होम्योपैथी-नई सोच/नई दिशायें

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कल्ब्रेथ की मैटेरिया मेडिका और फ़ार्मोकोलोजी (CULBRETH’S MATERIA MEDICA and PHARMACOLOGY)

June 1, 2008 · No Comments

 

साभार : डां मुख्तार अहमद

PDF आधारित इस e-book को डाउनलोड करने के लिये नीचे दिये लिंक पर जायें :

Part 1 :  Abies abies to Arctostaphylos (36 illustrations)
Part 2 :  Arctosraphylos (cont.) to Cannabis (33 illustrations)
Part 3 :  Capsicum to Citrus aurantium, var. sinensis (40 illustrations)
Part 4 Citrus aurantium, var. sinensis (cont.) to Ecballium elaterium (33 illustrations)
Part 5 Echinacea to Gaultheria (30 illustrations)
Part 6 :  Gaultheria (cont.) to Jateorhiza calumba (39 illustrations)
Part 7 Juglans to Nectandra (39 illustrations)
Part 8 Nepeta to Polygala senega (27 illustrations)
Part 9 Polygala senega (cont.) to Ricinus (35 illustrations)
Part 10 : Ricinus (cont.) to Styrax benzoin (41 illustrations)
Part 11 : Styrax benzoin (cont.) to Zingiber (35 illustrations)

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cold , cough & flu - an interesting flow chart

April 12, 2008 · 5 Comments

साभार : Isadore और आइरिश ग्रुप आफ़ होम्योपैथ

होम्योपैथिक थेरापियुटिक्स मे रोगों से सम्बन्धित औषधियों को उनके लक्षण के अनुसार याद रखना इतना आसान नही है । किसी भी रोग से सम्बन्धित औषधि अपने किसी खास लक्षण के अनुसार ही चुनी जाती है । फ़्लो चार्ट न सिर्फ़ समय की बचत करते हैं बल्कि व्यवाहिरक प्रयोग मे आ जाने पर अच्छी तरह से याद भी हो जाते हैं । आइरिश ग्रुप आफ़ होम्योपैथ के एक सदस्य एसाडोर ने cold, cough और flU से संबन्धित इस चार्ट को  अपलोड किया है । पी.डी.एफ़. (pdf ) आधारित इस फ़्लो चार्ट को   डाऊनलोड करने के लिये यहाँ चटका लगायें ।

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शिशुओं में दस्त और होम्योपैथी (Infantile Diarrhoea & homeopathy )

April 4, 2008 · 9 Comments

शिशुओं मे दस्तों का प्रकोप और उनसे होने वाली मृत्यु दर कई देशों की मजबूरी सा बन चुका है । W.H.O. की रिपोर्ट के अनुसर जहाँ १९७९ तक सालाना ४.५ मिलयन मृत्य सिर्फ़ शिशुओं मे दस्तों के कारण होती थी वहाँ अब यह घट कर लगभग १.६ मिलयन तक रह गयी हैं । अभी भी यह अनुपात काफ़ी अधिक हैं । होम्योपैथी औषधियों का प्रभाव इन दस्तॊं मे काफ़ी प्रभावी देखा गया है लेकिन व्यापक प्रचार-प्रसार के अभाव मे अभी भी होम्योपैथी जन साधारण से कोसों दूर है ।

दस्त ( Diarrhea ) क्या है ?

Diarrhea एक लैटिन शब्द है जिसका शब्दिक अर्थ है , ” Milk of the Anus ” ग्रीक शब्दिक अर्थ के अनुसार , ” Flow like a stream ” | ढीले औए पतले मल का बार-२ त्यागना , दस्त कहलाता है ।

कारण ( Aetiology)

  • संक्रमण : ( वायरस, बैक्टिया या परजीवी द्वारा )
  • किसी खाध पदार्थ के प्रति अधिक संवेदन्शीलता
  • किसी औषधि की प्रतिक्रिया स्वरूप

यदि दस्त का समुचित इलाज न किया जाये तो निर्जलीकरण ( शरीर मे पानी की कमी आ जाना ) हो सकती है । शरीर मे जल और अन्य द्र्व्यों की कमी के कारण मृत्यु भी हो सकती है ।

निर्जलीकरण की पहचान और लक्षण:

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दस्त से बचाव के उपाय :

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  • मल त्याग के बाद बच्चों मे सबुन से हाथ धोने की आदत डालें ।
  • खाने से पहले हथ अवशय साफ़ करें।
  • फ़ल और सब्जियाँ धो के खायें ।
  • खाध पदर्थों को ढक के रखें ।

क्या करें :

  • शिशु मे पानी की कमी को पूरा करें ।
  • शिशुओं को W.H.O. ओ.आर.एस. लगातार देते रहें ।
  • स्तनपान जारी रखें ।
  • शिशु का खाना बन्द न करें , बल्कि उसे नरम खाध पदार्थ जैसे केला , चावल , उबले आलू आदि देते रहें ।

याद रखें :

  • दस्त के सभी रोगियों का निर्जलीकरण के लिये वर्गीकरण करें । जहाँ गम्भीर निर्लजीकरण हो उसे क्लीनिक मे I.V. fluid से manage करें या अस्पताल रेफ़र करें ।
  • यदि मल मे खून आ रहा हो तो उसे पेचिश के लिये वर्गीकृत करें और औषधि के चुनाव के लिये प्लान दो को देखें ।

क्या न करें :

  • शिशु को सिर्फ़ ग्लूकोज या अकेला चीनी का घोल न दें । सिर्फ़ ग्लूकोज आधारित घोल शिशु के पेट में fermentation पैदा करते हैं जिससे बैक्टर्यिल संक्रमण की संभावनायें बढ जाती हैं ।
  • ऐसे तरल पदार्थ न दें जिसमें कैफ़ीन हो जैसे कोला या काँफ़ी ।
  • दूध या दूध से बनी वस्तुओं न दें ।

घर मे तैयार नमक-चीनी का घोल या W.H.O. ORS  में किसको चुनें :

घर मे बनाये गये नमक-चीनी के घोल मे सबसे बडी दिक्कत सही अनुपात का मिश्रण न हो पाना है जिससे या तो नमक की अधिकता हो जाती है या फ़िर चीनी का अनुपात बढ जाता है जो दोनॊ ही हालातों मे शिशु के लिये  हानिकारक सिद्द होती है । लेकिन फ़िर भी अगर O.R.S. उपलब्ध नही है तो यह तरीका कारगर है ।

बनाने की विधि :

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एक लीटर अथवा ५ ऊबले और ठंडे किये पानी मे १ छॊटा चम्मच नमक एवं ८ छॊटॆ चम्मच चीनी डालकर अच्छी तरह घोल ले और इस मिश्रण को २४ घंटॆ के अन्दर ही प्रयोग करें । बाकी बचे मिश्रण को फ़ेंक दें ।

होम्योपैथिक औषधियाँ :

शिशुओं मे आम प्रयोग होने वाकी होम्योपैथिक औषधियों की यह एक संक्षिप्त जानकारी है । [ नोट : स्वयं चिकित्सा करने की गलती न करें , आप का चिकित्सक ही आपको सही सलाह दे सकता है । ]

 1. प्लान “A”

2. प्लान “B “:

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होम्योपैथिक मैटेरिया मेडिका मे औषधियों के मध्य तुलनात्मक अधयन्न ( Comparative study of Homeopathic medicines in Materia Medica )

February 27, 2008 · No Comments

होम्योपैथिक मैटॆरिया मेडिका मे औषधि के अधयन्न करते समय लक्षणॊं को याद करना और बाद मे अन्य औषधियों से तुलना करते समय लक्षणॊं के सम्बन्ध समझना दिलचस्प है । मैटेरिया मेडिका मे हर लक्षण महत्वपूर्ण नही होते ; सामान्य से दिखने वाले लक्षण की अपेक्षा ऐसे लक्षण जो दुर्लभ हों और औषधि के स्वरुप को सामने लाते हों वह अधिक महत्वपूर्ण होते हैं । जैसे कोनियम के एक लक्षण को लें - चक्कर आना । कोनियम का चक्कर सिर घुमाने य इधर-उधर देखने से या बिस्तर पर करवट बदलने से बढता है ; यह कोई फ़र्क नही पडता कि यह चक्कर किन परस्थितियों मे आ रहा है , वह चाहे cervical spondylitis से जुडी हो या Meniere’s disease या hypertension से ।

चक्कर से संबधित अन्य औषधियों के मध्य एक रोचक तुलनात्मक पहलू देखें ।

चक्कर आये , सिर घुमाने से - conium, cal-carb, kali carb

चक्कर आये , सिर हिलाने से :- bryo, cal carb, conium

चक्कर आये , ऊपर देखने से :- pulsatilla, silicea

चक्कर आये , नीचे देखने से :- phos, spigellia

चक्कर आये , फ़ूलों की गन्ध से -Nux vom , phos

चक्कर आये , रात को जागने से या पूरी नींद न होने से : Cocculus, Nux Vom

चक्कर आये , जरा सी आवाज से :- Theridion

चक्कर आये ,अध्ययन के समय :- Nat Mur

चक्कर आये , खाना खाने के बाद :- Gratiola, nux vom, pulsatilla

चक्कर आये ,जैसे बिस्तर उलट गया हो :- conium

चक्कर आये ,बेहोशी के साथ :- nux vom

चक्कर आये ,आँखे बन्द करने पर या अन्धेरे में :- argent nit, stramonium, thyrodin

चक्कर आये ,बैठकर खडा होने पर :- bryo, phos

चक्कर आये ,बैठकर झुकने पर :-belladona

चक्कर आये ,बिस्तर से उठने पर :-bryo, chelidonium, cocculus

चक्कर आये ,झुकने पर :- bell, nux vom, puls, sulphur

चक्कर आये ,सीढियाँ चढने पर:- calc carb

चक्कर आये ,सीढियाँ उतरने पर :- borax, ferrum

चक्कर आये ,लेटने पर :- conium

चक्कर आये ,दांयें करवट लेटने से:- mur acid,phos

चक्कर आये , वायें करवट लेटने से :-iod,phos,sil

चक्कर आये ,लेट जाना पडे:- bryo, cocculus, phos, puls

चक्कर आये ,सॊने के बाद :- lachesis , petroleum

चक्कर आये ,जी मिचलाने के साथ:- cocculus ind, petroleum, chin sulph

स्त्रोत:- नैश थेरापेयुटिकस (Leaders in Homeopathic Therapeutics by Nash )

औषधियों के बीच के अन्तर समझने से औषध का चयन आसान और एक चिकित्सक का मार्ग सरल हो जाता है । अलग-२ औषधियों के मध्य तुलनात्मक अधयन्न के लिये

फ़ैरिन्टन (Farrington) ,   नैश (Nash)गौस (Gross) और  यूजिनियो ( Eugenio) की comparative मैटेरिया मेडिका अधयन्न योग्य पुस्तकें हैं ।

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समयबद्द लक्षण की वृद्दि का होम्योपैथिक औषधियों से संबध (Time of aggravation of Homeopathic remedies)

February 26, 2008 · 2 Comments

होम्योपैथिक मैटेरिया मेडिका मे संगृहीत कई औषधियों का समय से गहरा संबध है ; इन औषधियों का महत्व उन रोगियों मे तब और भी अधिक बढ जाता है जब उनके लक्षण की वृद्दि ( aggravation) समय से जुडी पायी जाती हैं । अन्य चिकित्सका पद्दति मे भले ही इन लक्षणॊं की भूमिका नगण्य ही हो लेकिन एक होम्योपैथिक चिकित्सक के लिये यह अक्सर प्रिसक्राइबिंग का आधार बन जाते हैं । उदाहरण के लिये colitis के रोगी मे सुबह नीदं खुलते ही पेट साफ़ (stool) करने के लिये भागना , या दमे के रोगी मे रात १२-२ बजे या सुबह ४-५ के बीच साँस का फ़ूलना , नाना प्रकार के ज्वर में रात गये बुखार का बढना , इत्यादि रोगों मे इन लक्षणॊं की प्रमाणिकता होम्योपैथिक औषधियों द्वारा निवारण से सिद्द होती है । संक्षेप में देखते हैं समय और होम्योपैथिक औषधियों की भूमिका :-

Ars —– 1-2 a. m. and 1-2 p. m.
Kali Carb —– 2-4 a. m.
Calc. —– 3 a. m.
Sulphur —– 3-5 a. m.(colitis में ) और 11a.m. (अत्यन्त कम्जोरी और पॆट मे खालीपन मालूम पडना -empty all gone sensation )
Nux Vom. —– 4-5 a. m.
Arn., Hep., Nux Vom. —– 6 a. m.
Bov., Bry., Eupat., Pod. —– 7 a. m.
Eupat., Pod. —– 7-9 a. m. (Fever)
Nat. Mur., Stann. —– 9-10-11 a. m. ( विशेषकर migraine और intermittent fever में )
Chin. S., Nat. Mur. —– 10-11 a. m.
Cactus, Bapt., Nat. Mur., Nux, Sulph. —– 11 a. m.
Sulph. : Weak Faint —– 11 a. m.
Lach. —– 12 Noon regularly.
Angust., Ant-t., Apis.
Ced. —– 3 p. m.
Bell. —– 3-4 p. m.
Ced. : Migraine every other day 11 a. m. ; epilepsy starts with slow Convulsions with menses ; abortion occurs at same period each time..
Aranea : Toothache, neuralgia, fever and chill —– at same hour.
Apis, Lyc., Puls. —– 4 p. m.
Kali Carb., Puls., Rhus, Thuja. —– 5 p. m.
Hep., Rhus., Sil. —– 6 p. m.
Lyc., Rhus. —– 7 p. m.
Am-m., Lac-vac-defl., Sulph. —– Every 7 days.
Ars., Carb-v., Lach., Psor., Rhus Rad., Sulph., Tub. —– Return same day, week, month, year.
Rhus Rad. —– Yearly recurrence at same hour of day.12

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रजोनिवृति महिलाओं की समस्याओं में होम्योपैथिक औषधियों के सफ़ल परीक्षण (Treating hot flushes in menopausal women with homeopathic treatment–Results of an observational study )

January 16, 2008 · 3 Comments

menopause

रजोनिवृति महिलाओं मे उत्पन्न होने वाली वह  शरीर की स्वभाविक प्रक्रिया है जहाँ मासिक धर्म ४५-५० साल की आयु मे पहुँचते-२ कम और बाद मे बन्द  हो जाता है । और इसके दौरान उत्पन्न होती हैं कई प्रतिक्रियायें जैसे चिडचिडापन , बहुत गर्मी लगना , हाथ पैर मे जलन होना,सोते समय शरीर से  पसीना आना , सेक्स से वितृष्णा होना आदि । मेडिकल भाषा मे इसे hot flushes कहा जाता है ।

When a woman reaches her late forties or early fifties, her periods grind to a halt. Menopause marks the move from the reproductive years to a cessation in fertility. This literally means that her supply of eggs, which is determined at birth, has been used up.
For some this change of life comes smoothly and all she notices is that she no longer has her periods. But for others, the change is more rocky and causes much distress with symptoms of hot flushes, night sweats, vaginal dryness and irritation, poor libido, frequent urinary tract infections, poor memory and concentration, fatigue, depression, headaches, weight gain and heart palpitations.
Nearly three-quarters of all menopausal women experience hot flushes which have been described as one of the most distressing symptoms.
Hot flushes (or hot flashes) come unexpectedly. It’s the sudden feeling of intense heat that one feels all over the face and upper body. The skin may turn red and the body starts to sweat. Hot flushes at night disturb a woman’s sleep and can be so severe as to cause the bedding to be soaked in sweat.

आठ देशों के ९९ चिकित्सकों ने औसतन ५५ वर्ष तक की ४३८ महिलाओं पर यह क्लीकल परीक्षण किये । जिन औषधियों को मूलत: प्रयोग किया उनमे  Lachesis mutus, Belladonna, Sepia officinalis, Sulphur और  Sanguinaria canadensis प्रमुख थीं ।

 

Treating hot flushes in menopausal women with homeopathic treatment–Results of an observational study

british homeopathy journal

Source: Science Direct

MF Bordet , A Colas , P Marijnen , JL Masson and M Trichard
1Boiron, Sainte-Foy-lès-Lyon, France
2Reims, France
3Ecully, France
4Lyon, France
Received 13 December 2006;  revised 19 November 2007;  accepted 19 November 2007.  Available online 11 January 2008.

Abstract
Objective

There is great controversy concerning treatment for menopausal symptoms. We evaluated homeopathic treatments for hot flushes and their effect on quality of life in menopausal women.

Methods

Open, multi-national prospective, pragmatic and non-comparative observational study of homeopathic treatments prescribed and their effectiveness, observing their impact on quality of life.

Results

Ninety-nine physicians in 8 countries took part in this study and included 438 patients with an average age of 55.

Homeopathic medicines were prescribed to all patients; 98% of the prescription lines were for homeopathic medicines. Lachesis mutus, Belladonna, Sepia officinalis, Sulphur and Sanguinaria canadensis were the most prescribed. A non-homeopathic treatment and/or food supplement prescribed for 5% of the patients.

This observational study revealed a significant reduction (p<0.001) in the frequency of hot flushes by day and night and a significant reduction in the daily discomfort they caused (mean fall of 3.6 and 3.8 points respectively, on a 10 cm visual analogue scale; p<0.001).

Ninety percent of the women reported disappearance or lessening of their symptoms, these changes mostly taking place within 15 days of starting homeopathic treatment.

Conclusions

The results of this observational study suggest that homeopathic treatment for hot flushes in menopausal women is effective. Further studies including randomized controlled trials should be conducted.

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सफ़ेद दाग और होम्योपैथी- आशा की एक किरण भाग- २ (Leucoderma & homeopathy- an ultimate hope-part-2 )

August 19, 2007 · 13 Comments

पिछ्ली पोस्ट से आगे……..

leucoderma

लियकोडर्मा या सफ़ेद दाग के प्रधान लक्षण - शरीर के चमडे के स्थान -२ पर सादा व उस स्थान पर लोम तक सफ़ेद हो जाते हैं , कभी-२ एक अंग का पूरा अंश सफ़ेद हो जाता है । इस रोग में चमडे के ऊपरी भाग का सूक्ष्म पर्दा ( dermis) केवल आक्रान्त होता है , इसलिये रोगी को शारिरक कष्ट तो अनुभव नही होता लेकिन मानसिक रुप से वह बुरी तरह से टूट जाता है । लियकोडर्मा स्पर्शाक्रमक यानि छूत का रोग नहीं है लेकिन इसके बावजूद भी विशेष कर ग्रामीण इलाकों में लियकोडर्मा के रोगियों को समाजिक बहिषकार तक झेलना पडता है ।

सफ़ेद दाग के कारण और विभिन्न चिकित्सकों के मत

causes of leucoderma

इस रोग की वास्तविक उत्पति का कारण आज तक निर्णीत नहीं हुआ है , बहुत से कारण हैं जिन्हें समय-२ पर विभिन्न चिकित्सकों ने देखा और परखा है , ऐसे ही कारणों पर नजर डालते हैं -

1- होम्योपैथी मे सफ़ेद दाग पर वयापक शोध मुम्बई के डा वडिया के हिस्से रहा । आपके अनुसार इस रोग का प्रधान कारण पेट के रोगों से संबधित है और इन रोगों मे पुराना अतिसार (chronic Amoebic dysentery )और आँतों मे कृमि (intestinal parasites) का होना प्रमुख है। आपके क्लीनिकल रेकार्ड को देखने पर 50% रोगी के मल की जाँचों मे Ent amoeba histolytica, giardia के अंडे या कृमि पाये गये। देखें यहाँ

२-परिवारिक अनुवांशिकता के सफ़ेद दाग के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं । हमारे देश मे सफ़ेद दाग की बहुतायत सोमवंश सहसर्जुन क्षत्रिय समुदाय मे अधिक पायी जाती है। देखें यहाँ (Vitiligo : a study of 998 cases attending KEM Hospital in Pune ;Tawade YV, Parakh AP, Bharatia PR, Gokhale BB, Ran )

३-मानसिक चिन्तायें, विषाद (depression), किसी तरह का सदमा(shock) ,गृह क्लेश , बेरोजगरी की समस्या के चलते मनसिक अवसद आदि भी भी इस रोग को पैदा करने मे सहायक रहे।

४- ऐसी antibiotcs जिनसे intestinal flora नष्ट हो गया , वह भी इस रोग को पैदा करने मे सहायक रही।

५- त्वचा के कई रोग जिनको एंटीबायटाकिस (antibiotcs) , स्टीरौडिस (steroids) और मलहम से दबाया गया ।

६- कुछ रोगियों मे जिनका परिवारिक यक्षमा (T.B.) का इतिहास रहा हो।

७ त्वचा का जलना, मस्से या तिल को सर्जरी से हटाना भी कभी-2 एक कारण मे देखा गया।

८- माथे पर बिन्दी का लगाना , कसे हुये कपडों का पहनना विशेष कर औरतो और युवतियो मे जहाँ कसे हुये ब्लाऊज, ब्रा, या पेटिकोट के नाडे के दबाब के चलते सफ़ेद दाग दिखे।

९- मियाज्म (Miasm) दोष- सोरा, सिफ़िलिस और साइकोसिस- ( मियाज्म (Miasm)कया है , इसके लिये यहाँ देखें

१०- जे जे हास्पिटल ,मुम्बई के डा जे श्रौफ़ ने Indian journal of medical science 1973 मे एक लेख के जरिये कुछ नये तर्क रखे। आपने पाया कि सफ़ेद दाग और कई औटो इमयून समस्यायें (auto immune disorders ) जैसे मधुमेह (diabetes), थाइरोड के कई रोग, और रक्ताभाव (pernicious anaemia) का आपस मे गहरा संबध है।

११- विटामिन बी काम्पलेक्स- कई विटामिन और खनिज तत्वों का भी मिलैनिन के उत्पादन पर असर देखा गया।

१२- ब्रेटनैक (Breathnach 1971 )ने पाया कि मिलैनिन के बनने की प्रक्रिया शरीर मे मौजूद इन्जाइम टायरोनेज (enzyme- tyrosinase ) पर निर्भर करती है और इन्जाइम टायरोनेज के बनने के लिये विटामिन की आवशयकता पडती है। इसके पहले सीव (Sieve 1965) ने विटामिन की कमी और सफ़ेद दाग के व्यापक प्रमाण दिये।

१३- खनिज तत्वों मे कापर ( copper) की catalytic activity सबसे अधिक इन्जाइम टायरोनेज (enzyme- tyrosinase ) पर देखी गयी । बाद के विशलेषणों मे पाया गया कि इन्जाइम टायरोनेज के अणु मे कापर की मात्रा 0.2% होती है और सफ़ेद दाग के रोगियों मे कापर का प्रतिशत आम लोगों की अपेक्षा कम देखा गया। ( V.C.Shah,N.J.Chinoy etc, deptt of zoology, gujrat university, Ahmedabad)
शायद यही कारण रहा कि आगरा के डा आर एस पारिख ने cuprum Acetium 6 के प्रयोग पर जोर दि्या।

१४- कुपोषण और बढती हुयी अंट-बंट (junk food) खाने की प्रवृति ने भी बच्चों मे सफ़ेद दाग की संख्या मे वृद्दि दिखाई दी , देखें यहाँ । (Behl PN, Agarwal A, Srivastava G- Etiopathogenesis of vitiligo : Are we dealing with an environmental disorder ?)

आहार और पथ्य (Diet & Regimen)

  • det.gif
  • जहाँ तक संभव हो माँसाहारी खाने का त्याग कर देना चाहिये । आधुनिकता के दौर मे खान -पान मे सब कुछ चलता है का शोर बहुत है लेकिन हम अपने तरफ़ यह नही देखते कि हम क्या खा रहे हैं। कई बीमार जानवरों के माँस के सेवन करने से नाना प्रकार के कृमि और अंडें खाने के साथ कृमिकोष (cyst) के रूप में आँतो के अन्दर चले जाते हैं।
    इसी तरह बच्चों मे अंट -संट (junk food) खाने की प्रवृति ने भी लियोकोडर्मा की बढती हुई समस्या मे इजाफ़ा किया है. 
  • l08.jpg  डा मौफ़टी के अनुसार ऐसे भोज्य तत्वों का समावेश खाने मे करना चाहिये जिनमे सोरेलिन (psoralen )की मात्रा अधिक हो जैसे चुकन्दर, गाजर, छुआरे, पालक आदि ।
  • dsc00639.jpg आटे मे से चोकर को हटाने की कवायद इधर अधिक देखी जाने लगी है , लेकिब जहाँ चोकर के तन्तु (fibre) पाचन क्रिया को आसान बनाते हैं , वही दूसरी तरफ़ शरीर मे आवशयक सोरेलिन भी सप्लाई करते हैं।
  • अमिबिक संक्रमण (Amoebiasis) और जियारडिया के संक्रमण (giardiasis) के सफ़ेद दाग के रोगियों मे प्रमाण मिलने से हमारी नजर दूषित पानी की तरफ़ भी जाती है, जहाँ तक सभव हो पानी को उबाल कर पीना चाहिये , विशेष कर लखनऊ और कानपुर जैसे शहरों के लिये तो यह बहुत ही आवशयक है।
  •  दूध या दूध से बनी वस्तुयें, खट्टे और रस भरे फ़ल भी आयुर्वेद चिकित्सा पद्दति के अनुसार हानिकारक है।

 

अगले भाग मे हम देखेगें लियकोडर्मा  पर हुये  होम्योपैथिक शोध-कार्य और साथ ही में प्रमुख होम्योपैथिक चिकित्सकों के मत ।

क्रमश: आगे जारी ……

 

संबधित पोस्ट :

1. VITILIGO & HOMEOPATHY
2. Leucoderma and Homeopathy ( सफ़ेद दाग और होम्योपैथी)
3. सफ़ेद दाग और होम्योपैथी- आशा की एक किरण -भाग-१ (Leucoderma & homeopathy- an ultimate hope -Part-1)
4.coming soon ….सफ़ेद दाग और होम्योपैथी- आशा की एक किरण -भाग-3 (Leucoderma & homeopathy- an ultimate hope -Part-3)


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सफ़ेद दाग और होम्योपैथी- आशा की एक किरण -भाग-१ (Leucoderma & homeopathy- an ultimate hope -Part-1)

August 13, 2007 · 13 Comments

  leucoderma लियकोडर्मा पर पिछली दो पोस्टों से अब की बार कुछ हट कर बात करते हैं। लेकिन यह बिल्कुल आवशयक नही कि मेरे तरीके दूसरे होम्योपैथिक चिकित्सक पसन्द करें और एक राय बनायें । सच तो यह है कि आज होम्योपैथी क्लासिकल और नान -क्लासिकल होम्योपैथी मे बुरी तरह से फ़ँस कर रह गयी है। हर चिकित्सक का औषधि देने का तरीका अलग-2 होता है , भले ही हम अपने को कितने सिद्दांत्वादी कह ले , लेकिन कही न कही हम करते वही हैं जो हम किलीनिकल प्रैकिटिस मे सीखते हैं। क्या क्लासिकल होम्योपैथी गलत है- बिल्कुल नहीं , मेरे यह लिखने का तात्पर्य यह कदापि नहीं है । हैनिमैन ने भी आर्गेनान मे अपने जीवित रहने तक छह बार सुधार किया , लेकिन उसके बाद क्या हुआ ? कुछ दिन पूर्व कलकत्ता के डां शयामल बैनर्जी ने बातों - 2 मे बहुत ही महत्वपूर्ण इशारा किया और मै डा बैनर्जी की बात से काफ़ी हद तक सहमत भी हूँ । बतौर डा बैनर्जी

“अकसर रिपर्टार्जेशन करते समय या तो पोलीक्रेस्ट औषधिया सामने आती हैं या ऐसी औषधियाँ जो कुछ मिलती हुयी या काफ़ी हद तक मिलती प्रतीत होती हु्यी या ऐसी मे वह औषधियाँ जो मियाज्म की पृष्ठभूमि से हैं लेकिन ऐसी औषधियाँ जो नयी और हाल ही मे आयी हैं वह लगभग छूट ही जाती हैं …. ”

यह बात काफ़ी हद तक सच भी है ।

 कुछ इसी तरह के विचार डां देश बन्धु वाजपेजी जी ने मेरी एक पोस्ट सेंकड प्रिसक्र्पशन और सही पोटेन्सी के चुनाव पर रखी थी । आपके अनुसार,

Since commence of Homeopathic doctrine in existence from Medicine of Experiences unto the appearance of the Organon of Medicine 6th edition, Hahnemann have changed many times his doctrine and philosophy, which he laid down in earliest period in their subsequent editions. These changes are itself proved that there is need to make much more changes in the practical way. Why we forget that Boenninghausen convinced Hahnemann for alternation of medicine rule inclusion in Organon. If you go Hahnemannian Life History and also in some writings, Hahnemann himself used and advocated alternation of two remedies at a time. Why you forget the famous trio of Boenninghausen, which is still effective in Spasmodic croup.But due to opposition of the then followers Hahnemann geared back to include this law.

हाल के दिनो मे देखें काफ़ी नयी होम्योपैथिक औषधियाँ प्रयोग के लिये तैयार हैं , लेकिन बात वही आ कर फ़ँस जाती है कि इनका उपयोग करने की जहमत कौन उठाये ।  ओ. बी. जूलियन की मैटिया मेडिका , डा घोष की ड्र्ग्स आफ़ हिन्दुस्तान, ऎन्शुट्ज की रेअर होम्योपैथिक मेडिसिन्स मे बहुत सी नयी औषधियों का समावेश है , उनको व्यवहार मे लाना तो होगा , मगर कैसे ? जब आप उनका उपयोग ही नही करोगे तो कहाँ से वह कसौटी पर उतरेगीं, जबकि इन औषधियों का कार्य कई रोगों मे अधिक त्वरित है। यही हाल बैच फ़्लावर औषधि और मदर टिन्चर के साथ भी है । डां रौजर वान वैन्डर्वुर्ड की कम्पलीट रिपर्ट्री को खोल कर देखें तो बहुत सी औषधियों के क्लीनिकल प्रमाण लियकोडर्मा मे दिखते हैं , यह बात अलग कि इनमे से अधिकांश औषधि भारत मे नही मिलती , और शायद इनका न मिलने का कारण होम्योपैथिक चिकित्सकों द्वारा नयी औषधियों के प्रति अरुचि दिखाना   है ।
लेकिन मैने पाया कि पुराने और जटिल रोगों मे अगर हम क्लासिकल और नान-क्लासिकल होम्योपैथी का संगम ले कर चलते हैं तो उनके परिणाम अधिक सुखद दिखते हैं। मै समझता हूँ कि बहुत से होम्योपैथिक चिकित्सक इनका प्रयोग सफ़लता पूर्वक कर रहे हैं लेकिन बोलने की हिमाकत नही करते क्योंकि फ़िर उनकी टाँग- खिचाई यह क्लासिकल वाले कुछ अधिक ही कर डाल देते हैं ) , तो जाहिर है कि कि मै हैनिमैन और केन्ट के तरीको से थोडा हट कर बात कर रहा हूँ, हाँ , यही सत्य है, कम से कम लियकोडरमा के रोगियों मे मै अपने ही तरीके से चलना पसन्द करता हूँ। हर साल कुछ नये रोगी लियकोडर्मा के मिलते रहते हैं , कुछ इनमे से ठीक होते हैं तो कुछ नही भी और कुछ बिना समय दिये ही जल्दी भाँगने मे भलाई समझते हैं , इतने सालों मे मै अपने कोई रिकार्ड व्यवस्थित न रख पाया लेकिन गत वर्ष होम्पैथ के case analysis साफ़्टवेऐर से लियकोडर्मा के रोगियों की सही ढँग से समीक्षा करने का मौका पडा । इस एक साल के दौरान २२ रोगी लिये गये जिनमें से ७ रोगियों ने १-२ महीने के अन्तराल पर इलाज छोडा , बाकी बचे १५ , इनमे से ७ पूर्णतया ठीक हुये और ४ को कुछ महीने के बाद मना करना पडा क्योंकि इनमे रोग  के पैच काफ़ी बडॆ थे और बाकी बचे ४ जिनका इलाज अभी चल रहा है और रोग मे कमी दिखा रहे हैं।
वैसे जब मै अपने तरीको की ही बात करूँ तो सबसे पहले रोग के प्रमुख कारण ,लियकोडर्मा रोगियों के लिये आहार और पथ्य,  विभिन्न होम्योपैथिक और दूसरी पद्दतियों के चिकित्सकों के मत और  उनके सफ़ल तरीको   पर भी एक चर्चा कर लेना आवशयक समझता हूँ। साथ ही में कुछ टिप्स B.H.M.S. छात्रॊं के लिये भी, विशेष कर रिपर्टाराजेशन करते समय आने वाली दुशवारियों और उनके हल पर भी रहेगीं । एक नजर हम डा सहगल की  ”Revolutionized Homoeopathy  यानि इन्कलाबी होम्योपैथी ” पर भी डालेगें और साथ ही मे बैच फ़्लावर पर भी एक नजर रहेगी । लेकिन यह सब देखेगें किसी दूसरी पोस्ट में ।  बास आज इतना ही !

क्रमश: आगे जारी ………

 देखें  लियकोडर्मा पर संबधित पोस्ट :

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प्रसूता मे दूध का अभाव और होम्योपैथी ( Lactation failure & Homeopathy)

July 12, 2007 · 18 Comments

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डा जयश्री जोशी एक बाल रोग चिकित्सका हैं और महाराष्ट्र के किसी ग्रामीण इलाके मे प्रैकिटिस करती हैं . एलोपैथिक चिकित्सक होने के बावजूद उनका रुझान होम्योपैथी , आयुर्वेदिक और अन्य भारतीय पद्दतियों की तरफ़ अधिक है . हाल ही मे उन्होने ”Lactation failure ’यानि “प्रसूता में दूध का अभाव ” पर एक पोस्ट लिखी थी , देखे यहाँ . कुछ होम्योपैथिक औषधियों का जिक्र उन्होने उस पोस्ट मे किया था , वह मेरे लिये लगभग नई थी , जिनका उपयोग मैने नही किया है , मै अभी तक Ricinus com Q और Lecithin 3x से काफ़ी अच्छे परिणाम निकाल रहा हूँ, इसलिये शायद किसी और नयी औषधि की तरफ़ देखने का मन न हुआ . डा जोशी ने जिन तीन का जिक्र किया था, वह निम्म हैं :
1. गैलेगा आफ़ (Galega officianlis)
2. एसपेरैगैस रेसीमोसा (Asparagus racemosa)
3. विथिनीया सोमिनीफ़ेरा या अशवगन्धा (Withania somnifera)
गत सप्ताह मुझे गैलेगा की प्रमाणिकता देखने का अवसर मिल ही गया , जुडवाँ बच्चे की एक माँ ने जब मुझसे लैक्टेशन समस्या के लिये सलाह माँगी तो हर बार की तरह मैने अपने पुराने विशवस्तों पर निर्भर रहना उचित समझा लेकिन अब कि कोई परिणाम न देखकर गैलगा देने की ठानी , मात्र ४८ घटों के अन्दर गैलगा ने यह समाधान मानो चुटकी मे कर दिया. डां जोशी , आपका धन्यवाद ! लेकिन गैलेगा को छोडकर मुझे अन्य दोनो औषधियों के क्लिनिकल प्रमाण किसी कोश मे नही मिले , यह हो सकता है कि डा जोशी के यह व्यक्तिगत अनुभव रहे हो जो उन्होने अपने रोगियों मे देकर हासिल किये. एक नजर गैलगा की तरफ़ :
1- गैल्र्गा आफ़ (Galega officianlis)

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गैलगा को होम्योपैथिक मैटेरिया मेडिका मे लाने का श्रेय डा. कैरन डी ला कैरी को जाता है . इस औषधि का उल्लेख भारत की होम्योपैथिक फ़ारमाकोपिया और यूनाईटेड स्टेस्ट्स की होम्योपैथिक फ़ारमाकोपिया में है.
होम्योपैथिक उपयोग:
भीषण कमर दर्द , अत्यन्त कमजोरी महसूस करना, रक्तभाव और पाचन क्रिया अव्यवस्थित रहने मे इसके प्रयोग सार्थक है.
इसके अलावा गैलगा का उपयोग प्रसूता मे दूध बढाने मे भी देखा गया है.
गैलगा मे ऐलकैलोडियज (alkaloids) , सैपोनिन (saponnins), फ़्लावोनोड(flavonoids) और टैनिन (tannins)पाये जाते हैं.
गैलगा का एक और उपयोग बढी हुयी शर्करा (blood sugar) को कम करने मे भी है.
पोटेन्सी : Q/1x
इस औषधि को मधुमेह के रोगियों मे प्रयोग करते समय सावधानी रखें और Q की खुराक को सेट करें.

2- ऐसपैगस रैसीमोसा ( Asparagus racemosa)
asparagus-racemosus1.jpg
3- अशवगन्धा ( Withania somnifera)
withania-somnifera.jpg
ऐसपैगस रैसीमोसा ( Asparagus racemosa) और अशवगन्धा (Withania somnifera) के लिये यहाँ देखें.

लैकेटेशन से संबधित कम्पलीट रिपर्टरी और सिन्थिसिस रिपर्टरी पर उपलब्ध संकलन को देखने के लिये नीचे दिये चित्र पर किल्क करें . ( pdf आधारित इस फ़ाइल को देखने के लिये एडोब रीडर का प्रयोग करें )
lacta.gif

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मेरी डायरी से - 1- फ़ास्फ़ोरस ( phosphorous)

April 9, 2007 · 9 Comments

कभी-2 कुछ रोगी हमेशा एक समस्या बन जाते हैं और कभी-2 होम्योपैथिक औषधियों के परिणाम तो उससे भी अधिक आशचर्यचकित करने वाले होते हैं। अब श्रीमान ब्रीजेश को ही लें , पिछले कई सालों से अस्थमा ( bronchial asthma) से पीडित हैं और उम्र भी कुछ अधिक नहीं , मात्र 25 साल । अक्टुबर 2006 मे आप मेरे पास आये और चाहते हैं कि inhaler और bronchodilators से पूर्ण्तया छुट्कारा मिले ; जो वह कई सालों से ले रहे हैं। होम्योपैथिक तरीके से रोगी के लक्ष्णो को लिया गया जो निम्म थे :
Kent ] [Respiration]Difficult:Lying:Amel:
[Kent ] [Respiration]Difficult:Exertion:After:
[Kent ] [Respiration]Difficult:Walking:Agg:
[Complete ] [Generalities]Food and drinks:Sweets:Desires:
[Complete ] [Generalities]Food and drinks:Spices, condiments, piquant, highly seasoned food:Desires:
[Complete ] [Stomach]Heartburn:

रोगी के लक्षणों मे जो विशेष बात थी कि साँस फ़ूलने मे लेटने से आराम मिल रहा था और चलने -फ़िरने मे तकलीफ़ बहुत अधिक बढ जाती थी। इसके अलावा सीने मे जलन , खाने -पीने मे चटपटी चीजों का शौक भी था। एक बात और कि उस मौसम मे जब लखनऊ मे कोई विशेष ठंडक नही होती , वह कुछ अधिक कपडे पहने था।
रोगी जहाँ रह रहा था वह जगह स्वास्थ के लिहाज से कोई विशेष उपयुक्त नही थी, धूप का घर मे अभाव था और घर मे सीलन काफ़ी थी (hydrogenoid constitution ) ।खैर लक्षणो को रिपरटार्जेशन के लिये डाला गया और कम्पलीट रिपर्ट्री और केन्ट रिपर्ट्री की मदद ली गयी। Drug Filters को apply किया और जैसा उम्मीद थी कि Psorinum औषधि के विकल्प मे आयी । तो prescription कुछ इस तरह बना:
29-10-06 = psorinum 200 1*3 { 15 दिन मे एक बार }
nat sulph 6x 4 TDS { रोगी के hydrogenoid constitution को ध्यान रखते हुये दी गयी }

18-11-06= कोई विशेष आराम नही, औषधि बदली गई।
Nux vom 30 TDS
Nat sulph 6x
Blatta Q 10 बूंद तीन बार, आवशय्कता पडने पर { Blatta Q को palliation के लिये दिया गया ।}
22-12-06 = आराम और वह भी जब तक Blatta Q का असर रहे , जाहिर है कि यह सिर्फ़ अभी तक palliation ही था।

इस बार drug filters को apply नही करते हुये सामान्य रिपरटार्जेशन का सहारा लिया गया और दोनो रिपर्ट्री केन्ट और कम्पलीट को एक साथ प्रयोग किया गया , जिसकी आकृति नीचे है:
1
Ars, sulp,puls, phos मे से अब की बार phos देने का मन बनाया , क्योकि इसकी वजह नीचे दी गयी आकृति से स्पष्ट है :
2

25-12-06= Phosphorous 1000 {15 दिन मे एक बार }
Nat sulp 6x 4 TDS
10-1-2007= अब की बार रोगी सन्तुष्ट दिखा, इन 5 दिन के दौरान उसे न तो उसे inhalers का प्रयोग करना पडा और न तो blatta Q को लेना पडा। Wheezing न के बराबर थी और उसकी जगह crepitations ने ले ली थी।
15-1-2007= Phosphorous 1000 1*3
Nat Sulph 6x 4 TDS
22-2-2007 = Phosphorous 1000 1*3
Nat Sulph 6x 4 TDS
16-3-2007 =Phosphorous 1000 1*3
Nat Sulph 6x 4 TDS

Phosphorous 1000 ने जैसा कि अब तक लग रहा है कि फ़िलहाल रोगी को अब तक अस्थमा की समस्या से छुटकारा देने मे उपयुक्त औषधि है। अभी यह रोगी इन औषधियों का नियम से सेवन कर रहा है ।
लेकिन यह रोगी होम्योपैथिक दृष्टिकोण से मेरे लिये कई प्रशन खडे कर गया जिसका जबाब मै ढूँढ रहा हूँ ।
प्रशन 1- होम्योपैथिक मैटेरिया मेडिका मे यह कही भी वर्णित नही है कि फ़ाफ़्फ़ोरस मे साँस फ़ूलने मे लेटने से आराम मिलता है (dyspnoea > lying down )नीचे देखें। हाँ , Generalities मे अवशय लक्षण लेटने से और वह भी दायीं करवट लेटने से आराम दिलाते हैं (> Lying on right side ) और बायीं करवट से तकलीफ़ बढती है।
3
ऊपर आकृति न 2 मे केन्ट रिपर्ट्री इस लक्षण को कवर नही कर रहा है बल्कि कम्पलीट रिपर्ट्री मे यह आराम दिखा रहा है, यह कैसे हुआ। क्या यह clinical verification मे आया है । इसका जबाब मेरे पास नही है। लेकिन यह भी सच है कि रोगी को कम्पलीट रिपर्ट्री के भले ही clinical verification के जरिये से ही सही; रोग मे पूर्णतया आराम मिला है। इस लक्षण को मैने ग्रीस (Greece)के डा जार्ज विथेलीकोस (Dr George Vitholuks) से जबाब जानने के लिये एक हफ़्ते पहले मेल किया था और उनके जबाब की मुझे प्रतीक्षा है । इसके अलावा जो होम्योपैथिक चिकित्सक इस ब्लाग से गुजर रहे हो , वह भी मुझे बताये कि क्या वजह रही कि लक्षण मेटेरिया मेडिका मे न हiने के बावजूद रोगी को आराम दे गया। आपके उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी।

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