होम्योपैथी-नई सोच/नई दिशायें

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शिशुओं में दस्त और होम्योपैथी (Infantile Diarrhoea & homeopathy )

April 4, 2008 · 9 Comments

शिशुओं मे दस्तों का प्रकोप और उनसे होने वाली मृत्यु दर कई देशों की मजबूरी सा बन चुका है । W.H.O. की रिपोर्ट के अनुसर जहाँ १९७९ तक सालाना ४.५ मिलयन मृत्य सिर्फ़ शिशुओं मे दस्तों के कारण होती थी वहाँ अब यह घट कर लगभग १.६ मिलयन तक रह गयी हैं । अभी भी यह अनुपात काफ़ी अधिक हैं । होम्योपैथी औषधियों का प्रभाव इन दस्तॊं मे काफ़ी प्रभावी देखा गया है लेकिन व्यापक प्रचार-प्रसार के अभाव मे अभी भी होम्योपैथी जन साधारण से कोसों दूर है ।

दस्त ( Diarrhea ) क्या है ?

Diarrhea एक लैटिन शब्द है जिसका शब्दिक अर्थ है , ” Milk of the Anus ” ग्रीक शब्दिक अर्थ के अनुसार , ” Flow like a stream ” | ढीले औए पतले मल का बार-२ त्यागना , दस्त कहलाता है ।

कारण ( Aetiology)

  • संक्रमण : ( वायरस, बैक्टिया या परजीवी द्वारा )
  • किसी खाध पदार्थ के प्रति अधिक संवेदन्शीलता
  • किसी औषधि की प्रतिक्रिया स्वरूप

यदि दस्त का समुचित इलाज न किया जाये तो निर्जलीकरण ( शरीर मे पानी की कमी आ जाना ) हो सकती है । शरीर मे जल और अन्य द्र्व्यों की कमी के कारण मृत्यु भी हो सकती है ।

निर्जलीकरण की पहचान और लक्षण:

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दस्त से बचाव के उपाय :

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  • मल त्याग के बाद बच्चों मे सबुन से हाथ धोने की आदत डालें ।
  • खाने से पहले हथ अवशय साफ़ करें।
  • फ़ल और सब्जियाँ धो के खायें ।
  • खाध पदर्थों को ढक के रखें ।

क्या करें :

  • शिशु मे पानी की कमी को पूरा करें ।
  • शिशुओं को W.H.O. ओ.आर.एस. लगातार देते रहें ।
  • स्तनपान जारी रखें ।
  • शिशु का खाना बन्द न करें , बल्कि उसे नरम खाध पदार्थ जैसे केला , चावल , उबले आलू आदि देते रहें ।

याद रखें :

  • दस्त के सभी रोगियों का निर्जलीकरण के लिये वर्गीकरण करें । जहाँ गम्भीर निर्लजीकरण हो उसे क्लीनिक मे I.V. fluid से manage करें या अस्पताल रेफ़र करें ।
  • यदि मल मे खून आ रहा हो तो उसे पेचिश के लिये वर्गीकृत करें और औषधि के चुनाव के लिये प्लान दो को देखें ।

क्या न करें :

  • शिशु को सिर्फ़ ग्लूकोज या अकेला चीनी का घोल न दें । सिर्फ़ ग्लूकोज आधारित घोल शिशु के पेट में fermentation पैदा करते हैं जिससे बैक्टर्यिल संक्रमण की संभावनायें बढ जाती हैं ।
  • ऐसे तरल पदार्थ न दें जिसमें कैफ़ीन हो जैसे कोला या काँफ़ी ।
  • दूध या दूध से बनी वस्तुओं न दें ।

घर मे तैयार नमक-चीनी का घोल या W.H.O. ORS  में किसको चुनें :

घर मे बनाये गये नमक-चीनी के घोल मे सबसे बडी दिक्कत सही अनुपात का मिश्रण न हो पाना है जिससे या तो नमक की अधिकता हो जाती है या फ़िर चीनी का अनुपात बढ जाता है जो दोनॊ ही हालातों मे शिशु के लिये  हानिकारक सिद्द होती है । लेकिन फ़िर भी अगर O.R.S. उपलब्ध नही है तो यह तरीका कारगर है ।

बनाने की विधि :

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एक लीटर अथवा ५ ऊबले और ठंडे किये पानी मे १ छॊटा चम्मच नमक एवं ८ छॊटॆ चम्मच चीनी डालकर अच्छी तरह घोल ले और इस मिश्रण को २४ घंटॆ के अन्दर ही प्रयोग करें । बाकी बचे मिश्रण को फ़ेंक दें ।

होम्योपैथिक औषधियाँ :

शिशुओं मे आम प्रयोग होने वाकी होम्योपैथिक औषधियों की यह एक संक्षिप्त जानकारी है । [ नोट : स्वयं चिकित्सा करने की गलती न करें , आप का चिकित्सक ही आपको सही सलाह दे सकता है । ]

 1. प्लान “A”

2. प्लान “B “:

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होम्योपैथिक मैटेरिया मेडिका मे औषधियों के मध्य तुलनात्मक अधयन्न ( Comparative study of Homeopathic medicines in Materia Medica )

February 27, 2008 · No Comments

होम्योपैथिक मैटॆरिया मेडिका मे औषधि के अधयन्न करते समय लक्षणॊं को याद करना और बाद मे अन्य औषधियों से तुलना करते समय लक्षणॊं के सम्बन्ध समझना दिलचस्प है । मैटेरिया मेडिका मे हर लक्षण महत्वपूर्ण नही होते ; सामान्य से दिखने वाले लक्षण की अपेक्षा ऐसे लक्षण जो दुर्लभ हों और औषधि के स्वरुप को सामने लाते हों वह अधिक महत्वपूर्ण होते हैं । जैसे कोनियम के एक लक्षण को लें - चक्कर आना । कोनियम का चक्कर सिर घुमाने य इधर-उधर देखने से या बिस्तर पर करवट बदलने से बढता है ; यह कोई फ़र्क नही पडता कि यह चक्कर किन परस्थितियों मे आ रहा है , वह चाहे cervical spondylitis से जुडी हो या Meniere’s disease या hypertension से ।

चक्कर से संबधित अन्य औषधियों के मध्य एक रोचक तुलनात्मक पहलू देखें ।

चक्कर आये , सिर घुमाने से - conium, cal-carb, kali carb

चक्कर आये , सिर हिलाने से :- bryo, cal carb, conium

चक्कर आये , ऊपर देखने से :- pulsatilla, silicea

चक्कर आये , नीचे देखने से :- phos, spigellia

चक्कर आये , फ़ूलों की गन्ध से -Nux vom , phos

चक्कर आये , रात को जागने से या पूरी नींद न होने से : Cocculus, Nux Vom

चक्कर आये , जरा सी आवाज से :- Theridion

चक्कर आये ,अध्ययन के समय :- Nat Mur

चक्कर आये , खाना खाने के बाद :- Gratiola, nux vom, pulsatilla

चक्कर आये ,जैसे बिस्तर उलट गया हो :- conium

चक्कर आये ,बेहोशी के साथ :- nux vom

चक्कर आये ,आँखे बन्द करने पर या अन्धेरे में :- argent nit, stramonium, thyrodin

चक्कर आये ,बैठकर खडा होने पर :- bryo, phos

चक्कर आये ,बैठकर झुकने पर :-belladona

चक्कर आये ,बिस्तर से उठने पर :-bryo, chelidonium, cocculus

चक्कर आये ,झुकने पर :- bell, nux vom, puls, sulphur

चक्कर आये ,सीढियाँ चढने पर:- calc carb

चक्कर आये ,सीढियाँ उतरने पर :- borax, ferrum

चक्कर आये ,लेटने पर :- conium

चक्कर आये ,दांयें करवट लेटने से:- mur acid,phos

चक्कर आये , वायें करवट लेटने से :-iod,phos,sil

चक्कर आये ,लेट जाना पडे:- bryo, cocculus, phos, puls

चक्कर आये ,सॊने के बाद :- lachesis , petroleum

चक्कर आये ,जी मिचलाने के साथ:- cocculus ind, petroleum, chin sulph

स्त्रोत:- नैश थेरापेयुटिकस (Leaders in Homeopathic Therapeutics by Nash )

औषधियों के बीच के अन्तर समझने से औषध का चयन आसान और एक चिकित्सक का मार्ग सरल हो जाता है । अलग-२ औषधियों के मध्य तुलनात्मक अधयन्न के लिये

फ़ैरिन्टन (Farrington) ,   नैश (Nash)गौस (Gross) और  यूजिनियो ( Eugenio) की comparative मैटेरिया मेडिका अधयन्न योग्य पुस्तकें हैं ।

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रजोनिवृति महिलाओं की समस्याओं में होम्योपैथिक औषधियों के सफ़ल परीक्षण (Treating hot flushes in menopausal women with homeopathic treatment–Results of an observational study )

January 16, 2008 · 3 Comments

menopause

रजोनिवृति महिलाओं मे उत्पन्न होने वाली वह  शरीर की स्वभाविक प्रक्रिया है जहाँ मासिक धर्म ४५-५० साल की आयु मे पहुँचते-२ कम और बाद मे बन्द  हो जाता है । और इसके दौरान उत्पन्न होती हैं कई प्रतिक्रियायें जैसे चिडचिडापन , बहुत गर्मी लगना , हाथ पैर मे जलन होना,सोते समय शरीर से  पसीना आना , सेक्स से वितृष्णा होना आदि । मेडिकल भाषा मे इसे hot flushes कहा जाता है ।

When a woman reaches her late forties or early fifties, her periods grind to a halt. Menopause marks the move from the reproductive years to a cessation in fertility. This literally means that her supply of eggs, which is determined at birth, has been used up.
For some this change of life comes smoothly and all she notices is that she no longer has her periods. But for others, the change is more rocky and causes much distress with symptoms of hot flushes, night sweats, vaginal dryness and irritation, poor libido, frequent urinary tract infections, poor memory and concentration, fatigue, depression, headaches, weight gain and heart palpitations.
Nearly three-quarters of all menopausal women experience hot flushes which have been described as one of the most distressing symptoms.
Hot flushes (or hot flashes) come unexpectedly. It’s the sudden feeling of intense heat that one feels all over the face and upper body. The skin may turn red and the body starts to sweat. Hot flushes at night disturb a woman’s sleep and can be so severe as to cause the bedding to be soaked in sweat.

आठ देशों के ९९ चिकित्सकों ने औसतन ५५ वर्ष तक की ४३८ महिलाओं पर यह क्लीकल परीक्षण किये । जिन औषधियों को मूलत: प्रयोग किया उनमे  Lachesis mutus, Belladonna, Sepia officinalis, Sulphur और  Sanguinaria canadensis प्रमुख थीं ।

 

Treating hot flushes in menopausal women with homeopathic treatment–Results of an observational study

british homeopathy journal

Source: Science Direct

MF Bordet , A Colas , P Marijnen , JL Masson and M Trichard
1Boiron, Sainte-Foy-lès-Lyon, France
2Reims, France
3Ecully, France
4Lyon, France
Received 13 December 2006;  revised 19 November 2007;  accepted 19 November 2007.  Available online 11 January 2008.

Abstract
Objective

There is great controversy concerning treatment for menopausal symptoms. We evaluated homeopathic treatments for hot flushes and their effect on quality of life in menopausal women.

Methods

Open, multi-national prospective, pragmatic and non-comparative observational study of homeopathic treatments prescribed and their effectiveness, observing their impact on quality of life.

Results

Ninety-nine physicians in 8 countries took part in this study and included 438 patients with an average age of 55.

Homeopathic medicines were prescribed to all patients; 98% of the prescription lines were for homeopathic medicines. Lachesis mutus, Belladonna, Sepia officinalis, Sulphur and Sanguinaria canadensis were the most prescribed. A non-homeopathic treatment and/or food supplement prescribed for 5% of the patients.

This observational study revealed a significant reduction (p<0.001) in the frequency of hot flushes by day and night and a significant reduction in the daily discomfort they caused (mean fall of 3.6 and 3.8 points respectively, on a 10 cm visual analogue scale; p<0.001).

Ninety percent of the women reported disappearance or lessening of their symptoms, these changes mostly taking place within 15 days of starting homeopathic treatment.

Conclusions

The results of this observational study suggest that homeopathic treatment for hot flushes in menopausal women is effective. Further studies including randomized controlled trials should be conducted.

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"तारे जमीन पर"- डिस्लेक्सिया पर आधारित एक सच्चाई

January 12, 2008 · 5 Comments

सिनेमा और मेरा साथ बडी मुशकिल से ही होता है , नये साल के पहले ही दिन जब घर मे  सबने तय कर लिया  कि ” तारे जमीन पर” देखनी है तो मरता क्या न करता । रात की  क्लीनिक  दस बजे खत्म करने के बाद  सहारागंज के पी.वी.आर. मे रात ११ बजे  सपरिवार धमक ही गये । रात लगभग २ बजे तक चली इस  फ़िल्म के दौरान न तो नींद का एक भी झोंका आया और न ही नजरें इधर-उधर  गई :) । कारण , यह फ़िल्म है ही इतनी अनूठी कि जो भी जिस वर्ग से है उसको सोचने पर मजबूर कर देगी ।
  यह फ़िल्म आठ साल के उस बच्चे ( ईशान ) की है जिस की अपनी दुनिया है । अपने मे खोया ,अपने मे ही मस्त , सारे जहाँ की मुसीबत अपनी जगह लेकिन उसकी दुनिया मे एक अलग तरह की मस्ती का आलम है । वह मछलियों को उडते देख सकता है लेकिन उसके साथ दिक्कत यह है कि वह अंग्रेजी वर्णमाला के  बी और डी मे भेद नही कर पाता । सीधे शब्दों को वह उल्टा बनाता है और जब तीन का पहाडा उसको सुनाने के लिये कहा जाता है तो वह अपनी जादुई दुनिया मे खो जाता है और ग्रहों की टकराहट को याद करके जबाब देता है । स्कूल मे उसका उपहास उसके साथियों और शिक्षकों द्वारा उडाया जाता है  और यहाँ तक घर मे भी  माता-पिता उसको समझ नही पाते और उसकी हरकतों से तंग आकर उसको बोर्डिग स्कूल मे डाल देते हैं । वह उदास सा रहने लगता है , लेकिन उसकी उदासी को उस स्कूल का एक टीचर ( आमिर ) पहचान लेता है , वह स्कूल के प्रिसंपल , टीचर और उसके घर वालों को भी समझाता है कि ईशान डिस्लेक्सिया से पीडित है । डिस्लेक्सिया पढने से संबंधी एक विकार है । इसमे बच्चों को शब्दों को पहचानने , पढने , याद करने और बोलने मे भी परेशानी आती है । वह कुछ अक्षरों को उच्चारित भी कर सकते हैं लेकिन उनकी पढने की रफ़्तार और बच्चॊं की अपेक्षा काफ़ी कम होती है । यह विकार ३-१५ साल के सामान्य जनसंख्या के लगभग ३% बच्चॊं मे पाया जाता है । और देशॊं के बारे मे नही कह सकते लेकिन अपने देश मे वह चाहे माता-पिता हों या स्कूल की शिक्षा -प्रणाली डिस्लेक्सिया से पीडित बच्चॊं की समस्या से मुँह मोडते हुये दिखती है । कुछ हद तक यह भी कह सकते हैं कि शायद आम लोगों को जागरुक करने का काम ही नही हुआ । अधिकतर केस मे बच्चे को मंद बुद्दि कह कर उसके अन्दर छुपी प्रतिभा को नंजरंदाज ही किया जाता तहा है । आमिर को साधुवाद कि इस फ़िल्म के माध्यम से समाज के हर वर्ग मे एक संदेश देने की पहल की । ऐसी फ़िल्में अपने देश मे बहुत कम ही बनती हैं और आमिर हम आप से आगे भी उम्मीद रखेगें कि ऐसे अछूते विषयों पर फ़िल्मे बनाने का काम जारी रखें । डिस्लेक्सिया को समझने के लिये इस वीडियो को ध्यान से देखें :

फ़िल्म छूटने के बाद मेरा ध्यान मेरे परिचित  की १० वर्षिया लडकी की तरफ़ गया जो कि डिस्लेकिस्या से पीडित है लेकिन इधर एक साल से उसमे मैने काफ़ी अच्छे परिवर्तन देखे । वह दमे से मूलत: पीडित है और काफ़ी ऐलोपैथिक इलाज करवाने के बावजूद उसकी समस्या सिर्फ़ कुछ दिनों तक ही आराम मे दिखती रही । उसकी माँ ने लखनऊ  के ही एक वरिष्ठ एलोपैथिक चिकित्सक की मदद ली जो होम्योपैथिक पद्दति का अच्छा ज्ञान रखते हैं और अपनी पद्दति के अलावा होम्योपैथी को जटिल रोगों मे अक्सर कई रोगियों मे देते रहे हैं ।  लेकिन यह भी सच था कि उसकी माँ ने दमे के लिये चिकित्सक से संपर्क किया था , डिस्लेकिस्या के बारे मे तो उसका ज्ञान न के बराबर था । दमे ( asthma ) से होने वाले attacks मे होम्योपैथिक औषधियों के प्रभाव से तो काफ़ी कमी आई लेकिन साथ मे उसकी याददाश्त ,लिखावट और  पढने -लिखने मे एक अच्छा बदलाव भी दिखा । मेरी उत्सुकता कम से कम दवाओं मे तो बिल्कुल भी न थी  क्योंकि हर रोगी होम्यो्पैथिक दृष्टिकोण  से अलग-२ होता है और दवाये भी अलग-२ निकलती हैं । कई सालो से जिस लडकी का पास होना भी मुशिकल था उसमे इतना बदलाव ! सब के लिये  लिये आशचर्य ही था ! लेकिन यह शायद यह किसी चारित्रिक लक्षणॊं ( constitutional symptoms ) पर आधारित चयन की गई औषधि का काम हो सकता था ।
अगले दिन मेरे ध्यान मे आया कि क्यों नही रिपर्टरी मे सर्च कर के देखें कि डिस्लेक्सिया पर होम्योपैथी मे क्या  हो सकता है । आखिरकार सिन्थिसीस रिपर्टरी ( synthesis repertory ) मे इसका पूरा उल्लेख मिला ।

रडार ९.२ के प्रयोगकर्ता  सर्च मे जाकर dyslexia टाइप करें । नीचे दी हुई  खिडकी कुछ इस तरह खुलेगी :

 

सबसे पहले वाले को  किल्क करें । उसकी आकृति इस तरह से है और एक ही औषधि की तरफ़ इंगित कर रही है ।

 

दूसरे रूब्रिक को किल्क करें :

 

ऊपर दिये रुब्रिक के नीचे लक्षणॊं के सात समूह और भी दिये हैं , इन पर भी किल्क करें । यह dyslexia से मिलते जुलते लक्षणॊं के रूब्रिक्स और उनसे संबधित औषधियों को इंगित  करता दिखेगा । जिन होम्योपैथिक चिकित्सकों के पास रडार की सुविधा नही है उनके लिये विस्तार से देखने के लिये नीचे दिये PDF लिंक पर किल्क करके डाऊन्लोड करें । PDF आधारित इस फ़ाइल को देखने के लिये acrobat reader या foxit reader का प्रयोग करें ।

 

pdf

यहाँ कोई दावों और प्रतिदावों जैसी कोई बात नही है , यह सिर्फ़ एक संभावनाओं की ओर इशारा कर रही है , आगे देखना यह काम चिकित्सा क्षेत्र से जुडॆ लोगों का है कि वह होम्योपैथी को होम्योपैथी के तरीकों से ही समझें और प्रयोग मे लाकर देखें , ताकि हम समाज के उस बहुत महत्वपूर्ण ईकाई को नजरान्दाज न कर सकें ।

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सफ़ेद दाग और होम्योपैथी- आशा की एक किरण भाग- २ (Leucoderma & homeopathy- an ultimate hope-part-2 )

August 19, 2007 · 13 Comments

पिछ्ली पोस्ट से आगे……..

leucoderma

लियकोडर्मा या सफ़ेद दाग के प्रधान लक्षण - शरीर के चमडे के स्थान -२ पर सादा व उस स्थान पर लोम तक सफ़ेद हो जाते हैं , कभी-२ एक अंग का पूरा अंश सफ़ेद हो जाता है । इस रोग में चमडे के ऊपरी भाग का सूक्ष्म पर्दा ( dermis) केवल आक्रान्त होता है , इसलिये रोगी को शारिरक कष्ट तो अनुभव नही होता लेकिन मानसिक रुप से वह बुरी तरह से टूट जाता है । लियकोडर्मा स्पर्शाक्रमक यानि छूत का रोग नहीं है लेकिन इसके बावजूद भी विशेष कर ग्रामीण इलाकों में लियकोडर्मा के रोगियों को समाजिक बहिषकार तक झेलना पडता है ।

सफ़ेद दाग के कारण और विभिन्न चिकित्सकों के मत

causes of leucoderma

इस रोग की वास्तविक उत्पति का कारण आज तक निर्णीत नहीं हुआ है , बहुत से कारण हैं जिन्हें समय-२ पर विभिन्न चिकित्सकों ने देखा और परखा है , ऐसे ही कारणों पर नजर डालते हैं -

1- होम्योपैथी मे सफ़ेद दाग पर वयापक शोध मुम्बई के डा वडिया के हिस्से रहा । आपके अनुसार इस रोग का प्रधान कारण पेट के रोगों से संबधित है और इन रोगों मे पुराना अतिसार (chronic Amoebic dysentery )और आँतों मे कृमि (intestinal parasites) का होना प्रमुख है। आपके क्लीनिकल रेकार्ड को देखने पर 50% रोगी के मल की जाँचों मे Ent amoeba histolytica, giardia के अंडे या कृमि पाये गये। देखें यहाँ

२-परिवारिक अनुवांशिकता के सफ़ेद दाग के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं । हमारे देश मे सफ़ेद दाग की बहुतायत सोमवंश सहसर्जुन क्षत्रिय समुदाय मे अधिक पायी जाती है। देखें यहाँ (Vitiligo : a study of 998 cases attending KEM Hospital in Pune ;Tawade YV, Parakh AP, Bharatia PR, Gokhale BB, Ran )

३-मानसिक चिन्तायें, विषाद (depression), किसी तरह का सदमा(shock) ,गृह क्लेश , बेरोजगरी की समस्या के चलते मनसिक अवसद आदि भी भी इस रोग को पैदा करने मे सहायक रहे।

४- ऐसी antibiotcs जिनसे intestinal flora नष्ट हो गया , वह भी इस रोग को पैदा करने मे सहायक रही।

५- त्वचा के कई रोग जिनको एंटीबायटाकिस (antibiotcs) , स्टीरौडिस (steroids) और मलहम से दबाया गया ।

६- कुछ रोगियों मे जिनका परिवारिक यक्षमा (T.B.) का इतिहास रहा हो।

७ त्वचा का जलना, मस्से या तिल को सर्जरी से हटाना भी कभी-2 एक कारण मे देखा गया।

८- माथे पर बिन्दी का लगाना , कसे हुये कपडों का पहनना विशेष कर औरतो और युवतियो मे जहाँ कसे हुये ब्लाऊज, ब्रा, या पेटिकोट के नाडे के दबाब के चलते सफ़ेद दाग दिखे।

९- मियाज्म (Miasm) दोष- सोरा, सिफ़िलिस और साइकोसिस- ( मियाज्म (Miasm)कया है , इसके लिये यहाँ देखें

१०- जे जे हास्पिटल ,मुम्बई के डा जे श्रौफ़ ने Indian journal of medical science 1973 मे एक लेख के जरिये कुछ नये तर्क रखे। आपने पाया कि सफ़ेद दाग और कई औटो इमयून समस्यायें (auto immune disorders ) जैसे मधुमेह (diabetes), थाइरोड के कई रोग, और रक्ताभाव (pernicious anaemia) का आपस मे गहरा संबध है।

११- विटामिन बी काम्पलेक्स- कई विटामिन और खनिज तत्वों का भी मिलैनिन के उत्पादन पर असर देखा गया।

१२- ब्रेटनैक (Breathnach 1971 )ने पाया कि मिलैनिन के बनने की प्रक्रिया शरीर मे मौजूद इन्जाइम टायरोनेज (enzyme- tyrosinase ) पर निर्भर करती है और इन्जाइम टायरोनेज के बनने के लिये विटामिन की आवशयकता पडती है। इसके पहले सीव (Sieve 1965) ने विटामिन की कमी और सफ़ेद दाग के व्यापक प्रमाण दिये।

१३- खनिज तत्वों मे कापर ( copper) की catalytic activity सबसे अधिक इन्जाइम टायरोनेज (enzyme- tyrosinase ) पर देखी गयी । बाद के विशलेषणों मे पाया गया कि इन्जाइम टायरोनेज के अणु मे कापर की मात्रा 0.2% होती है और सफ़ेद दाग के रोगियों मे कापर का प्रतिशत आम लोगों की अपेक्षा कम देखा गया। ( V.C.Shah,N.J.Chinoy etc, deptt of zoology, gujrat university, Ahmedabad)
शायद यही कारण रहा कि आगरा के डा आर एस पारिख ने cuprum Acetium 6 के प्रयोग पर जोर दि्या।

१४- कुपोषण और बढती हुयी अंट-बंट (junk food) खाने की प्रवृति ने भी बच्चों मे सफ़ेद दाग की संख्या मे वृद्दि दिखाई दी , देखें यहाँ । (Behl PN, Agarwal A, Srivastava G- Etiopathogenesis of vitiligo : Are we dealing with an environmental disorder ?)

आहार और पथ्य (Diet & Regimen)

  • det.gif
  • जहाँ तक संभव हो माँसाहारी खाने का त्याग कर देना चाहिये । आधुनिकता के दौर मे खान -पान मे सब कुछ चलता है का शोर बहुत है लेकिन हम अपने तरफ़ यह नही देखते कि हम क्या खा रहे हैं। कई बीमार जानवरों के माँस के सेवन करने से नाना प्रकार के कृमि और अंडें खाने के साथ कृमिकोष (cyst) के रूप में आँतो के अन्दर चले जाते हैं।
    इसी तरह बच्चों मे अंट -संट (junk food) खाने की प्रवृति ने भी लियोकोडर्मा की बढती हुई समस्या मे इजाफ़ा किया है. 
  • l08.jpg  डा मौफ़टी के अनुसार ऐसे भोज्य तत्वों का समावेश खाने मे करना चाहिये जिनमे सोरेलिन (psoralen )की मात्रा अधिक हो जैसे चुकन्दर, गाजर, छुआरे, पालक आदि ।
  • dsc00639.jpg आटे मे से चोकर को हटाने की कवायद इधर अधिक देखी जाने लगी है , लेकिब जहाँ चोकर के तन्तु (fibre) पाचन क्रिया को आसान बनाते हैं , वही दूसरी तरफ़ शरीर मे आवशयक सोरेलिन भी सप्लाई करते हैं।
  • अमिबिक संक्रमण (Amoebiasis) और जियारडिया के संक्रमण (giardiasis) के सफ़ेद दाग के रोगियों मे प्रमाण मिलने से हमारी नजर दूषित पानी की तरफ़ भी जाती है, जहाँ तक सभव हो पानी को उबाल कर पीना चाहिये , विशेष कर लखनऊ और कानपुर जैसे शहरों के लिये तो यह बहुत ही आवशयक है।
  •  दूध या दूध से बनी वस्तुयें, खट्टे और रस भरे फ़ल भी आयुर्वेद चिकित्सा पद्दति के अनुसार हानिकारक है।

 

अगले भाग मे हम देखेगें लियकोडर्मा  पर हुये  होम्योपैथिक शोध-कार्य और साथ ही में प्रमुख होम्योपैथिक चिकित्सकों के मत ।

क्रमश: आगे जारी ……

 

संबधित पोस्ट :

1. VITILIGO & HOMEOPATHY
2. Leucoderma and Homeopathy ( सफ़ेद दाग और होम्योपैथी)
3. सफ़ेद दाग और होम्योपैथी- आशा की एक किरण -भाग-१ (Leucoderma & homeopathy- an ultimate hope -Part-1)
4.coming soon ….सफ़ेद दाग और होम्योपैथी- आशा की एक किरण -भाग-3 (Leucoderma & homeopathy- an ultimate hope -Part-3)


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प्रसूता मे दूध का अभाव और होम्योपैथी ( Lactation failure & Homeopathy)

July 12, 2007 · 18 Comments

sto0008.jpg
डा जयश्री जोशी एक बाल रोग चिकित्सका हैं और महाराष्ट्र के किसी ग्रामीण इलाके मे प्रैकिटिस करती हैं . एलोपैथिक चिकित्सक होने के बावजूद उनका रुझान होम्योपैथी , आयुर्वेदिक और अन्य भारतीय पद्दतियों की तरफ़ अधिक है . हाल ही मे उन्होने ”Lactation failure ’यानि “प्रसूता में दूध का अभाव ” पर एक पोस्ट लिखी थी , देखे यहाँ . कुछ होम्योपैथिक औषधियों का जिक्र उन्होने उस पोस्ट मे किया था , वह मेरे लिये लगभग नई थी , जिनका उपयोग मैने नही किया है , मै अभी तक Ricinus com Q और Lecithin 3x से काफ़ी अच्छे परिणाम निकाल रहा हूँ, इसलिये शायद किसी और नयी औषधि की तरफ़ देखने का मन न हुआ . डा जोशी ने जिन तीन का जिक्र किया था, वह निम्म हैं :
1. गैलेगा आफ़ (Galega officianlis)
2. एसपेरैगैस रेसीमोसा (Asparagus racemosa)
3. विथिनीया सोमिनीफ़ेरा या अशवगन्धा (Withania somnifera)
गत सप्ताह मुझे गैलेगा की प्रमाणिकता देखने का अवसर मिल ही गया , जुडवाँ बच्चे की एक माँ ने जब मुझसे लैक्टेशन समस्या के लिये सलाह माँगी तो हर बार की तरह मैने अपने पुराने विशवस्तों पर निर्भर रहना उचित समझा लेकिन अब कि कोई परिणाम न देखकर गैलगा देने की ठानी , मात्र ४८ घटों के अन्दर गैलगा ने यह समाधान मानो चुटकी मे कर दिया. डां जोशी , आपका धन्यवाद ! लेकिन गैलेगा को छोडकर मुझे अन्य दोनो औषधियों के क्लिनिकल प्रमाण किसी कोश मे नही मिले , यह हो सकता है कि डा जोशी के यह व्यक्तिगत अनुभव रहे हो जो उन्होने अपने रोगियों मे देकर हासिल किये. एक नजर गैलगा की तरफ़ :
1- गैल्र्गा आफ़ (Galega officianlis)

galega-officinalis.jpg
गैलगा को होम्योपैथिक मैटेरिया मेडिका मे लाने का श्रेय डा. कैरन डी ला कैरी को जाता है . इस औषधि का उल्लेख भारत की होम्योपैथिक फ़ारमाकोपिया और यूनाईटेड स्टेस्ट्स की होम्योपैथिक फ़ारमाकोपिया में है.
होम्योपैथिक उपयोग:
भीषण कमर दर्द , अत्यन्त कमजोरी महसूस करना, रक्तभाव और पाचन क्रिया अव्यवस्थित रहने मे इसके प्रयोग सार्थक है.
इसके अलावा गैलगा का उपयोग प्रसूता मे दूध बढाने मे भी देखा गया है.
गैलगा मे ऐलकैलोडियज (alkaloids) , सैपोनिन (saponnins), फ़्लावोनोड(flavonoids) और टैनिन (tannins)पाये जाते हैं.
गैलगा का एक और उपयोग बढी हुयी शर्करा (blood sugar) को कम करने मे भी है.
पोटेन्सी : Q/1x
इस औषधि को मधुमेह के रोगियों मे प्रयोग करते समय सावधानी रखें और Q की खुराक को सेट करें.

2- ऐसपैगस रैसीमोसा ( Asparagus racemosa)
asparagus-racemosus1.jpg
3- अशवगन्धा ( Withania somnifera)
withania-somnifera.jpg
ऐसपैगस रैसीमोसा ( Asparagus racemosa) और अशवगन्धा (Withania somnifera) के लिये यहाँ देखें.

लैकेटेशन से संबधित कम्पलीट रिपर्टरी और सिन्थिसिस रिपर्टरी पर उपलब्ध संकलन को देखने के लिये नीचे दिये चित्र पर किल्क करें . ( pdf आधारित इस फ़ाइल को देखने के लिये एडोब रीडर का प्रयोग करें )
lacta.gif

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हकीकत बयान करते यह हाथ के नाखून

February 13, 2007 · 4 Comments

gabrielletraub.jpg nailsकैलीफ़ोर्निया की डा गैब्रैली ट्रायूब (Dr. Gabrielle Traub) द्वारा रचित यह लेख जनवरी 2007 की Homeopathy 4 Everyone मे प्रकाशित हुआ था। यह लेख और उसका संकलन वैसे तो एक आम चिकित्सक के किये कोई विशेष नहीं था लेकिन इसकी विशेषता एक होम्योपैथिक चिकित्सक के लिये नाखून की बनावट और रंग के आधार पर औषधि के चयन मे अवशय है। इस लेख को यहाँ देख सकते हैं और इसका Power Point Presentation यहाँ से डाउनलोड कर सकते है ।

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भागते युग की मशीनी समस्या- सरवाईकल स्पान्डयलोसिस(Cervical Spondylosis)

January 16, 2007 · 19 Comments

इधर के कुछ सालों मे अगर हम गौर करें तो सरवाईकल स्पान्डयलोसिस के रोगियों मे बेतहाशा वृद्दि हुयी है। ओ पी डी मे आने वाले रोगियों मे जहाँ इक्का-दुक्का ही रोगी इस रोग के नजर आते थे वहीं अब काफ़ी बडी संख्या इसकी नजर आती है। आयु, वर्ग विशेष से भी अब इसका लेना-देना न रहा। 15 वर्ष की आयु से बढती हुयी उभ्र के लोगों मे यह समस्या आम देखी जा सकती है। इस लेख मे मेरुदंड की संरचना ,इस मशीनी समस्या के कारण, लक्षण और महत्वूर्ण जाँचे, , फ़िजयोथिरेपी और एकयूप्रेशर की उपयोगिता और होम्योपैथिक औषधियों की भूमिका पर एक नजर देखेगें। जहाँ यह लेख आम होम्योपैथिक चिकित्सक की याददाश्त को रिफ़्रेश करेगा वहीं आम लोगों को भी इस समस्या और इससे उत्पन्न होने वाले लक्षणों से बचने के बारे मे भी उपयोगी जानकारी देगा। ( हाँ , एक आवशयक सलाह : आम जन के लिये : इस लेख मे दी गयी फ़िजयोथिरेपी और एकयूप्रेशर की व्यायामों और होम्योपैथिक औषधियों को आजमाने की चेष्टा न करें, आपका चिकित्सक और फ़िजयोथिरेपिस्ट ही आपको सर्वश्रेष्ठ सलाह दे सकता है। )
मेरुदण्ड की संरचना:

cev 1

आकृति नं0 1
यह एक सम्पूर्ण मेरुदंड की संरचना है , ऊपर दिये चित्र से स्पष्ट है कि मेरुदण्ड के पाँच हिस्से हैं-

    1-सर्वाईकल (Cervical)
    2-थोरॅसिक (Thoracic)
    3-लम्बर (Lumbar)
    4-सैकरम (Sacrum)
    5-कौसिक्स (coccyx)
    सर्वाईकल स्पाईन मेरुदण्ड की पाँच वर्टीबरी से मिल कर बनी होती है। C1-C7 जहाँ C सरवईकल का सूचक है। C1 सिर के पृष्ठ भाग के और C7 स्पाइन के थोरेसिक हिस्से से सटी रहती है।
    लक्षण और कारण
    रोग के लक्षण कोई आवशयक नहीं कि सिर्फ़ गर्दन की दर्द और जकडन को ही लेकर आयें। विभिन्न रोगियों मे अलग -2 तरह के लक्षण देखे जाते हैं:

  • गर्दन की दर्द और जकडन, गर्दन स्थिर रहना, बहुत कम या न घूमना।
  • चक्कर आना ।
  • कन्धे का दर्द, कन्धे की जकडन और बाँह की नस का दर्द ।
  •  ऊगलियों और हथेलियों का सुन्नपन 
  •  गर्दन की दर्द के प्रमुख कारण:
      वजह अनेक लेकिन सार एक, अनियमित और अनियंत्रित लाइफ़ स्टाईल। वजह आप स्वंय खोजें:
  • टेढे-मेढे होकर सोना, हमेशा लचक्दार बिछौनों पर सोना, आरामदेह सोफ़ों तथा गद्देदार कुर्सी पर घटो बैठे रहना, सोते समय ऊँचा सिरहाना (तकिया) रखना, लेट कर टी वी देखना ।
  • गलत ढंग से वाहन चलाना
  • बहुत झुक कर बैठ कर पढना, लेटकर पढना ।
  • घटों भर सिलाई, बुनाई, व कशीदा करने वाले लोगों।
  • गलत ढंग से और शारीरिक शक्ति से अधिक बोझ उठाना
  • व्यायाम न करना और चिंताग्रस्त जीवन जीना।
  • संतुलित भोजन न लेना, भोजन मे विटामिन डी की कमी रहना, अधिक मात्रा मे चीनी और मीठाईयाँ खाना।
  • गठिया से पीडित रोगी
  • घंटों कम्पयूटर के सामने बैठना और ब्लागिगं करना )

    महत्वपूर्ण जाँचे:

  • X-rays
  • Computed Tomography
  • Magnetic Resonance Imaging
  • Myelogram/CT
  • Discography

    अधिकतर रोगियों मे X-rays ही हकीकत बयान कर देते हैं। सरवाईकल डिस्क मे आने वाली आम समस्यायें नीचे दिये चित्र से स्पष्ट हो जाती हैं। इनमें अधिकतर रोगियों मे interverteberal disc spaces का कम हो जाना और osteophyte का बनना मुख्य है। देखें नीचे आकृति नं0 2

    CERV2CERV4
    CERV3

    रोग निवारण के लिये प्रचलित उपचार तरीके:


    मुसीबत मोल लेने से परहेज बेहतर:

    मुसीबत न आये इसलिये यह आवशयक है कि उन मुसीबतों को बुलावा न दिया जाय । पीठ की दर्द के लिये भी यही सावधानियाँ काम आयेगीं। इसलिये निम्म बातों का ध्यान रखें और जीवन सुचारु रुप से जियें:

  • Correct way of sitting जब भी कुर्सी या सोफ़े पर बैठें तो पीठ को सीधी रखें तथा घुटने नितम्बों से ऊँचे होने चाहिये।
  • चलते समय शरीर सीधी अवस्था मे होना चाहिये।
  • गाडी चलाते समय अपनी पीठ को सीधी रखें।
  • कोमल, फ़ोम के गद्दो पर लेटना छोडकर तख्त का प्रयोग करें ।
  • घर का काम करते समय पीठ को सीधी रखें।
  • गर्दन की सिकाई

    1-Cervical diathermy

    2-Ultrasound radiations

    3-Hot fomentatations

    तीव्र दर्द के हालात मे गर्म पानी मे नमक डाल कर सिकाई करें। यह क्रम दिन मे कम 3-4 बार अवश्य करें। दर्द को जल्द आराम देने मे यह काफ़ी लाभदायक है।

    तकिये (pillow) की बनावट
    सिरहाने को लेकर लोगों मे अलग- 2 तरह की भ्रान्तियॉ हैं। सरवाईकल स्प्पान्डयलोसिस से पीडित व्यक्ति या तो तकिया लगाना ही बन्द कर देता है या फ़िर अन्य सहारे का प्रयोग करने लगता है जैसे तौलिये को मोड कर सिर के नीचे रखना। लेकिन यह सब प्रयोग अन्तः उसके लिये नुकसान ही पैदा करते हैं। नीचे दी गयी आकृति न 3 के अनुसार तकिया बनवायें जो बाजार मे बिक रहे सिरहाने की तुलना मे सुविधाजनक रहता है।pillow

    Cervical Collar ( सरवाइकल कौलर) और Cervical Traction ( सरवाइकल ट्रेक्शन )
    सरवाईकल स्प्पान्डयलोसिस के हर रोगी मे कौलर और ट्रेक्शन की आवशयकता नही पडती , लेकिन आजकल इसका प्रयोग कई जगह बेवजह भी होता रहता है। लेकिन रोगी के रोग की वजह के अनुसार इसका महत्व भी है।
    जाडे आते ही सरवाईकल स्प्पान्डयलोसिस के रोगियों की समस्यायें बढनी शुरु हो जाती हैं, बाजार मे मिलने वाले कालर के अपेक्षा आम प्रयोग होने वाले मफ़लर को गले मे circular way मे इस तरह बाधें कि गर्दन का घुमाव नीचे की तरफ़ अधिक न हो। देखने मे भी यह अट-पटा नहीं लगता और गर्दन की माँसपेशियों को ठंडक से भी बचाव अच्छी तरह से कर लेता है।
    एकयूप्रेशर (Acupressure)
    बहुत से चिकित्सक संभवत: एकयूप्रेशर की उपयोगिता से सहमत नहीं रहते हैं, लेकिन सरवाईकल स्प्पान्डयलोसिस के कई रोगियों मे मैने इस पद्दति को बखूबी आजमाया है , भले ही यह कारणों को दूर करने मे सक्षम न हो लेकिन दर्द की तीव्रता को यह काफ़ी जल्द आराम दे देती है। सरवाईकल स्प्पान्डयलोसिस मे प्रयुक्त होने वाले व्यायामों के चित्र यहाँ दिये हैं, जिन एक्यूप्रेशर व्यायामों को मै अक्सर प्रयोग कराता हूँ उनके चित्र नीचे दिये हैं।
    acu 5ACU6
    ACU7ACU8

    सरवाईकल स्प्पान्डयलोसिस मे फ़िजयोथिरेपी की भूमिका:
    सरवाईकल व्यायाम दर्द की तीव्रता को घटाते हैं ही साथ मे अकडे हुये जोडों और माँसपेशियों को भी सही करते हैं ।
    मूलत: दो प्रकार के व्यायामों पर सरवाईकल स्प्पान्डयलोसिस मे जोर रहता है:

    1-Range of motion exercises

    2-Isometric exercises

    Range of motion exercises
    नीचे दी हुयी आकृति motion exercises को स्पष्ट कर रही है:
    Range of motion exercises

  • अपने सिर को दायें तरफ़ कन्धे तक झुकायें , थोडा रूकें और तत्पश्चात मध्य मे लायें। यही क्रम बायें तरफ़ भी करें।

  • अपनी ठुड्डी ( chin) को सीने की तरफ़ झुकायें, रुकें,तत्पश्चात सिर को पीछे ले जायें।
  • अपने सिर को बायें तरफ़ के कान की तरफ़ मोडें, रुकें और तत्पश्चात मध्य मे लायें। यही क्रम बायें तरफ़ भी करें।
    Isometric exercises

Isometric exercises को करते समय साँस को रोके नहीं। हर व्यायाम को 5-6 बार तक करें और इसके बाद शरीर को ढीला छोड दें।

  • अपने माथे को हथेलियों पर दबाब दे और सर को अपनी जगह से हिलने न दें।
  • अपनी हथेलियों का दबाब सिर के बायें तरफ़ दे और सिर को हिलने न दें। यही क्रम दायें तरफ़ भी करें।
  • अपनी दोनों हथेलियों का दबाब सिर के पीछे दें और सिर को स्थिर रखें।
  • अपनी हथेलियों का दबाब माथे पर दें और सिर को स्थिर रखें।

फ़िजयोथिरेपी व्यायामों को करते समय यह बात हमेशा ध्यान रखें कि अगर किसी भी समय ऐसा लगे कि दर्द का वेग बढ रहा है तो व्यायाम कदापि न करें। “दर्द नहीं तो व्यायाम करने से क्या लाभ” का फ़न्डा न अपनायें। सरवाईकल व्यायामों को कम से कम दिन मे दो बार अवशय करें ।
2-साभार श्री रवि रतलामी :
Noname
एक सपाट बिस्तर या फ़र्श पर बिना तकिये के पीठ के बल लेट जाएँ. फिर अपनी गर्दन को जितना संभव हो सके उतना धीरे धीरे ऊपर उठाते जाएँ. ध्यान रहे, पीठ का हिस्सा न उठे. गहरी से गहरी सांस भीतर खींचें. फिर उतने ही धीरे धीरे गर्दन नीचे करते जाएँ. सांस धीरे धीरे छोड़ें और पूरी ताकत से अंदर फेफड़े की हवा बाहर फेंकें. यह व्यायाम कम से कम एक दर्जन बार, सुबह-शाम करें. इस व्यायाम से आपके गर्दन की मांसपेशियों को ताकत मिलती है तथा इसके परिणाम आपको पंद्रह दिवस के भीतर मिलने लगेंगे. नियमित व्यायाम से गर्दन दर्द से पीछा छुड़ाया जा सकता है.
होम्योपैथी चिकित्सा (Homeopathic Treatment)
जहाँ बाकी चिकित्सा पद्धतियाँ विशेष कर एलोपैथी चिकित्सा पद्धति सिर्फ़ दर्दनाशक औषधियों तक ही सीमित रहती हैं, वहीं होम्योपैथी रोग के मूलकारण और उससे उत्पन्न होनी वाली समस्यायों को दूर करने मे सक्षम है। एक होम्योपैथिक चिकित्सक को सरवाईकल रोगों मे न सिर्फ़ औषधि के चयन बल्कि रोग को management करने के तरीको के बारे मे भी अच्छी तरह जानना चाहिये। आप का दृष्टिकोण समय के साथ चले , इसी मे इस पद्दति की सफ़लता निहित होगी।
सबसे पहले लेते हैं सरवाईकल रोग की थेरापियूटिक्स (therapeuctics) सेक्शन की , उसके बाद रिपरटारजेशन (repertorisation) की।

  • थेरापियूटिक्स (therapeuctics)

सरवाईकल रोगों के औषधि चयन करते समय रोग के कारणों पर अपनी नजरें जमायें रखें। विस्तार मे reference के लिये Samuel Lilientheal की
Therapeuctics को देखें।

  • Intervertebreal spaces के कम हो जाने और osteophyte के बन जाने पर –hekla lava, calc fl, phos
  • गर्दन की अकडन दर्द के सथ–actae racemosa, rhus tox, cocculus ind
  • Neurological लक्षणों के साथ, हाथ और ऊँगलियों का सुन्नपन्न–Kalmia,Parrirera brava,
  • दर्द का वेग एक या दोनो हाथों मे जाना—kalmia,nux
  • चक्कर के साथ—conium,cocculus ind
  • न सहन करने योग्य पीडा–gaultheria,stellaria media,colchichum

रिपरटारजेशन (repertorisation)
यह हमेशा ध्यान रखें कि किसी रोग की थेरापियूटिक्स (therapeuctics) हमेशा चिकित्सक को सीमित दायरे मे रख देती है। अगर समय का अभाव न हो तो सरवाईकल रोगों मे भी रिपरटारजेशन का साहारा लेने मे कोताही न बरतें।
सरवाईकल रोगों मे रिपरटारजेशन (repertorisation) करने के आसान सुझाव:

  • General symptoms को सबसे पहले वरीयता क्रम मे डालें; तत्पश्चात् particular और common symptoms का नम्बर लगायें। किसी भी रोग मे rare , characteristic और striking लक्षणों को तलाशने की कोशिश करें।

मै इस बात को अच्छी तरह से समझ सकता हूँ कि विशेष कर नये होम्योपैथी चिकित्सकों को लक्षणों को लेने मे और repertorisation चाहे manual या computerised करने मे कई दुशवारियाँ आती हैं । repertorisation करने के तरीके भले ही अलग -2 हों लेकिन सार सब का एक ही है कि सही सिमिलिमम (similimum) को ढूंढना ।

  • computerised repertorisation क्यों आज की आवश्यकता है इसके लिये यहाँ देखें
  • पुराने और जटिल रोगों (chronic diseases) मे case taking लेने का आसान सा तरीका यहाँ उपलब्ध है, समय -2 पर इसको और भी आसान बनाने की कोशिश की गयी है, इसको  यहाँ देखें
  • सही तरीकों से लक्षणों को लेना क्यों होम्योपैथी मे आवशयक है , इसके लिये यह भी देखें
  • नये होम्योपैथिक चिकित्सकों को रुबरिक्स(rubrics) बनाने मे या रडार, क्लासिक 8 या मर्क्यूरिस के साफ़्ट्वेएर मे लक्षणों डालने मे समस्या हो तो आरकुट मे चल रही Revolutionized Homoeopathy से सम्पर्क करें। डा प्रवीन, डा शशिकान्त, मै और अन्य आपकी सहायता के लिये हमेशा तत्पर मिलेगें।

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डेंगूं या डेंगूं फ़ोबिया

October 17, 2006 · 3 Comments

कम से कम लखनऊ के बारे मे अवशय कह सकता हूँ कि यहाँ डेंगूं का प्रकोप कम है और डेंगूं फ़ोबिया अधिक । यह मेरा निष्कर्ष अचानक नहीं है परन्तु मेरे और भी साथी चिकित्सकों का भी जो दूसरी पद्दतियों से हैं। गत 10 दिनों मे प्लेटलेटस की गणना मैने करीब 120 रोगियों मे करायी उनमे अधिकाश मे प्लेटलेटस की संख्या सामान्य निकली और जिन रोगियों मे प्लेटलेटस बहुत कम निकले , वह भी दोबारा जाँच कराने मे सामान्य निकले । यह एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य है और इस बात को भी इंगित करता है कि कहीं कुछ गडबड है. इसलिये अगर आप के घर मे या फ़िर किसी परिचित मे डेगू की जाँच मे प्लेटलेटस कम निकल रहे हैं उनकी जाँच दोबारा किसी और पैथोलोजी लैब मे अवशय करवायें। कुछ साल पहले तक हर पैथोलोजी लैब प्लेटलेटस की जाँच स्लाइड से कराते थे लेकिन अब यह ऐनालाइजर से करते हैं , जिन रिपोर्टों मे यह कम पाया गया और बाद मे 24 घटें के अन्दर यह सही पाया गया , वह लखनऊ की कोई ऐसी-वैसी लैब नही हैं बल्कि अत्यंत नामी लैब हैं।

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चिकनगुनिया

October 14, 2006 · 7 Comments

चिकनगुनिया
चिकनगुनिया भी एडीज एजेप्टाई मच्छर से फ़ैलता है। इसके लक्षण भी डेंगू से मिलते हैं लेकिन इसमे मृत्यु की संभावना नहीं होती है।

लक्षण:-
अचानक तेज बुखार के साथ सिरदर्द, जी मिचलाना,उल्टी,सर्दी लगना,जोडों मे दर्द और सूजन, त्वचा मे लाल चकत्ते इसके प्रमुख लक्षण हैं।

औषधियाँ:
चिकनगुनिया की प्रतिरोधक औषधि भी eupatorium perfolatum ही है, देखें यहाँ। चिकनगुनिया और होम्योपैथी पर वृहद शोध पत्र कुछ दिन पहले डा सुनीला ने एक साइन्टिफ़िक सेमिनार मे पेश किया था, जिसको मैने इस पोस्ट के साथ संलग्न किया है।

Source:CHIKUNGUNYA
A Homoeopathic Prospective.
Dr.Sunila BHMS, MD(Hom) Scholar
Govt. Homoeopathic Medical College. Calicut. Kerala
Email : babuabu@gmail.com

(Article presented by the author in the scientific seminar conducted by Govt. Homoeopathic Medical College. Calicut on 18.09.06 )

The Chikungunya epidemic currently attacked millions of people in Maharashtra, Karnataka, Tamilnadu, Andhrapradesh and Kerala. Chikungunya is not considered to be fatal. However, in 2005-2006, 200 deaths have been associated with chikungunya on Réunion Island and a widespread outbreak in Southern India (especially in Karnataka, Andhra Pradesh & Kerala). Chikungunya virus is highly infective and disabling but is not transmissible between people.( recent researches reported tramission from mother to foetus)

Chikungunya (also known as Chicken Guinea) is a relatively rare form of viral fever resembling dengue fever; caused by an alphavirus that is spread by mosquito bites from the Aedes aegypti mosquito, though recent research by the Pasteur Institute in Paris claims the virus has suffered a mutation that enables it to be transmitted by Aedes Albopictus (Tiger mosquito). The name is derived from the Makonde word meaning “that which bends up” in reference to the stooped posture developed as a result of the arthritic symptoms of the disease.

Epidemiology
Chikungunya was first described in Tanzania, Africa in 1952 following an outbreak on the Makonde plateau. The disease was first described by Marion Robinson and W.H.R. Lumsden. An outbreak of chikungunya was discovered in Port Klang in Malaysia in 1999 affecting 27 people. In February 2005, an outbreak was recorded on the French island of Réunion in the Indian Ocean. In Mauritius, 3,500 islanders have been hit in 2005. There have also been cases in Madagascar, Mayotte and the Seychelles.

In 2006, there was a big outbreak in the Andhra Pradesh state in India. Nearly 200,000 people were affected by this disease. Some deaths have been reported but it was thought to be due mainly to the inappropriate use of antibiotics and anti inflammatory tablets. As this virus can cause thrombocytopenia, injudicious use of these drugs can cause erosions in the gastric epithelium leading to upper GI bleeding (due to thrombocytopenia). According to the National Institute of Virology, Pune out of362 samples from Kadappa district in Andhrapradesh state 139 were found positive for chikungunya.

Over 2000 cases of chikungunya fever were reported from Maharashtra state, in March 2006. In Orissa state 5000 cases of were reported in February 2006. In Bangalore, there was an outbreak of Chikungunya in May 2006. In Tamilnadu, 20,000 cases were reported in June 2006. Earlier it was found spreading mostly in outskirts of Bangalore, but now it has started spreading in the city also.Over 800000lakh cvases were reported from Karnataka state. Over 20000 cases were reported from Thiruvananthapuram, Aleppey, Kottayam, Ernakulam, Palakkad, Malappuram and Kozhikkode district in Kerala state. 10 deaths have been reported from Aleppy district. 800 cases were reported from Cherthala of Aleppy district.300 cases were reported from Kollam district.

More seropositivity is found among the age group between 51- 55 years.

Chikungunya fever is caused by Chikugunya virus. They are spherical enveloped virions, 60 nm diameters and have single stranded positive sense RNA genome.

Characteristics of CHIKUNGUNYA virus
Virus classification
Group: Group IV ((+)ssRNA)
Family: Togaviridae
Genus: Alphavirus
Species: Chikungunya virus

Chikungunya virus is closely related to O’nyong’nyong virus. O’nyong’nyong virus caused a major epidemic of arthritis and rash involving at least 2 million people in Eastern and Central Africa in 1960s. After its mysterious emergence the virus virtually disappeared leaving only occasional evidence of its presence in Kenya.

The chikungunya virus is spread by mosquito bites from the Aedes aegypti mosquito. Mosquitoes become infected when they feed on a person infected with the chikungunya virus. Monkeys, and possibly other wild animals, may also serve as reservoirs of the virus. Infected mosquitoes can then spread the virus to other humans when they bite.

chikmungiya

Aedes aegypti (the yellow fever mosquito), a household container breeder and aggressive daytime bitter which is attracted to humans, is the primary vector of chikungunya virus to humans. Aedes albopictus (the Asian tiger mosquito) may also play a role in human transmission is Asia, and various forest-dwelling mosquito species in Africa have been found to be infected with the virus.

Aedes breeds in artificial accumulations of water. It needs only 2ml of water for breeding. It lays eggs singly. They do not fly over long distance, usually less than 100 metres. Eggs can resist desiccation for upto 1year. The eggs will hatch when flooded by deoxygenated water.

Aedes is the first proved vector of a virus disease- Yellow fever. Human blood is preferred over other animals with ankles as a favourite bite area.

Symptoms
After an incubation period of 3-12 days there is a sudden onset of flu-like symptoms including a severe headache, chills, fever (>40°C, 104°F), joint pain, backache, nausea, vomiting, petechial or maculopapular rash usually involving the limbs and trunks. Migratory polyarthritis mainly affects the small joints of the hands, wrists, ankles and feet with lesser involvement of the larger joints. Joints of the extremities in particular become swollen and painful to the touch. Haemorrhage is rare. There can also be headache, conjunctival infection and slight photophobia.

In the present epidemic in the state of Andhra Pradesh in India, high fever and crippling joint pain is the prevalent complaint. Fever typically lasts for two days and abruptly comes down. However joint pain, intense headache, insomnia and an extreme degree of prostration lasts for a variable period, usually for about 5 to 7 days.

Dermatological manifestations observed in a recent outbreak of Chikungunya fever are as follows:

• Maculopapular rash like ulcers over scrotum, crural areas and axilla.
• Nasal blotchy erythema
• Freckle-like pigmentation over centro-facial area
• Flagellate pigmentation on face and extremities
• Lichenoid eruption and hyperpigmentation in photodistributed areas
• Multiple aphthous ulcers
• Lympoedema
• Multiple ecchymotic spots (Children)
• Vesiculobullous lesions (infants)
• Subungual haemorrhage.

Investigations
• A few patients develop Leucopenia.
• Elevated levels of aspartate aminotransferace (AST) and C-reactive protein
• Mildly decreased platelet counts.

Diagnosis
Sudden severe headache, chills, fever, joint and muscle pain are the commonest symptoms. The diagnostic tests include detection of antigens or antibodies in the blood, using ELISA (or EIA - enzyme immunoassay) or molecular techniques like polymerase chain reaction (PCR). The antibodies detected by serological assays like ELISA require an IgM capture assay to distinguish it from dengue fever

Differential Diagnosis
1. Dengue Fever
Of all the arthropod- borne viral diseases, Dengue fever is the most common. This infection may be asymptomatic or may lead to
1. Classical Dengue Fever
2 .Dengue Haemorrhagic fever without shock
3. Dengue Haemorrhagic fever with shock

The main vector is Aedes aegypti mosquito. The illness is characterised by a incubation period of 3 to 10 days. The onset is sudden with chills and high fever, intense headache, muscle and joint pains which prevent all movement. Within 24 hrs retro-orbital pain and photophobia develops. Other symptoms include extreme weakness, anorexia, constipation, colicky pain and abdominal tenderness. Fever is typically but not inevitably followed by a remission of a few hrs to2 days. The rash may be diffuse flushing, mottling, or fleeting pin point eruptions on face, neck and chest during the first half of the febrile period and a conspicuous rash that may be maculopapular or scarlatiform on 3rd or 4th day. Fever lasts for about 5 days.

Dengue haemorrhagic fever is confined exclusively to children less than 15 yrs of age. There may be plasma leakage and abnormal haemostasis, as manifested by a rising haematocrit value and moderate to marked thrombocytopenia.

In dengue shock syndrome shock is present along with all the above criteria.

2. Yellow fever
It is a zoonotic disease affecting principally monkeys and other vertebrates. It shares clinical features of dengue fever but is characterised by more severe hepatic and renal involvement

3. Other viral fevers
Many of the viruses produce encephalitis, haemorrhagic fever or arthritis in various combinations. There may be high fever with backache and joint pain. Clinical features depend upon the type of virus causing infection.

a. SINDBIS virus infection: Transmitted among birds by mosquitoes. The disease begins with rash and arthralgia. Constitutional symptoms are not marked and fever is modest or lacking altogether.

b. MAYARO fever: Transmitted by Haemagogus mosquitoes. It causes a frequently endemic or epidemic infection of humans and appears to produce a syndrome resembling Chikungunya.

c. Epidemic Polyarthritis (ROSS RIVER virus infection): Constitutional symptoms are absent in many cases. Many patients are incapacitated by joint involvement.

d. Influenza: It is an acute respiratory illness caused by infection with influenza virus. Respiratory tract infection is accompanied by systemic signs and symptoms such as fever, headache and myalgia

4. Eruptive fevers like measles and German measles

Complications
• Super added infection with bacteria
• Meningo encephalitis
• Death occurs in immunocomprised patients.
• Myocarditis
• Pneumonias
Complications were observed due to injudicious application of certain anti-inflammatory drugs (as reported by www.chikungunya.co.uk)

Prevention
The best way to avoid CHIKV infection is to prevent mosquito bites.

There is no vaccine or preventive drug except homoeopathic medicines.. Preventive tips are similar to those for dengue or West Nile virus:

• Use insect repellent.
• Wear long sleeves and pants.
• Have secure screens on windows and doors to keep mosquitoes out.
• Get rid of mosquito breeding sites by emptying standing water from flower pots, buckets and barrels. Change the water in pet dishes. Drill holes in tire swings so water drains out. Keep children’s wading pools empty and on their sides when they aren’t being used.
• Additionally, a person with chikungunya fever or dengue should limit their exposure to mosquito bites in order to avoid further spreading the infection. The person should stay indoors or under a mosquito net.

Immunity
One attack confers life long immunity.

Homoeopathic Prophylaxis
As per the guidelines laid down by Dr. Samuel Hahnemann in the Organon a Genus epidemics has to be found out in the specific area and it could be the best to be found out in the specific area and it could be the best prophylactic remedy.

Many homeopaths consider Eupatorium perfoliatum as a preventive medicine for Chikungunya. The most commonly suggested potency as prophylaxis is 200C of Eupatorium perfoliatum. As per the reports the homoeopathic remedies useful for propylaxis are - Eupatorium Perfoliatum, Gelsemium, Rhustox, Bryonia Alba, Ars alb and Aconite.

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