Category Archives: Therapeuctics

मेरी डायरी से – एवियरी “ Aviare ”

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एवियरी को होम्योपैथिक मे लाने का श्रेय पैरिस के  डा. कार्टियर और अन्य होम्योपैथिक चिकित्सकों को  रहा । यह एवियन तपेदिक के जीवाणु से तैयार की जाती है । सन्‌ १८९६ में इन्टर्नेशनल होम्योपैथिक कान्फ़्रेन्स , पैरिस मे उन्होने यह शोध पत्र प्रस्तुत किया । इसको विस्तृत रुप से पढने के लिये देखे यहाँ । फेफड़ों के apices पर Aviaire प्रमुखता से कार्य करती है ।

एवियन तपेदिक के जीवाणु को मानव तपेदिक के जीवाणु साथ पहचान तो की गई है, लेकिन इन दोनों  nosodes के नैदानिक गुण समान नहीं हैं । यह एक अचरज की बात है कि एवियरी का उपयोग होम्योपैथिक चिकित्सकों मे लगभग नगणय सा रहा है ; संभवत:  इस औषधि की ड्र्ग प्रूविगं सम्पूर्ण रुप न होने के कारण । लेकिन फ़िर भी विशेषकर जाडे के दिनों मे शिशुओं और बच्चों में शवास संम्बन्धित संमस्याओं मे इसका उपयोग बेहद उपयोगी  है । एवियरी को अकेले भी प्रयोग किया जा सकता है और पर्यायक्रम ( alternate ) मे अन्य होम्य्पैथिक दवाओं के साथ भी । जैसे निम्म पोटेन्सी ( विशेषकर LM में ) Aconite  , ipecac , Antim Tart और अन्य औषधियों के  लक्षण अनुसार  । लेकिन पर्याक्रम में इसका कार्य अधिक बेहतर है ।

अन्य होम्योपैथिक दवाओं जैसे Bacillinum, Tuberculinum और Arsenic Iodide से इसकी तुलना की जा सकती है ।

क्लार्क की इन्साक्लोपीडिया मे एवियरी का उल्लेख है लेकिन संक्षिप्त रुप में । क्लार्क लिखते हैं :

Aviaire.
A preparation of chicken-tuberculosis introduced by Dr. Cartier and other homeopaths of Paris.
Clinical.-Bronchitis. Influenza. Measles. Phthisis.
Characteristics.-Dr. Cartier gave an account of this nosode in his paper read at the International Hom?opathic Congress, 1896 (Transactions, Part “Essays and Communications,” p. 187). Aviaire acts most prominently on the apices of the lungs, and it corresponds most closely to the bronchitis of influenza, which simulates tuberculosis, having cured several hopeless-looking cases. It has also done excellently in some cases of bronchitis following measles. The bacillus of avian tuberculosis has been identified with that of human tuberculosis, but the clinical properties of the two nosodes are not identical.
Relations.-Compare: Bacil., Bacil. t., Tuberc., Ars. i.

मेरी डायरी से – रोडोडेंड्रॉन ( Rhododendron)

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उत्तराखंड के कुमांयु मण्डल की मेरी सपरिवार यह दूसरी यात्रा थी । पिछ्ली बार नैनीताल, मुक्तेशवर , भवाली को कवर किया था और  इस बार  कौसानी लक्ष्य था । नैनीताल से कौसानी जाते समय कुछ पल रानीखेत मे बिताये । पिछ्ली बार भवाली की मार्केट मे चेस्टनेट  को देखकर उसके होम्योपैथिक और बैचफ़्लावर दवाओं मे प्रयोगों का स्मरण आ गया था ( देखें यहाँ) और इसबार  रानीखेत मे रोडोन्डून ( बुरांश ) का स्थानीय उपयोगों और उसके होम्योपैथिक प्रयोगों को देखकर यह पोस्ट लिखने का विचार आया ।

रानीखेत में अगर आप चौबटिया गार्डेन घूमने  जा रहे हो तो यहाँ पहाडी फ़ूल बुरांश का शरबत अवशय खरीदें और पीयें । यह स्वादिष्ट खट्टा मीठा स्वाद वाला शरबत है और यह हृदय रोगियों के लिए बेहद लाभकारी माना जाता है। चौबटिया गार्डेन में सेब का बगीचा है जिसे सरकार चलाती है । यहाँ फ़ैले जंगलो में  सेब , अलूचे, और आडु जैसे फ़लों की खेती की जाती है ।

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रोडोडेंड्रॉन की कई प्रजातियाँ बागवानी और औषधि के रुप में प्रयोग की जाती हैं । हिमालयी क्षेत्रों में 1500 से 3600 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाने वाला बुरांस मध्यम ऊंचाई पर पाया जाने वाला सदाबहार वृक्ष है। बुरांस के पेड़ों पर मार्च-अप्रैल माह में लाल सूर्ख रंग के फूल खिलते हैं। बुरांस के फूलों का इस्तेमाल दवाइयों में किया जाता है, वहीं पर्वतीय क्षेत्रों में पेयजल स्त्रोतों को यथावत रखने में बुरांस महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बुरांस या बुरुंश (रोडोडेंड्रॉन / Rhododendron ) सुन्दर फूलों वाला एक वृक्ष है। बुरांस का पेड़ जहां उत्तराखंड का राज्य वृक्ष है, वहीं नेपाल में बुरांस के फूल को राष्ट्रीय फूल घोषित किया गया है। गर्मियों के दिनों में ऊंची पहाडिय़ों पर खिलने वाले बुरांस के सूर्ख फूलों से पहाडिय़ां भर जाती हैं।

रोडोडेंड्राँन (Rhododendron), झाड़ी अथवा वृक्ष की ऊँचाईवाला पौधा है, जो एरिकेसिई कुल (Ericaceae) में रखा जाता है। इसकी लगभग 300 जातियाँ उत्तरी गोलार्ध की ठंडी जगहों में पाई जाती हैं। अपने वृक्ष की सुंदरता और सुंदर गुच्छेदार फूलों के कारण यह यूरोप की वाटिकाओं में बहुधा लगाया जाता है। भारत में रोडोडेंड्रॉन की कई जातियाँ पूर्वी हिमालय पर बहुतायत से उगती हैं। रोडोडेंड्रॉन आरबोरियम (Rhododendron arboreum ) अपने सुंदर चमकदार गाढ़े लाल रंग के फूलों के लिए विख्यात है। पश्चिम हिमालय पर कुल चार जातियाँ इधर उधर बिखरी हुई, काफी ऊँचाई पर पाई जाती हैं। दक्षिण भारत में केवल एक जाति रोडोडेंड्रॉन निलगिरिकम (R. nilagiricum) नीलगिरि पर्वतपर पाई जाती है। इस वृक्ष की सुंदरता के कारण इसकी करीब 1,000 उद्यान नस्लें (horticultural forms) निकाली गई हैं।

सामान्यत: प्रयोग होने वाली रोडोन्ड्रोन की प्रजातियाँ हैं :

1. Rhododendron anthopogon Family: Ericaceae (Heath Family)
2. Rhododendron arboreum Family: Ericaceae (Heath Family)
3. Rhododendron aureumRosebay Synonym: Rhododendron chrysanthum, Family: Ericaceae (Heath Family)
4. Rhododendron campanulatum Family: Ericaceae (Heath Family)
5. Rhododendron ferrugineumAlpenrose Family: Ericaceae (Heath Family)
6. Rhododendron griersonianum Family: Ericaceae (Heath Family)
7. Rhododendron indicumRhododendron Synonym: Azalea indica, Family: Ericaceae (Heath Family)
8. Rhododendron japonicum Synonym: Rhododendron metternichii, Family: Ericaceae (Heath Family)
9. Rhododendron kaempferi Family: Ericaceae (Heath Family)
10. Rhododendron lapponicumLapland Rosebay Family: Ericaceae (Heath Family)
11. Rhododendron lutescens Family: Ericaceae (Heath Family)
12. Rhododendron luteumHoneysuckle Azalea Synonym: Azalea pontica, Rhododendron flavum, Family: Ericaceae (Heath Family)
13. Rhododendron maximumRosebay Rhododendron Synonym: Rhododendron procerum, Family: Ericaceae (Heath Family)
14. Rhododendron molleChinese Azalea Synonym: Azalea mollis, Azalea sinensis, Rhododendron sinense, Family: Ericaceae (Heath Family)
15. Rhododendron mucronulatum Family: Ericaceae (Heath Family)
16. Rhododendron ‘PJM’ Family: Ericaceae (Heath Family)
17. Rhododendron ponticumRhododendron Synonym: Rhododendron lancifolium, Rhododendron speciosum, Family: Ericaceae (Heath Family)
18. Rhododendron x praecox Family: Ericaceae (Heath Family)

रोडोडेंड्रॉन का आयुर्वेदिक पद्द्ति मे उपयोग :

प्राचीन काल से ही बुरांश को आयुर्वेद में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। रोडोडेन्ड्रोन प्रजाति के इस पेड़ में सीजनल बुरांश के लाल, सफेद, नीले फूल लगते हैं। लाल फूल औषधि गुणों से भरपूर हैं। खास कर हृदय रोग से पीड़ित लोग के लिये यह वरदान है । जबकि शारीरिक विकास व खूनी की कमी में बुरांश का जूस व इससे तैयार उत्पाद अचूक औषधि का काम करती है। खांसी, बुखार जैसी बीमारियों में भी बुरांश का जूस दवा का काम करता है

रोडोडेंड्रॉन का  होम्योपैथिक मैटेरिया मेडिका मे प्रयोग :

होम्योपैथिक उपयोग के लिये रोडोन्ड्रोन फ़ेरूजीनीम (Rhododendron ferrugineum )  से बनाई जाती है । यह अधिकाशंतया साइबेरिया के पर्वत शिखरों पर उगती है ।  इस वनस्पति की शुष्क पत्तियों से इसका मूल अर्क तैयार किया जाता है ।

यह औषधि आमवाती ( rheumatic ) तथा गठियाबाती रोगों ( osteoarthritis )  रोगों मे व्यापक प्रयोग की जाती है ।रोडोडेंड्रॉनके लिये सार्वाधिक चारित्रिक संकेत गरज वाले तूफ़ान से पूर्व इसकी वृद्धि से है । यह वृद्धि नम मौसम से उतनी अधिक नही होती जितनी वातावरण मे विद्धुतीय परिवर्तनों के कारण । migratory rhematic सूजन में और अधिकतर लघु ( small joints ) को अधिक प्रभावित करती है । arthritic nodes पर इसका व्यापक असर है । विश्राम के दौरान वृद्धि और गति मे सुधार इसकी मुख्य modalities है ।

रोडोडेंड्रॉन बहुत अधिक स्मृति ह्वास से चारित्रिक है । वह लिखते हुये शब्दों को छोड देता है । हम इसको विचारों का लुप्त होना भी पाते  हैं । यह बोलने की क्रिया मे अचानक रुकावट से स्पष्ट होता है , रोगी प्राय: अचानक वार्तालाप बन्द कर देता है ताकि वह अपनई विचारधारा को स्मरण करने मे समर्थ हो सके ।

रोडोडेंड्रॉन  Tinnitus Aurum ( कानोंमे आवाज के साथ चक्कर ) मे भी यह प्रयोग की जाती है । बिस्तर पर लेटनेसे अचानक सिर मे चक्कर शुरु हो जाता है

रोडोन्ड्रोन का अन्य  मुख्य उपयोग अंडकोष ( Orchitis )  की नई और पुरानी सूजन के लिये भी है । मुख्यत यह बाये अडंकोष को प्रभावित करती है । अडंकोष लगता है कि जैसे खिचे हुये हों , ग्रंथि मे ऐसी अनूभूति होती है जैसे कुचल दी गई हो । Hydrocoele की आरंभिक स्थति में इसका प्रयोग सार्थक है ।

रोडोडेंड्रॉन आरबोरियम (Rhododendron arboreum )  का होम्योपैथिक परीक्षण नही किया गया है । लेकिन इसके तमाम गुणॊं को देखते हुये इसकी भी प्रूविगं CCRH को करवानी चाहिये ।

लेकिन अगली बार अगर आपका प्रोग्राम रानीखेत का बने तो रोडोडेंड्रॉन आरबोरियम (Rhododendron arboreum )  या बुरांश के शरबत का स्वाद लेना न भूलें Smile

वाइरल संक्रमण और होम्योपैथी-खसरा,छॊटी माता और कर्ण-मूल

Reblogged from होम्योपैथी-नई सोच/नई दिशायें:

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बदलता हुआ मौसम , बारिश के पानी मे भीगना, रिमझिम फ़ुआरों का आनन्द किसे नही डोल देता, लेकिन उसके साथ लेकर आता है तमाम तरह के वाइरल संक्रमण । फ़िर उसके साथ हमारे नगर निगमों की मेहरबानी जो नल के पानी के साथ प्रदूषित पानी देना अपना फ़र्ज समझते है, वह भी् विभन्न तरह के वाइरल और बैक्टीरियल संक्रमणों के जिम्मेदार होते है। वाइरल संक्रमण कोई आवशयक नही कि बारिश के मौसम की ही मार हो, होली के आसपास और अन्य महीनो मे खसरा, छोटी माता, कर्णमूल, इनफ़लूनजा, डेंगू बुखार का हो जोर या फ़िर प्रदूषित पानी की वजह से पीलिया , मियादी बुखार जो कि मूलभूत बैक्टीरियल संक्रमण है आम इन्सान की जिन्दगी को तंग करते रहते हैं।

Read more… 22 more words

एक पुरानी पोस्ट की याद आ गयी जो वाइरल संक्रमण विशेषकर खसरा , छॊटी माता और कर्ण मूल पर कई साल पहले लिखी थी । होली के बाद लखनऊ मे जिस तरह से खसरा , चेचक और कर्णमूल के केस बढॆ हैं , एक बार फ़िर होम्योपैथिक थेरापिटिकस को स्मरण करने की आवशयकता पड गयी है ।

व्यक्तित्व विकास, शारीरिक भाषा और होम्योपैथी – एक अभिनव अवधारणा ( Constitutional Prescribing ,Body Language and Homeopathy )

होम्योपैथिक प्रिसक्राबिंग मे विवधिता अकसर देखी जा सकती है । लगभग हर चिकित्सक का औषधि सेलेकशन अन्य से भिन्न ही दिखता है । एक उचित सिमिलमम को सर्च करने के लिये कई  चिकित्सक सम्पूर्ण लक्षण ( totality of symptoms ) लेने पर यकीन करते है , कई मियाज्म (miasm ) आधारित प्रिसक्र्पशन पर पर , कुछ उन अनोखे लक्षण  को  तलाशते हैं ( rare , uncommon & striking symptoms ) जो रोग के सामान्य लक्षण से अलग दिखता है ; कई डां सहगल के तरीकों का अनुकरण करते हुये सिर्फ़  मानसिक लक्षण पर  प्रिसक्राइब करते हैं और कई डां प्रफ़ुल्ल विजयकर  का अनुकरण करते हैं जिनमें  रोगी की गतिविधि, ठंडक और गर्मी से सहिषुण्ता/असहिषुणता ( thermal ), प्यास और शारीरिक या मानसिक लक्षण में  बदलाव औषधि सेलकशन के लिये पर्याप्त मापदंड रहता है ।

  इनमे से वह भी हैं जो शरीर की भाषा ( Body language )  और Constitution को आधार मानकर प्रिसक्राबिग  करते हैं । शारिरिक भाषा हमारे चारों तरफ है. यह एक दिलचस्प विषय है और एक है रोमांचकारी अनुभव भी । शारिरिक भाषा मौखिक संचार में तो एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती ही है लेकिन  एक होम्योपैथ के लिये तो रोगी की शारिरिक भाषा को समझना और भी आवशयक हो जाता है । भले ही रोजमर्रा की जिदंगी मे इसकी कोई अहमियत न हो लेकिन अगर हम नैदानिक(clinical) बिदुं से अगर हम उसका उपयोग करे तो उसके प्रयोग सार्थक सिद्ध होते है ।

pt in clinic

रोगी का परमार्श कक्ष मे प्रवेश करना , उसका उठना/बैठना , वार्तालाप करते समय उसके चेहरे के हाव भाव आदि एक उचित सिमिलिमम की आवशयकताओं को पूरा करते हैं ।  इसकी उपयोगिता सिर्फ़ किताबी ज्ञान तक ही सीमित नही है बल्कि यह अन्य क्षेत्रों भी उपयोगी है जैसे :

  • एक तरफ़ा रोगों मे जहाँ लक्षण न के बराबर दिखाई पड्ते हों ।
  • मनश्चिकित्सीय रोगियो में
  • बाल रोगों मे
  • विरोधाभासी लक्षणॊं मे
  • बहरे, गूंगे और मन्द बुद्दि रोगियों मे
  • समृद्ध और जटिल मेटेरिया मेडिका और रेपर्टिरी के अध्यन्न को सरल बनाने मे ।
  • शरीर की भाषा की मदद से रुब्रिक्स को समझने मे ।
  • और सबसे मुख्य बात कि यह बहुत बहूमूल्य  समय बचाता है ।

इसी तरह Constituitional  प्रेसक्राइबिग की भी होम्योपैथिक औषधि चुनाव  मे एक महत्वपूर्ण भूमिका है ।   होम्योपैथिक आधारित constituition का तात्पर्य एक इन्सान के मानसिक और शारिरिक व्यक्तित्व  को परिभाषित करना है । लेकिन यह भी एक सत्य है कि इसकी बुनियाद हैनिमैन ने नही रखी । गैलन (130-200 ई.पू.) और हिप्पोक्रेट्स (400 ई.पू.)  ने मनुष्य के व्यक्तित्व को समझने का प्रयास किया । जहाँ हिप्पोक्रेट्स (400 ई.पू.) का मानना था कि शरीर चार humors अर्थात रक्त,कफ, पीला पित्त और काला पित्त से बना है. Humors का असंतुलन, सभी रोगों का कारण है . वही गैलन Galen (130-200 ई.) ने इस शब्द  का इस्तेमाल  शारीरिक स्वभाव के लिये किया , जो यह निर्धारित करता है  कि शरीर  रोग के प्रति किस हद तक संवेदन्शील है । हिप्पोक्रेट के  Humour शब्द का तात्पर्य शरीर मे प्रवाहित हो रहे तरल पद्दार्थ से था हाँलाकि यह तकनीकी रुप से यह प्रचलित भावनाओं से जुडा था जैसे :

  • प्रसन्नता या खुशी का रक्त से संबध – सैन्गूयूनि टेम्परामेन्ट (Sanguine Temperament)
  • कफ़ का चिंता और मननशीलता से संबध – फ़ेलेगमेटेक ( phlegmatic Temperament)
  • पीले पित्त का क्रोध से संबध – कोरिक (Choleric Temperament)
  • उदासी का काले पित्त से – मेलोन्कोलिक (Melancholic Temperament)

hippocratic temperament

4 humours in respective order: choleric, melancholic, phlegmatic, and sanguine

इन चार स्वभावों को हम एक सक्षिप्त  उदाहरंण से  आसानी से समझ सकते हैं । एक होटल मे चार मित्र  सूप पीने जाते है । लेकिन अचानक चारों की नजर सूप मे तैरते बाल की तरफ़ पड जाती है  पहला  मित्र देखते ही आग बबूला हो उठा , गुस्से से उसने सूप का प्याला वेटर के मुँह पर दे मारा ( Choleric ) , दूसरे ने मुँह बनाया  अपने कोट को झाडा और सीटी बजाता हुआ निकल गया (Sanguine) , और तीसरा रुँआसा सा हो गया और बोला कि यह सब उसी की जिदंगी मे अक्सर क्यूं होता रहता है (Melancholic ) और चौथा मित्र तो बडे दिमाग वाला निकला , सूप मे से बाल को किनारे किया ;सूप पिया और वेटर से नुकसान हुये सूप के बदले दूसरे सूप की फ़रमाईश भी कर डाली ( phlegmatic)

इन चार स्वभावों को देखने  से यह लगता है कि अमुक स्वभाव अच्छा या बुरा होता है , लेकिन  ऐसा नही है , प्रत्येक स्वभावों के धन पक्ष भी है और ॠण पक्ष भी । हाँ उचित सिमिलिमन से हम उन कमजोरियों को कम अवशय कर सकते हैं या यो कहें कि  ॠण पक्ष  को धन पक्ष मे बदल सकते हैं ।

एक नजर देखते हैं इन चार स्वभावों मे धन पक्ष और ॠण पक्ष की :

सैन्गूयूनि टेम्परामेन्ट (Sanguine Temperament):

धन पक्ष : हमेशा प्रसन्न रहने वाले, आत्मविशवास से भरपूर , आशावादी , बहिर्मुखी और जीवन को जीने वाले ।

ॠण पक्ष :आत्मसंतोष की कमी , संवेदन्शील, अल्पज्ञता, अस्थिरता, बाहरी दिखावा करने वाले और ईर्ष्या को झुकाव ।

फ़ेलेगमेटेक टेम्परामेन्ट ( phlegmatic Temperament) :

धन पक्ष :   अच्छी तरह से संतुलित,  जीवन के साथ संगत, भरोसेमंद, रचनात्मक और विचारशील, संतुष्ट

ॠण पक्ष : आलसी, अकर्मण्य . अपने  कर्तव्य की उपेक्षा ,  दुविधाग्रस्त, अपने कर्तवों  को टालने वाले , महत्वाकांक्षा विहीन ,  दूसरों को भी प्रेरित न कर पाना

कोरिक टेम्परामेन्ट (Choleric Temperament) :

धन पक्ष : मजबूल इच्छाशक्ति वाले , दुनिया को अपने तरीके से चलाने वाले , आत्मविशवास से भरपूर

ॠण पक्ष : प्रचंड गुस्सा , अपने को श्रेष्ठ समझना , विरोधों को सहन न कर पाना , सहानभूति का अभाव , जीवन मे छ्ल , कपट और पाखंड का सहारा लेना

मेलोन्कोलिक टेम्परामेन्ट (Melancholic Temperament) :

धन पक्ष : प्रतिभाशाली, बेहद रचनात्मक , संवेदनशील, सपने देखने वाले , अतंर्मुखी, विचारशील,  आत्म त्याग की भावना से भरपूर , जिम्मेदार, विश्वसनीय

ॠण पक्ष : चिंता और अवसाद ग्रस्त , अपनी प्रतिभा का कम उपयोग करने वाले , मुखरता की कमी , आसानी से किसी को माफ़ न कर पाना , बेहद संवेदनशील


मन और शरिरिक गठन की गहरी जडॆं
पाइथागोरस से जुडी हैं
उदर हिप्पोक्रेट्स से
शाखायें पेरासेलसस में
और फ़ल वास्तव मे हैनिमैन से जुडॆ हैं ।

हैनिमैन की प्रशंसा करनी होगी कि उन्होने Hippocratic temperaments और humors को मैटेरिया  मेडिका मे एकीकृत कर के हमे यह दिखाया  कि हम किसका इलाज कर रहे हैं और वह किस से पीडित है ।
आर्गेनान आफ़ मेडिसन मे हैनिमैन लिखते हैं :
HAHNEMANN

Aphor .211

This is true to such an extent, that the state of patient’s Mind and Temperament (Gemuethszustand) is often of most decisive importance in the Homoeopathic selection of a remedy, since it is a sign possessing a distinct peculiarity, that should least of all escape the accurate observation of the physician.

यह बात किसी सीमा तक सही और सत्य है कि रोगी की मानसिक दशा रोग के लिये उपयुक्त औषधि चुनने मे बहुत सहायक होती है । जो चिकित्सक सावधानी के साथ इस निर्णायक मानसिक लक्षण पर दृष्टि रखतेहैं उनकी तीक्ष्ण नजर से रोगी के रोग का कोई भी लक्षण छिपा नही रह सकता |

क्लीनिकल प्रकैटिस मे Constituitional prescribing की भूमिका :

रोगी को देखते हुये मूल स्वभाव को तो हम देखते ही हैं लेकिन रोग ग्रस्त मनुष्य में जब वह स्वभाव मूल  से भिन्न दिखाई पडता है तो उसकी भूमिका और भी अधिक बढ जाती है । जैसे  एक कैल्कैरिया कार्ब का रोगी जो phlegmatic स्वभाव का है किसी कारण वश बहुत उग्र हो जाता है ( Choleric)  तो उसका यह भिन्न स्वभाव दवा का  सेलेक्शन मे भिन्न्ता ला सकता है । इसी तरह मृदु भाढी पल्साटिला नारी तनाव को झेलने मे अपने को असहज  पाती है तो उसमे होने वाले स्वभावों मे अन्तर दवा के चुनाव मे फ़र्क डाल सकते हैं ।

लुक डि फ़िशर ने Hahnemann Revisited पुस्तक  मे एक उदाहरण के जरिये सचित्र इसको समझाया है ।

एक फ़ास्फ़ोर्स व्यक्त्तित्व का इन्सान जो अपनी यात्रा अपने ही व्यक्तित्व मे न कर पाया । कारण समय-२ उसके जीवन  चक्र मे आने वाले परिवर्तन ।  चित्र पर किल्क करें और देखें ।

रोगी मे आने वाले स्वभावों मे अन्तर मानसिक लक्षणॊं की श्रेणी मे आते हैं । और दवा चुनाव मे वह अपनी वरियता सबसे ऊपर रखते हैं । नये रोगों ( acute diseases ) मे इनकी भूमिका भले ही बहुत न हो लेकिन जटिल और पुराने रोगों मे यह दवा चुनाव मे महत्वपूर्ण आधार बनते हैं ।

§ 5

HAHNEMANN Useful to the physician in assisting him to cure are the particulars of the most probable exciting cause of the acute disease, as also the most significant points in the whole history of the chronic disease, to enable him to discover its fundamental cause, which is generally due to a chronic miasm. In these investigations, the ascertainable physical constitution of the patient (especially when the disease is chronic), his moral and intellectual character, his occupation, mode of living and habits, his social and domestic relations, his age, sexual function, etc., are to be taken into consideration.

सूत्र ५-रोग के मूल कारण की खोज

रोग नया हो या पुराना चिकित्सक को बीमारी के मूल कारणॊं की खोज करना नितान्त आवशयक  है । नये रोगों मे रोग उत्पन्न करने और रोग को उत्तेजना देने वाले कारणॊं पर तथा पुरानी बीमारियों मे रोग के इतिहास पर चिकित्सकों को बहुत अधीरता और सावधानी से विचार करना चाहिये क्योंकि ऐसा करने पर ही रोग के मूल कारण का पता लग सकता है । वस्तुत: चिकित्सक को रोगी की शरीर रचना और प्रकृति – गठन , शक्ति , स्वभाव , आचरण , च्यवसाय , रहन सहन , आदतें , समाजिक तथा परिवारिक संबन्ध , आयु, ज्ञान्निद्र्यों के व्यवाहार पर पूरी तरह से विचार कर लेना चाहिये ।

    § 213

    We shall, therefore, never be able to cure conformably to nature – that is to say, homoeopathically – if we do not, in every case of disease, even in such as are acute, observe, along with the other symptoms, those relating to the changes in the state of the mind and disposition, and if we do not select, for the patient’s relief, from among the medicines a disease-force which, in addition to the similarity of its other symptoms to those of the disease, is also capable of producing a similar state of the disposition and mind.1

    1 Thus aconite will seldom or never effect a rapid or permanent cure in a patient of a quiet, calm, equable disposition; and just as little will nux vomica be serviceable where the disposition is mild and phlegmatic, pulsatilla where it is happy, gay and obstinate, or ignatia where it is imperturbable and disposed neither to be frightened nor vexed.

सूत्र २१३ – रोग के इलाज के लिये मानसिक दशा का ज्ञान अविवार्य

इस तरह , यह बात स्पष्ट है कि हम किसी भी रोग का प्राकृतिक ढंग से सफ़ल इलाज उस समय तक नही कर सकते जब तक कि हम प्रत्येक रोग , यहां तक नये रोगों मे भी  , अन्य लक्षणॊं कॆ अलावा रोगी के स्वभाव और मानसिक दशा मे होने वाले परिवर्तन पर पूरी नजर नही रखते । यादि हम रोगी को आराम पहुंचाने के लिये ऐसी दवा नही चुनते जो रोग के सभी लक्षण  के साथ उसकी मानसिक अवस्था या स्वभाव पैदा करनेच मे समर्थ है तो रोग को नष्ट करने मे सफ़ल नही हो सकते ।

सूत्र २१३ का नोट कहता है :

ऐसा रोगी जो धीर और शांत स्वभाव का है उसमे ऐकोनाईट और नक्स कामयाब नही हो सकती , इसी तरह एक खुशमिजाज नारी मे पल्साटिला या धैर्यवान नारी मे इग्नेशिया  का रोल नगणय ही  रहता है क्योंकि यह रोग और औषधि की स्वभाव से मेल नही खाते ।

यही कारण है कि  पोलिक्रेस्ट होम्योपैथिक दवाओं अपना अलग-२ स्वभाव  को दिखलाती हैं । हिपोक्रेट के इस विभाजन को हैनिमैन , केन्ट , हेरिंग और ऐलेन ने मैटेरिया मेडिका मे जगह –२ प्रयोग किया है । जैसे पल्साटिला के बारे मे हैनिमैन लिखते हैं , “ Pulsatilla  is suited to a low , tearful , changeable , plegmatic temparemt “ और फ़ास्फ़ोरस के बारे मे लिखा “ quick movements , rapid resolutions , and a cheeful mood are more often found in phosphorous . औषधियों के स्वभावों को जानने के लिये मैटेरिया मेडिका का अध्यन्न तो अनिवार्य शर्त है और उससे बढकर रिपर्टेरी मे MIND SECTION मे चिन्हित उन रुब्रिक्स को समझना और रोगी की भाषा मे बदलने की माहरत होनी चाहिये ।

Visible Code” in Repertorial Perspective – Important Rubrics

Mind Chapter

1. Activity, Mental

2. Actions, behaviour

3. Agony, anguish

4. Alert, mentally

5. Anger

6. Answers, general

7. Antics, plays

8. Anxiety

9. Automatic, behaviour

10. Aversion, general

11. Awkward

12. Bashful

13. Bites

14. Boredom, ennui

15. Busy

16. Caressed, agg.

17. Cheerful

18. Childish, behaviour

19. Clinging

20. Clothed, improperly

21. Crying

22. Dancing

23. Faces, makes

24. Frown, disposed to

25. Gestures, makes

26. Gloomy, morose

27. Grimaces, makes

28. Hatred feelings

29. Hurried

30. Hyperactive, children

31. Impolite

32. Indifference

33. Kicking, behaviour

34. Laughing, behaviour

35. Laziness, indolence

36. Moaning

37. Mocking

38. Plays, with his fingers

39. Rage

40. Restlessness

41. Screaming, shrieking

42. Serious, behaviour

43. Shameless

44. Sighing, emotional

45. Singing

46. Sit, inclination to

47. Sits, general

48. Speech, general

49. Smiling

50. Suspicious

51. Sympathetic

52. Torpor

53. Violent, behaviour

54. Walking, behaviour

55. Washing, hands

56. Whistling

57. Witty

58. Yielding

(II) Children chapter

(III) Legs

(IV) Limbs

(V) Generals

 source : murphy repertory

courtesy : Dr Rajoo Kulkarani -body language and homeopathy PPS cure 7

मैटेरिया मेडिका और रिपर्ट्री मे इन चार constitutions से संबधित रुब्रिकस और औषधियों के बारे मे विस्तार से ग्रुप दिये हैं जैसे synthesis में : :source -synthesis 9

  • सैन्गूयूनि टेम्परामेन्ट (Sanguine Temperament):  Rubric mentioned under cheerful/confident/optimistic
  • फ़ेलेगमेटेक टेम्परामेन्ट ( phlegmatic Temperament) : Rubric mentioned under dullness /indifference/slowness
  • कोरिक टेम्परामेन्ट (Choleric Temperament) : passionate
  • मेलोन्कोलिक टेम्परामेन्ट (Melancholic Temperament) : despair/ grief / sadness

 

संभावित औषधियाँ : source -murphy repertory :

 Constitutions – CHOLERIC, constitutions
acon. ars. aur. BRY. carb-v. Caust. CHAM. coff. FERR. Hep. HYOS. kali-p. Kalm. Lach. Lyc. nat-m. Nit-ac. NUX-V. Phos. Plat. sec. Sil. sulph.

 Constitutions – SANGUINE, constitutions
Acon. ars. aur. Calc. calc-p. Cham. chin. Chinin-s. Coff. FERR. HYOS. Ign. murx. Nit-ac. Nux-v. PHOS. plat. Puls. Sang.

 Constitutions – PHLEGMATIC, constitutions
aloe Am-m. ant-t. Bell. calad. CALC. Caps. Chin. Clem. cocc. cycl. Dulc. ferr-p. hep. kali-bi. kreos. Lach. Merc. mez. Nat-c. Nat-m. PULS. seneg. Sep.

 Constitutions – MELANCHOLIC, constitutions
Acon. anac. AUR. Aur-m. bell. Bry. Calc. chin. cocc. Colch. Graph. IGN. Lach. Lil-t. Lyc. murx. NAT-M. Plat. PULS. Rhus-t. staph. stram. Sulph. verat.

 

 pkt 2

Blog Author ( ब्लाग रचयिता ) : डा. प्रभात टन्डन
जन्म भूंमि और कर्म भूमि लखनऊ !! वर्ष १९८६ में नेशनल होम्योपैथिक कालेज , लखनऊ से G.H.M.S. किया , और सन १९८६ से ही इन्टर्नशिप के दौरान से ही प्रैक्टिस मे संलग्न .. वर्ष १९९४ मे P.H.M.S. join करते-२ मन बदला और तब से प्राइवेट प्रैक्टिस मे ………. आगे देखें

Clinic : Meo Lodge , Ramadhin Singh Road , Daligunj , Lucknow
E mail : drprabhatlkw@gmail.com
Landline No : 0522-2740211. 0522-6544031
Mobile no : xxxxxxxxx

मेरी डायरी – लखनऊ मे कहर बरपाता डॆंगूं

कम से कम मैने  अपनी २४ साल  की प्रैकिटिस मे किसी भी रोग का इतना विकराल रुप न देखा । कारण जो भी हों इस माहमारी फ़ैलने के लेकिन सच यह है कि होम्योपैथी को छॊडकर अन्य पद्दतियों का रोल केस के मैनेजमैटं को छोडकर लगभग नगणय सा रहा । अगर मै सितम्बर के आरम्भ मे बात करुं तो मुझे निराशा ही हाथ लगी क्योंकि रोगी होम्योपैथी मे रुकने को तैयार नही था । लेकिन मुझे पिछ्ले अनुभव से ज्ञात था कि यह अविशवास अधिक दिन नही रहने वाला है । और वही हुआ .. सितम्बर के दूसरे सप्ताह से अब तक का पूरा श्रॆय होम्योपैथिक औषधि यूपोटिरियम पर्फ़ोलेटम और अन्य चयनित औषधियों को रहा । और होगा भी क्यूं नही .. like cures like का इतना बढिया उदाहरण भला कहाँ मिलेगा । पिछ्ले सप्ताह जब डां राजीव सिह ने होम्योपैथिक औषधियों से अल्प समय ठीक हो रहे रोगियों का क्लीनिकल रिकार्ड , उनके पैथोलोजिकल जाँचे आदि सुरक्षित रखने को कहा तो मुझे भी यह बात काफ़ी हद तक पंसद आयी । और यही बात  अन्य होम्योपैथिक चिकित्सको से भी कहूगां कि ऐसे रिकार्ड को संभाल के रखॆं , कई स्त्रोतों पर यह काम आयेगें ।

लेकिन बात यूपोटोरियम पर्फ़ की

यूपोटोरियम पर्फ़ (Eupatorium Perfoliatum -Boneset)

कम्पोजीट परिवार का यह एक पौधा मूलत: अमेरिका और कनाडा मे पाया जाता है । बोन सॆट इसका आम नाम है । मूल अर्क बनाने के लिये पौधे की ताजी पत्तियों और फ़ूल प्रयोग मे लाये जाते है ।

होम्योपैथी मे लाने का श्रेय डां विलयम्सन को जाता है जिन्होने इसकी प्रूविगं सन १८४५ मे अपने मित्र चिकित्सकों और स्वयं पर की । और आशचर्यजनक बात यह रही कि इसके लक्षण आज की नामावली  डॆगूं/इनफ़्लून्जा आदि कई रोगॊ  के लक्षणॊं से मिलते हुये हैं  । मैलेरिया , इनफ़्लून्जा या अन्य किसी अन्य प्रकार के ज्वर या रोग मे –शरीर मे हड्डी तोड दर्द ( break-bone fever) , सिर दर्द , कमर मे ऐठंन , पित्त का वमन इत्यादि इस रोग के प्रधान लक्षण हैं

अगर आप केन्ट की होम्योपैथी मैटेरिया मेडिका मे यूपोटोरियम पर्फ़ की प्रस्तावना लेख को देखें तो पायेगें कि यह औषधि एक आम भारतीय औषधि जैसे तुलसी और अदरक जैसे गुणॊं से भरपूर कनाडा और अमेरिका मे कृषकों द्वारा प्रयोग  की जाती थी । केन्ट लिखते हैं :

Every time I take up one of these old domestic remedies I am astonished at the extended discoveries of medical properties in the household as seen in their domestic use.

All through the Eastern States, in the rural districts, among the first old -settlers, Boneset-tea was a medicine for colds. For every cold in the head, or running of the nose, every bone-ache or high fever, or headache from cold, the good old housewife had her Boneset-tea ready. Sure enough it did such things, and the provings sustain its use. The proving shows that Boneset produces upon healthy people symptoms like the colds the old farmers used to suffer from.

जितनी बार मै इन घरेलू दवाओं मे से किसी एक को लेता हूँ , उतनी ही बार घर मे ये चिकित्सा के समान ,व्यवाहार होते हुये देखकर मै आशचर्य मे पड जाता हूँ । सभी पूर्वी जमीन्दारियों मे , देहाती जिलों मे तथा पुराने आदिवासियों मे बोनसेट सर्दी की खास दवा थी । माथे को या नाक बहने वाली सर्दी के साथ प्रत्येक हड्डी मे दर्द या तेज बुखार के लिये बुद्दिमान गृहणियाँ बोनसेट की चाय को तौयार रखती थी । इसमे सन्देह नहीं कि इसने ऐसे काम किये हैं और परीक्षण ( प्रूविगं ) मे इसका व्यवहार प्रमाणित होता है । परीक्षा मे यह प्रकट होता है कि स्वस्थ मनुष्यों मे बोन सेट उस तरह के सर्दी के लक्षण लाता है जो पुराने कृषकों मे हो जाया करती थी ।

 

  • लेकिन मुख्य प्रशन कि क्या यूपोटोरिम को डेगूं की एकमात्र विशवसनीय औषधि मानें ?

उत्तर : नही , होम्योपैथिक पद्दति इसकी इजाजत नही देती । हर रोगी अपने मूल स्वभाव के कारण दूसरे रोगी से अलग होता है । यही होम्योपैथी की कहें तो विशेषता भी है और परेशानी भी । एक रोगी ठंड लगने के समय ओढना पसंद करता है और दूसरा नही करता । एक को प्यास अधिक लगती है और दूसरे को नही । रोगी अलग-२ है , उसके लक्षण अलग है जाहिर है दवा भी अलग होगी।

  • तो फ़िर एक नया चिकित्सक क्या करे , कैसे इस विशाल मैटेरिया मेडिका मे से सेलेक्शन करे ?

उत्तर : जहाँ तक संभव हो रोगी की गतिविधि, ठंडक और गर्मी से सहिषुण्ता/असहिषुणता ( थर्मल ), प्यास और शारीरिक या मानसिक लक्षण में  बदलाव पर गौर करें । इस संदर्भ मे डां प्रफ़ुल्ल विजयरकर का  एक्यूट फ़्लो चार्ट नये रोगों मे दवा के सेलेक्शन के लिये काफ़ी उपयोगी है । प्रफ़ुल्ल के इस फ़्लो चार्ट पर चर्चा हम अगले भाग मे करेगें । लेकिन यह तय है कि थेरेपेटिक्स आधारित प्रेसक्राबिगं की अपेक्षा प्रफ़ुल्ल का गतिविधि,  थर्मल , प्यास और शारीरिक या मानसिक लक्षण में  बदलाव पर वर्गीकरण अधिक कारगर है । अगले अंक मे जारी …..

 

अगले भाग मे देखें Genus epidemicus क्या है और महामारियों मे उसका क्या रोल है …

 

यह भी देखें :

कैन्सर कोशिकाओं पर होम्योपैथी दवाओं के प्रयोग – Homeopathic drugs Natrum sulphuricum and Carcinosin prevent azo dye-induced hepatocarcinogenesis in mice

image पिछ्ले दिनों ICRH पर कैन्सर कोशिकाओं पर होम्योपैथिक दवाओं के प्रयोगों पर दो रिसर्च पेपर पब्लिश हुये । कल्याणी यूनिवर्सिटी के श्री अनीसुर रहमान खुदाबख्श और उनके सहयोगियों का  ’Homeopathic drugs Natrum sulphuricum and Carcinosin prevent azo dye-induced hepatocarcinogenesis in mice’ और आमला कैन्सर रिसर्च सेन्टर , केरल के रामदास कुटन , हरीकुमार और अन्य का शोध पत्र , ’ Inhibition of Chemically Induced Carcinogenesis by Drugs Used in Homeopathic Medicine ’ । इन दोनों शोध पत्रों मे ’ Inhibition of Chemically Induced Carcinogenesis by Drugs Used in Homeopathic Medicine ’ मे लगभग वही तथ्यों को दोहराया गया जो इसके पहले प्रशान्त बैनर्जी कैन्सर रिसर्च फ़ाउन्डेशन ने अपने कई शोध पत्रों मे रुटा और उअसके पर्योगों पर दिये  थे , देखें विस्तृत वर्णन के लिये यहाँ

लेकिन बात करते हैं अनीसुर रहमान खुदाबख्श के शोध पत्र की । यह पेपर लीक से हट्कर था । प्रथम तो इसमे होम्योपैथी के मूलभूत सिद्धातों (  एकमैव औषधि- single medicine ) को नजरांदाज किया गया और दूसरा औषधि के परीक्षण के लिये चूहों का सहारा लिया गया । तो सबसे पहले विवरण :

विवरण :

इस शोध  का मकसद होम्योपैथिक औषधि कारसीनोसिन २०० ( carcinocin 200 ) और नैट्रेम सल्फ़ ३० ( Nat sulph-30) का कार्य p-dimethylaminoazobenzene (p-DAB) and phenobarbital (PB)  रसायन खिलाकर लिवर कैन्सर से पीडित हुये  चूहों पर देखना था  ।

इसके लिये चूहों को सात उप समूहों मे विभाजित किया गया ।

१. सामान्य अनुपचारित;

२. सामान्य + एल्कोहल उपचारित

३.  p-DAB (0.06%) + PB (0.05%);

४. p-DAB + PB + एल्कोहल उपचारित

५. p-DAB + PB + Nat sulph-30

६. p-DAB + PB + Car-200

७. p-DAB + PB + Nat sulph-30+Car-200

इन चूहों को क्रमश: ३०. ६०. ९०.और १२० दिनों के अंतराल पर मारकर उनके cytogenetical end-points जैसे chromosome aberrations, micronuclei, mitotic index , sperm head anomaly और cytotoxicity का विशलेषण  किया गया । इसके अलावा, इलेक्ट्रॉन सूक्ष्म अध्ययन और मैट्रिक्स metalloproteinases के लिए जेलाटीन zymography (एम एम पी) जिगर में 90 और 120 पर किये गये ।

परिणाम :

परिणाम दिखाते हैं कि सिर्फ़ नैट्रेम सल्फ़ ३० ( Nat sulph-30) पर  रखे गये कैन्सर से पीडित चूहों और कारसीनोसिन २०० को नैट्र्म सल्फ़ के साथ संयोजित करके चूहों मे लीवर की कई गांठॊ ( liver tumours ) मे व्यापक सुधार दिखाई दिया और  कई क्षेत्रों मे सकारात्मक और संरचनात्मक परिवर्तन दिखाई दिये जैसे MMPs expression, genotoxic parameters, lipid peroxidation, y-glutamyl transferase, lactate dehydrogenase, blood glucose, bilirubin, creatinine, urea and increased GSH, glucose-6-phosphate dehydrogenase, superoxide dismutase, catalase, glutathione reductase activities and hemoglobin, cholesterol, and albumin levels.मे व्यापक सुधार दिखाई दिया ।

नैट्रेम सल्फ़ ३० (Nat sulph-30 )के साथ carcinocin 200 (कारसीनोसिन २००) को देने से genotoxicity , cytotoxicity hepatotoxicity के खिलाफ अतिरिक्त लाभ दिखाई दिये |

 

image Homeopathic drugs Natrum sulphuricum and Carcinosin prevent azo dye-induced hepatocarcinogenesis in mice. Nandini Bhattacharjee, Pathikrit Banerjee and Anisur Rahman Khuda-Bukhshh. Indian Journal of Biochemistry & Biophysics’, Vol-46, August 2009, PP. 307-318.

The study was undertaken to examine whether Carcinosin-200 (Car-200) could provide additional ameliorative effect, if used intermittently with Natrum sulphuricum-30 (Nat sulph-30) against hepatocarcinogenesis induced by chronic feeding of p-dimethylaminoazobenzene (p-DAB) and phenobarbital (PB) in mice (Mus musculus).

Mice were randomly divided into seven sub-groups:

(i) normal untreated;

(ii) normal+succussed alcohol;

(iii) p-DAB (0.06%) + PB (0.05%);

(iv) p-DAB + PB +succussed alcohol

(v) p-DAB + PB + Nat sulph-30,

(vi) p-DAB + PB + Car-200, and

(vii) p-DAB + PB + Nat sulph-30+Car-200.

They were sacrificed at 30, 60, 90 and 120 days for assessment of genotoxicity through cytogenetical end-points like chromosome aberrations, micronuclei, mitotic index and sperm head anomaly and cytotoxicity through assay of widely accepted biomarkers and pathophysiological parameters.

Additionally, electron microscopic studies and gelatin zymography for matrix metalloproteinases (MMPs) were conducted in liver at 90 and 120 days.

Results showed that administration of Nat sulph-30 alone and in combination with Car-200 reduced the liver tumors with positive ultra- structural changes and in MMPs expression, genotoxic parameters, lipid peroxidation, y-glutamyl transferase, lactate dehydrogenase, blood glucose, bilirubin, creatinine, urea and increased GSH, glucose-6-phosphate dehydrogenase, superoxide dismutase, catalase, glutathione reductase activities and hemoglobin, cholesterol, and albumin levels.

Thus intermittent use of Car-200 along with Nat sulph-30 yielded additional benefit against genotoxicity, cytotoxicity hepatotoxicity and oxidative stress induced by the carcinogens during hepatocarcinogenesis.

Medicines regulator grants first ever licence to homeopathic remedy “Arnica”

image

Source : WDDTY & Times Online

Much to the anger of conventional medicine, the homeopathic remedy Arnica has been officially recognised as a successful remedy for treating sprains and bruises.

The Medicines and Healthcare Products Regulatory Agency (MHPRA) has registered the product, which means that the manufacturer can now make claims for its effectiveness. 

Arnica 30c, manufactured by Nelsons, is the first homeopathic remedy to be recognised without going through clinical trials.  Since 1971, homeopathic products have not been allowed to make any health claim without proper evidence.

But new rules, introduced in 2006, allow a manufacturer to make health claims for a product provided there is a tradition for its use in the UK, and it is for the treatment only of minor problems.

High Dilution Growth Factors/Cytokines: Positive Immunologic, Hematologic and Clinical Effects in HIV/AIDS Patients

High Dilution Growth Factors/Cytokines: Positive Immunologic, Hematologic and Clinical Effects in HIV/AIDS Patients

Source : Bastyr University Research Institute

Barbara Brewitt, PhD; Leanna Standish, ND, PhD Biomedical Explorations, Seattle, WA; Bastyr University Health Clinic, Seattle, WA

Objective: Determine efficacy of administering 4 high dilution cytokines; platelet-derived growth factor BB, insulin-like-growth factor-1, transforming growth factor beta 1, and granulocyte-macrophage colony simulatin factor (GM-CSF).

Methods: Sixteen weeks treatment group (“TX”)/placebo group (“PL”): CD4 counts 200-500 and 16 weeks open label study: CD4 counts 1250550, 10 drops/3X day/bottle p.o. growth factor type or placebo. Exclusion criteria: antiretroviral or steroidal therapy. Monthly evaluations: T/B lymphocytes, blood chemistry plus lipids, complete blood count, platelets, erythrocyte sedimentation rate (ESR), weigh, opportunistic infections (OIs) and HIV viral load (open label only). Growth factors/cytokines diluted (10-60, 10-400, 10-2000 molar), well beyond Avogadro’s number.

Results: TX/PL started with CD4s of 330±14 cells/ul (SEM). TX (n=13) raised CD4 & CD8 counts by 13±12 cells/uL and 83±4 cells/uL, respectively, vs. -55±15 CD4 cells/uL (p<0.008) by 16 weeks and -246±60 CD8 cells/uL (p<0.04 within group) by 20 weeks in placebo group (n=9). TX had no OIs vs. 20% Ois in PL. ESR with treatment decreased from 19±3 to 11±2 mm/hr between 8th and 16th week (p<0.01) vs. no change in placebo group, 20±5 to 17±4 mm/hr. TX gained +2.0±1.0 lbs vs. -4.0±1.4 lbs. in the placebo (p<0.01). Viral load was measured monthly in a separate group of patients (n=8) with CD4 count of 242±23 cells/uL. Viral decreased from 203,400±106,300 to 105,000±43,500 RNA copies/mL after 16 weeks of treatment, a decrease of 0.3 log unit. When PL patients were crossed over to treament for another 16 weeks, CD4, CD8 counts and viral load stabilized (112,000±19,000 RNA copies/mL) plus weigh loss was reversed. Eight patients completed 11 months of treatment with ending viral loads of 19,500±6,000 and 38% had no detectable virus, with CD4 and CD8 counts stable at baseline values. Twenty-five percent of patients were thrombocytopenic. During their first month of treatment, platelets rose 23% (111,000±22,000 to 136,000±29,000 plt/uL); 57% patients achieved normal values. Two patients enrolled in a single high dilution GM-CSF treatment, rose from 16,000 to 48,000 and 141,000 to 174,000 plt/uL after only one month of treatment.

Results suggest that unknown biophysical mechanisms of high dilutional growth factors/cytokines may exert immunological effects in HIV/AIDS.

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कम्पलीट रिपर्ट्री २००९ – डाउनलोड के लिये उपलब्ध

साभार: Edwin van Grinsven & Roger van Zandvoort

complete 2009

विशव मे सभी प्रोफ़ेशनल होम्योपैथों के बीच  कम्पलीट रिपर्ट्री की पहचान अपनी पूर्णता , सटीकता और मूल स्त्रोतों के कवरेज के लिये प्रसिद्ध है । रैजर वान जैन्ड्रवुड और इडविन वैन ग्रिन्सवन इसके पहले भी समय –२  पर नवीनतम संस्करणॊं को फ़्री मे डाउनलोड के लिये उपलब्ध करा  चुके हैं ।  कम्पलीट रिपर्ट्री २००९ का नवीनतम संस्करण डाउनलोड के लिये उपलब्ध है । इस नवीनतम संस्करण की कुछ मुख्य विशेषताओं मे  सर्चिगं का तरीका  और अधिक सुगम और प्रभावशाली , नये लक्षणॊं और औषधियों  का समावेश और नये स्त्रोतों से मिल रही जानकारी का समावेश भी  है । और सबसे विशेष बात कि यह बिल्कुल मुफ़्त है । बहुत से होम्योपैथिक चिकित्सकों  जिनके लिये नये और महँगे कम्पयूटर प्रोग्रामों  को खरीदना संभव नही है , यह एक अमूल्य तोहफ़ा है ।

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बवासीर या पाइल्स और होम्योपैथिक उपचार

 

बवासीर को आधुनिक सभ्यता का विकार कहें तो कॊई अतिश्योक्ति न होगी । खाने पीने मे अनिमियता , जंक फ़ूड का बढता हुआ चलन और व्यायाम का घटता  महत्व , लेकिन और भी कई कारण हैं  बवासीर के रोगियों के बढने में । तो सबसे पहले जाने बवासीर और उसके मूल कारण :

आंतों के अंतिम हिस्से या मलाशय की धमनी शिराओंके फ़ैलने को बवासीर कहा जाता है ।

बवासीर तीन प्रकर की हो सकती है

  • बाह्य पाइल्स: फ़ैली हुई धमनी शिराओं का मल द्वार से बाहर आना
  • आन्तरिक पाइल्स : फ़ैली हुई धमनी शिराओं का मल द्वार के अन्दर रहना
  • मिक्सड पाइल्स: भीतरी और बाहरी मस्से

कारण :

  • बहुत दिनों तक कब्ज की शिकायत रहना
  • सिरोसिस आफ़ लिवर
  • ह्र्दय की कुछ बीमारियाँ
  • मध, मांस, अण्डा, प्याज , लहसुन, मिर्चा, गरम मसाले से बनी सब्जियाँ, रात्रि जागरण , वंशागत रोग ।
  • मल त्याग के समय या मूत्र नली की बीमारी मे पेशाब करते समय काँखना
  • गर्भावस्था मे भ्रूण का दबाब पडना
  • डिस्पेपसिया और किसी जुलाब की गोली क अधिक दिनॊ तक सेवन करना ।

लक्षण

  • मलद्वार के आसपास खुजली होना
  • मल त्याग के समय कष्ट का आभास होना
  • मलद्वार के आसपास पीडायुक्त सूजन
  • मलत्याग के बाद रक्त का स्त्राव होना
  • मल्त्याग के बाद पूर्ण रुप से संतुष्टि न महसूस करना

बवासीर से बचाव के उपाय

कब्ज के निवारण पर अधिक ध्यान दें । इसके लिये :

  • अधिक मात्रा मे पानी पियें
  • रेशेदार खाध पदार्थ जैसे फ़ल , सब्जियाँ और अनाज लें | आटे मे से चोकर न हटायें ।
  • मलत्याग के समय जोर न लगायें
  • व्यायाम करें और शारिरिक गतिशीलता को बनाये रखें ।

अगर बवासीर के मस्सों मे अधिक सूजन और दर्द हो तो :

गुनगुने पानी की सिकाई करें या ’सिट्स बाथ’ लें । एक टब मे गुनगुना पानी इतनी मात्रा मे लें कि उसमे नितंब डूब जायें  । इसमे २०-३० मि. बैठें ।

होम्योपैथिक उपचार :

किसी भी औषधि की सफ़लता रोगी की जीवन पद्दति पर निर्भर करती है । पेट के अधिकाशं रोगों मे रोगॊ अपने चिकित्सक पर सिर्फ़ दवा के सहारे तो निर्भर रहना चाहता है लेकिन  परहेज से दूर भागता है । अक्सर देखा गया है कि काफ़ी लम्बे समय तक मर्ज के दबे रहने के बाद मर्ज दोबारा उभर कर आ जाता है अत: बवासीर के इलाज मे धैर्य और संयम की आवशयकता अधिक पडती है ।

नीचे दी गई  औषधियाँ सिर्फ़ एक संकेत मात्र हैं , दवा पर हाथ आजमाने की कोशिश न करें , दवा के उचित चुनाव के लिये एक योग्य होम्योपैथिक चिकित्सक पर भरोसा करें  ।

फ़्लो चार्ट को साफ़ और बडॆ आकार मे  देखने के लिये चित्र पर किल्क करें ।

१. बवासीर के मस्सों मे तकलीफ़ और अधिक प्रदाह : aconite, ignatia,acid mur, aloes, chamomilla, bell,acid mur, paeonia

२. खुजलाहट : arsenic, carbo, ignatia, sulphur
३. स्ट्रैंगुलैशन : belladona,ignatia, nux

४.रक्तस्त्राव में : aconite, millifolium,haemmalis, cyanodon

५. मस्से कडॆ : sepia

६. बवासीर के मस्सों का बाहर निकलना पर आसानी से अन्दर चले जाना : ignatia

७. भीतर न जाना : arsenic, atropine, silicea, sulphur
८. कब्ज के साथ : alumina, collinsonia, lyco, nux, sulphur

९.अतिसार के साथ : aloes,podo,capsicum

१०. बच्चों मे बवासीर  : ammonium carb, borax, collinsoniia, merc

११. गर्भावस्था मे बवासीर : lyco,nux, collinsonia , lachesis, nux

१२.शराबियों मे बवासीर : lachesis, nux

१३. वृद्धों मे बवासीर : ammonium carb , anacardium