रयोग दिखाते हैं कि इस अम्ल मे दमा के लक्षण उत्पन्न करने की क्षमता है . मौजूदा दौर मे जहाँ लगभग आठ बच्चों मे से एक दमा से पीडित है , यह सर्वेक्षण और शोध दमे के कारणों की ओर महत्वपूर्ण इशारा करते हैं. पूरी जानकारी के लिये देखे डेली मेल की यह रिपोर्ट
इसके पहले सन २००१ मे भी शोधकर्ताओं ने नान -स्टिक तवों से होने वाले नुकसान के बारे मे चेतावनी दी थी. देखे यहाँ
कभी-2 कुछ रोगी हमेशा एक समस्या बन जाते हैं और कभी-2 होम्योपैथिक औषधियों के परिणाम तो उससे भी अधिक आशचर्यचकित करने वाले होते हैं। अब श्रीमान ब्रीजेश को ही लें , पिछले कई सालों से अस्थमा ( bronchial asthma) से पीडित हैं और उम्र भी कुछ अधिक नहीं , मात्र 25 साल । अक्टुबर 2006 मे आप मेरे पास आये और चाहते हैं कि inhaler और bronchodilators से पूर्ण्तया छुट्कारा मिले ; जो वह कई सालों से ले रहे हैं। होम्योपैथिक तरीके से रोगी के लक्ष्णो को लिया गया जो निम्म थे :
Kent ] [Respiration]Difficult:Lying:Amel:
[Kent ] [Respiration]Difficult:Exertion:After:
[Kent ] [Respiration]Difficult:Walking:Agg:
[Complete ] [Generalities]Food and drinks:Sweets:Desires:
[Complete ] [Generalities]Food and drinks:Spices, condiments, piquant, highly seasoned food:Desires:
[Complete ] [Stomach]Heartburn:
रोगी के लक्षणों मे जो विशेष बात थी कि साँस फ़ूलने मे लेटने से आराम मिल रहा था और चलने -फ़िरने मे तकलीफ़ बहुत अधिक बढ जाती थी। इसके अलावा सीने मे जलन , खाने -पीने मे चटपटी चीजों का शौक भी था। एक बात और कि उस मौसम मे जब लखनऊ मे कोई विशेष ठंडक नही होती , वह कुछ अधिक कपडे पहने था।
रोगी जहाँ रह रहा था वह जगह स्वास्थ के लिहाज से कोई विशेष उपयुक्त नही थी, धूप का घर मे अभाव था और घर मे सीलन काफ़ी थी (hydrogenoid constitution ) ।खैर लक्षणो को रिपरटार्जेशन के लिये डाला गया और कम्पलीट रिपर्ट्री और केन्ट रिपर्ट्री की मदद ली गयी। Drug Filters को apply किया और जैसा उम्मीद थी कि Psorinum औषधि के विकल्प मे आयी । तो prescription कुछ इस तरह बना:
29-10-06 = psorinum 200 1*3 { 15 दिन मे एक बार }
nat sulph 6x 4 TDS { रोगी के hydrogenoid constitution को ध्यान रखते हुये दी गयी }
18-11-06= कोई विशेष आराम नही, औषधि बदली गई।
Nux vom 30 TDS
Nat sulph 6x
Blatta Q 10 बूंद तीन बार, आवशय्कता पडने पर { Blatta Q को palliation के लिये दिया गया ।}
22-12-06 = आराम और वह भी जब तक Blatta Q का असर रहे , जाहिर है कि यह सिर्फ़ अभी तक palliation ही था।
इस बार drug filters को apply नही करते हुये सामान्य रिपरटार्जेशन का सहारा लिया गया और दोनो रिपर्ट्री केन्ट और कम्पलीट को एक साथ प्रयोग किया गया , जिसकी आकृति नीचे है:
Ars, sulp,puls, phos मे से अब की बार phos देने का मन बनाया , क्योकि इसकी वजह नीचे दी गयी आकृति से स्पष्ट है :
25-12-06= Phosphorous 1000 {15 दिन मे एक बार }
Nat sulp 6x 4 TDS
10-1-2007= अब की बार रोगी सन्तुष्ट दिखा, इन 5 दिन के दौरान उसे न तो उसे inhalers का प्रयोग करना पडा और न तो blatta Q को लेना पडा। Wheezing न के बराबर थी और उसकी जगह crepitations ने ले ली थी।
15-1-2007= Phosphorous 1000 1*3
Nat Sulph 6x 4 TDS
22-2-2007 = Phosphorous 1000 1*3
Nat Sulph 6x 4 TDS
16-3-2007 =Phosphorous 1000 1*3
Nat Sulph 6x 4 TDS
Phosphorous 1000 ने जैसा कि अब तक लग रहा है कि फ़िलहाल रोगी को अब तक अस्थमा की समस्या से छुटकारा देने मे उपयुक्त औषधि है। अभी यह रोगी इन औषधियों का नियम से सेवन कर रहा है ।
लेकिन यह रोगी होम्योपैथिक दृष्टिकोण से मेरे लिये कई प्रशन खडे कर गया जिसका जबाब मै ढूँढ रहा हूँ ।
प्रशन 1- होम्योपैथिक मैटेरिया मेडिका मे यह कही भी वर्णित नही है कि फ़ाफ़्फ़ोरस मे साँस फ़ूलने मे लेटने से आराम मिलता है (dyspnoea > lying down )नीचे देखें। हाँ , Generalities मे अवशय लक्षण लेटने से और वह भी दायीं करवट लेटने से आराम दिलाते हैं (> Lying on right side ) और बायीं करवट से तकलीफ़ बढती है।
ऊपर आकृति न 2 मे केन्ट रिपर्ट्री इस लक्षण को कवर नही कर रहा है बल्कि कम्पलीट रिपर्ट्री मे यह आराम दिखा रहा है, यह कैसे हुआ। क्या यह clinical verification मे आया है । इसका जबाब मेरे पास नही है। लेकिन यह भी सच है कि रोगी को कम्पलीट रिपर्ट्री के भले ही clinical verification के जरिये से ही सही; रोग मे पूर्णतया आराम मिला है। इस लक्षण को मैने ग्रीस (Greece)के डा जार्ज विथेलीकोस (Dr George Vitholuks) से जबाब जानने के लिये एक हफ़्ते पहले मेल किया था और उनके जबाब की मुझे प्रतीक्षा है । इसके अलावा जो होम्योपैथिक चिकित्सक इस ब्लाग से गुजर रहे हो , वह भी मुझे बताये कि क्या वजह रही कि लक्षण मेटेरिया मेडिका मे न हiने के बावजूद रोगी को आराम दे गया। आपके उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी।
यह श्रीश ने भी मुझे कहाँ फ़ँसा दिया , आप तो टैग लगा के महोदय खिसक गये और तो और दो दिन पहले चैट रुम मे याद भी दिला गये कि भाई लिखना जरुरी है और खिसकना गुनाह ! खैर जब इतने एहतराम से बाँध ही दिया तो जबाब देने मे भलाई है। हाँ , कल समीर जी भी कुछ अलग तरह के टैग के बारे मे कह रह थे। अब यह टैग श्रीश के टैग से अलग है यह मुझे समझ मे नहीं आया, हो सकता है पिछली किसी पोस्ट मे जिक्र किया हो लेकिन इधर कुछ दिनों से नारद पर जाने का बहुत मौका नहीं मिला, एक तो मेरे पुत्र के सी बी एस सी बोर्ड के परीक्षायें होने के कारण घर पर नेट कनेक्शन कटवा के यहाँ क्लीनिक मे लगवाया लेकिन यहाँ काम मे व्यस्तता के कारण इतनी नेट की गतिविधियाँ संभव नही होती। हाँ , अलबत्ता आज मौका होली की छुट्टी के कारण अवशय लगा है और जाहिर है इसका सदुपयोग पूरा का पूरा कर रहा हूँ। कल रात क्लीनिक से निकलने के पहले पोर्टेबल फ़ायर फ़ाक्स की स्क्राप बुक मे आज के लिये कई दिन पुराने चिट्ठों को पढने के लिए सुरक्षित किया ।
वैसे कल छोटी होली के दिन मूड सुबह से ही घर पर नेट कनेक्शन न होने से बहुत खिन्न था, लेकिन जब दोपहर को अनूप जी का फ़ोन आया तो बहुत ही अच्छा लगा, हिन्दी चिट्ठाकारिता मे यही एक खास बात है कि प्रेम रूपी धागे से हिन्दी चिट्ठाकारी के वरिष्ठ सदस्य जीतू भाई , सृजन जी , अनूप जी , उन्मुक्त जी और समीर जी ने अपने कनिष्ट सदस्यों को बाँधा है इसकी मिसाल मुझे अंग्रेजी चिट्ठाकारी मे नहीं मिलती । आप सब चिट्ठाकारों को होली की बहुत-2 बधाई और अब देखूं कि श्रीश क्या फ़रमा रहे हैं : १. कम्प्यूटर पर हिन्दी टाइपिंग के बारे में सबसे पहले आपने कब सुना और कैसे, अपने कम्प्यूटर में हिन्दी में सबसे पहले किस सॉफ्टवेयर में/द्वारा टाइप किया और कब, आपको उसके बारे में पता कैसे चला ?
मुझे हिन्दी टाइपिंग के आसान औजारों के बारे मे कुछ भी नहीं मालूम था , कई साफ़्टवेएर आजमाये, सबसे पहले तो पुराने रेमिंटन तरीके से टाइप करने की सोची लेकिन वह तरीका बहुत ही उबाऊ लगा। याहू पर हिन्दी फ़ोरम का सदस्य तो बना और वहाँ साफ़्ट्वेएर का जो लिंक दिया गया उसमे भी मजा न आया। शुएब और जीतू भाई को मेल कर के आसान औजार पूछे लेकिन तब तक मै गूगल पर दोबारा सर्च करने पर श्री देवन्द्र पारख जी का हिन्दी राइटर पा चुका था , अब इसको चलाने कि समस्या थी तो एक दिन जीतू भाई ने याहू मेसेन्जर पर इसको चलाने कि विधि बतायी और तब जा कर तलाश पूरी हुई । जीतू भाई के साथ यह वार्तालाप मैने याहू 360 पर धरोहर के रुप मे रखी है , मुझ जैसे अनाडी की हिदी सीखने की कवायद देखें और मजा लें।
एक दोपहर जितेन्द् चैाधरी के साथ
Jitendra Chaudhary: namaskar ji
prabhat tandon: jitendra ji namaste apke blogs ka avlokan kar ajeeb si sukhad anubhuti hoti hai
Jitendra Chaudhary: dhanyavad
prabhat tandon: mujhe ise bhi khushee tab hoti jab main yeh mail hindi me likh raha hota
Jitendra Chaudhary: to likhiya na
Jitendra Chaudhary: aap yahoo par hai na
prabhat tandon: ha hoon
Jitendra Chaudhary: तो फिर
Jitendra Chaudhary: हिन्दी मे क्यों नही लिख़ पा रहे?
prabhat tandon: kaise likhoon type karne se eng type hota hai
Jitendra Chaudhary: ye leejiye
Jitendra Chaudhary: http://devendraparakh.port5.com/
Jitendra Chaudhary: yahan se download kariye
prabhat tandon: waiise maine abhi hindi writer download kar ke install kiya hai usme help ki kloi file nahin hai kaise use karoon
Jitendra Chaudhary: usme jaise hi aap run karoge
Jitendra Chaudhary: neeche “अ” लिख़ा हुआ आयेग
Jitendra Chaudhary: आयेगा
Jitendra Chaudhary: उसको क्लिक करियेगा
prabhat tandon: hai ayea
Jitendra Chaudhary: तो Show Keyboard map
Jitendra Chaudhary: aayega
prabhat tandon: hai hai
Jitendra Chaudhary: उसको देख़ियेprabhat tandon: ab kya karoon
Jitendra Chaudhary: बस लिख़िये
Jitendra Chaudhary: मजे से
Jitendra Chaudhary: yahoo par sirf yahi chalta hai
Jitendra Chaudhary: ek aur option hai
Jitendra Chaudhary: BARAHA
prabhat tandon: baraha kya
Jitendra Chaudhary: www.baraha.com
Jitendra Chaudhary: is se aap kai bhashaon mein likh sakte hain
Jitendra Chaudhary: lekin ye yahoo par nahi chalta
Jitendra Chaudhary: isme help file kaafi achhi hai
Jitendra Chaudhary: http://baraha.com/html_help/sdk_docs/devtrans_eng.htm
prabhat tandon: key board map se kaise likhoon usme bhi to eng type hota hai
Jitendra Chaudhary: matlab
prabhat tandon: map ke hisab se likh kar kya trnslator ko press karoon
Jitendra Chaudhary: nahi bhai
Jitendra Chaudhary: aap seedhi seedhi likhna shuru kariye
Jitendra Chaudhary: Yahoo messenger ke ander
Jitendra Chaudhary: dekhiye
Jitendra Chaudhary: neeche “अ” kaa rang kaun sa hai?
prabhat tandon: ग्रेएन
Jitendra Chaudhary: theek hai
Jitendra Chaudhary: bas likhna shuru kariye
Jitendra Chaudhary: aa to gaya na
prabhat tandon: अरे येह हिन्दि मे त्य्पे कैसे हो गय
Jitendra Chaudhary: yahi to kamaal hai
Jitendra Chaudhary: bas thora samay lagega
prabhat tandon: अप्ने कैसे किय
Jitendra Chaudhary: maine kahan kiya
Jitendra Chaudhary: aapne kiya sab
prabhat tandon: green se matlab kya
Jitendra Chaudhary: agar green hai to Hindi mein likhega
Jitendra Chaudhary: agar RED hai to English mein
prabhat tandon: oh yeh baat hai phir se try karta hoon
Jitendra Chaudhary: usme Toggle Transilator hai
Jitendra Chaudhary: usko click karne se Hindi/Englsh par switch kar sakte hain
Jitendra Chaudhary: SHIFT+PAUSE is the toggle key
prabhat tandon: toggle translator matlab
Jitendra Chaudhary: hindi 2 english and englsh 2 hindi switching
prabhat tandon: ाब संम्झ आया
Jitendra Chaudhary: ab is se aap kanhi bhi likh sakte ho
prabhat tandon: Thank u jitendra ji hum phir milenge abki correct hindi ke saath namaste
Jitendra Chaudhary: namskar
२. आपका हिन्दी चिट्ठाजगत में आगमन कैसे हुआ, इसके बारे में कैसे पता लगा, पहला हिन्दी चिट्ठा/पोस्ट कौन सा पढ़ा/पढ़ी ? अपना चिट्ठा शुरु करने की कैसे सूझी ?
हिन्दी लिखने का ही मुझे शौक था, चिट्ठाकारी का तो बिल्कुल नहीं , मैने तो हिन्दी मे कभी निबंध तक नहीं लिखे , हाई स्कूल और इन्टर बोर्ड की परीक्षाओं मे कुछ महत्वपूर्ण निंबध रट के जाता था। लेकिन जब जीतू भाई ने मुझे चिट्ठा लिखने को प्रेरित किया तो मै बडी दुविधा मे पडा कि मै क्या लिखूं , फ़िर मेरी फ़ील्ड होम्योपैथी को देखते हुये उन्होने ही राय दी कि इसी से ही पोस्ट शुरु करें। और जाहिर है कि जीतू भाई और शुएब से मैने हिन्दी चिट्ठा पढने की शुरुआत की । शुएब के चिट्ठों से मै बहुत प्रभावित था और शायद इसका कारण यह भी रहा कि मेरे धर्म संबधी अपने विचार शुएब के विचारों से मेल खाते प्रतीत होते थे। यह बात अलग कि मै हिन्दू धर्म की कुरीतियों से खिन्न था और शुएब अपने धर्म की । लेकिन वक्त गुजरने के साथ मुझे यह पक्का यकीन हो गया है कि धर्म ही मानवता का सबसे बडा दुशमन है।
३. चिट्ठा लिखना सिर्फ छपास पीडा शांत करना है क्या ? आप अपने सुख के लिये लिखते हैं कि दूसरों के (दुख के लिये क्या इससे आप के व्यक्तित्व में कोई परिवर्तन या निखार आया ? टिप्पणी का आपके जीवन में क्या और कितना महत्त्व है ?
दूसरों के दु:ख के लिये तो बिल्कुल ही नहीं , हाल की कई पोस्टों को मुझे हटाना पडा क्योंकि उनको पढने के बाद मुझे बाद मे लगा कि मुझे नहीं लिखना चाहिये या किसी का नाम नहीं खसीटना चाहिये । चिट्ठा लिखना भले ही अपनी छपास पीडा को शांत करना भी हो तब भी श्रीश आप स्वंय देखो कि आप तकनीकी क्लास लगा के हम सब को बिना माँगे सब कुछ दे रहे हो जो हम घंटो नेट पर सिर खपाने के बावजूद नहीं ढूंढ पाते । इसी तरह रवि जी, उन्मुक्त जी और भी अन्य चिठ्ठाकार जो आज दे रहे हैं, वह शायद कल की नींव ही बनेगा। होम्योपैथी से संबधित चिट्ठे से होम्योपैथिक कालेज से निकलने वाले नये चिकित्सकों को मै बहुत कुछ दे सकता हूँ जो उन्हें पुस्तकों मे नहीं मिलेगा , हो सकता है कि आज इसकी उपयोगिता वह न समझें लेकिन आने वाला कल इससे लाभान्वित होगा ऐसा मुझे विशवास है।
रही बात टिप्पणी की, बिल्कुल जरुरी है क्योंकि टिप्पणी के बगैर तो ब्लाग बिल्कुल सूना-2 लगता है।
४. अपने जीवन की कोई उल्लेखनीय, खुशनुमा या धमाकेदार घटना(एं) बताएं, यदि न सूझे तो बचपन की कोई खास बात जो याद हो बता दें।
बहुत सी , लेकिन प्रैकिट्स जब मैने 1986 मे शुरु की तब मेरी इन्टर्नशिप चल रही थी और विधिवत मुझे डिग्री नहीं मिली थी । प्रैकिटिस तो बिल्कुल शुरुआती दौर मे थी और कोई खास भी नहीं । इतवार को उस वक्त मै क्लीनिक खोलता था जबकि अधिकतर चिकित्सक छुट्टी रखते थे । एक इतवार की ही शाम को एक दम्पति अपने एक महीने के बच्चे को दिखाने के लिये लाये , उसकी हालत बहुत ही नाजुक थी और संभवत: वाइरल निमोनिया से पीडित था । कई ऐलोपैथिक चिकित्सकों का इलाज चल चुका था और दो दिन से वह किसी प्राइवेट नर्सिगं होम मे था । एटींबायोटिक , ब्रान्कोडाइलेटर और नेबुलाइजर के लगने के बावजूद भी उसकी हालत मे सुधार नही हो पा रहा था। मै वह केस लेना नही चाहता था, इसका एक खास कारण होम्योपैथी का नये रोगों मे कोई ट्रैक रिकार्ड बहुत अच्छा नही था और दूसरा कि मेरी इन्टर्न्शिप चल रही थी। बावजूद इस बात को समझाने के वह दम्पति जाने को टस से मस न हुये , उस रात शायद मैने लाइकोपोडियम 30 और आयोडियम दी थी। अगली सुबह जब मै देर से क्लीनिक आया तो बाहर बहुत भीड लगी थी, मेरी तो हवा निकल गयी, मन ही मन अपने आप को कोसा। अन्दर क्लीनिक मे आया और डरते-2 पूछा कि क्या हुआ । जब उसके परिवारजनो ने बताया कि बच्चा बिल्कुल स्वस्थ है और वह दवा को लेने आये हैं तो शायद उस क्षण को भुला पाना मेरे लिये आज तक नामुनिकन है।
५. यदि भगवान आपको भारतवर्ष की एक बात बदल देने का वरदान दें, तो आप क्या बदलना चाहेंगे/चाहेंगी ।
हर धर्म को चारदीवारी तक रखा जाये । धर्म इन्सान की व्यक्तिगत पूँजी है, वह किस मत को माननेवाला है , इससे फ़र्क नहीं पडता लेकिन धर्म को छूट देनी बिल्कुल रोक देनी चाहिये । भारत के नियम कानून भारतवासियों के लिये होने चाहिये न कि किसी धर्म विशेष के लिये।
बस इतना ही । अब मै किसको फ़ाँसू, हाँ, जीतू भाई
और शुएब
ही ठीक रहेगें । तो चन्द प्रश्न इनसे :
1- चिट्ठाकारी मे आप कैसे फ़ँसे ?
2- जब आप चिट्ठाकारी मे आये होगें तब हिन्दी लिखने के इतने औजार भी नहीं थे, तब उस वक्त किन साफ़्ट्वेएरों का प्रयोग करते थे?
3- आप दोनों बाहर दूर देश मे हैं , वहाँ के व्यक्तिगत अनुभव क्या रहे हैं?
4- और कोई भी रोचक संस्मरण बतायें?
डा किशोर शाह गायनकालोजिसट हैं और पूना मे प्रकैटिस करते हैं , चिकित्सक होने के साथ ही वह बहुत अच्छे लेखक भी है।, यह उनका एक व्यक्तिगत संस्मरण है। डा नन्दना पई ने कुछ दिन पहले यह रोचक कहानी भेजी थी, जिसका हिन्दी रुपांतरण यहाँ लिख रहा हूँ। वह कौन थी
मेरी पत्नी एक नाक, कान विशेषज्ञ हैं जब कि मै एक गायनाकोलिजिस्ट हूँ। और निकट भविष्य मे मेरा पुत्र जो एक प्रोकटोलोजिस्ट है एक यूरोलोजिस्ट डा से विवाह करने वाला है। इन सब वजह से कभी-2 अजीब सी समस्यायें खडी हो जाती है। अभी कुछ दिन पहले कि ही बात ले मेरे जानने वाले एक चिकित्सक ने गर्भ की सफ़ाई के लिये
एक मरीज और एक कान साफ़ करवाने के लिये एक और मरीज मेरी पत्नी के पास भेजा।
मैने अपने रिसपेन्शिट से यह कह दिया था कि जैसे ही आये उसको सीधे मेरे पास भेज दूँ। अब इसको क्या कहा जाये कि वह रोगी जिसका कान साफ़ होना था वह मेरी पत्नी के बजाय मेरे पास आ गई, जब कि मै समझ रहा था कि वह गर्भ गिरवाने आयी है।
अब आगे के वार्तालाप आप के सामने है-
” आइये बैठिये” मैने मुस्कराते हुये कहा, वैसे मै तभी मुस्कराता हूँ जब मुझे कोई मोटी रकम हाथ लगने वाली होती है। मरीज थोडी सकुचायी , ” आराम से बैठें “ मैने कहा।
” डा, क्या इसमे बहुत दर्द होगा।?”
“नही, बिल्कुल नही”
रोगी थोडे अब आराम से दिख रही थी और बोली, “डा , हमने घर मे सब तरह से कोशिश की, लेकिन कामयाब न हो पाये।”
मै कुछ हैरान हुआ, “क्या आप को मालूम है कि घर मे यह सब करने से बहुत गडबड हो सकती थी।”
“मैने इसको हटाने के लिये पहले ऊपर -नीचे किया लेकिन यह हटा ही नही।”
मै मुस्कराया और बोला, ” अगर यह इतना आसान होता तो हम डाक्टरों की जरुरत क्यूँ पडती ?”
उसने मुस्कराते हुये कहा , “मेरे पडौसी ने इसको ऊँगली से निकालने की कोशिश की लेकिन छेद इतना संकरा था कि उसे पिन डालनी पडी ।”
“हे भगवान” मैने कहा।
” और तो सुनिये! मेरी मां ने माचिस की तीली से भी कोशिश की लेकिन सफ़लता नही मिली।
मेरे स्वयं का रक्तचाप अब बढने लगा था और गुस्से से मेरे मुँह से बोल निकल नही पा रहे थे।
“डा मै आइंदा से क्या करुं कि यह गन्दगी दोबारा न आये।”
मै जानता था कि यह एक अंवछानीय गर्भ है, लेकिन उसे गन्दगी कहना मुझसे सहन न हुआ। मैने उससे कहा ,“आप को रात मे सावधानी रखनी चाहिये या फ़िर आप गोलियों का सहारा भी ले सकती हैं।
“तो आप का कहना है कि यह सिर्फ़ रात मे ही होता है।”
मैने उसकी बात को पकडा , ” नही-2! मेरे कहने का मतलब है किसी भी समय आप कर सकती है , जब भी आप का मूड करे, लेकिन पूरी सुरक्षा के साथ।”
अब कि बार वह कुछ परेशान सी दिखी, “इसमे मूड से क्या मतलब।”
मै उस का मतलब शायद कुछ-2 समझ रहा था , “यह हो जाता है, इसमे मूड की कोई बात नही है।”
“मेरे बाजू वाले ने राय दी कि रोड किनारे एक आदमी बैठता है ,उसको दिखा लूँ।”
“तो तुम्हारा मतलब है कि वह पिन वाला आदमी।”
“हाँ”
“तुम्हें उस पडोसी की राय नही माननी चाहिये थी।
“नही , लेकिन मैने उसकी दूसरी राय मानी। उसने मुझसे कहा कि इसमे गर्म तेल डालूँ और इन्तजार करुँ, लेकिन इस प्रयोग ने भी काम न किया।”
“लेकिन आपको अपने पति की इजाजत ले लेनी चाहिये थी।”
मुझे वह असमंजस मे दिखी , “क्या मुझे अपने पति की इजाजत लेनी पडेगी? लेकिन वह तो दुबई मे हैं। और हम पिछले एक साल से नही मिले।”
मेरी तो हवा अब सरकने लगी थी। मैने उसे फ़िर भी समझाया,“नही-2 इसमे पति की इजाजत लेने की क्या आवशयकता।”
“लेकिन क्या मै उनको फ़ोन से बता दूँ।”
मुझे समझ मे नही आ रहा था कि उसके पति को मुबारक बाद दूँ या सांतवना दूँ”
चलिये यह अच्छा हुआ कि आप जल्दी आ गयी।”
” मै तो सुबह ही आना चाहती थी लेकिन कुछ दूसरे काम आडे आ गये।”
” नही मेरा यह कहना नही था , अगर आप देर कर देती तो वह घूमने सा लगता और उसके दिल की धडकन भी सुनाई पडती।”
वह मेरी तरफ़ बडी-2 आँखे कर के देखने लगी जैसे कि वह रामसे ब्रदर्स की पिक्चर देख रही हो।”
उसके चेहरे को देखते हुये मैने कहा, “आपको थोडा सा रक्त स्त्राव होगा जो कुछ दिन चलेगा।”
वह बुरी तरह काँपने लगी, ” कितना रक्त स्त्राव होगा।”
” यह एक सिर्फ़ सामान्य मासिक धर्म से कुछ अधिक ही होगा और अधिक से अधिक एक हफ़्ते तक चलेगा।”
उसकी मन:स्थिति मुझे बहुत खराब दिखी, वह बार-2 अपने बालों को ऊँगली से लपेट रही थी , मैने बहुत नरमी से कहा, ” अब आप पलंग पर लेट जायें और कपडे ढीले कर लें।”
बस इसके बाद यह हमारे बीच आखिरी वार्तालाप था , वह बहुत तेजी से मुडी और फ़र्राटे से क्लीनिक का दरवाजा खोल कर निकल गयी।
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